कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
३१६ कंब रामायण
जिस परम तत्त्व के बारे मे सब लोग यह सोचते रहते हैं कि वह स्वर्ग मे है, भूलोक मे है, अन्य किसी लोक मे है, (योगियो के) हृदय मे है अथवा वेदों मे है, उस तत्त्व को मै अपनी आँखो से देख सकूँगा—यह सोचकर अगस्त्य आनन्दित हुए।
ब्रह्मा आदि भी, प्रसिद्ध वेदो तथा अन्य (दर्शन-ग्रन्थो) का सम्यक् अध्ययन करने से तीक्ष्ण बने हुए अपने ज्ञान की कसौटी पर अनेक युगो तक कस-कसकर भी जिस तत्त्व को ठीक-ठीक पहचान नही पाते, वही परम तत्त्व अब मेरे सम्मुख स्थित होकर मुझसे बोलने-वाला है—यों सोचकर अगस्त्य अत्यन्त आनन्दित हुए।
असाध्य तथा क्रूर बलवाले राक्षस-रूपी विष को, जड़ से उखाड़ देनेवाला वैद्य अब आ गया है। अब देवता लोग बच गये। तपस्वियो के प्राण भी सुरक्षित हो गये। ब्राह्मण भी धर्म-मार्ग में स्थिर हुए—यों अगस्त्य ने विचार किया।
अब प्राणियो को (उनकी आयु के) मध्य मे ही चबाकर खा जानेवाले राक्षसो के वज्र को भी जलानेवाले क्रोध-रूपी अग्नि को शीघ्र मिटाकर संसार की रक्षा करने के लिए गगन के मेघ के समान ये (रामचन्द्र) आये हैं—इस प्रकार सोचकर उमंग-भरे हृदय से अगस्त्य आगे बढ़े।
उस मुनि ने, जो अपने कमंडलु मे भरकर अनुपम कावेरी को लाये थे और उसके द्वारा अष्ट दिशाओ, सप्त लोकों तथा सब प्राणियो को सद्गति प्रदान की थी, राम को आते हुए देखा, तब प्रेमाधिक्य से कमल-समान कांतिवाले उनके नयनो से आनन्दाश्रु बह चले।
वहाँ स्थित मुनि को श्रीराम ने आकर प्रणाम किया। तब शाश्वत रहनेवाली मधुर तमिल-भाषा (के व्याकरण) को प्रचलित कर यशस्वी बने मुनि ने प्रेम से उनका आलिंगन किया और आनन्दाश्रु बहाये। फिर 'तुम्हारा स्वागत है।' कहकर अनेक मधुर वचन कहे।
महान् तपस्वी तथा ब्राह्मणजन घिरकर वहाँ आये, वेद-पाठ किया तथा कमडलु-जल का प्रोक्षण कर पुष्प बरसाये। फिर अगस्त्य, पुष्पो की सुरभि से पूर्ण शीतल उद्यान मे (राम, लक्ष्मण और सीता को) ले गये।
अमल (राम) ने हर्ष के साथ उस सुन्दर उद्यान मे प्रवेश किया। मुनि ने उनका आतिथ्य किया। फिर कहा—हे करुणामय। यह मेरे बडे सुकृत का फल है, जो तुम मेरी कुटी मे आये। तुमने मेरी अपूर्व तपस्या को सफल बना दिया।
यों कहने पर रामचन्द्र ने अगस्त्य से कहा—देवता और महान् तपस्वी मुनि भी आपकी कृपा को (सुलभता से) नही प्राप्त कर सकते। मैं आपकी कृपा का पात्र बना, अतः मैं समस्त लोको का विजयी हो गया हूँ। अब मुझे प्राप्त करने को क्या शेष रह गया ?
तब अपने उत्तम शिर पर चन्द्रकला को धारण करनेवाले (शिव) की समता करनेवाले उन मुनि ने कहा—हे प्रशमनीय गुणो से विभूषित। मैंने सुना था कि तुम
अरण्यकाण्ड ३१७
दंडकारण्य में आये हो। इस पर मैं यह सोचकर आनन्दित हुआ कि तुम इस स्थान पर भी अवश्य आओगे। फिर आगे कहा—
हे प्रभु ! अब तुम यही निवास करो, यहाँ रहने से आवश्यक तथा स्पृहणीय महान् तपस्या को पूर्ण कर सकोगे। बढ़ते हुए क्रोध से युक्त क्रूर राक्षस जब आयेंगे, तब युद्ध मे उन्हे निहत करके हमारे मन के क्लेश को दूर करना।
हे चक्रवर्त्ती-कुमार ! ( अब ) वेद जीवित रहेंगे। मनु-विहित नीति जीवित रहेगी। धर्म जीवित रहेगा। हीन बने हुए देवता उन्नति प्राप्त करेंगे। असुर अवनति प्राप्त करेंगे। इसमे कुछ संदेह नही है। यह निश्चित है। सप्त लोक जीवित रहेगे। तुम यही निवास करो—यो अगस्त्य ने कहा।
तब राम बोले—हे वेद-ज्ञान से युक्त मुनिवर ! गर्वीले राक्षस, जो अत्याचार कर रहे हैं, उन्हे मिटाने एव उनके गर्व को दूर करने के हेतु उनका शीघ्र हनन के लिए मै सन्नद्ध हूँ। अतः, मै सोचता हूँ कि वे जिस दिशा से आते हैं, उसी दक्षिण दिशा मे मेरा आगे बढ़ जाना उचित है। आपकी क्या सम्मति है ?
तब अगस्त्य ने यह कहकर कि, 'तुमने सुन्दर वचन कहे' आगे कहा—यह जो धनु मेरे यहाँ है, यह पूर्वकाल मे विष्णु के पास था। त्रिलोकी के लोग तथा मै इसकी पूजा करते रहे हैं। इस धनुष को तथा अक्षय बाणोवाले इन ( दो ) तूणीरो को लो। यह कहकर धनुष एव तूणीर राम को प्रदान किये।
अगस्त्य ने राम को एक ऐसा करवाल दिया, जो यदि त्रिभुवन को तराजू के एक पलडे में रखकर और दूसरे मे उस करवाल को रखकर तोलें, तो त्रिभुवन भी उसकी समता नहीं कर सकते। फिर, एक (वैष्णव नामक) शर दिया, जिसे अग्नि-रूपी हर ने महान् मेरु को धनुष बनाकर उस पर रखकर प्रयुक्त किया था और उससे त्रिपुरो को मिटाया था। उन दोनो शस्त्रों को देकर—
अगस्त्य ने कहा—हे तात ! उन्नत वृक्षो, पर्वत शिखरों, सिकता-श्रेणियो तथा पुष्प-राशियो से शोभायमान, आसपास मे शीतल उद्यानो से शोभित और तरगायमान नदियो से घिरे हुए पर्वत मे पंचवटी नामक एक स्थान है।
उस स्थान मे फल देनेवाले बालकदली-वृक्ष, रक्त धान की वालियों से पूर्ण सस्य, मधुस्रावी पुष्प तथा दिव्य कावेरी के समान नदी का प्रवाह है। वहाँ इस देवी (सीता) के कौतुक के लिए सारस एव हस भी हैं।
अब तुम उसी स्थान मे जाकर निवास करो—यों। (अगस्त्य ने) कहा। घनश्याम ने भी उन्हे प्रणाम किया, उनकी आज्ञा ली और आगे चले। उनके पीछे खाँड़ के रस के समान मीठी बोलीवाली (सीता) तथा उनके अनुज चले और उनका अनुसरण करता हुआ उन मुनिवर का मन चला। वे सत्वर आगे बढ़ चले। ( १-५६ )
अध्याय ५
जटायु-दर्शन पटल
वे (राम, सीता और लक्ष्मण) कई कोस चले और बहनेवाली अनेक नदियों, स्थिर रहनेवाले कई पर्वतों, क्रमशः स्थित घने वनों आदि को पार करके गये और एक स्थान पर गृद्धों के राजा (जटायु) को देखा।
वह जटायु इस प्रकार शोभायमान था, जैसे उदयगिरि पर स्थित पिघले स्वर्ण-सदृश बाल रवि हो, जो इस विशाल धरती की सब दिशाओं को प्रकाशित करनेवाली अपनी घनी किरणों-रूपी पंखों को फैलाये हुए बैठा हो।
वह (जटायु) एक ऊँचे पर्वत के शिखर-मध्य बैठा हुआ ऐसा था, मानों देवताओं ने अपार शब्दायमान क्षीरसागर के मध्य चंद्र की कांति से सयुत मंदर पर्वत को खड़ा कर दिया हो।
वह जटायु, विशाल प्रदेशवाले उस नीलवर्ण पर्वत पर (अपनी देह-कांति से) नीलवर्ण गगन की कांति को आवृत्त किये हुए, दीर्घ प्रवाल-लता के समान सुन्दर वर्ण से युक्त अपनी मनोहर टाँगों की अरुण कांति के साथ शोभायमान था।
वह पवित्र था। अपार शिक्षा तथा ज्ञान से युक्त था। सत्यपरायण था। दोषहीन था। सूक्ष्म बुद्धिवाला था। अपनी विवेचन-शक्ति से (बातों को) जाननेवालों के जैसे ही दूर की वस्तुओं को भी अपनी छोटी आँखों से देख सकता था।
वह क्रूर राक्षसों को मारकर यम को भोजन देकर तदनन्तर बचे हुए मास को स्वयं खानेवाला था, नित्य रगड़ खाने से उसकी चोंच इन्द्र के छोटी आँखवाले (ऐरावत) हाथी के अंकुश के समान चमक रही थी।
वह नवग्रहों और इनसे घिरे हुए ध्रुव नक्षत्र का-सा दृश्य उपस्थित करनेवाले रत्नहार से शोभित था। उसके शिर पर किरीट इस प्रकार शोभित हो रहा था, जिस प्रकार मेरु के शिखर पर उज्ज्वल रवि हो।
वह शब्दों की शक्ति को कुंठित करनेवाले (अर्थात्, शब्दों के द्वारा प्रकट करने में असम्भव) महान् यश से उदित होनेवाले अरुणदेव का पुत्र था और उसने अनेक कल्पों को दिनों के समान व्यतीत होते हुए देखा था।
वह एक अत्युन्नत पर्वत पर खड़ा था। वह इतना बलवान् था कि उसके भार को न सँभाल सकने के कारण वह पर्वत धरती में धँसकर नीचा हो गया था। ऐसी वीरता से पूर्ण उस (जटायु) के निकट, वे (राम-लक्ष्मण) आशंका-युक्त मन के साथ जा पहुँचे।
बडे वीर-ककण को पहने हुए उन वीरों ने, यह सोचते हुए कि कोई ज्ञान-रहित राक्षस हमारी हानि करने के विचार से पक्षी का वेष धारण करके आया है, संदेह के साथ उसे देखा।
अरण्यकाण्ड ३१६
वह (जटायु) भी, वीर-कंकणो से भूषित तथा दृढ धनुष को धारण करनेवाले उन वीरों को देखकर संदेह करने लगा कि जटायुक्त शिरवाले ये (पुरुष), कर्म-बंधन से मुक्ति-प्राप्ति का साधन तप करनेवाले (तपस्वी) मात्र नही दिखते, क्योकि इनके हाथ में धनुष है। शायद ये स्वयं देव ही तो नही हैं ?
