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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 327, कुल 549 में से

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पृष्ठ 327

अरण्यकाण्ड ३१७

दंडकारण्य में आये हो। इस पर मैं यह सोचकर आनन्दित हुआ कि तुम इस स्थान पर भी अवश्य आओगे। फिर आगे कहा—

हे प्रभु ! अब तुम यही निवास करो, यहाँ रहने से आवश्यक तथा स्पृहणीय महान् तपस्या को पूर्ण कर सकोगे। बढ़ते हुए क्रोध से युक्त क्रूर राक्षस जब आयेंगे, तब युद्ध मे उन्हे निहत करके हमारे मन के क्लेश को दूर करना।

हे चक्रवर्त्ती-कुमार ! ( अब ) वेद जीवित रहेंगे। मनु-विहित नीति जीवित रहेगी। धर्म जीवित रहेगा। हीन बने हुए देवता उन्नति प्राप्त करेंगे। असुर अवनति प्राप्त करेंगे। इसमे कुछ संदेह नही है। यह निश्चित है। सप्त लोक जीवित रहेगे। तुम यही निवास करो—यो अगस्त्य ने कहा।

तब राम बोले—हे वेद-ज्ञान से युक्त मुनिवर ! गर्वीले राक्षस, जो अत्याचार कर रहे हैं, उन्हे मिटाने एव उनके गर्व को दूर करने के हेतु उनका शीघ्र हनन के लिए मै सन्नद्ध हूँ। अतः, मै सोचता हूँ कि वे जिस दिशा से आते हैं, उसी दक्षिण दिशा मे मेरा आगे बढ़ जाना उचित है। आपकी क्या सम्मति है ?

तब अगस्त्य ने यह कहकर कि, 'तुमने सुन्दर वचन कहे' आगे कहा—यह जो धनु मेरे यहाँ है, यह पूर्वकाल मे विष्णु के पास था। त्रिलोकी के लोग तथा मै इसकी पूजा करते रहे हैं। इस धनुष को तथा अक्षय बाणोवाले इन ( दो ) तूणीरो को लो। यह कहकर धनुष एव तूणीर राम को प्रदान किये।

अगस्त्य ने राम को एक ऐसा करवाल दिया, जो यदि त्रिभुवन को तराजू के एक पलडे में रखकर और दूसरे मे उस करवाल को रखकर तोलें, तो त्रिभुवन भी उसकी समता नहीं कर सकते। फिर, एक (वैष्णव नामक) शर दिया, जिसे अग्नि-रूपी हर ने महान् मेरु को धनुष बनाकर उस पर रखकर प्रयुक्त किया था और उससे त्रिपुरो को मिटाया था। उन दोनो शस्त्रों को देकर—

अगस्त्य ने कहा—हे तात ! उन्नत वृक्षो, पर्वत शिखरों, सिकता-श्रेणियो तथा पुष्प-राशियो से शोभायमान, आसपास मे शीतल उद्यानो से शोभित और तरगायमान नदियो से घिरे हुए पर्वत मे पंचवटी नामक एक स्थान है।

उस स्थान मे फल देनेवाले बालकदली-वृक्ष, रक्त धान की वालियों से पूर्ण सस्य, मधुस्रावी पुष्प तथा दिव्य कावेरी के समान नदी का प्रवाह है। वहाँ इस देवी (सीता) के कौतुक के लिए सारस एव हस भी हैं।

अब तुम उसी स्थान मे जाकर निवास करो—यों। (अगस्त्य ने) कहा। घनश्याम ने भी उन्हे प्रणाम किया, उनकी आज्ञा ली और आगे चले। उनके पीछे खाँड़ के रस के समान मीठी बोलीवाली (सीता) तथा उनके अनुज चले और उनका अनुसरण करता हुआ उन मुनिवर का मन चला। वे सत्वर आगे बढ़ चले। ( १-५६ )

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