कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 337, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअरंण्यकाण्ड ३२७
तुम्हारा आगमन हुआ है। तुम्हारा स्थान कौन-सा है ? नाम क्या है ? बंधु-जन कौन है ?
तब उस मुग्धा ने अपना वृत्तांत यों कहा—
कमलभव (ब्रह्मा) के पुत्र (पुलस्त्य) के कुमार (विश्ववसु) की मै पुत्री हूँ।
त्रिपुर-दाह करनेवाले वृषभ-वाहन (शिव) के मित्र रक्त करोंवाले (कुबेर) की भगिनी हूँ।
दिग्गजो का बल चूर-चूर करके रजत-पर्वत को उठानेवाले, त्रिलोक का शासन करनेवाले
रावण की कनिष्ठा (बहन) हूँ। मै कामवल्ली कहलाती हूँ।
ये वचन सुनकर वीर (राम) ने संशय-भरे चित्त के साथ सोचा कि इसका
कार्य कपट-रहित नहीं है। इससे और कुछ प्रश्न पूछकर इसका हाल जानना चाहिए।
फिर, प्रश्न किया—यदि यह कथन सत्य है कि तुम रक्तनेत्रवाले, भयंकर आकारवाले (रावण)
की बहन हो, तो तुम्हे यह मनोहर रूप कैसे मिला ?
उन पवित्र पुरुष (राम) के यों पूछने के पूर्व ही, स्फूत्तिं के साथ कह उठी—
मायावी तथा क्रूर राक्षसो के साथ रहना अनुचित समझकर, विवेकशील होकर मैने धर्म को
अपनाया और उसी पर स्थिर रहने लगी। फिर ऐसा तप किया, जिससे मेरे पाप मिट गये
और देवो का अनुग्रह प्राप्त हुआ।
तब राम ने प्रश्न किया—हे सुन्दरी ! देवताओ का अधिपति भी जिसकी
सेवा करता रहता है, ऐसे त्रिभुवन के शासक (रावण) की तुम बहन हो, तो समृद्धि-वैभव
के साथ न आकर, किसी को साथ लिये बिना एकाकी यहाँ क्यो आई हो ?
वीर के यह पूछने पर सत्यरहित (शूर्पणखा) ने कहा—हे विमल ! हे प्रभु !
मै असजन (रावण आदि) लोगो के समीप नही जाती हूँ। देवताओं तथा उत्तम मुनियों
के संग में रहती हूँ। यहाँ एक काम से तुम्हारे दर्शन करने आई हूँ।
उसके यह कहने पर प्रभु ने यह सोचकर कि सुन्दर ललाटवाली स्त्रियो का हृदय
सुलभता से ज्ञात नही होता, इसका हृद्गत भाव पीछे प्रकट होगा, कहा—हे कंकन-भूषित
हाथोवाली ! मुझसे तुम्हे क्या कार्य है ? बताओ। यदि उचित होगा, तो वह कार्य
पूर्ण करके तुम्हारा उपकार करूँगा।
कुलीन स्त्रियो के लिए यह संभव नही है कि वे अपने हृदय के काम-भाव को स्वयं
ही प्रकट कर सकें। फिर भी, मै ऐसी हूँ कि मेरा कोई नही है। पर मै क्या करूँ ?
काम नामक एक (दुष्ट) के अत्याचार से तुम मेरी रक्षा करो।—यों उस स्त्री ने कहा।
दूर तक जाकर अवरुद्ध हो लौट आनेवाले, बिखरी हुई लाल-लाल रेखाओ से
युक्त, नानाविध भंगिमाएँ दिखाते हुए, चमचमानेवाले काले रंगवाले तथा करवाल-सदृश
नेत्रो एवं आभरण-भूषित स्तनो से शोभित उस (शूर्पणखा) के ये वचन कहने पर, प्रभु ने
विचार किया—यह लज्जाहीन है। नीच स्वभाववाली है। मायाविनी है। इसमें किंचित्
भी सद्गुण नही है।
मौन रहनेवाले उदार प्रभु के हृदय का भाव वह नही जान सकी। भ्रमर-समुदाय
के गुंजारो से युक्त कुंतलोवाली यह (शूर्पणखा) 'मेरे वचनों से मुझपर अनुरक्त हुआ है