मै तो इन्द्र आदि सब देवताओ को देखता हूँ। चक्रधारी (विष्णु), अभीष्ट वर देनेवाले (ब्रह्मा) और परशुधारी (शिव) भी मेरे लिए अदृश्य नही हैं। मै उन्हे सदा देखता हूँ।
मन्मथ को भी मैने अपनी आँखो से देखा है। वह, कमल-सदृश अरुण नयनो तथा विशाल हाथो से युक्त इन वीरो की चरण धूलि की भी समता नही कर सकता। फिर, ये वीर कौन हैं ?
इनके शरीर मे तीनो लोको को अपना स्वत्व बनानेवाले उत्तम पुरुष के लक्षण विद्यमान हैं। कमलभव देवी (लक्ष्मी) का उपमान कहने योग्य एक रमणी इनके साथ चल रही है। मै नही जानता कि ये धनुर्धारी वीर कौन हैं।
ये नील तथा रक्तवर्ण पर्वतो के जैसे रूपवाले हैं। विजयलक्ष्मी से शोभित वक्ष-वाले हैं। अरुण नयनवाले हैं। ये दोनो वीर, मेरे सुहृद् अपूर्व सद्गुणो से पूर्ण चक्रवर्ती (दशरथ) के जैसे हैं।
वह (जटायु) मन में इस प्रकार अनेक तर्क-वितर्क कर रहा था। उसके मन में कठोर शस्त्रधारी उन वीरो के प्रति प्रेम उमड़ आया। उसने प्रश्न किया—उत्तम तथा दृढ धनुष को धारण करनेवाले, वृषभ-सदृश (बलवान्) आप कौन हैं ?
उसके यो प्रश्न करने पर, पुष्प-मालाओ से अलंकृत, सत्य के अतिरिक्त अन्य किसी प्रकार का वचन न बोलनेवाले इन वीरों ने उत्तर दिया—शब्दायमान विशाल सागर से आवृत धरती की रक्षा करनेवाले वीर-कंकणधारी चक्रवर्ती (दशरथ) के हम पुत्र हैं।
उनके यो कहने पर, उमड़ते हुए हर्ष-रूपी समुद्र मे निमग्न होकर प्रेम से उनका आलिंगन करने के लिए वह (उस पर्वत पर से) नीचे उतर पड़ा और बोला—हे सुरभित हारो को धारण करनेवाले वीरो। उस चक्रवर्ती की पर्वत-समान विशाल भुजाएँ बलशाली तो हैं न ?
ज्योही (उन वीरो ने) यह कहा कि वे (चक्रवर्ती) अविस्मरणीय सत्य की रक्षा करते हुए स्वर्ग सिधार गये, त्योंही उनकी मृत्यु का हाल जानकर वह शोकोद्विग्न हो उठा और फिर मूर्च्छित हो गिर पड़ा।
तब उन दोनो ने अपने विशाल हाथों से उसे उठाया तथा अपने अश्रुओ से उसके मुख को धोया। अपने प्राण (सज्ञा) लौट आने पर जटायु शिथिलमन होकर रोने लगा।
हे राजाओ के राजा। हे असत्य के शत्रु। हे सत्य के आभरण ! हे यश के प्राण। तुम्हारी अवर्णनीय दानशीलता, उज्ज्वल श्वेतच्छत्र तथा क्षमा के सम्मुख जो उडुपति (चन्द्रमा), समुद्र से आवृत धरती तथा उदार कल्पवृक्ष अपनी गरिमा को खो बैठे थे, अब आनद से जीवित रहेंगे। इस प्रकार तुम याचको को, सद्धर्म को एव मुझको यह शोक भोगने के लिए छोड़कर चले गये।
३२० कंब रामायण
हे महाराज ! शोभा बढ़ानेवाले तथा लोकों को अमृत प्रदान करनेवाले श्वेतच्छत्र से युक्त । समुद्र से आवृत इस धरती की रक्षा का भार त्याग कर क्या मेरे अस्थिर प्रेममय मित्र की परीक्षा करने के लिए ही तुम यो चले गये हो ? हे नायक ! हाय ! पापकर्मी मैं, मित्र-धर्म से स्खलित होकर अभी तक जीवित हूँ ।
हे दोष से रहित परिशुद्ध मनवाले ! दही को मथनेवाली मथानी के समान लोकों को दुःख देनेवाले शवरासुर को जब तुमने परास्त किया था, तब तुमने सूक्ष्म मृत्तिका से भरी इस धरती के सब लोगों के सम्मुख अपने को देह और मुझे प्राण कहा था। तुम्हारे वचन अयथार्थ नहीं होते। विवेक-रहित यम प्राणों को छोड़कर शरीर को ही स्वर्ग ले गया है।
मैं अब अपनी कीर्त्ति को बढ़ाते हुए प्रज्वलित अग्नि में गिरूँगा। अन्यथा, भीरु स्त्रियों के समान धरती पर गिरकर विलाप करना क्या मेरे लिए उचित होगा ? यों कहकर आत्मज्ञानी के जैसे वह उठा और उन (राम-लक्ष्मण) को देखकर बोला-सप्त लोकों को अपने अधीन बनानेवाले हे कुमारो ! सुनो—
दक्ष प्रजापति की पचास पुत्रियाँ थीं, जो पीन स्तनोंवाली सुन्दरियाँ थीं। उनमें तेरह पुत्रियों से काश्यप ने विवाह किया। उनमें से अदिति ने तैंतीस करोड़ सुरों को जन्म दिया और काजल-लगी आँखोंवाली दिति ने उन (सुरों) से दुगुने असुरों को जन्म दिया।
दनु ने दानवों को जन्म दिया। मति ने मनुष्य जातियों को जन्म दिया। सुरभि ने गायों, अश्वों और अन्य जन्तुओं को जन्म दिया। क्रोधवशा ने गर्दभो, हरिणी और ऊँटों को जन्म दिया।
मेघतुल्य केशोंवाली विनता ने घन की विद्युत् को, अरुण ने गरुड़ को पल्लव- तुल्य पखवाले उलूक को तथा चील आदि पक्षियों को जन्म दिया। (स्त्रियों में) रत्न-तुल्य ताम्रा ने गोरैया, कौदारी, 'काडे' आदि (छोटे) पक्षियों को जन्म दिया। कला नामक लता-सदृश महिला ने लता-गुल्मों को जन्म दिया।
कद्रू नामक विद्युल्लता-सदृश स्त्री ने अनेक भयंकर फनोंवाले सर्पों को जन्म दिया। सुधा ने एक शिरवाले नागों को जन्म दिया। अरिष्टा ने गोह, गिरगिट, गिलहरी आदि जन्तुओं को जन्म दिया। इडा ने जलचरों को जन्म दिया।
अदिति, दिति, दनु, अरिष्टा, सुधा, कला, सुरभि, विनता, मति, इडा, कद्रू, क्रोधवशा, ताम्रा—इन्होने भी क्रमशः इन सब को जन्म दिया। विनता के पुत्र अरुण के कोमल भुजाओं तथा बाल-चन्द्र तुल्य ललाटवाली रंभा से हम (अर्थात्, संपाति और जटायु) उत्पन्न हुए।$^१$
यौवन की शोभा से युक्त हे कुमारो ! मैं अरुण का पुत्र हूँ। जिन-जिन लोकों में वे (अरुण) व्याप्त होते हैं, उन-उन लोकों में जाने की शक्ति मैं रखता हूँ। उन दशरथ का, जिन्होंने (लोकों के) अंधकार को दूर करते हुए शासन-चक्र को चलाया था, मैं प्राण- प्रिय मित्र हूँ। जिस समय देव तथा अन्य जातियों का विभाजन हुआ था, उसी समय मैं उत्पन्न हुआ। मैं गृद्धराज संपाति का अनुज जटायु हूँ।
१. ऊपर के पाँच पद प्रक्षिप्त जान पड़ते हैं। —अनु०
अरण्यकाण्ड ३२१
उस (जटायु) ने जब ये वचन कहे, तब पर्वत-सदृश कंधोंवाले उन (राम-लक्ष्मण) ने अपने कमल-करों को जोड़कर प्रणाम किया। उस समय प्रेम के कारण उत्पन्न अत्यधिक वेदना से अपने कमल-सदृश नयनों से अश्रु बहाते हुए इस प्रकार हुए, मानो धरती पर अपार यश को छोड़कर स्वर्ग में पहुँचे हुए अपने पिता (दशरथ) को ही पुनः लौटे हुए देख रहे हों।
सुन्दर गुणोंवाले उन वीरों को अपने दोनों पंखों से आलिंगन करके (जटायु ने) कहा—हे पुत्रो ! अब तुम ही मुझ पापकर्मवाले की भी अंतिम क्रिया करके मेरा उपकार करो। हमारे दो शरीरों के लिए एक ही प्राण बने हुए वे (दशरथ) जब चल बसे, तब भी यह मेरा शरीर सुखपूर्वक अबतक जीवित है। यदि मैं इस शरीर का मोह छोड़कर अभी इसे अग्नि में न डाल दूँ, तो इस दुःख को मैं कभी भूल नहीं सकूँगा।
इस प्रकार कहनेवाले गृध्रराज को देखकर घनी पुष्प-मालाओं से विभूषित उन वीरों ने उसे प्रणाम किया और अपने नयनों से मोती-जैसे अश्रुओं को अधिकाधिक बहाते हुए ये वचन कहे—
जबतक चक्रवर्ती जीवित रहे, वे हमारी रक्षा करते थे। वे अपने सत्य की रक्षा के लिए, (अपने शरीर का) कुछ भी विचार न करके स्वर्ग सिधार गये। अब हे महाभाग ! तुम भी यदि हमें छोड़कर चले जाओगे, तो हमारा अवलंब कौन रह जायगा ?
