कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 335, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअरण्यकाण्डं ३२५
को कष्ट देता हुआ यो व्रताचरण कर रहा है ? न जाने तपस्या ने स्वयं कैसी तपस्या की है कि ऐसे नवीन कमल-तुल्य नयनों से युक्त यह पुरुष उस (तपस्या) को अपनाये हुए है ?
समुद्र-रूपी वस्त्र से शोभित, सुन्दर रूपवाली, गज की गति से युक्त पृथ्वी का स्त्रीत्व भी कैसा (सार्थक) है ? उसपर उगी हुई हरियाली ऐसी है, मानो इस पुरुष के पदतल के स्पर्श से वह (पृथ्वी) पुलक से भर गई हो।
कटि में बँधे हुए करवाल से शोभित इस पुरुष की उज्ज्वल कांति को दिनकर ने कदाचित् देखा ही नहीं है। इसीलिए, मन में लज्जा का अनुभव न करके, वह दूर तक अपनी किरणों को प्रसारित करता हुआ संचरण करता है।
दुर्लंघ्य महान् पर्वत को भी जीतनेवाले उन्नत कंधों से युक्त इस पुरुष के अधर का संसार में उचित उपमान क्या दूँ ? हे मन ! यदि प्रवाल से इसकी उपमा दूँ, तो तू मेरा धिक्कार करेगा (क्योंकि वह उपमान-योग्य नहीं है)। अब किस उत्तम पदार्थ को इसका उपमान बताऊँ ?
सब कलाओं से पूर्ण चंद्रमा के समान शोभायमान इस सुन्दर की, सूर्य को भी (अपनी कांति से) विचलित करनेवाली कटि को प्राप्त करने के लिए, न जाने, इन वल्कलों ने कौन-सा तप किया था, दोषहीन पीतांबर ने कदाचित् वैसा तप नहीं किया।
लंबे, घुँघराले, झुकी हुई मेघ-पंक्तियों के समान दीखनेवाले, मध्य में टेढ़े एव काले केश-पाश को, यदि इसने जटा बनाकर न पहन लिया होता, तो उसे देखकर सब युवतियों के प्राण निकल गये होते।
प्रकट प्रकाशवाले उत्तम आभरण भी यदि (इसके शरीर को) प्राप्त करें, तो क्या वे इसके सौंदर्य को बढ़ा सकेंगे ? क्या अच्छे लक्षणों से युक्त अनुपम रत्न किसी दूसरे रत्न को धारण करके और अधिक प्रकाश से चमक उठेगा ?
जो इन्द्र, वर प्राप्त करके भी इसके परस्पर तुल्य, चरणों की धूलि की भी समता नहीं कर सकता, वह सब लोकों पर शासन करता है। (किन्तु) इस (राम) में ब्रह्मा ने सब उत्तम लक्षणों को प्रकट किया है, फिर भी यह अरण्य में निवास करता है। इस कारण ब्रह्मा भी निन्दा का पात्र हो गया है।
उस (शूर्पणखा) के मन में ऐसी वासना उमड़ी कि नदी का प्रवाह और समुद्र भी उसके सम्मुख छोटे पड़ गये। उसकी बुद्धि (उस वासना-प्रवाह में) निमग्न हो गई, जिससे उसका शील इस प्रकार क्रमशः घटने लगा, जिस प्रकार धर्म-कार्य के लिए कुछ दान दिये बिना अपने धन को बचाकर रखनेवाले व्यक्ति का यश घटता है।
उस समय वह शूर्पणखा गगन पर अंकित चित्र-प्रतिमा के समान थी। उसका मन मलिन हुआ। उसमें वेदना उत्पन्न हुई। प्रभु की प्रकाशमान सुन्दर भुजाओं में अपनी दृष्टि गड़ाये, उस (दृष्टि) को फिर खींच लेने में असमर्थ होकर वह स्तब्ध खड़ी रही।
वह इसी प्रकार खड़ी रही। फिर, यह विचार कर कि इसके विशाल वक्ष का आलिंगन करूँगी, अन्यथा अमृत पीने पर भी मेरे प्राण नहीं बच सकेंगे। अब और कोई उपाय नहीं है—उन (राम) के सम्मुख जाने का उपाय सोचने लगी।