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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 323, कुल 549 में से

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पृष्ठ 323

अरण्यकाण्ड ३१३

पर प्रश्न किया कि क्या आज्ञा है ? तब उन्होंने उत्तर दिया—हे संसार के रक्षक (दशरथ) के पुत्र ! अब जो अत्याचार यहाँ हो रहे हैं, उन्हें सुनो।

दया नामक गुण का लेश भी जिनके हृदय में नहीं है, ऐसे धर्म-रहित कुछ लोग हैं, जिन्हें राक्षस कहते हैं। वे (राक्षस) हमें अनुचित तथा अधर्म के मार्ग पर चलने के लिए विवश करते हैं, जिससे हम धर्म और तपस्या के सन्मार्ग से भटक जाते हैं।

हे धनुष से युक्त भुजावाले ! अनेक व्याघ्र जहाँ संचरण करते हैं, ऐसे वन में रहनेवाले हरिणों के समान, हम रात-दिन व्यथितमन रहते हैं। हमसे अब अधिक सहा नहीं जायगा। प्रख्यात धर्म-पथ से भी हम स्खलित हो रहे हैं। क्या हमें इन दुःखों से मुक्ति मिलेगी ?

महिमामय तपोमार्ग में हम नहीं चल पाते। अब वेदों का अध्ययन भी नहीं कर पाते। अध्ययन करनेवालों की सहायता भी नहीं कर सकते। पुरातन यज्ञाग्नि को भी हम प्रज्वलित नहीं कर पाते। सदाचरण से भी भ्रष्ट हो गये हैं। अतः, हम ब्राह्मण कहलाने योग्य भी नहीं रहे।

इन्द्र के बारे में पूछो, तो वह राक्षसों के आदेशों को, अपने शिर आँखों पर धारण कर उनका पालन करता रहता है। हे हमारे प्रभु ! तुम्हारे अतिरिक्त हमारे दुःखों को दूर करनेवाला और कौन है ? हमारे सुकृत से ही तुम यहाँ आये हो।

संसार-भर में प्रचलित अपने शासन-चक्र से संसार की रक्षा करनेवाले चक्रवर्ती के हे पुत्र ! हमारे दिन अवार्य अंधकार से भरे हैं। अब तुम सूर्य के समान उदित हुए हो। हे कृपालु वीर ! हम तुम्हारी शरण में हैं—यों मुनियों ने निवेदन किया।

सूर्यकुल में उत्पन्न वीर (राम) ने कहा—यदि वे (राक्षस) मेरी शरण में आकर क्षमा नहीं माँगेंगे, तो भले ही वे इस ब्रह्मांड को छोड़कर बाहर भी क्यों न भाग जायें, मेरे बाण खाकर नीचे गिरेंगे। अब आप लोग इस अनुचित पीड़ा से मुक्त हो जाइए।

मेरी माता का वर माँगना, मेरे पिता की मृत्यु होना, मेरे गौरव-पूर्ण भाई (भरत) का दुःखी होना, मेरे नगर के लोगों का अत्यंत वेदना से दुःखित होना—इन सबके होते हुए भी मेरा वन-गमन मेरे पुण्यों का ही फल है।

यदि मैं उन राक्षसों की शक्ति का समूल नाश न करूँ, जो धर्म से कभी स्खलित न होनेवाले मुनियों के महत्त्व को भूलकर, नीच बनकर उन्हें सताते हैं, तो मेरे लिए यही उचित होगा कि मैं (उनके हाथ) मर जाऊँ। अन्यथा, मनुष्य-जन्म पाने से मुझे क्या सुकृत मिलेगा ?

उत्तम वेदों के ज्ञाता आपलोग भी उन राक्षसों के कबन्धों को नाचते हुए सहर्ष देखें। तभी दृढ़ धनुष तथा अवार्य बाणों से पूर्ण तूणीरों का वहन करनेवाली मेरी भुजाओं की पीडा दूर होगी।

गो-ब्राह्मणों तथा अन्य लोगों की रक्षा के लिए जो अपने प्राणों का त्याग करते हैं, वे ही उत्तम स्वर्ग के निवासी देवताओं के लिए भी पूज्य देवता बनते हैं।

शूरपद्म (नामक असुर) को मारनेवाले (सुब्रह्मण्य), उज्ज्वल चक्रायुध को धारण करनेवाले (विष्णु) या त्रिपुरों को मिटानेवाले (शिव) भी, उन राक्षसों की रक्षा