कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 324, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३१४ | कंब रामायण |
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करने आयें, तो भी मैं उन अधर्मी (राक्षसो) का समूल विनाश करूँगा। आपलोग डरें नहीं।
(राम के द्वारा) कथित ये वचन सुनकर वे आनंदित हुए। उनका प्रेम उमड़ उठा, उनकी पीडा दूर हुई। वे अपने दंड उछालने लगे। मधुर वेद-वाचन करने लगे। नाचने लगे। फिर यो बोले—
हे सृष्टि के नायक! यदि तुम क्रोध करो, तो इन तीनो लोको के जैसे तीस कोटि लोक भी यदि तुम्हारा सामना करने आयें, तो वे भी तुम्हारे लिए कुछ नही होगे। सब वेद, (हमारी) तपस्या और ज्ञान इसके साक्षी हैं।
अतः, तुम (वनवास के) दिनो हमारी रक्षा करते हुए, यही इस आश्रम में आराम से रहो—यो मुनियो ने कहा। तब राम ने उन महान् तपस्वियो के चरणों को नमस्कार करके वही निवास किया।
वे कुमार (राम-लक्ष्मण) उस स्थान में विना किसी कष्ट के दस वर्ष-पर्यंत रहे। फिर, उन तपस्वियो ने विचार करके इनसे कहा कि तुम अगस्त्य के पास जाओ। तब वे अर्धचंद्र-सम ललाटवाली सीता देवी के साथ वहाँ से चल पडे।
दरारो से भरी तथा उबड़-खाबड़ धरती को और बाँस आदि के झाडो से भरे स्थलो के संकीर्ण मार्गों को धीरे-धीरे पार करके वे उज्ज्वल शरीरवाले कर्म-बंधन से रहित सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम में पहुँचे।
गर्व-रहित चित्तवाले उन कुमारो ने वहाँ पहुँचकर, सूर्य के समान तेजस्वी उन मुनिवर के अरुण चरणो को प्रणाम किया। तब मुनि ने उनका सत्कार करके कहा—तुम लोग यही विश्राम करो। तब वे वीर उस सुगंधित उद्यान में ठहरे।
जब वे वहाँ ठहरे हुए थे, तब उन मुनिवर ने उनका सब प्रकार से उपचार करके कहा—हे श्रीमन्! यह मेरे सुकृत हैं, जो तुमने यहाँ आने की कृपा की। प्रभु ने भी बड़ी भक्तिपूर्वक उन मुनिवर से कहा—
प्रख्यात चतुर्मुख के वंश में उत्पन्न मुनिश्रेष्ठो में तुम्हारे समान पूर्ण तपस्या से संपन्न अन्य कौन हैं? और, तुम्हारे-जैसे महान् तपस्वी की कृपा का पात्र में बना हूँ। इसलिए, मेरे समान (भाग्यशाली) गृहस्थ भी कौन है?
चिरकालिक तपस्या से संपन्न मुनिवर ने उपमान-रहित (राम) को उत्तर दिया—तुम आतिथ्य स्वीकार करके उसे सफल बनाओ। मै अपनी समस्त तपस्या दक्षिणा के रूप मे तुम्हे अर्पित करता हूँ।
वदान्य (राम) ने उस वेदज्ञ मुनि को उत्तर दिया—हे स्वामिन्! तुम्हारी यह करुणा ही किस तपस्या से कम है? फिर कहा—अब मुझे एक बात निवेदन करनी है। अगस्त्य महर्षि के दर्शन अभी मैने किये नही। यही एक कमी रह गई है।
तब मुनि ने कहा—तुमने ठीक सोचा है। मैने पहले ही यह कार्य निश्चित किया था। तुम उन मुनि के आश्रम में उनके निकट जाओ। वहाँ जाने पर तुम्हारे लिए कोई सुफल अलभ्य नही रह जायगा।
इतना ही नही। वे अबतक तुम्हारे आगमन की प्रतीक्षा करते हुए रहते होगे।