कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
मंगलाचरण
आदि ब्रह्म भेद-रहित है तथा उत्पत्ति तथा विकारो से युक्त नाना प्रकार के रूपों ( वस्तुओ ) मे अनन्य होकर मिला रहता है । वह, उन वेदों के लिए, जो पुनः-पुनः उनका अध्ययन करते रहने से ज्ञान के यथार्थ स्वरूप को स्पष्ट करते हैं, एवं उन वेदों के ज्ञाता ब्राह्मणों और ब्रह्मादि देवताओं के लिए भी अज्ञेय है; वही परब्रह्म (अव रामचन्द्र के रूप में) हमारे ज्ञान का विषय हो गया है ।
<div align="center">●</div>अध्याय १
विराध-वध पटल
मनोहर वक्र धनुष को धारण करनेवाले वे राजकुमार ( राम-लक्ष्मण ), उन सीता देवी के साथ, जिनके दंत ऐसे थे, मानो चुनी हुई मुक्ताएँ पंक्तियों में जड़कर रखी गई हो, अपूर्व तपस्या से संपन्न अत्रि महामुनि के, पत्र-फल से परिपूर्ण घने वृक्षोंवाले वन मे जा पहुँचे ।
दिशाओ मे महान् भार का वहन किये हुए रहनेवाले, पीन और मनोहर सूँड़ो-वाले तथा छोटी आँखोवाले पर्वत-सदृश गजों की समता करनेवाले वे ( राम-लक्ष्मण ), उस वन मे प्रविष्ट हुए और काम आदि तीन दुर्गुणों को दूर करके तपस्या करनेवाले अतिपवित्र अत्रि मुनि को प्रणाम किया ।
वे मुनिवर ऐसे प्रसन्न हुए, जैसे अपने बन्धु ही आ गये हों और बोले—हे राजकुमारो ! तुम स्वयं यहाँ आकर हमें दर्शन दे रहे हो, ऐसे सौभाग्य सदा सुलभ नही होता । यह तो ऐसा है, मानो सब देवता तथा सभी लोक ही यहाँ आ गये हों । न जाने हम में से किसकी तपस्या का यह फल है ।
३०० | कंब रामायण
वे (राम-लक्ष्मण) उस दिन वहीं उस मुनि के साथ आश्रम में रहे। फिर, उन जानकी को, जिन्होंने उस मुनिवर की पवित्रता तथा अत्युत्तम पत्नी अनसूया की आज्ञा से सुन्दर आभूषणों, वस्त्रों एवं चन्दन को धारण किया था, साथ लेकर चले और महान् दंडकारण्य में प्रविष्ट हुए।
तब उनके सम्मुख एक राक्षस आया, जो चौदह नयनवाले, उनसे दुगुने विषैले, गोलाकार एवं कठोर नयनोंवाले पर्वतव्यापी चौदह हरणों को, अति तीक्ष्ण घोर त्रिशूल में घने रूप में पिरोकर एक हाथ में लिये हुए था।
उसके सिर पर रक्त वर्णवाले घुँघराले घने बाल थे, मानो विष ही घोर रूप धारण करके चन्दनवन से आ रहे हों। वह इस प्रकार शीघ्रगति से आया कि बड़े बड़ों से घिरे पर्वत भी उसके पैरों के नीचे दबकर धूल के समान हो गये।
ताले फल के समान (लाल) दिखाई पड़नेवाली उसकी आँखों से स्फुलिंग निकल रहे थे। उसके नेत्रों से विष आकाश की ओर उठता था; पर्वत हिल जाते थे; उष्णकिरण (सूर्य) मंद पड़ जाता था। विशाल समुद्र में घिरी अरती लहर नीचे ही रहती थी। अति बलवान् यम भी मन में (डर से) शिथिल हो उठता था।
उत्तप्त सिंह, उसके कानों में (उन्हें पर्वत की कंदरा समझकर) प्रवेश करके गरज रहे थे। चारों ओर कांति बिखेरनेवाले मेरु-शिखर उसके कुंडल बने हुए थे। उसने साथ युद्ध में मरे हुए वीरों के रक्त-रूपी रक्तचन्दन से लिप्त होकर वह रक्त-आकाश की नकल करता था।
उसने आयुधधारी वीरों, शीघ्रगामी अश्वों, अति विशाल गजों, रथों, गर्जनशील सिंहों, प्राणहारी व्याघ्रों तथा नागों ने प्राय अनेक जन्तुओं को मारकर, उजले ढाँचे में उन्हें गूँथकर अनेक प्रकार की मालाएँ बना ली थीं और वे (मालाएँ) उसकी भुजाओं में लटक रही थीं।
उसकी उँगलियों के मध्य ग्रंथियों में रखे हुए पर्वतों के समान क्रोध में गर्जन करनेवाले गज दबे पड़े थे; जिन्हें वह अपने विशाल कर से उठा-उठाकर अति विशाल विष-सदृश अपने मुँह में भर लेता था और (मुँह के) एक ओर से उन्हें चबा रहा था, तो भी उसकी भूख बढ़ती ही रहती थी।
उत्तम स्वर्ग के वनों से रत्नों को निकालकर जिस प्रकार माला बनाते हैं, उसी प्रकार अप्सराओं की देह में, देवताओं के विमानों, उज्ज्वल नक्षत्रों एवं नक्षत्रों की बीच-बीच में जड़कर उसने विजय-मालाएँ बनाई थीं और उन्हें अपने वक्ष पर धारण कर लिया था।
उसके पाँवों में रत्नाकार की समता करनेवाले केश शोभ रहे थे। उसके कुंभ-सदृश कंधे पर इन्द्र का ऐरावत बँधा हुआ था; जिसका मुखपृष्ठ तथा दांतों के फलक चमक रहे थे।
(उसमें) अत्यन्त घनी कालिमा संयुक्त थी। तीक्ष्ण अत्याचार उमड़ रहा था। अति निष्ठुर पाप, विष, अग्नि—ये सब भयंकर रूप से बढ़ रहे थे। अतः, वह ऐसा लगता था, मानो अंधकार से लिप्त कलिकाल ही साकार होकर आ रहा हो।
अरण्यकाण्ड ३०१
मारे हुए कठोर व्याघ्रो के चर्म को ऐंठकर उसे (उत्तरीय के रूप मे) पहन लिया था। हाथियों के चर्मों को कटि मे बाँध लिया था। विजयी दिग्गजों के रत्न-समुदाय को अजगर-रूपी रस्सी में पिरोकर कटि-बध के जैसे बाँध लिया था।
रक्त नयनों एवं दीर्घ देहवाले अनुपम सर्पों की मणियो को जड़कर अनेक वलय उसने अपने शरीर मे पहन लिये थे। उसके करो में 'चलांचल' नामक शब्दायमान शंखो के वलय चमक रहे थे।
उसके पैर ऐसे थे कि वह उन पैरो से कैलास और मेरु पर्वत को गेंद के समान उछालकर उन्हे परस्पर टकरा सकता था। ऐसे पैरो से गंभीर गति मे वह चल रहा था। यद्यपि वह भूलोक में संचरण कर रहा था, तथापि देवलोक के निवासियो के मन मे भी उसके बल का प्रभाव पड़ता था।
उसका आकार ऐसा था, मानो सब प्राणी एक रूप बनकर और नवीन आकृति धारण करके आ गये हो। उसकी कंठध्वनि वज्रघोष के समान थी। (उसकी तपस्या से) प्रसन्न हुए ब्रह्मा के द्वारा दिये गये वर के प्रभाव से वह सवा लाख हाथियो के बल से युक्त था।
महावज्र-सदृश कार्य करनेवाला विराध नामक वह राक्षस जब आ रहा था, तब (उसकी गति के वेग से) उसके दोनो पार्श्वों में वृक्ष उखड़-उखड़कर धराशायी हो रहे थे। बड़े पर्वत ढह जाते थे। यो वह उन धनुर्धारियो के सम्मुख आ पहुँचा, जिनको अपनी वीरता के योग्य युद्ध अभी तक प्राप्त नही हुआ था।
मास चबानेवाले लबे दाँतो, बलिष्ठ खड्ग-दंतो से चमकनेवाले अपने कंदरा-सदृश मुँह को खोलकर 'ठहरो, ठहरगे', चिल्लाता हुआ वह आया और घने दलवाले कमल पर आसीन रहनेवाली लक्ष्मी रूपी (राम की) देवी को, एक शब्द का उच्चारण करने के समय मे ही, झट उठाकर आकाश-मार्ग से जाने लगा।
वृषभ-सदृश वे दोनो वीर उसकी आकृति को देखकर क्रोध से उग्र हो उठे और कंधे पर के धनुष को वाम हस्त मे लेकर, उज्ज्वल तथा तीक्ष्ण नोकवाले बाण को दक्षिण कर में लेकर उस राक्षस का पीछा करते हुए बोले—अरे, इस प्रकार धोखा देकर कहाँ जा रहा है ? तब उस विराध ने (कहा—)
ब्रह्मा के द्वारा दिये गये वर के प्रभाव से मै मृत्यु-रहित हूँ। समस्त लोकों के निवासी भी यदि मेरा सामना करने आयें तो, मै किसी आयुध के बिना ही उन सब को जीत सकता हूँ। अरे ! मैने तुम्हारे प्राण छोड़ दिये हैं। इस स्त्री को छोड़कर सुख से चले जाओ, यो विराध ने कहा। तब—
