कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 345, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअरण्यकाण्ड ३३५
दानवों के कुल को मिटाकर, इन्द्र को बन्दी बनाकर, देवों को दास बनाकर उनसे सेवा करानेवाले हे मेरे भतीजे ! अरण्य में दो मनुष्यों ने मेरे कान और नाक काट दिये हैं। क्या, मैं पापिन इस अपमान से यहाँ यों ही मिट जाऊँ ?
पूर्वकाल में, हाथ में एक ही धनुष लेकर सप्तलोकों को जलानेवाले, अशमनीय क्रोध के साथ सब दिशाओं को परास्त करनेवाले तथा इन्द्र के दोनों चरणों में श्रृंखला डालनेवाले हे मेरे भतीजे ! क्या इन मनुष्यों का पराक्रम देखने के लिए नहीं आयोगे ?
शिलाओं को भेदनेवाले शस्त्रों को धारण करनेवाले विशाल करों से युक्त, हे पराक्रमी खर-दूषण आदि ! हे अंधकार को मिटानेवाले प्रकाश से युक्त रत्नाभरणों को धारण करनेवाले राक्षसों के कुल में उत्पन्न लोगो ! लुहार के द्वारा पैनाये गये शस्त्रोंवाले कुम्भकर्ण-जैसे ही क्या तुम लोग भी धरती में कहीं सोये पड़े हो ? मेरी पुकार तुमलोग सुन क्यों नहीं रहे हो ?
यों अनेक वचन कह-कहकर वह बलवान् राक्षसी शोक-मग्न हो रोती हुई वहाँ की मनोहर आश्रम-भूमि पर लोटती रही । उस समय, अपने कर में दृढ धनुष लिये, विशाल भुजावाले, मरकत पर्वत ( सदृश राम ), ( गोदावरी ) नदी पर सन्ध्या आदि नित्यकर्म समाप्त करके वहाँ आये ।
तब वह ( शूर्पणखा ), वहाँ आनेवाले ( राम ) को मार्ग के मध्य देखकर, अपनी छाती पीटती हुई, आँखों से अश्रु की वर्षा करती हुई, अपने शोणित के प्रवाह से वहाँ की सुन्दर भूमि को कीचड़ से भरती हुई, यह कहकर कि—'हे प्रभु ! हाय ! मैं तुम्हारे सुन्दर रूप पर आसक्त होने के अपराध में इस दुर्दशा को प्राप्त हुई हूँ। यह देखो ।'—उन ( राम ) के सामने गिर पड़ी ।
प्रभु ने अपने उपमाहीन मन से समझ लिया कि बिखरे केशोंवाली इस (राक्षसी) ने कोई क्रूर कार्य किया होगा । यह भी समझ लिया कि अनुज ने ही इसके दीर्घ कान-नाक काटे हैं। फिर उस ( राक्षसी ) से पूछा—तू कौन है ?
उस प्रश्न को सुनकर क्रूर राक्षसी ने उत्तर दिया—क्या तुम मुझे नहीं पहचानते ? बैर के नाम तक को धरती पर से मिटा देनेवाले क्रोध से युक्त, भयंकर पन्नाकार भाले को धारण करनेवाले, त्रिभुवन के शासक रावण की मैं बहन हूँ ।
तब ( राम के ) यह प्रश्न करने पर कि, पराक्रमी राक्षसों के स्थान को छोड़कर हमारे तप करने के इस स्थान में तू क्यों आई ? उसने उत्तर दिया कि, हे अग्निकण के समान तपानेवाली काम-वेदना के लिए उत्तम औषधि-समान ! मैं कल भी आई थी न ?
( तब राम ने प्रश्न किया—) क्या रक्त मीन के समान चंचल, काले वर्ण से युक्त दीर्घ नयनोंवाली, मधुपूर्ण कमल में निवास करनेवाली लक्ष्मी का भ्रम उत्पन्न करनेवाली, जो स्त्री कल आई थी, वह तुम्हीं हो ?—( राम के ) यों प्रश्न करने पर उस राक्षसी ने उत्तर दिया—सुन्दर नेत्रोंवाले हे राजन् ! स्तन, ताटंक-भूषित कान और लतातुल्य नासिका को काट देने पर सुन्दरता कहाँ रह जाती है ?
यह सुनकर प्रभु, दाँतों को किंचित् खोलकर, मुस्कराये और अनुज का मुख