कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 330, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें३२० कंब रामायण
हे महाराज ! शोभा बढ़ानेवाले तथा लोकों को अमृत प्रदान करनेवाले श्वेतच्छत्र से युक्त । समुद्र से आवृत इस धरती की रक्षा का भार त्याग कर क्या मेरे अस्थिर प्रेममय मित्र की परीक्षा करने के लिए ही तुम यो चले गये हो ? हे नायक ! हाय ! पापकर्मी मैं, मित्र-धर्म से स्खलित होकर अभी तक जीवित हूँ ।
हे दोष से रहित परिशुद्ध मनवाले ! दही को मथनेवाली मथानी के समान लोकों को दुःख देनेवाले शवरासुर को जब तुमने परास्त किया था, तब तुमने सूक्ष्म मृत्तिका से भरी इस धरती के सब लोगों के सम्मुख अपने को देह और मुझे प्राण कहा था। तुम्हारे वचन अयथार्थ नहीं होते। विवेक-रहित यम प्राणों को छोड़कर शरीर को ही स्वर्ग ले गया है।
मैं अब अपनी कीर्त्ति को बढ़ाते हुए प्रज्वलित अग्नि में गिरूँगा। अन्यथा, भीरु स्त्रियों के समान धरती पर गिरकर विलाप करना क्या मेरे लिए उचित होगा ? यों कहकर आत्मज्ञानी के जैसे वह उठा और उन (राम-लक्ष्मण) को देखकर बोला-सप्त लोकों को अपने अधीन बनानेवाले हे कुमारो ! सुनो—
दक्ष प्रजापति की पचास पुत्रियाँ थीं, जो पीन स्तनोंवाली सुन्दरियाँ थीं। उनमें तेरह पुत्रियों से काश्यप ने विवाह किया। उनमें से अदिति ने तैंतीस करोड़ सुरों को जन्म दिया और काजल-लगी आँखोंवाली दिति ने उन (सुरों) से दुगुने असुरों को जन्म दिया।
दनु ने दानवों को जन्म दिया। मति ने मनुष्य जातियों को जन्म दिया। सुरभि ने गायों, अश्वों और अन्य जन्तुओं को जन्म दिया। क्रोधवशा ने गर्दभो, हरिणी और ऊँटों को जन्म दिया।
मेघतुल्य केशोंवाली विनता ने घन की विद्युत् को, अरुण ने गरुड़ को पल्लव- तुल्य पखवाले उलूक को तथा चील आदि पक्षियों को जन्म दिया। (स्त्रियों में) रत्न-तुल्य ताम्रा ने गोरैया, कौदारी, 'काडे' आदि (छोटे) पक्षियों को जन्म दिया। कला नामक लता-सदृश महिला ने लता-गुल्मों को जन्म दिया।
कद्रू नामक विद्युल्लता-सदृश स्त्री ने अनेक भयंकर फनोंवाले सर्पों को जन्म दिया। सुधा ने एक शिरवाले नागों को जन्म दिया। अरिष्टा ने गोह, गिरगिट, गिलहरी आदि जन्तुओं को जन्म दिया। इडा ने जलचरों को जन्म दिया।
अदिति, दिति, दनु, अरिष्टा, सुधा, कला, सुरभि, विनता, मति, इडा, कद्रू, क्रोधवशा, ताम्रा—इन्होने भी क्रमशः इन सब को जन्म दिया। विनता के पुत्र अरुण के कोमल भुजाओं तथा बाल-चन्द्र तुल्य ललाटवाली रंभा से हम (अर्थात्, संपाति और जटायु) उत्पन्न हुए।$^१$
यौवन की शोभा से युक्त हे कुमारो ! मैं अरुण का पुत्र हूँ। जिन-जिन लोकों में वे (अरुण) व्याप्त होते हैं, उन-उन लोकों में जाने की शक्ति मैं रखता हूँ। उन दशरथ का, जिन्होंने (लोकों के) अंधकार को दूर करते हुए शासन-चक्र को चलाया था, मैं प्राण- प्रिय मित्र हूँ। जिस समय देव तथा अन्य जातियों का विभाजन हुआ था, उसी समय मैं उत्पन्न हुआ। मैं गृद्धराज संपाति का अनुज जटायु हूँ।
१. ऊपर के पाँच पद प्रक्षिप्त जान पड़ते हैं। —अनु०