वीर (राम) ने अपने रजत मदहास-रूपी ज्योत्स्ना को प्रकट करते हुए कहा—इस (राक्षस) ने युद्ध क्या है—यह जाना नही है। अब इसके प्रताप और बल सब मिट जायँगे—फिर, मन मे विचार करके अपने भारी धनुष का टकार किया।
वर्षाकालिक मेघ-सदृश रामचन्द्र ने, जो वज्र-सम वरछे एवं अपार पराक्रम से युक्त थे, अपने कोदण्ड की लबी डोरी से जो घोर टकार उत्पन्न किया, वह तरंगायमान समुद्रो से
३०२ | कंब रामायण
आवृत्त तथा भूधरों से भरित पृथ्वी में, पाताल में, स्वर्गलोक में तथा अन्य सब लोकों में वज्र-घोष के समान प्रतिध्वनित हो उठी।
तब वह राक्षस, वंचक तथा अत्याचारी मार्जार के मुँह में फँसे हुए तोते के समान चिल्लानेवाली सीता को छोड़कर किंचित् विकल-चित्त-सा खड़ा सोचता रहा। फिर, विक्षुब्ध होकर अंजनपर्वत-सदृश राम के सम्मुख आ खड़ा हुआ।
फिर, उसने अपने त्रिशूल को, जो शत्रुओं के रक्त में डूब-डूबकर पिशाचों की भूख को मिटाता रहता था और जो अपने तीनों नोकों से वडवाग्नि के सदृश ज्वालाएँ उगलता था, घुमाकर (रामचन्द्र पर) फेंका।
वह त्रिशूल हालाहल विष के समान उज्ज्वल हो अतिवेग से आने लगा, जिसे देखकर अष्ट दिशाएँ, दिक्पाल दिग्गज तथा सर्वलोक काँप उठे। तब राम ने महामेरु और सप्त कुलपर्वत-समान अति दृढ़ दीर्घ कोदंड में एक अपूर्व बाण रखकर प्रयुक्त किया।
आज से राक्षस-समूह का नाश हो गया—ऐसी सूचना देते हुए, दिन में ही मानों गगन से नक्षत्र गिर रहे हों—ऐसा दृश्य उपस्थित करते हुए चारों ओर प्रकाश फैलानेवाला वह शूल दो टुकड़े हो गया और दिशाओं के अंत में जा गिरा।
देवताओं का भी दमन करनेवाले उस शूल को टूटकर गिरते हुए देखकर भी उस राक्षस ने युद्ध करना छोड़ा नहीं। किन्तु, अधिक उत्साह दिखाता हुआ धरती को कँपा देनेवाले अपने हाथों से अनेक पर्वतों को जड़ से उखाड़कर त्वरित गति से वह (राम पर) फेंकने लगा।
रामचन्द्र ने अति दृढ़ तथा अति तीक्ष्ण बाणों को उन (पर्वतों) पर छोड़ा, जिससे घेरकर आनेवाले वे पर्वत टूटकर नीचे गिर गये। वह राक्षस एक-एक करके जो पर्वत फेंकता था, वे लौटकर उसी की देह पर गिरते थे, जिससे उसके शरीर में अनेक घाव हो गये।
तब उसने एक बड़ा वृक्ष उखाड़ लिया और उसको लेकर उस राम पर आक्रमण करने के लिए आया, जिनके नामों को ज्ञानी पुरुष जपते रहते हैं, जो धर्म को स्थापित करने के लिए सर्पशय्या को छोड़कर इस धरती पर अवतीर्ण हुए हैं। तब—
उत्तम वीर (राम) ने चार बाणों से उस बड़े वृक्ष के टुकड़े-टुकड़े कर दिये और (राक्षस के) कंधों और वक्ष में बारी-बारी से अत्यन्त वेग से अनेक अति तीक्ष्ण बाण मारे, तब वह राक्षस—
अपने शरीर में अति पैने बाणों के छिद जाने से बहुत पीड़ित हुआ और त्वरित गति से अपने शरीर को झटकाकर उन बाणों को छितराने लगा, जैसे कोई बहुत बड़ा साही अपनी देह पर के काँटों को फुलाकर खड़ा हो।
तब राम ने और भी अग्नि-समान तीक्ष्ण बाणों को प्रयुक्त किया, जो कहीं भी रुके बिना (उसके शरीर को) भेद देते थे। फिर भी, उस (राक्षस) का चित्त पापमुक्त नहीं हुआ। पर्वत से गिरनेवाले निर्झर के समान उसके शरीर से रक्त बहने लगा। जिससे वह दुर्बल तथा मूर्च्छित होकर गिर पड़ा।
अरण्यकाण्ड ३०३
वे दोनो (राम-लक्ष्मण), जो बिना थके हुए मल्लयुद्ध करने मे कुशल थे, यह सोचकर कि इस राक्षस को सत्य ही वर प्राप्त हुए हैं, जिससे यह शस्त्रो के प्रयोग से मर नही सकेगा, अत्यन्त क्रोध से करवाल निकालकर उसकी भुजाओ को काटने के विचार से उसके कंधो पर चढ़ गये।
बहनेवाले रक्त-प्रवाह से युक्त वह (विराध) पुनः संज्ञा पाकर उठा। जब उसको यह मालूम हुआ (कि राम-लक्ष्मण उसके कंधो पर चढ़ गये हैं) तब वह तुरन्त दंड-सदृश अपनी भुजाओं से उन दोनो को दबाकर अपनी पूर्व गति से भी दसगुने वेग से चल पड़ा।
तब वे दोनो मेरु की परिक्रमा करनेवाले सूर्य-चन्द्र के समान शोभायमान हो उठे। उस राक्षस का सिर गगन-तल से टकरा रहा था। वह अतिवेग से घूमने लगे और उसके शरीर से रक्त-प्रवाह बह चला।
स्वर्णवर्णवाले (लक्ष्मण) के साथ कृष्ण वर्णवाले (राम) को अपने कंधों पर लिये आकाश तक उठकर वह राक्षस चल पड़ा। तब वह उस पक्षिराज गरुड की समता करता था, जो धर्म-रूपी अपने पंखो पर बलराम और कृष्ण को उठाये वेग से जा रहा हो।
उत्तम कुल में उत्पन्न सीता, अति कृपालु अपने पति को वंचक राक्षस के द्वारा दूर उठा लिये जाते हुए देखकर अत्यन्त व्याकुल हुई और उस हंसिनी के समान हो गईं, जिसका जोड़ा (हंस) किसी के द्वारा बंदी बना लिया गया हो। वह मुरझाई हुई लता के समान अपने केशों को फैलाये धूल में गिर पड़ी।
फिर वह उठी। उनको संभालनेवाला व्यक्ति भी वहाँ कोई नही था। उन्हे सांत्वना का कोई शब्द भी नही मिला। वह शीघ्रता से (राक्षस का) पीछा करती हुई दौड़ी, जिससे उनकी विद्युत्-समान कटि काँप उठी। फिर, उस (राक्षस) से कहा—इन मातृ-समान करुणावाले धर्म-स्वरूप कुमारो को छोड़ दो और मुझको खा डालो।
वह रोई। उनका स्वर गद्गद हुआ। उनके प्राण विकल हुए। बड़ी वेदना से वह चित्र-लिखित प्रतिमा के समान स्तब्ध पड़ी रही। उनकी उस दशा को देखकर कनिष्ठ प्रभु (लक्ष्मण) ने कर जोड़कर (राम से) निवेदन किया—देवी अत्यन्त पीडित हो रही हैं। उनको इस दशा मे छोड़कर यो विनोद करना ठीक नही है। इससे अहित हो सकता है। तब सृष्टि के आदिभूत (भगवान् के अवतार राम) कहने लगे—
हे उपमाहीन! मैने सोचा, इस प्रकार ही सही, हम अपने गंतव्य स्थान को शीघ्र पहुँच जायेंगे। अब इसको मारना कोई बड़ा काम नही—यो कहकर मदहास करते हुए अपने बलिष्ठ पैर से उस राक्षस को धकेला। तब भी वह नीचे गिरा नही।
तब बलिष्ठ भुजावाले (राम-लक्ष्मण) ने क्रुद्ध होकर तीक्ष्ण करवालो से उसकी दोनो भुजाओ को काट डाला और धरती पर कूद पडे। तब वह राक्षस उन दोनो के निकट इस प्रकार झुक गया, जैसे रक्त नयनोवाला सर्प (राहु) भौंहो-रूपी भुजाओ को झुकाये, दोनो ज्योति-पिंडो (अर्थात्, सूर्य-चन्द्र) को ग्रसने के लिए आया हो।
उस (राक्षस) के घावो से अधिकाधिक रक्त बह रहा था। तो भी उसके प्राण
३०४ कंब रामायण
परलोक को नहीं जा रहे थे। उस दशा को देखकर सर्वान्तर्यामी (राम)ने विचारकर कहा— भाई ! इसे शीघ्र भूमि में गाड़ देना ही ठीक है।
