कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 309, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंमंगलाचरण
आदि ब्रह्म भेद-रहित है तथा उत्पत्ति तथा विकारो से युक्त नाना प्रकार के रूपों ( वस्तुओ ) मे अनन्य होकर मिला रहता है । वह, उन वेदों के लिए, जो पुनः-पुनः उनका अध्ययन करते रहने से ज्ञान के यथार्थ स्वरूप को स्पष्ट करते हैं, एवं उन वेदों के ज्ञाता ब्राह्मणों और ब्रह्मादि देवताओं के लिए भी अज्ञेय है; वही परब्रह्म (अव रामचन्द्र के रूप में) हमारे ज्ञान का विषय हो गया है ।
<div align="center">●</div>अध्याय १
विराध-वध पटल
मनोहर वक्र धनुष को धारण करनेवाले वे राजकुमार ( राम-लक्ष्मण ), उन सीता देवी के साथ, जिनके दंत ऐसे थे, मानो चुनी हुई मुक्ताएँ पंक्तियों में जड़कर रखी गई हो, अपूर्व तपस्या से संपन्न अत्रि महामुनि के, पत्र-फल से परिपूर्ण घने वृक्षोंवाले वन मे जा पहुँचे ।
दिशाओ मे महान् भार का वहन किये हुए रहनेवाले, पीन और मनोहर सूँड़ो-वाले तथा छोटी आँखोवाले पर्वत-सदृश गजों की समता करनेवाले वे ( राम-लक्ष्मण ), उस वन मे प्रविष्ट हुए और काम आदि तीन दुर्गुणों को दूर करके तपस्या करनेवाले अतिपवित्र अत्रि मुनि को प्रणाम किया ।
वे मुनिवर ऐसे प्रसन्न हुए, जैसे अपने बन्धु ही आ गये हों और बोले—हे राजकुमारो ! तुम स्वयं यहाँ आकर हमें दर्शन दे रहे हो, ऐसे सौभाग्य सदा सुलभ नही होता । यह तो ऐसा है, मानो सब देवता तथा सभी लोक ही यहाँ आ गये हों । न जाने हम में से किसकी तपस्या का यह फल है ।