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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 325, कुल 549 में से

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पृष्ठ 325

अरण्यकाण्ड ३१५

अतः, हे समस्त कल्याणों से युक्त महानुभाव ! तुम उन मुनिवर के निकट जाओ। इनसे देवों तथा अन्य सब का हित होगा।

फिर, मुनि ने (अगस्त्य के आश्रम को जाने का) मार्ग बताकर उन्हें आशीर्वाद दिये। तब उन तपस्वी के कमल-समान चरणों को प्रणाम करके वे वीर वहाँ से चले और मधु की स्वच्छ धाराओं को बहानेवाले एक स्थान में रात्रि को पहुँचे।

विशाल (वा चिरंतन) तमिऴ भाषा से सारे लोक को चक्रपाणि (विष्णु) के जैसे नापनेवाले (अगस्त्य) मुनि ने जब यह सुना कि पौरुष के भरे कुमार (राम-लक्ष्मण) वहाँ आये हैं, तब उनके मन में जो आनन्द उमड़ा, वह समुद्र के-जैसे उमड़कर मरुद्देशों में भर गया। वे महिमावान् वरद (राम) की शरण में जाने के लिए आगे बढ़े।

वे अगस्त्य ऐसे हैं कि पूर्वकाल में जब देवताओं ने, समुद्र में असुरों के छिप जाने पर उनसे प्रार्थना की कि हे तपस्वी ! हम पर कृपा करो; तब उन्होंने सारे समुद्र को एक चुल्लू में भरकर पी लिया था और जब उन (देवों ने) प्रार्थना की कि समुद्र को त्यागने की कृपा करें, तब उसे वमन दिया था।

उन वामनाकार मुनि ने स्वच्छ समुद्र के जल को पीकर उसे वमन दिया था और मायावी गजन (वातापि) को खाकर उनके कठोर शरीर को पचा लिया था, एवं संसार के दुःख को दूर किया था।

जब विन्ध्याचल ने बढ़कर अंतरिक्ष को भर दिया था; उस समय चीर-वस्त्रों में स्थित रहनेवाले मुनियों ने (अगस्त्य) से प्रार्थना की कि आप हमारे जाने का कोई बाधा-रहित मार्ग बनाइए। तब अगस्त्य ने मेघों की पंक्तियों में उठे हुए गगनभेदी विन्ध्याचल पर अपना पद रखा और हाथी के जैसे जमकर बैठकर उसे ऐसा दबाया कि वह पाताल में धँस गया।

पूर्वकाल में एक बार उत्तर दिशा नीचे झुक गई और दक्षिण दिशा ऊपर उठ गई। तब नागों को धारण करनेवाले शिवजी ने अगस्त्य को आज्ञा दी कि हे निश्चल दया- निधीय तपस्यावाले ! तुम (दक्षिण दिशा में) जाओ। उस आदेश के अनुसार वे गगनभेदी मलय पर्वत ('पोदियिलै' नामक पर्वत) पर जा पहुँचे और शिवजी के समान ही दक्षिण दिशा में रहकर भूमि के संतुलन को बनाये रखा।

गतिमय परन्तु तथा सुन्दर ललाट में अग्नि-उगलनेवाले नेत्रों से शोभित, अग्नि- महत् तेज-स्वरूप भगवान् (शिव) के द्वारा उपदिष्ट तमिऴ (व्याकरण) को उन्होंने लोक- परंपरा, शब्द-शुद्धि एवं अपनी बुद्धि के द्वारा व्यवस्थित सुसंस्कृत करके पण्डितों से अध्ययन किये जानेवाले चार वेदों से भी श्रेष्ठ बना दिया।१


१. यह कथा प्रसिद्ध है कि अगस्त्य शिवजी द्वारा दत्त व्याकरण को लेकर दक्षिण में 'पोदियिलै' पर आकर रहे थे। वहाँ पेरगतियम् (बृहद् अगस्त्यम्) और चित्रगतियम् (लघु अगस्त्यम्) नामक दो ग्रन्थ रचकर अपने बारह शिष्यों को सिखाया, जिनमें तोल्काप्पियर मुख्य थे। इन्हीं तोल्काप्पियर ने आगे चलकर तमिऴ-भाषा का एक बृहद् व्याकरण लिखा, जो अब तमिऴ-साहित्य में उपलब्ध प्राचीनतम ग्रन्थ है। अगस्त्य का नाम युक्त व्याकरण ग्रन्थ अब उपलब्ध नहीं है, किन्तु उनके व्याकरण के उद्धरण अन्य ग्रन्थों में मिलते हैं। विशेष विवरण के लिए द्रष्टव्य बालकाण्ड (अनुवाद), पृ० ४० की पादटिप्पणी। —अनु०

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