मत्तगज-सदृश लक्ष्मण ने जो गढा खोदा, दोषहीन रामचन्द्र ने अपने उस रक्त चरण से विराध के शरीर को उसमें ढकेल दिया, जो (चरण) नर्मदा नदी में निमग्न हुआ था, जो पवित्र यज्ञों की आहुतियों को प्राप्त कर संसार के भक्तों को उनके अभीष्ट प्रदान करता था।
वह राक्षस, उस रामचन्द्र के प्रभाव से, जो ब्रह्मांड की सृष्टि करके स्वयं उस ब्रह्मांड में अवतीर्ण हुए थे, पूर्व-शाप से उत्पन्न दुःखदायक राक्षस-शरीर से मुक्त हो गया और गगन-तल में पूर्वज्ञान से युक्त होकर दिव्य देह धारण करके शोभायमान हुआ।
अब उस (दिव्य देहधारी) की बुद्धि, पंचेन्द्रियों के अधीन नहीं रह गई थी और वासनाओं से मुक्त हो सन्मार्ग पर स्थिर हो गई थी। उस (विराध) में पहले से ही अनन्य भक्ति विद्यमान थी। अतः, अब उसको तत्त्वज्ञान प्राप्त हो गया, जिससे प्रभु (राम) को पहचानकर वह उनकी स्तुति करने लगा।
सब वेदों के द्वारा स्तुत्य तुम्हारे चरण ही यदि सब लोकों में व्याप्त हैं, तो तुम्हारे अन्य अंग कैसे और कहाँ रहते होंगे। (कौन जाने ?) तुम शीतलता से युक्त समुद्र के निवासी हो, यदि तुम परस्पर असदृश पाँचों भूतों में निवास करने लगे, तो क्या वे (भूत) तुम्हें धारण करने में समर्थ हो सकेंगे ? (अर्थात्, नहीं होंगे)।
क्रुद्ध मगर से त्रस्त होने पर एक गज ने अत्यन्त आर्त्त हो शिथिल शरीर से, अपनी सूँड को ऊपर उठाकर सर्व दिशाओं में फैलनेवाली अपनी ऊँची ध्वनि से तुम्हें पुकारा था कि हे महिमापूर्ण, अनुपम, आदिकारण-भूत, हे परमतत्त्व आओ, मेरी रक्षा करो। उसी क्षण तुम 'क्या हुआ ?' कहते हुए दौड़कर वहाँ आ गये थे (और उस गज की रक्षा की थी)।
हे मेरे प्रभु ! तुम अपने (अर्थात्, परम पद में स्थित नित्य तथा मुक्त जीवात्मा) तथा बाह्य (अर्थात्, लोकों में वर्त्तमान भक्त आदि जीव)—इन दोनों को देखनेवाले हो, पक्षपातहीन हो, कृपा से कभी रहित न होनेवाले हो। हे कमल-सदृश नेत्रवाले। तुम धर्म की रक्षा के लिए, अन्य किसी की सहायता के बिना, एकाकी चक्र के समान घूमते रहते हो; यह तुम्हारा ही कार्य तो है।
जन्म और मरण इन दोनों खेलों को बड़ी उमंग के साथ करते रहनेवाले हे प्रभु ! तुम्हारी कृपा से सब प्रकार के जीवों को मुक्ति-पद प्राप्त करना कठिन नहीं है। विरक्ति को सर्वात्मना अपनाये हुए मुनि लोग यदि दूसरा जन्म ग्रहण भी करते हैं, तब भी वे अपने आत्मस्वरूप को नहीं भूलते। इतना ही नहीं, अन्य लोगों के समान (अर्थात्, जो विरक्त नहीं हैं, पुनः-पुनः जन्म भी नहीं पाते (अर्थात्, वे शीघ्र मुक्त हो जाते हैं)।
भयंकर जन्म-सागर के पार पहुँचने के लिए तरणि के समान रहनेवाले जितने धर्म हैं, उन सब धर्मों के अनुयायी जिस परमात्मा की प्रशंसा अनुपम और अवाङ्मनसगोचर कहकर करते हैं, तुम उसी परमात्मा के अवतार हो। अब तुम्हारे सम्मुख अन्य देवों की क्या गिनती है?
अररायकाण्ड ३०५
हे धर्म के अनुपम स्वरूप ! सृष्टिकर्त्ता कमलभव से लेकर सब देवो तथा उनमे इतर प्राणिवर्ग के लिए माता और पिता दोनो तुम्ही हो ।
आदि परब्रह्म तुम हो, सब लोक तुम्हारे अधीन हैं। विवेचन से परे अनेक धर्म तुम्हारे चरणो के ही आश्रित हैं। फिर, तुम बच्चक के सदृश क्यो छिपे रहते हो ? यदि तुम प्रकट हो जाओ, तो क्या हानि है ? क्या तुम्हारी यह अनन्त मायामय क्रीडा आवश्यक है ?
हे प्रभु ! तुम अज्ञेय होते हुए भी ( अपने दासो के लिए ) सुलभ-ज्ञेय भी हो। ससार मे ऐसा कोई वछड़ा नही होगा, जो अपनी माता को नही पहचानता हो । ऐसी माता भी नही होगी, जो अपने वछडे को नही पहचानती हो । अखिल सृष्टि की माता बने हुए तुम सबको पहचानते हो । किन्तु, वे सब तुम्हें यथार्थ रूप मे नही पहचानते । यह भी तुम्हारी कैसी माया है ?
संसार के लोग अनेक देवताओ की स्तुति करते हैं। किंतु महात्मा पुरुष तुम्हारे अतिरिक्त अन्य किसी को श्रेष्ठ नही मानते । सदाचार मे स्थिर रहनेवाले वे लोग क्या यह नही जानते कि ब्रह्मा आदि वेदज्ञो के द्वारा आराध्य देव तुम्हारे अतिरिक्त और कोई नही है ?
हे लक्ष्मी से अधिष्ठित सुन्दर वक्षवाले ! हे सदा जागरित रहनेवाले ! अनेक धर्मों के द्वारा आराध्य देवता भी कर्म के बधनो मे पड़े हुए लोगों के समान ही कठोर तपस्या करते रहते हैं। किंतु, तुम्हारे लिए करने योग्य कोई तपस्या नही है । अतएव कर्म-बधनो से मुक्त आत्माओं के सदृश तुम योगनिद्रा मे मग्न रहते हो ।१
तुम स्वयं आदिशेष का रूप धारण करके सुन्दर भूमिदेवी का वहन करते हो । ( वराह के रूप में ) अपने दाँत पर ( इस भूमि को ) धारण करते हो । ( प्रलय-काल मे ) एक ही बार ( एक ही कौर मे ) इस सृष्टि को निगल जाते हो । एक ही पग मे इस सारी पृथ्वी को ढक लेते हो । उस भूमि के प्रति तुम्हारे प्रेम को यदि सुगंधित तुलसी-हारो से अलंकृत तुम्हारे मनोहर वक्ष पर आसीन ( लक्ष्मी ) देवी जान लेंगी, तो क्या वह तुम से रूठ नही जायेंगी ?
हे प्रभु ! तुम्हारे द्वारा सृष्ट प्राणी यदि परम तत्त्व को किंचित् भी पहचान लेंगे और मुक्त हो जायेंगे, तो इससे तुम्हारी क्या हानि होगी ? स्वर्ग एवं इस धरती के निवासियो मे ऐसे लोग भी तो हैं, जो पूर्वकाल मे, तुमने शिवजी को जो भिक्षा दी थी, उस घटना को जानकर, सदेह से (अर्थात्, कौन परम-तत्त्व है, इस शंका से) मुक्त हो गये हैं।२
१. भाव यह है कि भगवान् विष्णु, कर्म-बधन में पडे प्राणियो के समान निद्रित नही हे, वह सजग हैं। किंतु, ऐसो योग-निद्रा में निरत हैं, जिससे अखिल विश्व की रक्षा होती है। २. भाव यह हे कि शिवजी ने एक बार ब्रह्मा के पाँच शिरो में एक को काट दिया, तो वह कपाल शिवजी के हाथ मे सट गया। बहुत कोशिश करने पर भी वह कपाल उनके हाथ से नहीं छूटा। तब आकाशवाणी हुई कि उसमें भीख माँगते रहो। जब वह कपाल भीख से भर जायगा, तब वह छूट जायगा। शिवजी सर्वत्र भीख माँगते रहे, कितु कपाल भरा नहीं। अंत में विष्णु भगवान् के पास पहुँचे। जब उन्होने भीख दी, तब कपाल एकदम भर गया और हाथ से छूट गया। इस घटना से यह सिद्ध होता है कि विष्णु शिवजी की भी रक्षा करनेवाले हे । —अनु०
| ३०६ | कंब रामायण |
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हे वराह-रूप मे पृथ्वी को उबारनेवाले ! तुमने हंस का आकार धारण करके अपूर्व शब्दो का उपदेश (ब्रह्मा को) दिया था। पहले तुम्हे उन वेदो को सिखानेवाले कौन थे ? वे सब क्या अब समाप्त हो गये हैं ? तुम (चर और अचर पदार्थों से) परे होकर अकेले रहते हो और सबके अतर्यामी हो। तुम्हारी यह स्थिति क्या इन पदार्थों से भिन्न हो रहने से संभव होती है या अभिन्न होकर रहने से ? यह कैसी माया है ?
