कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 341, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअरण्याकाण्ड ३३१
में स्थित अपने स्फटिकमय आवास मे जा पहुँची। सूर्य भी पश्चिम दिशा मे जा पहुँचा और लाली छा गई।
वह (शूर्पणखा) इस प्रकार प्रज्ञाहीन और शिथिल हो गई, मानो काल-सर्प के छेदवाले दंत से निकला हुआ विष उसकी देह में संचरण कर रहा हो। प्रख्यात कामाग्नि (उसके शरीर में) भड़क उठी।
युद्धकुशल मन्मथ के तीक्ष्ण बाण उसके वक्ष में ऐसे जा लगे, जैसे ताड़का नामक क्रूर राक्षसी के विशाल वक्ष में पुरुषोत्तम (राम) का तीक्ष्ण शर लगा था; इससे उसके भीत प्राण काँप उठे।
वह (काम-वेदना से पीड़ित) राक्षसी यह विचार करके उठी कि कलाओं से पूर्ण चन्द्रमा को साग बनाकर दृढ़ धनुर्धारी मन्मथ को ही चबा डालूँ, किन्तु मलय पर्वत से आनेवाला पवन, जब यम के दीर्घ शूल के समान उसके वक्ष पर लगा और पीड़ा उत्पन्न करने लगा, तब वह निष्क्रिय होकर गिर पड़ी।
(तरंगायमान समुद्र जब अपने शब्द से उसे सताने लगा, तब) उसने तरंगपूर्ण उस समुद्र को पर्वतों से पाट देना चाहा; किन्तु स्थिर गगन में प्रकाशित होनेवाले पूर्णचंद्र की दीर्घ किरणें उसे भयभीत कर रही थी, जिससे वह बलहीन होकर कुढ़ती हुई पड़ी रही।
(कभी) वह क्रुद्ध हो सोचती कि मैं इस धरती के सब उद्यानों को विध्वस्त कर, सब पुष्पों को चूर-चूर कर दूँगी; किन्तु अपने पति के संग रहनेवाली लाल मुकुटवाली क्रौंची की ध्वनि सुनकर वह अपने मन मे काँप उठती।
(कभी) वह क्रोध के साथ सर्प (राहु) को लाने का विचार करती, जिससे वह अपने प्रतिकूल रहनेवाले चंद्र को निगल जाय, किन्तु उसके पीन स्तनों पर शीतल-मंद पवन के लगने से उसके प्राण तप्त हो उठते और वह व्याकुल हो पड़ी रहती।
(अपने ताप को शांत करने के लिए) वह अपने करों से अति शीतल हिम-खंडों को लेकर अपने पुष्ट स्तनों पर रख लेती, किन्तु (उसके स्तनों से) उत्पन्न होनेवाली अग्नि में, तप्त पत्थर पर रखे हुए मक्खन के समान वे (हिमखंड) पिघल जाते।
कभी वह कामाग्नि से पीड़ित होकर निःश्वास भरती हुई अपने शरीर को शीतल जल में निमग्न करती, किन्तु वह जल (उसके शरीर के ताप से) उष्ण हो उठता। वह चिंता करती, किन्तु गरजनेवाले समुद्र एवं क्रूर मन्मथ से बचकर रहने का स्थान कहाँ है?
उसका शरीर इतना तप उठा कि शीतल चंद्रकांत की शिला भी उसके स्पर्श से पिघलने लगी। वह काले मेघ को देखती या उत्तम नील रत्नमय स्तंभ को देखती, तो (राम का स्मरण कर) उन्हें हाथ जोड़ देती।
वह कभी सोचती कि मैं किसी भयंकर, क्रूर दाँतोंवाले सर्प से सुरक्षित पर्वत की बड़ी गुहा में जाकर रहूँगी, जहाँ मनोहर पूर्णचंद्र, शीतल पवन और मदन मुझे पहचान नहीं सके।
उस समय, उष्णता बढ़ानेवाला मंद पवन पहले से भी तिगुने वेग से बहकर