भारतकोश
कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 328, कुल 549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 328

अध्याय ५

जटायु-दर्शन पटल

वे (राम, सीता और लक्ष्मण) कई कोस चले और बहनेवाली अनेक नदियों, स्थिर रहनेवाले कई पर्वतों, क्रमशः स्थित घने वनों आदि को पार करके गये और एक स्थान पर गृद्धों के राजा (जटायु) को देखा।

वह जटायु इस प्रकार शोभायमान था, जैसे उदयगिरि पर स्थित पिघले स्वर्ण-सदृश बाल रवि हो, जो इस विशाल धरती की सब दिशाओं को प्रकाशित करनेवाली अपनी घनी किरणों-रूपी पंखों को फैलाये हुए बैठा हो।

वह (जटायु) एक ऊँचे पर्वत के शिखर-मध्य बैठा हुआ ऐसा था, मानों देवताओं ने अपार शब्दायमान क्षीरसागर के मध्य चंद्र की कांति से सयुत मंदर पर्वत को खड़ा कर दिया हो।

वह जटायु, विशाल प्रदेशवाले उस नीलवर्ण पर्वत पर (अपनी देह-कांति से) नीलवर्ण गगन की कांति को आवृत्त किये हुए, दीर्घ प्रवाल-लता के समान सुन्दर वर्ण से युक्त अपनी मनोहर टाँगों की अरुण कांति के साथ शोभायमान था।

वह पवित्र था। अपार शिक्षा तथा ज्ञान से युक्त था। सत्यपरायण था। दोषहीन था। सूक्ष्म बुद्धिवाला था। अपनी विवेचन-शक्ति से (बातों को) जाननेवालों के जैसे ही दूर की वस्तुओं को भी अपनी छोटी आँखों से देख सकता था।

वह क्रूर राक्षसों को मारकर यम को भोजन देकर तदनन्तर बचे हुए मास को स्वयं खानेवाला था, नित्य रगड़ खाने से उसकी चोंच इन्द्र के छोटी आँखवाले (ऐरावत) हाथी के अंकुश के समान चमक रही थी।

वह नवग्रहों और इनसे घिरे हुए ध्रुव नक्षत्र का-सा दृश्य उपस्थित करनेवाले रत्नहार से शोभित था। उसके शिर पर किरीट इस प्रकार शोभित हो रहा था, जिस प्रकार मेरु के शिखर पर उज्ज्वल रवि हो।

वह शब्दों की शक्ति को कुंठित करनेवाले (अर्थात्, शब्दों के द्वारा प्रकट करने में असम्भव) महान् यश से उदित होनेवाले अरुणदेव का पुत्र था और उसने अनेक कल्पों को दिनों के समान व्यतीत होते हुए देखा था।

वह एक अत्युन्नत पर्वत पर खड़ा था। वह इतना बलवान् था कि उसके भार को न सँभाल सकने के कारण वह पर्वत धरती में धँसकर नीचा हो गया था। ऐसी वीरता से पूर्ण उस (जटायु) के निकट, वे (राम-लक्ष्मण) आशंका-युक्त मन के साथ जा पहुँचे।

बडे वीर-ककण को पहने हुए उन वीरों ने, यह सोचते हुए कि कोई ज्ञान-रहित राक्षस हमारी हानि करने के विचार से पक्षी का वेष धारण करके आया है, संदेह के साथ उसे देखा।