हे उपमान-रहित ! हे एकनायक ! तुम अपने पूर्व विश्राम-स्थान क्षीरसागर को छोड़कर मेरे सुकृत से ही यहाँ आये हो। मै इस जीवन के सागर को पार कर गया। मै जन्म-हीन हो गया। तुमने अपने प्रवाल-समान चरण-युगल से मेरे कर्मद्वय को पोछ दिया।
विराध इस प्रकार के वचन कहकर देवरूप धारण कर खड़ा हुआ। तब विजय-शील (राम) ने कहा—तुम अपना वृत्तांत कहो।
तब विराध ने सारा वृत्तांत यो कह सुनाया—असत्य जीवन से मुक्ति देनेवाले, ज्ञान को प्रदान करनेवाले चरणो से युक्त, हे प्रभु ! तुम्हारी जय हो।
कठोर धनुष को हाथ में धारण करनेवाले हे देव ! मेरा नाम तुंबुर है। मै कुबेर के लोक का निवासी हूँ। अब मै इस धरती पर जन्म पाने का वृत्तांत कहता हूँ।
नर्त्तकी रंभा एक बार विशाल नृत्य-शाला मे गायन और नृत्य कर रही थी। (उसपर अनुरक्त रहने के कारण) मैं उसके ऊपर कुपित हुआ और (उसके डराने के लिए) राक्षस का रूप धारण कर लिया।
मेरी काम-वेदना मुझे आर्त करती हुई बढ़ने लगी। उस अपराध से (कुबेर ने) मुझे शाप दिया, जिससे मै राक्षस ही बना रहा।
हे आदि भगवन् ! उस यक्षराज (कुबेर) ने मुझे दुःख से मुक्ति पाने का वर देते हुए, मुझ दुःखी के प्रति कहा—जब मै तुम्हारे चरण का स्पर्श प्राप्त करूँगा, तब यह शाप मिट जायगा।
मै, भयंकर शूलधारी और विजयी किलिंज नामक राक्षस का पुत्र होकर उत्पन्न हुआ तथा इस विशाल लोक के सब प्राणियो को खानेवाला बना।
हे आदिब्रह्म ! अब मै, उस दिन से आजतक, भले-बुरे का विचार किये बिना (सब प्राणियो को) खाता हुआ पाप-कर्म करता रहा।
ज्ञान के प्रबोधक, अनादि वेदो के द्वारा प्रशंसित तुम्हारे स्वर्ण-वलय-भूषित चरण के स्पर्श से मै आज शाप-मुक्त हुआ।
हे सृष्टि के आदिकारण ! तुमने, प्राणियो की हत्या करने के कारण मेरे (संचित) पापो को मिटा दिया। ज्ञानहीन हो, मैने तुम्हारे प्रति जो अपराध किया, उसे क्षमा करो—यो प्रार्थना करके वह (विराध) वहाँ से चला गया।
देवो को सतानेवाला राक्षस मिट गया !—यो सोचकर आनन्दित हो, धनुर्विद्या मे निपुण राम-लक्ष्मण भी, कमलासना (लक्ष्मी के अवतार सीता) को साथ लिये हुए वहाँ से आगे बढ़े।
अरण्यकाण्ड ३०७
अपने करों में यम-सदृश धनुष को धारण करनेवाले वे वीर, सत्यमय वेद-स्वरूप मुनियों के निवास-स्थानभूत एक घने उद्यान में गये और दिन-भर वहीं रहे । ( १-७२ )
अध्याय २
शरभंग-देहत्याग पटल
जब रात्रि के आगमन का समय हुआ, तब 'कुरवक' तथा 'कोंगु' नामक पुष्पों से युक्त लता के सदृश सीता के साथ (राम-लक्ष्मण) उस स्थान से चलकर उस सुरभित स्थान में जा पहुँचे, जहाँ शरभंग मुनि तपस्या करते थे और जहाँ कुङ्कुमवृक्ष और कोंगु (नामक) वृक्ष लहलहाते थे ।
मनोहर शूल से युक्त वे वीर जब उस आश्रम में पहुँचे, तब देवेन्द्र वहाँ आया, जो रात्रि में भी मुकुलित न होनेवाले कमल-सदृश पृथक्-पृथक् शोभायमान सहस्र नयनों से युक्त था ।
उस (देवेन्द्र) की देह-कांति ऐसी थी, जैसे उसको घेरकर रहनेवाली लक्ष्मी-सदृश सुन्दर अप्सराओं के आभरणों की कांति तथा उस (कांति) पर फैली हुई विद्युत् की ज्वाला, दोनो मिलकर चमक रही हों ।
उसके काले वर्ण के शरीर पर के नेत्र-रूपी भ्रमर, दिव्य स्त्रियों के नयन-रूपी पुष्पित उद्यान में मत्त हो मँडरा रहे थे । उसके कर्ण-रूपी भ्रमर श्रीनारद की वीणा के नाद-रूपी मधु का पान कर रहे थे ।
उसने, शास्त्रों में प्रतिपादित अनेक कर्मों के समूह से युक्त एक सौ अश्वमेध यज्ञ किये थे । उसके पैरों के वीर-वलयों पर, त्रिमूर्तियों के अतिरिक्त अन्य सब देवताओं के किरीट आकर लगते थे ।
वह इन्द्र विशाल रक्तकमल पर आसीन लक्ष्मी के समान रहनेवाली अपनी देवी (शची) के साथ, त्रिविध मदजलों से युक्त, आगे-आगे पैर उठा-उठाकर चलनेवाले, अति उष्ण श्वेत ऐरावत गज पर आरूढ होता था । वह उज्ज्वल रजतगिरि पर (पार्वती के संग) आसीन शिवजी की समता करता था ।
ऊपर का लोक (स्वर्ग) स्वयं श्वेत छत्र का रूप धारण कर उस (इन्द्र) के ऊपर यों छाया हुआ था कि उसे देखकर सर्वत्र फैलनेवाली कांति से युक्त शीतकिरण (चंद्रमा), यह सोचकर कि यदि अब मैं चमकता रहूँ तो उससे कुछ प्रयोजन नहीं है, मन्द हो रहा था ।
उसके (दोनो पाश्र्वों में) चामर उज्ज्वल कांति बिखेर रहे थे, जो (चामर) ऐसे थे, मानो असुरों की प्रभूत कीर्त्ति ही, दिग्गजों के स्वच्छ मदजलों का स्पर्श कर तथा उन गजों से अनेक युद्धों में टक्कर लेकर और उनमें परास्त हो घनीभूत बनकर वहाँ आ गये हों ।
३०८ कव रामायण
उसका किरीट ऐसा था, मानों निरन्तर सञ्चरण करती रहनेवाली किरणों से युक्त सूर्य ही परिवेष-सहित आ गया हो। युद्ध में अत्यन्त निपुण उन इन्द्र का रत्नहार इस प्रकार उज्ज्वल था, जिस प्रकार चक्रधारी विष्णु के विशाल वक्ष पर लक्ष्मी शोभित हो रही हों।
उसका कञ्चुक, उसमें जड़े हुए सूर्य के समान उज्ज्वल रक्तवर्ण रत्नों के द्युतिपुंज से शोभित था। वह विजयलक्ष्मी के शीतल तथा उज्ज्वल मन्दहास के समान चारों ओर कान्ति बिखेरनेवाले बाहु-वलयों से विभूषित था।
अनेक सहस्र जगमगाते हुए अति प्राचीन रत्नमय आभरणों की कान्ति एक साथ चमक उठने के कारण उनकी देह इस प्रकार लग रही थी, जैसे उनके धनुष (अर्थात्, इन्द्र-धनुष) से युक्त मेघ ही हो।
वह ऐसे मधुस्रावी, मनोहर पुष्पहारों से अलंकृत था, जिनकी सुगन्ध नाना लोकों में फैलती थी। उसपर देव-स्त्रियों के, मीन-सदृश तथा श्रेष्ठ विजय से युक्त नयन-रूपी करवाल आघात करते थे।
उसके पास ऐसा वज्रायुध था, जिसकी धार, सूर्य-समान कान्ति से युक्त विजयमाला धारण करनेवाले रावण पर विजय पाने की आकांक्षा से प्रयुक्त करने पर भी धान की नोक के बराबर भी (रत्ती-भर भी) त्रुटित नहीं हुई थी।
इस प्रकार का इन्द्र शरभंग के आश्रम में आ पहुँचा। मुनिवर ने सम्मुख जाकर उसका स्वागत किया और उत्तम रीति से सत्कार किया। फिर प्रश्न किया—आपके आगमन का प्रयोजन क्या है? अविनश्वर स्वर्ण-वलयोंवाले इन्द्र ने कहा -
हे स्वर्ण-सदृश जटा से युक्त महान् तपस्वी ! ब्रह्मदेव ने, यह विचार कर कि तुम्हारा अति दीर्घ तप उनके लिए भी अवर्णनीय है, तुम्हें आज्ञा दी है कि तुम उनके लोक में आ जाओ। अतः, अब यहाँ से चलो।
हे महामुने ! हे अकुंठित तपस्या से संपन्न ! सब लोकों की और सब चराचर प्राणियों की सृष्टि करनेवाले उस ब्रह्मा ने तुम्हें अपने लोक का वास दिया है। यदि तुम उनके लोक में जाओगे, तो वे सम्मुख आकर तुम्हारा स्वागत करेंगे।
हे निर्दोष तपस्या-सम्पन्न ! मेरे कहने की आवश्यकता नहीं है, तुम स्वयं जानते हो कि वह (ब्रह्मलोक) सब लोकों में श्रेष्ठ है। अतः, तुम तुरंत वहाँ चले आओ। इन्द्र का यह कथन सुनकर तत्त्वज्ञ मुनि ने अपनी अस्वीकृति प्रगट करते हुए कहा—
हे अति प्रख्यात कीर्त्तिवाले ! क्या नश्वर चित्रों के सदृश रहनेवाले लोकों को मैं प्राप्त करना चाहूँगा ? मैं ऐसे तुच्छ पदों का विचार तक अपने मन में नहीं लाता हूँ। मेरी तपस्या अनेक कल्पों की है। यह तुम जानते ही न ?
