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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 326

३१६ कंब रामायण

जिस परम तत्त्व के बारे मे सब लोग यह सोचते रहते हैं कि वह स्वर्ग मे है, भूलोक मे है, अन्य किसी लोक मे है, (योगियो के) हृदय मे है अथवा वेदों मे है, उस तत्त्व को मै अपनी आँखो से देख सकूँगा—यह सोचकर अगस्त्य आनन्दित हुए।

ब्रह्मा आदि भी, प्रसिद्ध वेदो तथा अन्य (दर्शन-ग्रन्थो) का सम्यक् अध्ययन करने से तीक्ष्ण बने हुए अपने ज्ञान की कसौटी पर अनेक युगो तक कस-कसकर भी जिस तत्त्व को ठीक-ठीक पहचान नही पाते, वही परम तत्त्व अब मेरे सम्मुख स्थित होकर मुझसे बोलने-वाला है—यों सोचकर अगस्त्य अत्यन्त आनन्दित हुए।

असाध्य तथा क्रूर बलवाले राक्षस-रूपी विष को, जड़ से उखाड़ देनेवाला वैद्य अब आ गया है। अब देवता लोग बच गये। तपस्वियो के प्राण भी सुरक्षित हो गये। ब्राह्मण भी धर्म-मार्ग में स्थिर हुए—यों अगस्त्य ने विचार किया।

अब प्राणियो को (उनकी आयु के) मध्य मे ही चबाकर खा जानेवाले राक्षसो के वज्र को भी जलानेवाले क्रोध-रूपी अग्नि को शीघ्र मिटाकर संसार की रक्षा करने के लिए गगन के मेघ के समान ये (रामचन्द्र) आये हैं—इस प्रकार सोचकर उमंग-भरे हृदय से अगस्त्य आगे बढ़े।

उस मुनि ने, जो अपने कमंडलु मे भरकर अनुपम कावेरी को लाये थे और उसके द्वारा अष्ट दिशाओ, सप्त लोकों तथा सब प्राणियो को सद्गति प्रदान की थी, राम को आते हुए देखा, तब प्रेमाधिक्य से कमल-समान कांतिवाले उनके नयनो से आनन्दाश्रु बह चले।

वहाँ स्थित मुनि को श्रीराम ने आकर प्रणाम किया। तब शाश्वत रहनेवाली मधुर तमिल-भाषा (के व्याकरण) को प्रचलित कर यशस्वी बने मुनि ने प्रेम से उनका आलिंगन किया और आनन्दाश्रु बहाये। फिर 'तुम्हारा स्वागत है।' कहकर अनेक मधुर वचन कहे।

महान् तपस्वी तथा ब्राह्मणजन घिरकर वहाँ आये, वेद-पाठ किया तथा कमडलु-जल का प्रोक्षण कर पुष्प बरसाये। फिर अगस्त्य, पुष्पो की सुरभि से पूर्ण शीतल उद्यान मे (राम, लक्ष्मण और सीता को) ले गये।

अमल (राम) ने हर्ष के साथ उस सुन्दर उद्यान मे प्रवेश किया। मुनि ने उनका आतिथ्य किया। फिर कहा—हे करुणामय। यह मेरे बडे सुकृत का फल है, जो तुम मेरी कुटी मे आये। तुमने मेरी अपूर्व तपस्या को सफल बना दिया।

यों कहने पर रामचन्द्र ने अगस्त्य से कहा—देवता और महान् तपस्वी मुनि भी आपकी कृपा को (सुलभता से) नही प्राप्त कर सकते। मैं आपकी कृपा का पात्र बना, अतः मैं समस्त लोको का विजयी हो गया हूँ। अब मुझे प्राप्त करने को क्या शेष रह गया ?

तब अपने उत्तम शिर पर चन्द्रकला को धारण करनेवाले (शिव) की समता करनेवाले उन मुनि ने कहा—हे प्रशमनीय गुणो से विभूषित। मैंने सुना था कि तुम