हे धर्म का कभी त्याग न करनेवाले ! जिनका वियोग असह्य होता है, ऐसे पिता, माता तथा सुखद नगर से बिछुड़कर भी तुम्हारे कारण हम वन में आने के दुःख से मुक्त हुए हैं। अब क्या तुम भी हमें छोड़कर जाना चाहते हो ?
जब वे वीर इस प्रकार प्रार्थना करते हुए, दुःखी मन के साथ खड़े रहे, तब उन्हें देखकर जटायु ने कुछ विचार कर कहा—हे तात ! यदि मेरा इस समय मर जाना तुम्हें स्वीकार नहीं हो, तो तुमलोग जब अयोध्या वापस पहुँचोगे, तब मैं उन चक्रवर्ती (दशरथ) के पास जाऊँगा।
यदि चक्रवर्ती स्वर्ग सिधार गये, तो तुम वीर राज्य का भार वहन किये बिना इस वन में क्यों आये हो ? तुम्हारे इस कार्य से मेरी बुद्धि चकरा रही है। अतः, सारा वृत्तांत ठीक-ठीक कहो।
पत्राकार अति तीक्ष्ण मनोहर तथा रक्त के चिह्नों से युक्त शूल को धारण करने-वाले हे वीरो ! बलवान् देव हो, दानव हो, नाग हो अथवा अन्य कोई भी हो, यदि वे तुम्हें कुछ कष्ट देंगे, तो मैं उनके प्राण हरूँगा और तुम्हें राज्य प्रदान करूँगा।
तात (जटायु) के यों कहने पर सीता-पति ने अपने अनुज की ओर देखा। तब उस (लक्ष्मण) ने अपनी विमाता के कारण उत्पन्न सारी घटना को संपूर्ण रूप से कह सुनाया।
तब जटायु ने राम से कहा—तुम अपने पिता के सत्य-वचन की रक्षा के लिए अपनी विमाता की आज्ञा को शिरोधार्य करके पृथ्वी (के राज्य) को अपने भाई (भरत) को सौंपकर यहाँ आये हो। हे वदान्य ! मेरे तात ! तुमने जो माहत्म्यपूर्ण कार्य किया है, उसे और कौन कर सकता है ?
| ३२२ | कंब रामायण |
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यों कहकर कमल-समान नयनोंवाले (राम) का प्रेम से आलिंगन करके उनका सिर सूंघा और आनन्दाश्रु बहाते हुए कहा—हे समर्थ कुमार। तुमने उन चक्रवर्ती को तथा मुझको अपार यश दिया है।
फिर, उस महात्मा (जटायु) ने कंकणों से भूषित हंस-सदृश देवी (सीता) को देखकर (राम से) पूछा—हे चक्रवर्ती कुमार ! यह स्त्री कौन है ? कहो।
तब राम के अनुज ने पूर्वकाल में साकार अंधकार-सदृश ताडका के वध से लेकर शिव-धनु का भंग करने तक की सारी घटनाएँ तथा वन-गमन तक के अन्य प्रसंग भी कह सुनाये।
उज्ज्वल शिरवाले वयोवृद्ध (जटायु) ने सब सुनकर आनन्दित होकर कहा—पुष्प-मालाओं से भूषित हे कुमारो ! समृद्ध देश को त्यागकर आये हुए तुमलोग उज्ज्वल ललाटवाली (सीता) के साथ इसी वन में निवास करो। मैं तुमलोगों की रक्षा करूँगा।
तब सबके हृदयो में निवास करनेवाले (राम) ने (जटायु से) कहा—हे तात ! अगस्त्य महर्षि ने विचार करके, एक अति सुन्दर नदी के तट पर स्थित एक स्थान के बारे में कहा है।
तब जटायु ने कहा—वह महिमापूर्ण स्थान बहुत ही अच्छा है। तुमलोग वहाँ रहकर अपने धर्म का निर्वाह करो। आओ। मैं तुम्हें वह स्थान दिखाता हूँ—यों कहकर उनपर अपने विशाल पक्षों की छाया करता हुआ वह गगन-मार्ग से उड़ने लगा।
परिशुद्ध चित्तवाले तथा दोषहीन गुणवाले उस जटायु ने उन्हें (पंचवटी नामक) उस स्थान को दिखाया और फिर चला गया। उन धनुर्धारी वीरो ने उस सुन्दर उद्यान में अपना निवास बनाया।
वहाँ के राक्षसों के बल को असंदिग्ध रूप से जाननेवाला जटायु उचित ढंग से विचार करके कंचुकाबद्ध स्तनोंवाली वधू (सीता) की एव अपने पुत्र (सदृश राम-लक्ष्मण) की, घोसले में रहनेवाले अपने बच्चों की तरह रक्षा करता रहा। (१-४८)
अध्याय ५
शूर्पणखा पटल
उन वीरो (राम और लक्ष्मण) ने उस गोदावरी नदी को देखा, जो धरती का आभरण थी, उत्तम पदार्थों को प्रदान करनेवाली थी, अनेक धाराओ में प्रवहमाण थी। उष्णता को शांत करनेवाले घाटो से शोभित थी; एव पञ्चविध भंगिमाओं से युक्त थी। (अर्थात्, १. पर्वत, २. अरण्य, ३. नगर, ४. समुद्र, एवं ५. मरु नामक पाँचों प्रदेशों में बहती थी तथा पूर्वोक्त पाँच प्रदेशों में होनेवाले मनुष्य के व्यापारी का वर्णन
अरण्यकाण्ड ३२३
करनेवाली थी )। बहुत स्वच्छ थी। शीतल गुणवाली थी। यों वह नदी उत्तम कवि की कविता के समान थी। १
वह दिव्य नदी भ्रमरों से गुंजित, कमलपुष्प-रूपी अपने वदन को विकसित किये, सुरभित नीलोत्पल-रूपी नयनों से एकटक देखती हुई, क्रमशः एक के पश्चात् एक करके आनेवाली लहरों के करों से उत्तम पुष्पों को बिखेर रही थी, मानों उन प्यारे कुमारों के चरणों की पूजा करके उनको प्रणाम कर रही हो।
चंचल जल से पूर्ण वह नदी, निरपराध तथा सत्य-युक्त उन कुमारों को वन-जीवन के कष्ट उठाते देखकर, उमड़ते हुए प्रेम से, सद्योविकसित नीलोत्पल-समुदाय-रूपी अपने मनोहर नेत्रों से अश्रु-बिंदु बहाती हुई, अत्यन्त द्रवित होकर मानो दहाड़ मारकर रो रही थी।
दीर्घ धनुर्धारी (राम), नाल-संयुक्त कमलपुष्प-रूपी शय्या पर युगल नयनों के जैसे विश्राम करनेवाले चक्रवाक-मिथुन को देखते और अपनी प्रियतमा (सीता) के वक्ष की ओर दृष्टि फेरते तथा उत्तम आभरणों से भूषित सीता महिमावान् प्रभु (राम) के कंधों में रमे हुए अपने मन के साथ उन्हीं (कंधों) के जैसे शोभित होनेवाले रत्नमय पुलिनों की ओर देखती।
उत्तम प्रभु (राम), हंसों को (उनके आने की आहट पाकर) वहाँ से हट जाते हुए देखकर अपने समीप में आनेवाली सीता की पदगति को निहारते हुए मंदहास करते। तब वहाँ पर आकर, जल पीकर लौट जानेवाले मत्तगजों को देखती हुई वह देवी भी एक नवीन मंद-मुस्कान से खिल उठती।
धनुष को अपने विशाल कर में धारण करनेवाले वीर (राम), जब जल से समृद्ध उस नदी में लताओं को हिलते हुए देखते और अपनी प्रियतमा की कटि को देखते, तब सीता अंधकार-सदृश कांतिवाले मनोहर कुवलय-पुष्पों के मध्य अरुण कमल को विकसित देखती और (उस दृश्य में) अपने प्रभु के सौंदर्य को देखती।
राम, इस प्रकार चलकर उस नदी के निकट, शीतल 'पंचवटी' नामक पुष्पभरे उद्यान में जा पहुँचे और वहाँ अनुज के द्वारा निर्मित एक सुन्दर पर्णकुटी में निवास करने लगे। फिर एक दिन—
(शूर्पणखा उस आश्रम में आ पहुँची) जो नीलरत्न-समान कांतिवाले राक्षस—
१. तमिल काव्य-लक्षणों के अनुसार कविता में 'तुरै' और 'तियै' नामक दो लक्षण होने चाहिए। तुरै का अर्थ है 'अहम्' और 'पुरम्'। ये क्रमशः मनुष्य के आंतरिक भाव और बाह्य-व्यापार को व्यक्त करते हैं। पुरम् की अपेक्षा अहम् को व्यक्त करनेवाली कविता अधिक सुन्दर होती है। नवरसों में शृंगार को अहम् में और अन्य रसों को पुरम् में अंतर्भूत किया जा सकता है। 'तुरै' शब्द में श्लेष से घाट का अर्थ भी है। तियै का अर्थ है पाँच प्रकार के प्रदेश। इन्हीं पाँच प्रदेशों की भूमिका पर मनुष्य-जीवन की सुख-दुःखात्मक विभिन्न दशाओं का चित्रण करना प्राचीन तमिल कवियों की परिपाटी रही है। नदी और कविता—दोनों का संबंध इन पाँच प्रदेशों से दिखाया गया है। यह पद कंबन की कविता-कौशल का एक सुन्दर नमूना है। —ले०
| ३२४ | कंब रामायण |
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राज ( रावण ) के समूल विनाश का कारण बननेवाली थी और किसी के जन्मकाल मे ही उसके प्राणो के साथ उत्पन्न होकर, अपना प्रभाव दिखाने के लिए उचित समय की प्रतीक्षा करती हुई किसी व्याधि के सदृश थी ;
जो ताँबे के जैसे लाल और घने केशोंवाली थी । राहु को भी मद कर देनेवाले शरीर से युक्त थी । स्वर्ग के देवों, तपस्वियो तथा समुद्र से आवृत धरती के लोगो का एक साथ विनाश करने की शक्तिवाली थी ,
किसी क्रूर कार्य के हेतु अकेले ही उस वन मे निवास करनेवाली थी । वह ऐसी दक्ष थी कि इस सारे ससार मे सर्वत्र अनायास ही घूम सकती थी । ऐसी वह ( शूर्पणखा ) राघव के निवासभूत उस आश्रम में आई ।