हे वीर-कंकणधारी ! ऐसा वचन कहना उचित नहीं है। ब्रह्मलोक प्राप्त करना या न प्राप्त करना मेरे लिए दोनों समान हैं। अधिक कहने से क्या प्रयोजन ? मैंने यहाँ रहकर अपनी तपस्या पूर्ण की है।
हे देवाधिदेव ! ये पञ्चमहाभूत जो चिरकालिक हैं, सदा स्थिर हैं, संकोच
अरण्यकाण्ड ३०६
और विकास से हीन हैं तथा जिनके गुणों में परिवर्त्तन नहीं होता, भले ही वे विनष्ट हो जायें, तो भी मैं अविनेश्वर पद की प्राप्ति का उपाय करना नहीं छोड़ूँगा ।
इस प्रकार, जब ( शरभंग ) कह रहे थे, तभी सुदृढ़ तथा गठीले धनुष को धारण करनेवाले वीर उस आश्रम के निकट आ पहुँचे और वहाँ होनेवाले कोलाहल को सुनकर, उसका कारण क्या है—यह सोचते हुए खड़े रहे ।
तब उन्होंने देखा कि उज्ज्वल कांतिवाले हीरक-जटित वलयों से भूषित, परस्पर समान चार दाँतों से युक्त, आलान में बाँधे जानेवाला ( अति महान् ) गज वहाँ खड़ा है । उससे उन्होंने जान लिया कि उस महातपस्वी के पास देवेन्द्र आया है ।
हरिणी-सदृश नयनोंवाली देवी के साथ लक्ष्मण को उस पुष्पोद्यान के बाहर छोड़-कर रामचन्द्र ( अकेले ) उस विशाल वन में वृषभ और सिंह के जैसे गये । तब—
देवताओं के स्वामी ने उस स्थान में दर्शन-दुर्लभ, चतुर्वेदों के फल को (अर्थात्, भगवान् के अवतार राम को ) अपने सहस्र नेत्रों से इस प्रकार देखा, मानो कमलसम नयन-वाला एक नीलवर्ण सूर्य को ही देख रहा हो ।
इन्द्र उन्हें देखकर मन-ही-मन दुःखी हुआ ( क्योंकि उन देवों की रक्षा के लिए ही रामचन्द्र को वन का दुःख भोगना पड़ रहा है ) । फिर, उसने मुनियों के नायक उस पुरुषोत्तम को, नित्य प्रणाम करनेवाले अपने शिर से तथा स्तंभ-समान अपनी भुजाओं से नमस्कार किया ।
उस ( नारायण के अवतारभूत राम ) को—जो ध्वजाओं से भरे हुए युद्धों में शत्रुओं का ( असुरों का ) विनाश करके, विशाल समुद्र-समान वेदों के पदों के अर्थ को समझाकर, नित्य धर्म के सन्मार्ग पर ( लोगों को ) चलाकर, संपत्ति और मोक्ष-पद देकर, (प्राणियों की) रक्षा करनेवाला अविश्वर कवच बनकर, उनके प्राण बनकर, तपस्या बनकर, नेत्र बनकर एवं अन्तहीन ज्ञान बनकर ( सब लोकों की ) रक्षा करता है—देखकर वह इन्द्र अपने को भूल गया, द्रवितचित्त हुआ, एक ओर खड़ा रहा और उस ( राम ) की महिमा का एक साधारण व्यक्ति के समान ही गान् करने लगा ।
तुम ऐसी ज्योति हो,जो सब पदार्थों में ( अंतर्यामी के रूप में ) मिली रहती है, तथापि निर्लिप्त रहती है । तुम आसक्ति-हीन ( विरक्त ) व्यक्तियों के बंधु हो । अपार करुणा का आवास हो । वेदोक्त मार्ग से विवेचन करने से उत्पन्न होनेवाले तत्त्वज्ञान के विषय हो । हे हमारी माता एवं पिता ! हम, तुम्हारे दासों ने जब शत्रुओं से पीड़ित होकर तुम्हारी प्रार्थना की, तब यथाप्रदत्त वरदान के अनुसार तुम हमारी सहायता करने के लिए ( इस रूप में ) अवतीर्ण हुए हो । अन्यथा, क्या तुम्हारे चरण-कमलयुगल इस विशाल धरती के योग्य हैं ?
( तुम्हारी देह की कांति की छाया से ) नीलवर्ण बने ( क्षीर- ) सागर में शयन करनेवाले हे देव ! ( तुम्हारे ) शत्रु नहीं हैं । मित्र भी नहीं हैं । ( तुम्हारे लिए ) प्रकाश नहीं, अंधकार भी नहीं है । यौवन भी नहीं, बुढ़ापा भी नहीं है । आदि, मध्य और अंत भी नहीं हैं । तुम्हारी ऐसी दशा हो रही है । किंतु, यदि तुम यों हाथ में धनुष लिये हुए, अपने
३१० | कंब रामायण
अरुण चरणों को दुखाकर पैर रखते हुए हमारी रक्षा करने को न आते, तो उससे तुम्हारा क्या अपयश होता ? (जिससे वचने के लिए तुम आये हो) या (हमसे कुछ प्रतिफल की कामना रखते हो, पर) कौन-सा प्रतिफल देना हमारे लिए संभव है ?
हे उत्तम ! तुम्हारे नाभि-कमल से उत्पन्न चतुर्मुख भी, दोषहीन सब लोकों को गणना-चिह्न मानकर, गिनने लगे, तो उसका एक अंश भी नहीं गिन सकता है । पूर्वकाल में धरती को पात्र, क्षीर सागर को दही और उन्नत (मंदर) पर्वत को मथानी बनाकर अपने कमल-तुल्य करों को दुखाते हुए तुमने मथा था और अमृत निकालकर केवल हम देवों को दिया था । तब असुर लोग भी तुम्हारे दास हो गये थे न ?
आदि में तुम एक ही थे। फिर, अनेक रूप हुए और सबके प्राण और प्रज्ञा भी हुए । महाप्रलय के समय तुम विनाश का रूप लेते हो और (सृष्टि के आरंभ में) नाना लोकों का रूप धारण करते हो। हे स्वच्छ ज्ञान का विषय बने हुए भगवान् ! हमारे अभीष्टों को पूर्ण करनेवाले प्रभु ! तुम पवित्र आत्माओं की रक्षा करते हो तथा पापियों को दंड देते हो। वह विनश्वर पाप भी तो तुम्हारी ही सृष्टि है।
हे मेरे पिता ! पूर्वकाल में अपार माया के प्रभाव से जब हम इस शंका में पड़कर कि तुम परम तत्त्व हो या नहीं, विश्रान्त और दिङ्मूढ़ हो गये थे, तब हमारे सुकृत के परिणाम से सप्तर्षिगण हमारे सामने प्रकट हुए और शिवजी के पास पहुँचकर, हमने यह निर्णय किया कि समस्त लोक तुम (विष्णु) से ही उत्पन्न होकर बढ़ते हैं। यों हमारी शंका को दूर करने का साधन भी तुम्हीं बने थे ।१
स्वर्णमय दीर्घ मुकुटवाले इन्द्र ने मन में विचार कर इस प्रकार के अनेक वचन कहकर उनकी प्रशंसा की । फिर, यह सोचकर कि (रामचन्द्र के वहाँ आगमन का) कोई विशेष कारण है, अपना उपमान न रखनेवाले मुनिवर से आज्ञा माँगी और देवलोक को जा पहुँचा ।
शरभंग ने इस प्रकार जानेवाले देवेन्द्र का मनोगत भाव जान लिया। फिर, देवाधिदेव (राम) के सम्मुख जाकर स्वागत कर उन्हें ले आये। उस समय राम ने उन मुनि के चरणों को प्रणाम किया, तब वह मुनि जो निःश्रेयस पद पाने की इच्छा से कठिन साधना कर रहे थे, प्रेम के आधिक्य से रो पड़े।
मुनि ने राम से कहा—'सुखी हो और जीते रहो। अपनी पत्नी और अनुज को भी यहाँ आने दो।' तब रामचन्द्र उनको भी ले आये। अनेक युगों से तप करनेवाले
१. एक बार मुनियों और देवों में यह विवाद छिड़ा कि कौन परमात्मा है। तब सप्तर्षियों में प्रधान भृगु, क्रमशः कैलास और सत्यलोक में गये। किंतु, यहाँ शिव ओर ब्रह्मा को अपनी-अपनी देवी के साथ संलाप में निरत देखा। वहाँ से निराश होने पर वे वैकुंठ में गये। वहाँ लक्ष्मी के संग सर्प-शय्या पर आसीन विष्णु को देखा, पर विष्णु की निगाह भृगु पर न पड़ी। इसपर क्रुद्ध होकर भृगु ने विष्णु के वक्ष पर पदाघात किया। तब विष्णु यह कहते हुए कि ऐसा करने से महर्षि का पैर दुख गया होगा, उनके चरण को पकड़कर दबाने लगे। इस पर भृगु ने पहचाना कि विष्णु ही सात्त्विक देव हैं और अन्य मूर्तियों से श्रेष्ठ हैं। इसी कथा की ओर इस पद्य में संकेत किया गया है।—अनु०
अरण्यकाण्ड ३११
उस मुनि के आश्रम में आकर वे यो आनन्दित हुए, जैसे क्षीरसागर में (शेष) शयन पर ही विश्राम कर रहे हों।
उस स्थान में, तत्त्वज्ञ मुनि के धर्ममय उपदेश सुनते हुए रामचन्द्र ने हरिणी-समान नयनोंवाली देवी के साथ वह अंधकार-भरी रात्रि व्यतीत की।
तब सूर्य, संसार को आवृत करनेवाले घने अंधकार-रूपी चादर को अपने सब दिशाओं में परिव्याप्त अपरिमेय उज्ज्वल करों के आतप-रूपी धारवाले करवाल से हटाने लगा।
उस समय, तत्त्वज्ञ मुनि ने उन (राम) के सम्मुख ही अग्नि को प्रज्वलित करके उसमें प्रवेश करने का विचार किया और शास्त्रोक्त विधि से सत्वर अग्नि प्रज्वलित करके रामचन्द्र से प्रार्थना की कि अब मुझे आज्ञा दीजिए।
