कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 310, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें३०० | कंब रामायण
वे (राम-लक्ष्मण) उस दिन वहीं उस मुनि के साथ आश्रम में रहे। फिर, उन जानकी को, जिन्होंने उस मुनिवर की पवित्रता तथा अत्युत्तम पत्नी अनसूया की आज्ञा से सुन्दर आभूषणों, वस्त्रों एवं चन्दन को धारण किया था, साथ लेकर चले और महान् दंडकारण्य में प्रविष्ट हुए।
तब उनके सम्मुख एक राक्षस आया, जो चौदह नयनवाले, उनसे दुगुने विषैले, गोलाकार एवं कठोर नयनोंवाले पर्वतव्यापी चौदह हरणों को, अति तीक्ष्ण घोर त्रिशूल में घने रूप में पिरोकर एक हाथ में लिये हुए था।
उसके सिर पर रक्त वर्णवाले घुँघराले घने बाल थे, मानो विष ही घोर रूप धारण करके चन्दनवन से आ रहे हों। वह इस प्रकार शीघ्रगति से आया कि बड़े बड़ों से घिरे पर्वत भी उसके पैरों के नीचे दबकर धूल के समान हो गये।
ताले फल के समान (लाल) दिखाई पड़नेवाली उसकी आँखों से स्फुलिंग निकल रहे थे। उसके नेत्रों से विष आकाश की ओर उठता था; पर्वत हिल जाते थे; उष्णकिरण (सूर्य) मंद पड़ जाता था। विशाल समुद्र में घिरी अरती लहर नीचे ही रहती थी। अति बलवान् यम भी मन में (डर से) शिथिल हो उठता था।
उत्तप्त सिंह, उसके कानों में (उन्हें पर्वत की कंदरा समझकर) प्रवेश करके गरज रहे थे। चारों ओर कांति बिखेरनेवाले मेरु-शिखर उसके कुंडल बने हुए थे। उसने साथ युद्ध में मरे हुए वीरों के रक्त-रूपी रक्तचन्दन से लिप्त होकर वह रक्त-आकाश की नकल करता था।
उसने आयुधधारी वीरों, शीघ्रगामी अश्वों, अति विशाल गजों, रथों, गर्जनशील सिंहों, प्राणहारी व्याघ्रों तथा नागों ने प्राय अनेक जन्तुओं को मारकर, उजले ढाँचे में उन्हें गूँथकर अनेक प्रकार की मालाएँ बना ली थीं और वे (मालाएँ) उसकी भुजाओं में लटक रही थीं।
उसकी उँगलियों के मध्य ग्रंथियों में रखे हुए पर्वतों के समान क्रोध में गर्जन करनेवाले गज दबे पड़े थे; जिन्हें वह अपने विशाल कर से उठा-उठाकर अति विशाल विष-सदृश अपने मुँह में भर लेता था और (मुँह के) एक ओर से उन्हें चबा रहा था, तो भी उसकी भूख बढ़ती ही रहती थी।
उत्तम स्वर्ग के वनों से रत्नों को निकालकर जिस प्रकार माला बनाते हैं, उसी प्रकार अप्सराओं की देह में, देवताओं के विमानों, उज्ज्वल नक्षत्रों एवं नक्षत्रों की बीच-बीच में जड़कर उसने विजय-मालाएँ बनाई थीं और उन्हें अपने वक्ष पर धारण कर लिया था।
उसके पाँवों में रत्नाकार की समता करनेवाले केश शोभ रहे थे। उसके कुंभ-सदृश कंधे पर इन्द्र का ऐरावत बँधा हुआ था; जिसका मुखपृष्ठ तथा दांतों के फलक चमक रहे थे।
(उसमें) अत्यन्त घनी कालिमा संयुक्त थी। तीक्ष्ण अत्याचार उमड़ रहा था। अति निष्ठुर पाप, विष, अग्नि—ये सब भयंकर रूप से बढ़ रहे थे। अतः, वह ऐसा लगता था, मानो अंधकार से लिप्त कलिकाल ही साकार होकर आ रहा हो।