अपने बंधुजनो का अंत खोजनेवाली उस शूर्पणखा ने, पूर्वकाल मे पूजनीय देवताओं की इस प्रार्थना पर कि—'राक्षस लोग हमारा विरोध करते हैं, इसलिए आप उनका नाश करें', आदिशेष पर योगनिद्रा छोड़कर ससार मे अवतीर्ण हुए प्रभु को देखा ।
वह सोचने लगी—मन मे रहनेवाले ( मन्मथ ) के आकार नही होता । देवेन्द्र के सहस्र नयन होते हैं । शिवजी के कमल-तुल्य नयन तीन होते हैं। अपनी नाभि से सारी सृष्टि की रचना करनेवाले ( विष्णु ) के चार भुजाएँ होती हैं । ( अतः, यह उनमें से कोई नही हैं ।)
वह फिर विचार करने लगी—तो क्या जटा-जूट से शोभित (शिव) के (ललाट) नेत्र से देखे जाने से जलकर अनग बना हुआ वह ( मन्मथ ) ही, श्रेष्ठ तप करके अब पहले से भी अधिक सुन्दर रूप प्राप्त करके यहाँ आया है ।
वह सोचने लगी—इसकी मनोहर बाहुएँ, उत्तम लक्षणो से पूर्ण हैं । ( आजानु ) लबी होकर सुषमा का निवास-स्थान बनी हैं । वृक्ष भी इनकी समता नहीं कर सकते । पर्वत भी इनके सम्मुख क्षुद्र हैं । तो क्या ये बल से प्रभूत दिग्गजों की सूँडें ही हैं ?
धनुर्युद्ध मे निपुण इस व्यक्ति के वीरतापूर्ण कंधो की समता शिलामय पर्वत भी नही कर सकते । किसी अत्युन्नत इन्द्रनील रत्न के पर्वत को छोड़कर, प्रख्यात मेरु-पर्वत भी, स्वर्णमय होने से, इन ( कंधो ) की समता नही कर सकता ।
नाल पर उठे हुए रक्तकमल के दलों की समता करनेवाले इसके नयनो तथा पर्वत के समान उन्नत आकार से शोभायमान इस पुरुष की, एक कंधे से दूसरे कंधे तक फैले हुए ( वक्ष ) प्रदेश को दृष्टि-पथ मे लाने की चेष्टा करें, तो मेरे नेत्र इतने विशाल नही हैं कि इस विशाल वक्ष को पूर्णतया एक साथ देख सकें ।
यह सुन्दर अति-उज्ज्वल वदन क्या प्रफुल्ल कमल के जैसा है ? ( नही, उससे भी अधिक सुन्दर है )। क्या किरणो से पूर्ण चन्द्र को ( इसके वदन का ) उपमान कहें ? पर उस ( चन्द्र ) की कलाएँ तो क्षीण होती रहती हैं । वह जब पूर्ण रहता है, तब भी उस मे कलक रहता है ( अतः, वह इसके वदन का उपमान नही हो सकता ) ।
ऐसे मनोज्ञ सौंदर्य मे पूर्ण यह पुरुष किस प्रयोजन से, व्यर्थ ही अपने सुन्दर शरीर
अरण्यकाण्डं ३२५
को कष्ट देता हुआ यो व्रताचरण कर रहा है ? न जाने तपस्या ने स्वयं कैसी तपस्या की है कि ऐसे नवीन कमल-तुल्य नयनों से युक्त यह पुरुष उस (तपस्या) को अपनाये हुए है ?
समुद्र-रूपी वस्त्र से शोभित, सुन्दर रूपवाली, गज की गति से युक्त पृथ्वी का स्त्रीत्व भी कैसा (सार्थक) है ? उसपर उगी हुई हरियाली ऐसी है, मानो इस पुरुष के पदतल के स्पर्श से वह (पृथ्वी) पुलक से भर गई हो।
कटि में बँधे हुए करवाल से शोभित इस पुरुष की उज्ज्वल कांति को दिनकर ने कदाचित् देखा ही नहीं है। इसीलिए, मन में लज्जा का अनुभव न करके, वह दूर तक अपनी किरणों को प्रसारित करता हुआ संचरण करता है।
दुर्लंघ्य महान् पर्वत को भी जीतनेवाले उन्नत कंधों से युक्त इस पुरुष के अधर का संसार में उचित उपमान क्या दूँ ? हे मन ! यदि प्रवाल से इसकी उपमा दूँ, तो तू मेरा धिक्कार करेगा (क्योंकि वह उपमान-योग्य नहीं है)। अब किस उत्तम पदार्थ को इसका उपमान बताऊँ ?
सब कलाओं से पूर्ण चंद्रमा के समान शोभायमान इस सुन्दर की, सूर्य को भी (अपनी कांति से) विचलित करनेवाली कटि को प्राप्त करने के लिए, न जाने, इन वल्कलों ने कौन-सा तप किया था, दोषहीन पीतांबर ने कदाचित् वैसा तप नहीं किया।
लंबे, घुँघराले, झुकी हुई मेघ-पंक्तियों के समान दीखनेवाले, मध्य में टेढ़े एव काले केश-पाश को, यदि इसने जटा बनाकर न पहन लिया होता, तो उसे देखकर सब युवतियों के प्राण निकल गये होते।
प्रकट प्रकाशवाले उत्तम आभरण भी यदि (इसके शरीर को) प्राप्त करें, तो क्या वे इसके सौंदर्य को बढ़ा सकेंगे ? क्या अच्छे लक्षणों से युक्त अनुपम रत्न किसी दूसरे रत्न को धारण करके और अधिक प्रकाश से चमक उठेगा ?
जो इन्द्र, वर प्राप्त करके भी इसके परस्पर तुल्य, चरणों की धूलि की भी समता नहीं कर सकता, वह सब लोकों पर शासन करता है। (किन्तु) इस (राम) में ब्रह्मा ने सब उत्तम लक्षणों को प्रकट किया है, फिर भी यह अरण्य में निवास करता है। इस कारण ब्रह्मा भी निन्दा का पात्र हो गया है।
उस (शूर्पणखा) के मन में ऐसी वासना उमड़ी कि नदी का प्रवाह और समुद्र भी उसके सम्मुख छोटे पड़ गये। उसकी बुद्धि (उस वासना-प्रवाह में) निमग्न हो गई, जिससे उसका शील इस प्रकार क्रमशः घटने लगा, जिस प्रकार धर्म-कार्य के लिए कुछ दान दिये बिना अपने धन को बचाकर रखनेवाले व्यक्ति का यश घटता है।
उस समय वह शूर्पणखा गगन पर अंकित चित्र-प्रतिमा के समान थी। उसका मन मलिन हुआ। उसमें वेदना उत्पन्न हुई। प्रभु की प्रकाशमान सुन्दर भुजाओं में अपनी दृष्टि गड़ाये, उस (दृष्टि) को फिर खींच लेने में असमर्थ होकर वह स्तब्ध खड़ी रही।
वह इसी प्रकार खड़ी रही। फिर, यह विचार कर कि इसके विशाल वक्ष का आलिंगन करूँगी, अन्यथा अमृत पीने पर भी मेरे प्राण नहीं बच सकेंगे। अब और कोई उपाय नहीं है—उन (राम) के सम्मुख जाने का उपाय सोचने लगी।
| ३२६ | कंब रामायण |
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'खड्गदंतवाली यह राक्षसी सब प्राणियो को अपने उदरस्थ करनेवाली (राक्षसी) है'—यों सोचकर कही वे मेरा तिरस्कार न कर दें, इसलिए उस (शूर्पणखा) ने कोकिल-तुल्य मधुर वाणीवाली तथा बिंब-समान रक्ताधर से शोभित कलापी-तुल्य सुन्दर रमणी का वेष धारण किया।
उसने रक्तकमल पर आसीन लक्ष्मी का अपने मन में ध्यान किया। अपने वश में स्थित किसी मंत्र का जप किया और चंद्र से भी अधिक सुन्दर वदनवाली सुन्दरी का रूप लेकर गगन-तल में अपनी कांति को बिखेरती हुई नीचे उतर आई।
रुई को एवं रुचिर पल्लव दल को भी दुखानेवाले अरुण मनोहर कमल-दल-से लगनेवाले उसके छोटे-छोटे पैर थे। वह मायाविनी (शूर्पणखा), मधुर बोलीवाली पिक-वयनी-सी, कलापी-सी, हंसिनी-सी, उज्ज्वल वलि लता-सी एवं विष-सी बनकर वहाँ आई।
स्वर्ण-पराग से युक्त कमल में वास करनेवाली (लक्ष्मी) देवी के सौंदर्य को तथा शुक के सौंदर्य को भी परास्त कर देनेवाले उत्तम सौंदर्य से युक्त होकर, दो चमकते करवालों (अर्थात्, नयनों) से शोभायमान वदन के साथ, वह (गगन-तल से) यो उतर आई, मानो विद्युल्लता ही मेखला-भूषित विशाल तथा मनोहर रथ (अर्थात्, जघन तट) से युक्त होकर, एक मुग्धा का रूप धारण करके उतर रही हो।
मानो अति सुरभित कल्पवृक्ष की कोई प्रकाशमान लता, एक सुन्दरी का वेष धारण करके, अधिकाधिक बढ़नेवाली कामुकता तथा मधु-सदृश मधुर बोली को पाकर, नेत्रों को आनन्द देनेवाले लावण्य से युक्त होकर, अनुपम हरिणी की चितवन प्राप्त करके कलापी के समान चली आई हो।
(उस शूर्पणखा के) नूपुर, मेखला, हार, काली सिकता के समान केशों में गुँथे हुए पुष्पों पर मँडरानेवाले भ्रमर—इन सबकी ध्वनि यह सूचना दे रही थी कि कोई युवती आ रही है। चक्रवर्ती कुमार (राम) ने उस ध्वनि की दिशा मे दृष्टि डाली।
'स्वर्ग के द्वारा प्रदत्त कोई अनुपम मधुर अमृत हो'—ऐसी वह सुन्दरी, मनोज्ञ स्तनों के भार से कमर लचकाती हुई आ रही थी। अज्ञान को दूर करके उत्तरोत्तर बढ़नेवाले सत्य-ज्ञानरूपी नेत्र प्रदान करनेवाले भगवान् (के अवतार राम) ने अपने दोनों नयनों से उसे अपने सम्मुख देखा।
विशाल प्रदेशवाले नागलोक में, स्वर्गलोक में एवं भूलोक में भी अप्राप्य उस उपमा-रहित स्त्री-लावण्य को देखकर राम ने सोचा—यह कौन है? इसकी सुन्दरता की भी कोई सीमा है? आभरण-भूषित सुन्दरियों में इसका उपमान कौन हो सकता है?