दृढ धनुष्य (धनुष के प्रयोग मे निपुण) राम ने वेदों में निपुण (शरभंग) को देखकर कहा—आप क्या करना चाहते हैं, बताइए। तब मुनि ने कहा—हे लक्ष्मी-नायक ! मै मोक्ष प्राप्त करने की इच्छा से अग्नि में प्रवेश करना चाहता हूँ, आप आज्ञा देने की कृपा कीजिए।
रामचन्द्र ने उनसे प्रश्न किया—अजिन (मृगचर्म) से शोभायमान वस्त्रवाले, हे मुनिवर ! मेरे आगमन के समय आप यह क्या कर रहे हैं ? तब मन्मथ की विजय को कुंठित करनेवाली मानसिक दृढता से युक्त उस मुनिवर ने अपना शरीर त्याग करने के उमंग में यों उत्तर दिया—
हे विजयशील ! विविध प्रकार की तपस्यायों में निरत रहनेवाला मैं—तुम अवश्य यहाँ आओगे, यह निश्चय करके तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा था। अब मेरे दोनों प्रकार के कर्मों का बंधन टूट गया। जैसे घटित होना था, वैसे ही हुआ और तुम आये। अब मेरे लिए यहाँ और कोई कार्य नहीं रह गया है।
हे शक्तिशाली ! इन्द्र ने आकर कहा था कि कमलभव ब्रह्मा ने तुम्हे सत्यलोक का निवास प्रदान किया है। प्रलय-काल तक तुम वहीं रह सकते हो। किन्तु, शाश्वत परमपद की प्राप्ति की कामना करनेवाले मैंने उस सत्यलोक को पाना नहीं चाहा।
अपौरुषेय वेदों के लिए भी अज्ञेय परमतत्त्व को जाननेवाले (शरभंग) ने कहा कि तुम ऐसी कृपा करो कि मैं परमपद प्राप्त करूँ। फिर, अपनी प्रिय पत्नी के साथ उग्र अग्नि में प्रवेश करके अनुपम अपवर्ग-पद में जा पहुँचे।
भावी को जाननेवाले, महिमामय सुगंधित कमल में उत्पन्न ब्रह्मा आदि देव, मुनिगण तथा अन्य लोग भी, दोनों कर्मों के बंधन से मुक्त होकर जिस पद को प्राप्त करने की कामना करते हैं, उस पद में वे मुनिवर जा पहुँचे।
अखिल ब्रह्मांड को अज्ञेय रूप में निगलनेवाले (भगवान् राम) के एक नाम को जो जानते हैं, उनके पुण्य-फल भी विचार से परे होते हैं। फिर, जो अपने अंतिम समय में उस भगवान् के दर्शन करते हैं, उनको कौन-सा बड़ा पद प्राप्त होगा, इसको कौन जान सकता है। (१-४४)
अध्याय ३
अगस्त्य पटल
आनन्द उत्पन्न करनेवाले, वक्र धनुष को धारण किये हुए वे कुमार (राम-लक्ष्मण), उस शरभंग की मृत्यु का दृश्य देखकर मन में बहुत दुःखी हुए। फिर, (सीता) देवी के साथ उस पवित्र (मुनि) के आश्रम से धीरे-धीरे चले।
पर्वत, वृक्ष, सुन्दर काली शिलाएँ, तरंगों से भरी नदियों, झरनों से युक्त पर्वत-शिखर, घने उद्यान, सुहावने स्थान एवं गभीर जलाशय सबको धीरे-धीरे पार करते हुए वे आगे बढ़े।
पुरातन ब्रह्मदेव के पुत्र, मुंडे हुए शिखावाले बालखिल्य आदि दंडकारण्य के निवासी मुनि उनके सम्मुख आये और उनके दर्शन करके आनन्दित हुए।
अत्यधिक बढ़नेवाले क्रोध से युक्त राक्षसों के अत्याचारों से (बचने का) कोई उपाय न देखकर पीड़ित होनेवाले वे मुनिगण जलते वन के उन सूखे वृक्षों की समता करते थे, जो अमृत-समान जल-धारा से सिंचित होकर जीवित हो उठे हों।
अधिकाधिक बढ़ते हुए बलवाले राक्षसों का नाम लेते हुए भी उनका कंठ-स्वर विकृत हो उठता था। ऐसे संकट से अब मुक्त हुए उन मुनियों की दशा उस बछड़े की-सी थी, जो दावानल से जलनेवाले वन में फँस गया हो और फिर अपनी माँ को अपनी ओर दौड़कर आते हुए देखकर आनन्दित हो उठा हो।
किसी के द्वारा प्रतिकार करने को दुस्साध्य, क्रूर कृत्यवाले राक्षसों के साथ युद्ध करके उन्हें मिटाने का कोई उपाय न देखकर वे मुनि मन-ही-मन कुढ़ते रहते थे। अब ऐसे निश्चिन्त हुए, जैसे राक्षस नामक समुद्र के मध्य डूबनेवालों को एक नौका ही मिल गई हो।
उन मुनियों ने (रामचन्द्र को) भली भाँति देखा और ऐसे प्रसन्न हुए, जैसे अपने महान् तप की महिमा से ज्ञान पाकर, जन्म-रूपी कठोर बंधन से मुक्त हो गये हों और मोक्ष-पद प्राप्त कर लिया हो।
यद्यपि वे (मुनि) ऐसी सत्य तपस्या से संपन्न थे, जो साधकों के सब अभीष्टों को पूर्ण करनेवाली होती थी, तथापि उन्होंने क्षमा-शक्ति के कारण उत्तरोत्तर बढ़नेवाले अपने क्रोध को समूल विनष्ट कर दिया था। इसलिए, उस वन के राक्षसों से पीड़ित होते रहते थे।
वे मुनि उठकर आये। काले मेघ-सदृश स्थित उन राम के निकट उमड़ते प्रेम के साथ आ पहुँचे। ज्यों-ज्यों वे राम उन्हें नमस्कार करते थे, त्यों-त्यों वे मुनि आशीः देते रहे।
वे मुनि उन (रामचन्द्र) को एक सुन्दर पर्ण-शाला में ले गये और यह कहकर कि यहाँ तुम सुख से निवास करो, अनेक सत्कार किये, फिर वे स्वयं अन्यत्र जाकर ठहरे। फिर (उचित समय पर) राक्षसों के अत्याचार को कहने के लिए (राम के पास) आये।
प्रभु ने आये हुए मुनियों को प्रणाम करके उनकी प्रस्तुति की और आसीन होने
अरण्यकाण्ड ३१३
पर प्रश्न किया कि क्या आज्ञा है ? तब उन्होंने उत्तर दिया—हे संसार के रक्षक (दशरथ) के पुत्र ! अब जो अत्याचार यहाँ हो रहे हैं, उन्हें सुनो।
दया नामक गुण का लेश भी जिनके हृदय में नहीं है, ऐसे धर्म-रहित कुछ लोग हैं, जिन्हें राक्षस कहते हैं। वे (राक्षस) हमें अनुचित तथा अधर्म के मार्ग पर चलने के लिए विवश करते हैं, जिससे हम धर्म और तपस्या के सन्मार्ग से भटक जाते हैं।
हे धनुष से युक्त भुजावाले ! अनेक व्याघ्र जहाँ संचरण करते हैं, ऐसे वन में रहनेवाले हरिणों के समान, हम रात-दिन व्यथितमन रहते हैं। हमसे अब अधिक सहा नहीं जायगा। प्रख्यात धर्म-पथ से भी हम स्खलित हो रहे हैं। क्या हमें इन दुःखों से मुक्ति मिलेगी ?
महिमामय तपोमार्ग में हम नहीं चल पाते। अब वेदों का अध्ययन भी नहीं कर पाते। अध्ययन करनेवालों की सहायता भी नहीं कर सकते। पुरातन यज्ञाग्नि को भी हम प्रज्वलित नहीं कर पाते। सदाचरण से भी भ्रष्ट हो गये हैं। अतः, हम ब्राह्मण कहलाने योग्य भी नहीं रहे।
इन्द्र के बारे में पूछो, तो वह राक्षसों के आदेशों को, अपने शिर आँखों पर धारण कर उनका पालन करता रहता है। हे हमारे प्रभु ! तुम्हारे अतिरिक्त हमारे दुःखों को दूर करनेवाला और कौन है ? हमारे सुकृत से ही तुम यहाँ आये हो।
संसार-भर में प्रचलित अपने शासन-चक्र से संसार की रक्षा करनेवाले चक्रवर्ती के हे पुत्र ! हमारे दिन अवार्य अंधकार से भरे हैं। अब तुम सूर्य के समान उदित हुए हो। हे कृपालु वीर ! हम तुम्हारी शरण में हैं—यों मुनियों ने निवेदन किया।
सूर्यकुल में उत्पन्न वीर (राम) ने कहा—यदि वे (राक्षस) मेरी शरण में आकर क्षमा नहीं माँगेंगे, तो भले ही वे इस ब्रह्मांड को छोड़कर बाहर भी क्यों न भाग जायें, मेरे बाण खाकर नीचे गिरेंगे। अब आप लोग इस अनुचित पीड़ा से मुक्त हो जाइए।
मेरी माता का वर माँगना, मेरे पिता की मृत्यु होना, मेरे गौरव-पूर्ण भाई (भरत) का दुःखी होना, मेरे नगर के लोगों का अत्यंत वेदना से दुःखित होना—इन सबके होते हुए भी मेरा वन-गमन मेरे पुण्यों का ही फल है।
यदि मैं उन राक्षसों की शक्ति का समूल नाश न करूँ, जो धर्म से कभी स्खलित न होनेवाले मुनियों के महत्त्व को भूलकर, नीच बनकर उन्हें सताते हैं, तो मेरे लिए यही उचित होगा कि मैं (उनके हाथ) मर जाऊँ। अन्यथा, मनुष्य-जन्म पाने से मुझे क्या सुकृत मिलेगा ?
