कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 329, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअरण्यकाण्ड ३१६
वह (जटायु) भी, वीर-कंकणो से भूषित तथा दृढ धनुष को धारण करनेवाले उन वीरों को देखकर संदेह करने लगा कि जटायुक्त शिरवाले ये (पुरुष), कर्म-बंधन से मुक्ति-प्राप्ति का साधन तप करनेवाले (तपस्वी) मात्र नही दिखते, क्योकि इनके हाथ में धनुष है। शायद ये स्वयं देव ही तो नही हैं ?
मै तो इन्द्र आदि सब देवताओ को देखता हूँ। चक्रधारी (विष्णु), अभीष्ट वर देनेवाले (ब्रह्मा) और परशुधारी (शिव) भी मेरे लिए अदृश्य नही हैं। मै उन्हे सदा देखता हूँ।
मन्मथ को भी मैने अपनी आँखो से देखा है। वह, कमल-सदृश अरुण नयनो तथा विशाल हाथो से युक्त इन वीरो की चरण धूलि की भी समता नही कर सकता। फिर, ये वीर कौन हैं ?
इनके शरीर मे तीनो लोको को अपना स्वत्व बनानेवाले उत्तम पुरुष के लक्षण विद्यमान हैं। कमलभव देवी (लक्ष्मी) का उपमान कहने योग्य एक रमणी इनके साथ चल रही है। मै नही जानता कि ये धनुर्धारी वीर कौन हैं।
ये नील तथा रक्तवर्ण पर्वतो के जैसे रूपवाले हैं। विजयलक्ष्मी से शोभित वक्ष-वाले हैं। अरुण नयनवाले हैं। ये दोनो वीर, मेरे सुहृद् अपूर्व सद्गुणो से पूर्ण चक्रवर्ती (दशरथ) के जैसे हैं।
वह (जटायु) मन में इस प्रकार अनेक तर्क-वितर्क कर रहा था। उसके मन में कठोर शस्त्रधारी उन वीरो के प्रति प्रेम उमड़ आया। उसने प्रश्न किया—उत्तम तथा दृढ धनुष को धारण करनेवाले, वृषभ-सदृश (बलवान्) आप कौन हैं ?
उसके यो प्रश्न करने पर, पुष्प-मालाओ से अलंकृत, सत्य के अतिरिक्त अन्य किसी प्रकार का वचन न बोलनेवाले इन वीरों ने उत्तर दिया—शब्दायमान विशाल सागर से आवृत धरती की रक्षा करनेवाले वीर-कंकणधारी चक्रवर्ती (दशरथ) के हम पुत्र हैं।
उनके यो कहने पर, उमड़ते हुए हर्ष-रूपी समुद्र मे निमग्न होकर प्रेम से उनका आलिंगन करने के लिए वह (उस पर्वत पर से) नीचे उतर पड़ा और बोला—हे सुरभित हारो को धारण करनेवाले वीरो। उस चक्रवर्ती की पर्वत-समान विशाल भुजाएँ बलशाली तो हैं न ?
ज्योही (उन वीरो ने) यह कहा कि वे (चक्रवर्ती) अविस्मरणीय सत्य की रक्षा करते हुए स्वर्ग सिधार गये, त्योंही उनकी मृत्यु का हाल जानकर वह शोकोद्विग्न हो उठा और फिर मूर्च्छित हो गिर पड़ा।
तब उन दोनो ने अपने विशाल हाथों से उसे उठाया तथा अपने अश्रुओ से उसके मुख को धोया। अपने प्राण (सज्ञा) लौट आने पर जटायु शिथिलमन होकर रोने लगा।
हे राजाओ के राजा। हे असत्य के शत्रु। हे सत्य के आभरण ! हे यश के प्राण। तुम्हारी अवर्णनीय दानशीलता, उज्ज्वल श्वेतच्छत्र तथा क्षमा के सम्मुख जो उडुपति (चन्द्रमा), समुद्र से आवृत धरती तथा उदार कल्पवृक्ष अपनी गरिमा को खो बैठे थे, अब आनद से जीवित रहेंगे। इस प्रकार तुम याचको को, सद्धर्म को एव मुझको यह शोक भोगने के लिए छोड़कर चले गये।