उस समय, कामना से पूर्ण हृदयवाली उस (शूर्पणखा) ने (राम का) वदन देखा। अपने अरुण करों से उनके चरणों का स्पर्श किया। फिर अपने दीर्घ तथा तीक्ष्ण नेत्र-रूपी शूलों को उनपर फेंककर कटाक्ष-पात करती हुई, हरिणी के समान लज्जा-सी दिखाती हुई, एक ओर खड़ी रही।
वेदों के आदि (प्रकाशक) उन (राम) ने उससे प्रश्न किया—हे लक्ष्मी-समान देवी! गौरवर्ण सुन्दरी। तुम्हारा आगमन मंगलप्रद हो। यह हमारा पुण्य ही तो है कि
अरंण्यकाण्ड ३२७
तुम्हारा आगमन हुआ है। तुम्हारा स्थान कौन-सा है ? नाम क्या है ? बंधु-जन कौन है ?
तब उस मुग्धा ने अपना वृत्तांत यों कहा—
कमलभव (ब्रह्मा) के पुत्र (पुलस्त्य) के कुमार (विश्ववसु) की मै पुत्री हूँ।
त्रिपुर-दाह करनेवाले वृषभ-वाहन (शिव) के मित्र रक्त करोंवाले (कुबेर) की भगिनी हूँ।
दिग्गजो का बल चूर-चूर करके रजत-पर्वत को उठानेवाले, त्रिलोक का शासन करनेवाले
रावण की कनिष्ठा (बहन) हूँ। मै कामवल्ली कहलाती हूँ।
ये वचन सुनकर वीर (राम) ने संशय-भरे चित्त के साथ सोचा कि इसका
कार्य कपट-रहित नहीं है। इससे और कुछ प्रश्न पूछकर इसका हाल जानना चाहिए।
फिर, प्रश्न किया—यदि यह कथन सत्य है कि तुम रक्तनेत्रवाले, भयंकर आकारवाले (रावण)
की बहन हो, तो तुम्हे यह मनोहर रूप कैसे मिला ?
उन पवित्र पुरुष (राम) के यों पूछने के पूर्व ही, स्फूत्तिं के साथ कह उठी—
मायावी तथा क्रूर राक्षसो के साथ रहना अनुचित समझकर, विवेकशील होकर मैने धर्म को
अपनाया और उसी पर स्थिर रहने लगी। फिर ऐसा तप किया, जिससे मेरे पाप मिट गये
और देवो का अनुग्रह प्राप्त हुआ।
तब राम ने प्रश्न किया—हे सुन्दरी ! देवताओ का अधिपति भी जिसकी
सेवा करता रहता है, ऐसे त्रिभुवन के शासक (रावण) की तुम बहन हो, तो समृद्धि-वैभव
के साथ न आकर, किसी को साथ लिये बिना एकाकी यहाँ क्यो आई हो ?
वीर के यह पूछने पर सत्यरहित (शूर्पणखा) ने कहा—हे विमल ! हे प्रभु !
मै असजन (रावण आदि) लोगो के समीप नही जाती हूँ। देवताओं तथा उत्तम मुनियों
के संग में रहती हूँ। यहाँ एक काम से तुम्हारे दर्शन करने आई हूँ।
उसके यह कहने पर प्रभु ने यह सोचकर कि सुन्दर ललाटवाली स्त्रियो का हृदय
सुलभता से ज्ञात नही होता, इसका हृद्गत भाव पीछे प्रकट होगा, कहा—हे कंकन-भूषित
हाथोवाली ! मुझसे तुम्हे क्या कार्य है ? बताओ। यदि उचित होगा, तो वह कार्य
पूर्ण करके तुम्हारा उपकार करूँगा।
कुलीन स्त्रियो के लिए यह संभव नही है कि वे अपने हृदय के काम-भाव को स्वयं
ही प्रकट कर सकें। फिर भी, मै ऐसी हूँ कि मेरा कोई नही है। पर मै क्या करूँ ?
काम नामक एक (दुष्ट) के अत्याचार से तुम मेरी रक्षा करो।—यों उस स्त्री ने कहा।
दूर तक जाकर अवरुद्ध हो लौट आनेवाले, बिखरी हुई लाल-लाल रेखाओ से
युक्त, नानाविध भंगिमाएँ दिखाते हुए, चमचमानेवाले काले रंगवाले तथा करवाल-सदृश
नेत्रो एवं आभरण-भूषित स्तनो से शोभित उस (शूर्पणखा) के ये वचन कहने पर, प्रभु ने
विचार किया—यह लज्जाहीन है। नीच स्वभाववाली है। मायाविनी है। इसमें किंचित्
भी सद्गुण नही है।
मौन रहनेवाले उदार प्रभु के हृदय का भाव वह नही जान सकी। भ्रमर-समुदाय
के गुंजारो से युक्त कुंतलोवाली यह (शूर्पणखा) 'मेरे वचनों से मुझपर अनुरक्त हुआ है
३२८ कंब रामायण
अथवा मुझे 'नहीं' कहनेवाला है' यों संकल्प-विकल्प में दोलायमान चित्तवाली होकर आगे इस प्रकार कहने लगी—
चित्रित करने के लिए दुस्साध्य सौंदर्य से पूर्ण ! तुम्हारे यहाँ आगमन का समाचार नहीं जानने से मैं सर्वज्ञ मुनियों के आज्ञानुसार उनकी सेवा में ही निरत रह गई। मेरे कलंकहीन स्त्रीत्व एवं यौवन यों ही व्यर्थ व्यतीत हुए। यों ही एक-एक दिन एवं उनका प्रत्येक पल व्यर्थ ही चले गये।
यह सुनकर प्रभु ने मन में यह विचार कर कि यह नीच राक्षसी नीति-रहित है, अनैतिक कार्य करने का निश्चय करके यहाँ आई है, उससे कहा—हे सुन्दरी ! तुम्हारी इच्छा परंपरागत आचार के अनुकूल नहीं है। तुम ब्राह्मण जाति में उत्पन्न हो और मैं क्षत्रिय वंश का हूँ।
(तब शूर्पणखा ने कहा—) हे युद्ध के अलंकारभूत भाले को धारण करनेवाले ! मेरे पिता ब्राह्मण हैं; किंतु अरुंधती-सदृश पातिव्रत्यवाली मेरी माता धरती का राज्य करनेवाले 'माल्यकटंकट' के वंश में उत्पन्न हैं। यदि मुझे स्वीकार करने में यही (अर्थात्, मेरा ब्राह्मण-जन्म में उत्पन्न होना ही) कारण है, तो मेरे प्राण अब बच गये। भाव यह है कि मेरा पिता ब्राह्मण है; किंतु माता क्षत्रिय है, अतः मैं अनुलोम जाति में उत्पन्न हूँ और शास्त्र-विधान के अनुसार कोई क्षत्रिय मुझसे विवाह कर सकता है।
उस कामुकी (शूर्पणखा) के यह कहने पर, अधर के मंदहास की उज्ज्वलता बाहर प्रकट करनेवाले नीलवर्ण मेघ-सदृश उन प्रभु ने विनोद-पूर्ण चित्त से कहा—हे स्त्रीरत्न ! दुःखहीन राक्षसों के साथ हम, दुःखी मनुष्य, विवाह करें यह उचित नहीं है। यह बुद्धिमानों का कथन है।
तब उसने कहा—अवर्णनीय प्रेमाधिक्य से युक्त मेरी भक्ति-भावना को न देखकर मुझे रावण की बहन कहना ही अनुचित है। आदिशेष पर लेटे हुए अमल (विष्णु) जैसे हे सुन्दर ! मैंने पहले ही कहा था कि उस गर्हणीय राक्षस-वंश से पृथक् होकर मैं देवताओं की स्तुति में लगी रहती हूँ।
वेदों के लिए भी अतीत उन भगवान् (के अवतार राम) ने तब उससे कहा—हे सुन्दरी ! यदि विचार करके देखें, तो तुम्हारा एक भाई त्रिभुवन का नायक है, दूसरा कुबेर है, यदि उनमें से कोई तुम्हें प्रदान करे, तो हम विवाह करेंगे। अन्यथा, एकाकी आई हुई तुम किसी दूसरे स्थान में जाओ। मुझे तो (तुमसे बात करने में भी) आशंका हो रही है।