उत्तम वेदों के ज्ञाता आपलोग भी उन राक्षसों के कबन्धों को नाचते हुए सहर्ष देखें। तभी दृढ़ धनुष तथा अवार्य बाणों से पूर्ण तूणीरों का वहन करनेवाली मेरी भुजाओं की पीडा दूर होगी।
गो-ब्राह्मणों तथा अन्य लोगों की रक्षा के लिए जो अपने प्राणों का त्याग करते हैं, वे ही उत्तम स्वर्ग के निवासी देवताओं के लिए भी पूज्य देवता बनते हैं।
शूरपद्म (नामक असुर) को मारनेवाले (सुब्रह्मण्य), उज्ज्वल चक्रायुध को धारण करनेवाले (विष्णु) या त्रिपुरों को मिटानेवाले (शिव) भी, उन राक्षसों की रक्षा
| ३१४ | कंब रामायण |
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करने आयें, तो भी मैं उन अधर्मी (राक्षसो) का समूल विनाश करूँगा। आपलोग डरें नहीं।
(राम के द्वारा) कथित ये वचन सुनकर वे आनंदित हुए। उनका प्रेम उमड़ उठा, उनकी पीडा दूर हुई। वे अपने दंड उछालने लगे। मधुर वेद-वाचन करने लगे। नाचने लगे। फिर यो बोले—
हे सृष्टि के नायक! यदि तुम क्रोध करो, तो इन तीनो लोको के जैसे तीस कोटि लोक भी यदि तुम्हारा सामना करने आयें, तो वे भी तुम्हारे लिए कुछ नही होगे। सब वेद, (हमारी) तपस्या और ज्ञान इसके साक्षी हैं।
अतः, तुम (वनवास के) दिनो हमारी रक्षा करते हुए, यही इस आश्रम में आराम से रहो—यो मुनियो ने कहा। तब राम ने उन महान् तपस्वियो के चरणों को नमस्कार करके वही निवास किया।
वे कुमार (राम-लक्ष्मण) उस स्थान में विना किसी कष्ट के दस वर्ष-पर्यंत रहे। फिर, उन तपस्वियो ने विचार करके इनसे कहा कि तुम अगस्त्य के पास जाओ। तब वे अर्धचंद्र-सम ललाटवाली सीता देवी के साथ वहाँ से चल पडे।
दरारो से भरी तथा उबड़-खाबड़ धरती को और बाँस आदि के झाडो से भरे स्थलो के संकीर्ण मार्गों को धीरे-धीरे पार करके वे उज्ज्वल शरीरवाले कर्म-बंधन से रहित सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम में पहुँचे।
गर्व-रहित चित्तवाले उन कुमारो ने वहाँ पहुँचकर, सूर्य के समान तेजस्वी उन मुनिवर के अरुण चरणो को प्रणाम किया। तब मुनि ने उनका सत्कार करके कहा—तुम लोग यही विश्राम करो। तब वे वीर उस सुगंधित उद्यान में ठहरे।
जब वे वहाँ ठहरे हुए थे, तब उन मुनिवर ने उनका सब प्रकार से उपचार करके कहा—हे श्रीमन्! यह मेरे सुकृत हैं, जो तुमने यहाँ आने की कृपा की। प्रभु ने भी बड़ी भक्तिपूर्वक उन मुनिवर से कहा—
प्रख्यात चतुर्मुख के वंश में उत्पन्न मुनिश्रेष्ठो में तुम्हारे समान पूर्ण तपस्या से संपन्न अन्य कौन हैं? और, तुम्हारे-जैसे महान् तपस्वी की कृपा का पात्र में बना हूँ। इसलिए, मेरे समान (भाग्यशाली) गृहस्थ भी कौन है?
चिरकालिक तपस्या से संपन्न मुनिवर ने उपमान-रहित (राम) को उत्तर दिया—तुम आतिथ्य स्वीकार करके उसे सफल बनाओ। मै अपनी समस्त तपस्या दक्षिणा के रूप मे तुम्हे अर्पित करता हूँ।
वदान्य (राम) ने उस वेदज्ञ मुनि को उत्तर दिया—हे स्वामिन्! तुम्हारी यह करुणा ही किस तपस्या से कम है? फिर कहा—अब मुझे एक बात निवेदन करनी है। अगस्त्य महर्षि के दर्शन अभी मैने किये नही। यही एक कमी रह गई है।
तब मुनि ने कहा—तुमने ठीक सोचा है। मैने पहले ही यह कार्य निश्चित किया था। तुम उन मुनि के आश्रम में उनके निकट जाओ। वहाँ जाने पर तुम्हारे लिए कोई सुफल अलभ्य नही रह जायगा।
इतना ही नही। वे अबतक तुम्हारे आगमन की प्रतीक्षा करते हुए रहते होगे।
अरण्यकाण्ड ३१५
अतः, हे समस्त कल्याणों से युक्त महानुभाव ! तुम उन मुनिवर के निकट जाओ। इनसे देवों तथा अन्य सब का हित होगा।
फिर, मुनि ने (अगस्त्य के आश्रम को जाने का) मार्ग बताकर उन्हें आशीर्वाद दिये। तब उन तपस्वी के कमल-समान चरणों को प्रणाम करके वे वीर वहाँ से चले और मधु की स्वच्छ धाराओं को बहानेवाले एक स्थान में रात्रि को पहुँचे।
विशाल (वा चिरंतन) तमिऴ भाषा से सारे लोक को चक्रपाणि (विष्णु) के जैसे नापनेवाले (अगस्त्य) मुनि ने जब यह सुना कि पौरुष के भरे कुमार (राम-लक्ष्मण) वहाँ आये हैं, तब उनके मन में जो आनन्द उमड़ा, वह समुद्र के-जैसे उमड़कर मरुद्देशों में भर गया। वे महिमावान् वरद (राम) की शरण में जाने के लिए आगे बढ़े।
वे अगस्त्य ऐसे हैं कि पूर्वकाल में जब देवताओं ने, समुद्र में असुरों के छिप जाने पर उनसे प्रार्थना की कि हे तपस्वी ! हम पर कृपा करो; तब उन्होंने सारे समुद्र को एक चुल्लू में भरकर पी लिया था और जब उन (देवों ने) प्रार्थना की कि समुद्र को त्यागने की कृपा करें, तब उसे वमन दिया था।
उन वामनाकार मुनि ने स्वच्छ समुद्र के जल को पीकर उसे वमन दिया था और मायावी गजन (वातापि) को खाकर उनके कठोर शरीर को पचा लिया था, एवं संसार के दुःख को दूर किया था।
जब विन्ध्याचल ने बढ़कर अंतरिक्ष को भर दिया था; उस समय चीर-वस्त्रों में स्थित रहनेवाले मुनियों ने (अगस्त्य) से प्रार्थना की कि आप हमारे जाने का कोई बाधा-रहित मार्ग बनाइए। तब अगस्त्य ने मेघों की पंक्तियों में उठे हुए गगनभेदी विन्ध्याचल पर अपना पद रखा और हाथी के जैसे जमकर बैठकर उसे ऐसा दबाया कि वह पाताल में धँस गया।
पूर्वकाल में एक बार उत्तर दिशा नीचे झुक गई और दक्षिण दिशा ऊपर उठ गई। तब नागों को धारण करनेवाले शिवजी ने अगस्त्य को आज्ञा दी कि हे निश्चल दया- निधीय तपस्यावाले ! तुम (दक्षिण दिशा में) जाओ। उस आदेश के अनुसार वे गगनभेदी मलय पर्वत ('पोदियिलै' नामक पर्वत) पर जा पहुँचे और शिवजी के समान ही दक्षिण दिशा में रहकर भूमि के संतुलन को बनाये रखा।
गतिमय परन्तु तथा सुन्दर ललाट में अग्नि-उगलनेवाले नेत्रों से शोभित, अग्नि- महत् तेज-स्वरूप भगवान् (शिव) के द्वारा उपदिष्ट तमिऴ (व्याकरण) को उन्होंने लोक- परंपरा, शब्द-शुद्धि एवं अपनी बुद्धि के द्वारा व्यवस्थित सुसंस्कृत करके पण्डितों से अध्ययन किये जानेवाले चार वेदों से भी श्रेष्ठ बना दिया।१
१. यह कथा प्रसिद्ध है कि अगस्त्य शिवजी द्वारा दत्त व्याकरण को लेकर दक्षिण में 'पोदियिलै' पर आकर रहे थे। वहाँ पेरगतियम् (बृहद् अगस्त्यम्) और चित्रगतियम् (लघु अगस्त्यम्) नामक दो ग्रन्थ रचकर अपने बारह शिष्यों को सिखाया, जिनमें तोल्काप्पियर मुख्य थे। इन्हीं तोल्काप्पियर ने आगे चलकर तमिऴ-भाषा का एक बृहद् व्याकरण लिखा, जो अब तमिऴ-साहित्य में उपलब्ध प्राचीनतम ग्रन्थ है। अगस्त्य का नाम युक्त व्याकरण ग्रन्थ अब उपलब्ध नहीं है, किन्तु उनके व्याकरण के उद्धरण अन्य ग्रन्थों में मिलते हैं। विशेष विवरण के लिए द्रष्टव्य बालकाण्ड (अनुवाद), पृ० ४० की पादटिप्पणी। —अनु०
३१६ कंब रामायण
जिस परम तत्त्व के बारे मे सब लोग यह सोचते रहते हैं कि वह स्वर्ग मे है, भूलोक मे है, अन्य किसी लोक मे है, (योगियो के) हृदय मे है अथवा वेदों मे है, उस तत्त्व को मै अपनी आँखो से देख सकूँगा—यह सोचकर अगस्त्य आनन्दित हुए।
ब्रह्मा आदि भी, प्रसिद्ध वेदो तथा अन्य (दर्शन-ग्रन्थो) का सम्यक् अध्ययन करने से तीक्ष्ण बने हुए अपने ज्ञान की कसौटी पर अनेक युगो तक कस-कसकर भी जिस तत्त्व को ठीक-ठीक पहचान नही पाते, वही परम तत्त्व अब मेरे सम्मुख स्थित होकर मुझसे बोलने-वाला है—यों सोचकर अगस्त्य अत्यन्त आनन्दित हुए।
असाध्य तथा क्रूर बलवाले राक्षस-रूपी विष को, जड़ से उखाड़ देनेवाला वैद्य अब आ गया है। अब देवता लोग बच गये। तपस्वियो के प्राण भी सुरक्षित हो गये। ब्राह्मण भी धर्म-मार्ग में स्थिर हुए—यों अगस्त्य ने विचार किया।
अब प्राणियो को (उनकी आयु के) मध्य मे ही चबाकर खा जानेवाले राक्षसो के वज्र को भी जलानेवाले क्रोध-रूपी अग्नि को शीघ्र मिटाकर संसार की रक्षा करने के लिए गगन के मेघ के समान ये (रामचन्द्र) आये हैं—इस प्रकार सोचकर उमंग-भरे हृदय से अगस्त्य आगे बढ़े।
उस मुनि ने, जो अपने कमंडलु मे भरकर अनुपम कावेरी को लाये थे और उसके द्वारा अष्ट दिशाओ, सप्त लोकों तथा सब प्राणियो को सद्गति प्रदान की थी, राम को आते हुए देखा, तब प्रेमाधिक्य से कमल-समान कांतिवाले उनके नयनो से आनन्दाश्रु बह चले।
वहाँ स्थित मुनि को श्रीराम ने आकर प्रणाम किया। तब शाश्वत रहनेवाली मधुर तमिल-भाषा (के व्याकरण) को प्रचलित कर यशस्वी बने मुनि ने प्रेम से उनका आलिंगन किया और आनन्दाश्रु बहाये। फिर 'तुम्हारा स्वागत है।' कहकर अनेक मधुर वचन कहे।
महान् तपस्वी तथा ब्राह्मणजन घिरकर वहाँ आये, वेद-पाठ किया तथा कमडलु-जल का प्रोक्षण कर पुष्प बरसाये। फिर अगस्त्य, पुष्पो की सुरभि से पूर्ण शीतल उद्यान मे (राम, लक्ष्मण और सीता को) ले गये।
अमल (राम) ने हर्ष के साथ उस सुन्दर उद्यान मे प्रवेश किया। मुनि ने उनका आतिथ्य किया। फिर कहा—हे करुणामय। यह मेरे बडे सुकृत का फल है, जो तुम मेरी कुटी मे आये। तुमने मेरी अपूर्व तपस्या को सफल बना दिया।
यों कहने पर रामचन्द्र ने अगस्त्य से कहा—देवता और महान् तपस्वी मुनि भी आपकी कृपा को (सुलभता से) नही प्राप्त कर सकते। मैं आपकी कृपा का पात्र बना, अतः मैं समस्त लोको का विजयी हो गया हूँ। अब मुझे प्राप्त करने को क्या शेष रह गया ?
