भारतकोश
कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 336, कुल 549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 336
३२६कंब रामायण

'खड्गदंतवाली यह राक्षसी सब प्राणियो को अपने उदरस्थ करनेवाली (राक्षसी) है'—यों सोचकर कही वे मेरा तिरस्कार न कर दें, इसलिए उस (शूर्पणखा) ने कोकिल-तुल्य मधुर वाणीवाली तथा बिंब-समान रक्ताधर से शोभित कलापी-तुल्य सुन्दर रमणी का वेष धारण किया।

उसने रक्तकमल पर आसीन लक्ष्मी का अपने मन में ध्यान किया। अपने वश में स्थित किसी मंत्र का जप किया और चंद्र से भी अधिक सुन्दर वदनवाली सुन्दरी का रूप लेकर गगन-तल में अपनी कांति को बिखेरती हुई नीचे उतर आई।

रुई को एवं रुचिर पल्लव दल को भी दुखानेवाले अरुण मनोहर कमल-दल-से लगनेवाले उसके छोटे-छोटे पैर थे। वह मायाविनी (शूर्पणखा), मधुर बोलीवाली पिक-वयनी-सी, कलापी-सी, हंसिनी-सी, उज्ज्वल वलि लता-सी एवं विष-सी बनकर वहाँ आई।

स्वर्ण-पराग से युक्त कमल में वास करनेवाली (लक्ष्मी) देवी के सौंदर्य को तथा शुक के सौंदर्य को भी परास्त कर देनेवाले उत्तम सौंदर्य से युक्त होकर, दो चमकते करवालों (अर्थात्, नयनों) से शोभायमान वदन के साथ, वह (गगन-तल से) यो उतर आई, मानो विद्युल्लता ही मेखला-भूषित विशाल तथा मनोहर रथ (अर्थात्, जघन तट) से युक्त होकर, एक मुग्धा का रूप धारण करके उतर रही हो।

मानो अति सुरभित कल्पवृक्ष की कोई प्रकाशमान लता, एक सुन्दरी का वेष धारण करके, अधिकाधिक बढ़नेवाली कामुकता तथा मधु-सदृश मधुर बोली को पाकर, नेत्रों को आनन्द देनेवाले लावण्य से युक्त होकर, अनुपम हरिणी की चितवन प्राप्त करके कलापी के समान चली आई हो।

(उस शूर्पणखा के) नूपुर, मेखला, हार, काली सिकता के समान केशों में गुँथे हुए पुष्पों पर मँडरानेवाले भ्रमर—इन सबकी ध्वनि यह सूचना दे रही थी कि कोई युवती आ रही है। चक्रवर्ती कुमार (राम) ने उस ध्वनि की दिशा मे दृष्टि डाली।

'स्वर्ग के द्वारा प्रदत्त कोई अनुपम मधुर अमृत हो'—ऐसी वह सुन्दरी, मनोज्ञ स्तनों के भार से कमर लचकाती हुई आ रही थी। अज्ञान को दूर करके उत्तरोत्तर बढ़नेवाले सत्य-ज्ञानरूपी नेत्र प्रदान करनेवाले भगवान् (के अवतार राम) ने अपने दोनों नयनों से उसे अपने सम्मुख देखा।

विशाल प्रदेशवाले नागलोक में, स्वर्गलोक में एवं भूलोक में भी अप्राप्य उस उपमा-रहित स्त्री-लावण्य को देखकर राम ने सोचा—यह कौन है? इसकी सुन्दरता की भी कोई सीमा है? आभरण-भूषित सुन्दरियों में इसका उपमान कौन हो सकता है?

उस समय, कामना से पूर्ण हृदयवाली उस (शूर्पणखा) ने (राम का) वदन देखा। अपने अरुण करों से उनके चरणों का स्पर्श किया। फिर अपने दीर्घ तथा तीक्ष्ण नेत्र-रूपी शूलों को उनपर फेंककर कटाक्ष-पात करती हुई, हरिणी के समान लज्जा-सी दिखाती हुई, एक ओर खड़ी रही।

वेदों के आदि (प्रकाशक) उन (राम) ने उससे प्रश्न किया—हे लक्ष्मी-समान देवी! गौरवर्ण सुन्दरी। तुम्हारा आगमन मंगलप्रद हो। यह हमारा पुण्य ही तो है कि