तब उस (शूर्पणखा) ने कहा—हे पर्वत-समान सुन्दर कंधोंवाले ! जो पुरुष और स्त्री, अनुराग से एकीभूत हृदयवाले हो जाते हैं, उनके लिए वेद-विहित विवाह एक गांधर्व विवाह ही है न ? यह विवाह हो जाय, तो मेरे भ्राता भी इसे स्वीकार करेंगे और एक बात कहती हूँ—
मेरा भाई (रावण) पहले से ही मुनियों से गहरा वैर रखता है। वह (शत्रुओं का विनाश करने में) नीति का भी विचार नहीं करता। अतः, तुम एकाकी रहनेवाले का
अरण्यकाण्ड ३२६
उसके साथ मित्रता हो जाय, इसके लिए यही उपाय है (कि तुम मुझसे विवाह कर लो)। मेरे भाई तुमसे स्नेह करेंगे और चाहो, तो स्वर्ग का राज्य भी तुम्हें दे देंगे और स्वयं तुम्हारा आदेश पूरा करते रहेंगे।
राक्षसों की कृपा मुझे मिल गई। तुम्हारी संगति भी मिली। अब मैं तुम्हारे संग शाश्वत वैभवपूर्ण जीवन सदा व्यतीत करनेवाला हो गया। उत्तम अयोध्या को त्यागने के पश्चात् मेरे पूर्वकृत तप अनेक रूप में फलित हुए हैं। यों कहकर दृढ धनुष के प्रयोग में अभ्यस्त भुजावाले प्रभु अपने दाँतो के उज्ज्वल प्रकाश को दिखाते हुए हँस पड़े।
इसी समय, स्त्रियों की रानी, धरती का रत्न, 'वजि' लता समान सुन्दरी देवी (सीता) सुगन्धित पर्णशाला के भीतर से, देवताओं के सुकृत के फलस्वरूप, उस मूर्त्ति के पास आ खड़ी हुई, जो ऐसे प्रकाशमय रूपवान् है, जिसे देखने पर देवलोक, मनुष्यलोक एवं पाताल-लोक के निवासी तथा ब्रह्मा प्रभृति देवों की आँखें भी चौंधिया जाती हैं।
मांस को पकाकर खाने के लिए ललचानेवाले बिल-सदृश मुँह से युक्त उस (शूर्पणखा) ने दिव्य ज्योति के समान एक रूप को (राम और उसके) मध्य में आकर खड़े होते हुए देखा, मानो उसने नक्षत्रों से प्रकाशमान आकाश और धरती में फैले हुए वीर गञ्ज-रूपी वन को जलाने के लिए उत्पन्न हुई पातिव्रत्य-रूपी वह्नि-ज्वाला को ही देखा हो।
तब वह (शूर्पणखा) यह सोचती हुई कि सुरभिपूर्ण केशोंवाली (अपनी पत्नी) को यह पुरुष वन में नहीं लाया होगा, इतनी सुन्दरता से पूर्ण कोई रमणी इस अरण्य में भी नहीं है, लक्ष्मी अरविंद का आवास छोड़कर क्या अपने चरण-युगल को धरती पर रखती हुई यहाँ आ सकती हैं?
वह (शूर्पणखा) तन्मय होकर बिलंब तक (सीता को) देखती खड़ी रही। वह यह सोचती रही—सृष्टिकर्त्ता की कुशलता की सीमा हो सकती है। किंतु मन से कभी न हटनेवाली (अर्थात्, मन में स्थिर रूप में अंकित रहनेवाली) सुन्दरता की कोई सीमा नहीं है। फिर सोचा—इसे देखने पर मुझ स्त्री-जन्म में उत्पन्न हुई की आँखें भी अन्य वस्तुओं पर नहीं जा रही हैं। जब मेरा ही मन ऐसा हो रहा है, तब अब दूसरों की (अर्थात्, इसे देखनेवाले पुरुषों की) क्या दशा होगी?
फिर, उसने युद्ध में निपुण प्रभु को देखा और शुकी-तुल्य देवी को देखा और वैसी ही (स्तब्ध) खड़ी रह गई। फिर, वह सोचने लगी—अब अन्य कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। कमलभव ने स्वयं सारी सृष्टि का अवलोकन करके, त्रिभुवन के निवासियो में दोनों प्रकार के (अर्थात्, स्त्री और पुरुष) व्यक्तियों की सुन्दरता की पराकाष्ठा बनाकर इन दोनों को उत्पन्न किया है।
उसने विचार किया—स्वर्ण के जैसे प्रकाश फेंकनेवाले तथा अतसी-पुष्प के जैसे रंगवाले इन पुरुष का शरीर, इस विद्युत्-समान सूक्ष्म कटिवाली के साथ संयुत नहीं है (अर्थात्, यह पुरुष इस स्त्री का पति नहीं है)। अपनी समता न रखनेवाली, पल्लव-समान चरणोंवाली यह सुन्दरी, मेरे जैसे ही बीच में (इस पुरुष पर आसक्त होकर) आई हुई कोई स्त्री है। इसका तिरस्कार (इस पुरुष से) कराऊँगी।
| ३३० | कंब रामायण |
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तब उस (शूर्पणखा) ने (राम से) कहा—हे उत्तम ! हे वीर ! यह माया में चतुर है। यह वंचक राक्षसी है। इसका हृदय दुर्जय है। इसे सद्गुणवती समझना उचित नहीं है। इसका यह रूप सत्य नहीं है। यह मास खाकर जीवित रहनेवाली है। इसे देखकर मैं डर रही हूँ। इसे मेरे निकट आने से रोको और मेरी रक्षा करो।
यह सुनकर वीर (राम) बोले—हे विद्युत्-समान स्त्री ! तुम्हारा ज्ञान खूब है। तुम्हे धोखा देने की शक्ति किसमें है ? यह ज्ञात हुआ कि तुम्हारी मति स्वच्छ है और तुम सद्गुणवाली हो। अहो ! यह (सीता) कदाचित् क्रूर राक्षसी ही है। इसे तुम भली भाँति देख लो और अपने उज्ज्वल दाँत-रूपी मोतियों को दिखाकर हँस पड़े।
उस समय, अमृत के जैसी आई हुई, अरुन्धती के सदृश पातिव्रत्यवाली, मधुर बोली एवं वाँस के जैसे सुन्दर कंधोंवाली देवी (सीता) वीर (राम) के निकट आ पहुँची। तब भड़कती अग्नि के सदृश वचकगुण से पूर्ण चित्तवाली (शूर्पणखा) यह कहकर (सीता को) धमकाने लगी कि हे राक्षस-कुल में उत्पन्न स्त्री, तू क्यो बीच में आ पड़ी है ?
हंसिनी-तुल्य वह (सीता) भीत हुई। भीत होकर झट (राम की ओर) यो दौड़ी कि उसकी विद्युत्-समान सूक्ष्म कटि लचक गई और कोमल चरण दुखने लगे। यो दौड़कर वह कुंजर-समान वीर की पुष्ट भुजाओ से ऐसे लिपट गई, जैसे वर्षाकालिक जल से भरे बादल के मध्य कोई प्रवालमय लता कौंध गई हो।
तब वीर (राम) ने यह सोचकर कि वक्र खड्गदंतवाले राक्षसो के साथ विनोद करना भी बुरा ही होगा, उस (शूर्पणखा) से कहा—तुम कोई अहितकारी कार्य न करो। (मेरा) अनुज यदि तुम्हारा समाचार जान लेगा, तो वह अत्यन्त क्रुद्ध होगा। हे स्त्री ! तुम शीघ्र यहाँ से चली जाओ।
लावण्य से युक्त उस राक्षसी ने कहा—कमल मे, जल मे और कैलास मे निवास करनेवाले करुणा-पूर्ण हृदयवाले देव (ब्रह्मा, विष्णु और शिव), अनग तथा अन्य देवता भी मुझे प्राप्त करने के लिए तपस्या करते हैं। ऐसी हूँ मै। मेरी उपेक्षा करके तुम क्षमाहीन इस मायाविनी को चाहते हो, यह कैसे उचित है ?