तब अपने उत्तम शिर पर चन्द्रकला को धारण करनेवाले (शिव) की समता करनेवाले उन मुनि ने कहा—हे प्रशमनीय गुणो से विभूषित। मैंने सुना था कि तुम
अरण्यकाण्ड ३१७
दंडकारण्य में आये हो। इस पर मैं यह सोचकर आनन्दित हुआ कि तुम इस स्थान पर भी अवश्य आओगे। फिर आगे कहा—
हे प्रभु ! अब तुम यही निवास करो, यहाँ रहने से आवश्यक तथा स्पृहणीय महान् तपस्या को पूर्ण कर सकोगे। बढ़ते हुए क्रोध से युक्त क्रूर राक्षस जब आयेंगे, तब युद्ध मे उन्हे निहत करके हमारे मन के क्लेश को दूर करना।
हे चक्रवर्त्ती-कुमार ! ( अब ) वेद जीवित रहेंगे। मनु-विहित नीति जीवित रहेगी। धर्म जीवित रहेगा। हीन बने हुए देवता उन्नति प्राप्त करेंगे। असुर अवनति प्राप्त करेंगे। इसमे कुछ संदेह नही है। यह निश्चित है। सप्त लोक जीवित रहेगे। तुम यही निवास करो—यो अगस्त्य ने कहा।
तब राम बोले—हे वेद-ज्ञान से युक्त मुनिवर ! गर्वीले राक्षस, जो अत्याचार कर रहे हैं, उन्हे मिटाने एव उनके गर्व को दूर करने के हेतु उनका शीघ्र हनन के लिए मै सन्नद्ध हूँ। अतः, मै सोचता हूँ कि वे जिस दिशा से आते हैं, उसी दक्षिण दिशा मे मेरा आगे बढ़ जाना उचित है। आपकी क्या सम्मति है ?
तब अगस्त्य ने यह कहकर कि, 'तुमने सुन्दर वचन कहे' आगे कहा—यह जो धनु मेरे यहाँ है, यह पूर्वकाल मे विष्णु के पास था। त्रिलोकी के लोग तथा मै इसकी पूजा करते रहे हैं। इस धनुष को तथा अक्षय बाणोवाले इन ( दो ) तूणीरो को लो। यह कहकर धनुष एव तूणीर राम को प्रदान किये।
अगस्त्य ने राम को एक ऐसा करवाल दिया, जो यदि त्रिभुवन को तराजू के एक पलडे में रखकर और दूसरे मे उस करवाल को रखकर तोलें, तो त्रिभुवन भी उसकी समता नहीं कर सकते। फिर, एक (वैष्णव नामक) शर दिया, जिसे अग्नि-रूपी हर ने महान् मेरु को धनुष बनाकर उस पर रखकर प्रयुक्त किया था और उससे त्रिपुरो को मिटाया था। उन दोनो शस्त्रों को देकर—
अगस्त्य ने कहा—हे तात ! उन्नत वृक्षो, पर्वत शिखरों, सिकता-श्रेणियो तथा पुष्प-राशियो से शोभायमान, आसपास मे शीतल उद्यानो से शोभित और तरगायमान नदियो से घिरे हुए पर्वत मे पंचवटी नामक एक स्थान है।
उस स्थान मे फल देनेवाले बालकदली-वृक्ष, रक्त धान की वालियों से पूर्ण सस्य, मधुस्रावी पुष्प तथा दिव्य कावेरी के समान नदी का प्रवाह है। वहाँ इस देवी (सीता) के कौतुक के लिए सारस एव हस भी हैं।
अब तुम उसी स्थान मे जाकर निवास करो—यों। (अगस्त्य ने) कहा। घनश्याम ने भी उन्हे प्रणाम किया, उनकी आज्ञा ली और आगे चले। उनके पीछे खाँड़ के रस के समान मीठी बोलीवाली (सीता) तथा उनके अनुज चले और उनका अनुसरण करता हुआ उन मुनिवर का मन चला। वे सत्वर आगे बढ़ चले। ( १-५६ )
अध्याय ५
जटायु-दर्शन पटल
वे (राम, सीता और लक्ष्मण) कई कोस चले और बहनेवाली अनेक नदियों, स्थिर रहनेवाले कई पर्वतों, क्रमशः स्थित घने वनों आदि को पार करके गये और एक स्थान पर गृद्धों के राजा (जटायु) को देखा।
वह जटायु इस प्रकार शोभायमान था, जैसे उदयगिरि पर स्थित पिघले स्वर्ण-सदृश बाल रवि हो, जो इस विशाल धरती की सब दिशाओं को प्रकाशित करनेवाली अपनी घनी किरणों-रूपी पंखों को फैलाये हुए बैठा हो।
वह (जटायु) एक ऊँचे पर्वत के शिखर-मध्य बैठा हुआ ऐसा था, मानों देवताओं ने अपार शब्दायमान क्षीरसागर के मध्य चंद्र की कांति से सयुत मंदर पर्वत को खड़ा कर दिया हो।
वह जटायु, विशाल प्रदेशवाले उस नीलवर्ण पर्वत पर (अपनी देह-कांति से) नीलवर्ण गगन की कांति को आवृत्त किये हुए, दीर्घ प्रवाल-लता के समान सुन्दर वर्ण से युक्त अपनी मनोहर टाँगों की अरुण कांति के साथ शोभायमान था।
वह पवित्र था। अपार शिक्षा तथा ज्ञान से युक्त था। सत्यपरायण था। दोषहीन था। सूक्ष्म बुद्धिवाला था। अपनी विवेचन-शक्ति से (बातों को) जाननेवालों के जैसे ही दूर की वस्तुओं को भी अपनी छोटी आँखों से देख सकता था।
वह क्रूर राक्षसों को मारकर यम को भोजन देकर तदनन्तर बचे हुए मास को स्वयं खानेवाला था, नित्य रगड़ खाने से उसकी चोंच इन्द्र के छोटी आँखवाले (ऐरावत) हाथी के अंकुश के समान चमक रही थी।
वह नवग्रहों और इनसे घिरे हुए ध्रुव नक्षत्र का-सा दृश्य उपस्थित करनेवाले रत्नहार से शोभित था। उसके शिर पर किरीट इस प्रकार शोभित हो रहा था, जिस प्रकार मेरु के शिखर पर उज्ज्वल रवि हो।
वह शब्दों की शक्ति को कुंठित करनेवाले (अर्थात्, शब्दों के द्वारा प्रकट करने में असम्भव) महान् यश से उदित होनेवाले अरुणदेव का पुत्र था और उसने अनेक कल्पों को दिनों के समान व्यतीत होते हुए देखा था।
वह एक अत्युन्नत पर्वत पर खड़ा था। वह इतना बलवान् था कि उसके भार को न सँभाल सकने के कारण वह पर्वत धरती में धँसकर नीचा हो गया था। ऐसी वीरता से पूर्ण उस (जटायु) के निकट, वे (राम-लक्ष्मण) आशंका-युक्त मन के साथ जा पहुँचे।
बडे वीर-ककण को पहने हुए उन वीरों ने, यह सोचते हुए कि कोई ज्ञान-रहित राक्षस हमारी हानि करने के विचार से पक्षी का वेष धारण करके आया है, संदेह के साथ उसे देखा।