तब पवित्र चित्तवाले (राम), यह सोचकर कि यह शिलातुल्य कठोर चित्तवाली (राक्षसी), मेरे यह कहने पर भी कि मै तुमसे सबध रखना नही चाहता हूँ, हटती नही है, किन्तु कपट-वचन कह रही है—मिथिलापति की पुत्री के साथ विद्युत् के साथ चलनेवाले मेघ के जैसे उस सुन्दर उद्यान के बीच स्थित कुटी मे चले गये।
उनके चले जाने के बाद, यह जानकर कि वे चले गये हैं, शूर्पणखा शरीर से निकले हुए प्राणो के साथ श्वासहीन हो गई। मन में अत्यत विह्वल हुई। उसे कुछ अवलवन नही मिला। मन में क्रुद्ध हुई और सोचने लगी—अंजन-समान काले केशोंवाली उस नारी पर यह पुरुष गहरा प्रेम रखता है।
इस प्रकार चिंतित होकर, वह वहाँ खड़ी नही रह सकी। वह उस पुरुषोत्तम की सगति प्राप्त करने का उपाय सोचती हुई वहाँ से चली गई। यह सोचकर कि यदि मैं इसके शरीर का आलिंगन नही करूँगी, तो अपने प्राण खो दूँगी, स्वर्ण-पराग से पूर्ण सुन्दर उद्यान
अरण्याकाण्ड ३३१
में स्थित अपने स्फटिकमय आवास मे जा पहुँची। सूर्य भी पश्चिम दिशा मे जा पहुँचा और लाली छा गई।
वह (शूर्पणखा) इस प्रकार प्रज्ञाहीन और शिथिल हो गई, मानो काल-सर्प के छेदवाले दंत से निकला हुआ विष उसकी देह में संचरण कर रहा हो। प्रख्यात कामाग्नि (उसके शरीर में) भड़क उठी।
युद्धकुशल मन्मथ के तीक्ष्ण बाण उसके वक्ष में ऐसे जा लगे, जैसे ताड़का नामक क्रूर राक्षसी के विशाल वक्ष में पुरुषोत्तम (राम) का तीक्ष्ण शर लगा था; इससे उसके भीत प्राण काँप उठे।
वह (काम-वेदना से पीड़ित) राक्षसी यह विचार करके उठी कि कलाओं से पूर्ण चन्द्रमा को साग बनाकर दृढ़ धनुर्धारी मन्मथ को ही चबा डालूँ, किन्तु मलय पर्वत से आनेवाला पवन, जब यम के दीर्घ शूल के समान उसके वक्ष पर लगा और पीड़ा उत्पन्न करने लगा, तब वह निष्क्रिय होकर गिर पड़ी।
(तरंगायमान समुद्र जब अपने शब्द से उसे सताने लगा, तब) उसने तरंगपूर्ण उस समुद्र को पर्वतों से पाट देना चाहा; किन्तु स्थिर गगन में प्रकाशित होनेवाले पूर्णचंद्र की दीर्घ किरणें उसे भयभीत कर रही थी, जिससे वह बलहीन होकर कुढ़ती हुई पड़ी रही।
(कभी) वह क्रुद्ध हो सोचती कि मैं इस धरती के सब उद्यानों को विध्वस्त कर, सब पुष्पों को चूर-चूर कर दूँगी; किन्तु अपने पति के संग रहनेवाली लाल मुकुटवाली क्रौंची की ध्वनि सुनकर वह अपने मन मे काँप उठती।
(कभी) वह क्रोध के साथ सर्प (राहु) को लाने का विचार करती, जिससे वह अपने प्रतिकूल रहनेवाले चंद्र को निगल जाय, किन्तु उसके पीन स्तनों पर शीतल-मंद पवन के लगने से उसके प्राण तप्त हो उठते और वह व्याकुल हो पड़ी रहती।
(अपने ताप को शांत करने के लिए) वह अपने करों से अति शीतल हिम-खंडों को लेकर अपने पुष्ट स्तनों पर रख लेती, किन्तु (उसके स्तनों से) उत्पन्न होनेवाली अग्नि में, तप्त पत्थर पर रखे हुए मक्खन के समान वे (हिमखंड) पिघल जाते।
कभी वह कामाग्नि से पीड़ित होकर निःश्वास भरती हुई अपने शरीर को शीतल जल में निमग्न करती, किन्तु वह जल (उसके शरीर के ताप से) उष्ण हो उठता। वह चिंता करती, किन्तु गरजनेवाले समुद्र एवं क्रूर मन्मथ से बचकर रहने का स्थान कहाँ है?
उसका शरीर इतना तप उठा कि शीतल चंद्रकांत की शिला भी उसके स्पर्श से पिघलने लगी। वह काले मेघ को देखती या उत्तम नील रत्नमय स्तंभ को देखती, तो (राम का स्मरण कर) उन्हें हाथ जोड़ देती।
वह कभी सोचती कि मैं किसी भयंकर, क्रूर दाँतोंवाले सर्प से सुरक्षित पर्वत की बड़ी गुहा में जाकर रहूँगी, जहाँ मनोहर पूर्णचंद्र, शीतल पवन और मदन मुझे पहचान नहीं सके।
उस समय, उष्णता बढ़ानेवाला मंद पवन पहले से भी तिगुने वेग से बहकर
३३२ कंब रामायण
उसको तपाने लगा । उसके स्तन उत्तप्त हो उठे । वह क्या उपचार करना है—यह न जानती हुई स्वर्ण रग के नवपल्लवो की शय्या पर करवटे लेने लगी ।
वीर (राम) का आकार उस क्रूर स्त्री की दृष्टि मे कालमेघ के समान दिखाई पड़ता । तब वह लज्जित हो उठती, शिथिल हो उठती, चौंक पड़ती, जैसे वह उनको अपने सम्मुख ही देख रही हो । जब वह आकार अदृश्य हो जाता, तब वह कठोर विरहाग्नि मे फँस जाती ।
अंजन-समान काले मेघ को प्रभु (राम) ही समझकर वह उसे पकड़कर अपने स्तनो से लगा लेती । किन्तु, उस मेघ को झुलसकर मिटते हुए देखकर रो पड़ती । क्षुद्र स्वभाववाली उस राक्षसी की काम-वेदना की कोई सीमा भी थी ?
वह यो तप रही थी, जैसे प्रलय-काल की भीषण अग्नि मे फँस गई हो । फिर भी, वह मूढ़ स्त्री चक्रधारी (राम) को प्राप्त कर जीवित रहूँगी—इस आशा-रूपी ओषधि से अपने प्राणो को रोके रही ।
कभी वह (राम से) प्रार्थना करने लगती—तुम क्रूर माया को अधिकाधिक बढ़ाने की शक्ति रखनेवाले मेरे विष-सदृश हृदय मे आ जाओ और मेरी वेदना को दूर करो । कभी कहती—हे अंजन पर्वत ! मुझपर कृपा करो । वह इस प्रकार पीडित हुई, जैसे उसने विष पी लिया हो ।
प्राण जाने पर भी कामना को न त्यागनेवाली वह (स्त्री) सोचती—(उस स्त्री के नयन) नीलोत्पल है ? या मीन है ?—ऐसा संदेह उत्पन्न करनेवाले नयन-युगल से युक्त वह स्त्री (सीता) लक्ष्मी से भी अधिक सुन्दर है । ऐसी दशा मे वह (राम) क्या मुझ पापी की ओर दृष्टि भी फेरेगा ?
वह सोचती—इस पुरुष के पास रहनेवाली सुन्दरी उत्तम पातिव्रत्यवाली है । रक्त कमल में वास करनेवाली लक्ष्मी ही है, फिर सोचती—मै उस (पुरुष) पर अनुरक्त होऊँ, तो भी वह इस वेदना से तस नही होता ।
जब उसकी काम-वेदना इस प्रकार बढ़ रही थी, तब सूर्य इस प्रकार उदित हुआ, जैसे तीनों लोकों में भरे हुए राक्षस-रूपी गाढ अन्धकार को दूर करने के लिए राम ही उदित हुए हो ।
उस क्रूर राक्षसी ने प्रभात को देखा और अपने प्राणो को भी सुरक्षित देखा । उसने विचार किया—जबतक वह अनुपम सुन्दरी उसके समीप रहेगी, तबतक वह पुरुष आँख उठाकर भी मुझे नही देखेगा, अतः मैं शीघ्र जाकर उस स्त्री को उठा ले आऊँगी और कहीं छिपा दूँगी । फिर, उस पुरुष के साथ सुखी जीवन व्यतीत करूँगी ।
उसने (पर्णशाला मे) आकर देखा—राम गोदावरी के सुन्दर घाट पर सध्यो- पासना मे मग्न हैं, पर उसने यह न देखा कि समीपस्थ घनी छाया से पूर्ण सुरभित उद्यान मे रहकर उनके अनुज, चंद्र-समान ललाटवाली देवी (सीता) की रक्षा कर रहे हैं ।
उसने सोचा कि यह (सीता) अकेली हैं, मेरा उद्देश्य सफल हुआ, अब सोचते हुए विलम्ब करना उचित नहीं है। और, कलंकित चित्तवाली वह, कलापी (तुल्य सीता को)
अरण्यकाण्ड ३३३
पकड़ने के लिए उनका पीछा करती हुई गई । फल-भरे उद्यान में स्थित लक्ष्मण ने यह देख लिया ।
उन्होंने क्रुद्ध होकर गरजते हुए कहा—अरी ! ठहर । फिर, झट उसके निकट आकर देखा—यह स्त्री है, हाथ मे धनुष लिया नही है; फिर उस (शूर्पणखा) के भड़कती आग-जैसे दीखनेवाले केशो को अपने अरुण कर से ऐंठकर पकड़ लिया । उसके पेट पर शीघ्रता से एक पदाघात किया और अपने कर मे उज्ज्वल करवाल धारण किया ।
तब वह उन (लक्ष्मण) को भी उठाकर आकाश-मार्ग से उड़ जाने का प्रयत्न करने लगी । इतने में (लक्ष्मण ने) उसे झट नीचे ढकेल दिया और 'अब-आगे कभी ऐसा कार्य न करना'—कहते हुए उसकी नाक, कान और कठोर स्तन के चूचुको को एक-एक कर के काट दिया । फिर शातकोप होकर उसके केशो को छोड़ दिया ।
उस क्षण, वह (शूर्पणखा) अपना मुँह खोलकर चिल्ला उठी । वह ध्वनि सब दिशाओ मे व्याप्त हो गई और देवताओ के कानो मे भी जा पड़ी । अब उसकी दशा का क्या वर्णन करना है ? उसकी नाक के छेद से प्रवाहित रक्त से धरती गल गई ।
उसकी हत्या न करके, लक्ष्मण ने अपने उज्ज्वल करवाल से उस क्रूर (राक्षसी) के नाक-कान काट दिये । वह कार्य ऐसा था, जैसे रावण के रत्नमय मुकुट-भूषित शिरो को काटने के लिए सुदिन का निर्णय करके, उसका प्रारंभ करते हुए पर्वत-शिखर को ही उन्होने काट दिया हो ।
वह धरती पर धड़ाम से गिर पड़ी और पैर उछालती हुई दहाड़ मारकर रोने लगी । वह ऐसी दिखाई पड़ती थी, मानो यम के समान कठोर शूल को धारण करनेवाले क्षुब्ध हो युद्ध करनेवाले खर प्रभृति राक्षसो के विनाश की सूचना देता हुआ कोई कालमेघ रक्त की वर्षा कर रहा हो ।
दुःख स्वयं जिनसे डरकर दूर भागता था, ऐसे राक्षसो के कुल मे उत्पन्न वह स्त्री, आकाश में उछलती, धरती पर गिरती, लोट जाती, शिथिल पड़ जाती, व्याकुल हो हाथ मलती, मूर्च्छित होती, मूर्च्छा से जग पड़ती, बार-बार कहती—मुझ स्त्री-जन्म पानेवाली का आज कैसा पराभव हुआ ?
हाथ से नाक दबाती, लुहार की भाँथी के जैसे निःश्वास भरती, धरती पर हाथ मारती, अपने युगल स्तनो पर हाथ रखती, उसकी देह स्वेद से भर जाती, अपने बलवान् पैरो को लिये चारो ओर दौड़ती, फिर रक्त बहाती हुई शिथिल पड़ जाती ।
स्रोत से उमड़नेवाले जल के समान बहनेवाले लहू से जो कीचड़ बन गया, उसमें लोटती हुई वह राक्षसी पीड़ा को नही सह सकी और अपने कुल के लोगो के नाम पुकार-पुकारकर रोने लगी, जिससे यम भी भयभीत हो गया और देवता भय से भागने लगे ।
अग्नि-ज्वाला को कर में धारण करनेवाले (शिव) के पर्वत (कैलास) को उखाड़कर उठानेवाले, हे पर्वत (सदृश रावण) ! तुम्हारे धरती पर जीवित रहते हुए ये मुनिवेषधारी धनुष लेकर घूम रहे हैं । क्या यह तुम्हारे लिए अपमानजनक नही है ?
| ३३४ | कंब रामायण |
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'देवता लोग आँख उठाकर भी तुम्हारी ओर नही देख सकते—क्या यह कहने मात्र से तुम्हारा काम हो गया ? आओ, यहाँ की दशा भी तो देखो।'
हे प्रलय-काल में भी न डिगनेवाले त्रिमूर्त्ति एवं देवो से भी अधिक बल से युक्त (रावण) ! 'बाघिन के पीछे-पीछे जाते हुए उसके बच्चे कभी पीड़ित नहीं होते'—समुद्र से आवृत धरती के लोगों का यह कथन भी क्या असत्य है ? आओ, मेरी इस वेदना को भी तो देखो।
हे रावण ! जब देवेन्द्र ऐरावत पर आरूढ हो देवताओ की सेना के साथ गर्जन करता हुआ युद्ध करने के लिए सम्मुख आया था, तब तुमने उसे परास्त करके भगा दिया था। हे इन्द्र की पीठ को देखनेवाले ! आओ, मेरे अपमान को भी तो देखो।
हे शिव के द्वारा प्रदत्त बड़े करवाल को धारण करनेवाले ! तुम पवन, जल, अग्नि, कालांतक यम, स्वर्ग एवं ग्रहों से अपनी सेवा कराने में समर्थ हो। क्या अब इन दो नरो के बल से परास्त हो निर्बल होकर बैठे हो ?
चलते समय जिनके भारी पैरों के पद-तल से चिनगारियाँ निकलती हैं, ऐसे मद-भरे दिग्गजों के दाँतो को तोड़नेवाले तथा पर्वतों को फोड़नेवाले कंधो से युक्त, हे बलवान् ! रूप में मन्मथ के समान होने पर भी ये मनुष्य तुम्हारे जूते के नीचे की धूल के बराबर भी नहीं हैं, क्या इनपर तुम क्रोध न करोगे ?
हाय ! क्या मधुपूर्ण सुगन्धिक पुष्प-मालाधारी देवो को मिटाने की, रावण एवं उसके भाइयो की शक्ति अब नष्ट हो गई है ? क्या अब वह शक्ति मांसमय शरीरवाले, हमारे कुलवालों का आहार बननेवाले मनुष्यो के पास चली गई है ?
युद्ध में सम्मुख पड़नेवाले, जिसे देखकर यों सदेह कर उठते हैं कि यह हर है, विष्णु है अथवा ब्रह्मा है—हे ऐसे शक्ति से संपन्न खर ! घने वृक्षों से भरे विशाल वन में एकांतवास करनेवाले मुनिवेषधारी मनुष्यो की शक्ति से, अथवा पराक्रमी राक्षसों के निर्वीर्य हो जाने से मुझपर जो विपदा आ पड़ी है, उसे तू देख।
इंद्र, हर, ब्रह्मा तथा अन्य देव जब तुम्हारी सेवा में निरत रहते हैं, सप्तलोकों के निवासी तुम्हारी स्तुति करते रहते हैं, तब तुम्हारे पूर्णचन्द्र-सदृश श्वेतच्छत्र की छाया में आसीन रहते समय, तुम्हारी सभा के मध्य मैं निर्लज्ज-सी आकर किस प्रकार अपना मुख दिखा सकूँगी ?
शिव के आसन कैलास को उखाड़नेवाले हे मेरे भाई ! मेरे बल को चूर करते हुए, पदाघात से मुझे नीचे गिराकर जिस (मनुष्य) ने मेरी नाक काट दी, वह जीवित रहकर अपनी भुजा को (गर्व से) देखे और मैं नीचे गिरकर रोती रहूँ—क्या यह उचित है ? यह वन खर का है न ? तो भी क्या मुझे ये कष्ट भोगने पड़ेंगे ?
दिग्गजो के क्रोध को कम करते हुए, उनके साथ युद्ध करके उनके दाँतो को तोड़नेवाले और उससे प्राप्त यश से फूले हुए कंधोवाले हे रावण ! कामना के वशीभूत होकर मैंने नाक खोई और निर्लज्जता से जिस अपमान का भागी हो गई हूँ, इससे क्या तुम्हारा यश कलंकित नही होगा ?
अरण्यकाण्ड ३३५
दानवों के कुल को मिटाकर, इन्द्र को बन्दी बनाकर, देवों को दास बनाकर उनसे सेवा करानेवाले हे मेरे भतीजे ! अरण्य में दो मनुष्यों ने मेरे कान और नाक काट दिये हैं। क्या, मैं पापिन इस अपमान से यहाँ यों ही मिट जाऊँ ?
पूर्वकाल में, हाथ में एक ही धनुष लेकर सप्तलोकों को जलानेवाले, अशमनीय क्रोध के साथ सब दिशाओं को परास्त करनेवाले तथा इन्द्र के दोनों चरणों में श्रृंखला डालनेवाले हे मेरे भतीजे ! क्या इन मनुष्यों का पराक्रम देखने के लिए नहीं आयोगे ?
शिलाओं को भेदनेवाले शस्त्रों को धारण करनेवाले विशाल करों से युक्त, हे पराक्रमी खर-दूषण आदि ! हे अंधकार को मिटानेवाले प्रकाश से युक्त रत्नाभरणों को धारण करनेवाले राक्षसों के कुल में उत्पन्न लोगो ! लुहार के द्वारा पैनाये गये शस्त्रोंवाले कुम्भकर्ण-जैसे ही क्या तुम लोग भी धरती में कहीं सोये पड़े हो ? मेरी पुकार तुमलोग सुन क्यों नहीं रहे हो ?
यों अनेक वचन कह-कहकर वह बलवान् राक्षसी शोक-मग्न हो रोती हुई वहाँ की मनोहर आश्रम-भूमि पर लोटती रही । उस समय, अपने कर में दृढ धनुष लिये, विशाल भुजावाले, मरकत पर्वत ( सदृश राम ), ( गोदावरी ) नदी पर सन्ध्या आदि नित्यकर्म समाप्त करके वहाँ आये ।
तब वह ( शूर्पणखा ), वहाँ आनेवाले ( राम ) को मार्ग के मध्य देखकर, अपनी छाती पीटती हुई, आँखों से अश्रु की वर्षा करती हुई, अपने शोणित के प्रवाह से वहाँ की सुन्दर भूमि को कीचड़ से भरती हुई, यह कहकर कि—'हे प्रभु ! हाय ! मैं तुम्हारे सुन्दर रूप पर आसक्त होने के अपराध में इस दुर्दशा को प्राप्त हुई हूँ। यह देखो ।'—उन ( राम ) के सामने गिर पड़ी ।
प्रभु ने अपने उपमाहीन मन से समझ लिया कि बिखरे केशोंवाली इस (राक्षसी) ने कोई क्रूर कार्य किया होगा । यह भी समझ लिया कि अनुज ने ही इसके दीर्घ कान-नाक काटे हैं। फिर उस ( राक्षसी ) से पूछा—तू कौन है ?
उस प्रश्न को सुनकर क्रूर राक्षसी ने उत्तर दिया—क्या तुम मुझे नहीं पहचानते ? बैर के नाम तक को धरती पर से मिटा देनेवाले क्रोध से युक्त, भयंकर पन्नाकार भाले को धारण करनेवाले, त्रिभुवन के शासक रावण की मैं बहन हूँ ।
तब ( राम के ) यह प्रश्न करने पर कि, पराक्रमी राक्षसों के स्थान को छोड़कर हमारे तप करने के इस स्थान में तू क्यों आई ? उसने उत्तर दिया कि, हे अग्निकण के समान तपानेवाली काम-वेदना के लिए उत्तम औषधि-समान ! मैं कल भी आई थी न ?
( तब राम ने प्रश्न किया—) क्या रक्त मीन के समान चंचल, काले वर्ण से युक्त दीर्घ नयनोंवाली, मधुपूर्ण कमल में निवास करनेवाली लक्ष्मी का भ्रम उत्पन्न करनेवाली, जो स्त्री कल आई थी, वह तुम्हीं हो ?—( राम के ) यों प्रश्न करने पर उस राक्षसी ने उत्तर दिया—सुन्दर नेत्रोंवाले हे राजन् ! स्तन, ताटंक-भूषित कान और लतातुल्य नासिका को काट देने पर सुन्दरता कहाँ रह जाती है ?
यह सुनकर प्रभु, दाँतों को किंचित् खोलकर, मुस्कराये और अनुज का मुख