कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 340, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३३० | कंब रामायण |
|---|
तब उस (शूर्पणखा) ने (राम से) कहा—हे उत्तम ! हे वीर ! यह माया में चतुर है। यह वंचक राक्षसी है। इसका हृदय दुर्जय है। इसे सद्गुणवती समझना उचित नहीं है। इसका यह रूप सत्य नहीं है। यह मास खाकर जीवित रहनेवाली है। इसे देखकर मैं डर रही हूँ। इसे मेरे निकट आने से रोको और मेरी रक्षा करो।
यह सुनकर वीर (राम) बोले—हे विद्युत्-समान स्त्री ! तुम्हारा ज्ञान खूब है। तुम्हे धोखा देने की शक्ति किसमें है ? यह ज्ञात हुआ कि तुम्हारी मति स्वच्छ है और तुम सद्गुणवाली हो। अहो ! यह (सीता) कदाचित् क्रूर राक्षसी ही है। इसे तुम भली भाँति देख लो और अपने उज्ज्वल दाँत-रूपी मोतियों को दिखाकर हँस पड़े।
उस समय, अमृत के जैसी आई हुई, अरुन्धती के सदृश पातिव्रत्यवाली, मधुर बोली एवं वाँस के जैसे सुन्दर कंधोंवाली देवी (सीता) वीर (राम) के निकट आ पहुँची। तब भड़कती अग्नि के सदृश वचकगुण से पूर्ण चित्तवाली (शूर्पणखा) यह कहकर (सीता को) धमकाने लगी कि हे राक्षस-कुल में उत्पन्न स्त्री, तू क्यो बीच में आ पड़ी है ?
हंसिनी-तुल्य वह (सीता) भीत हुई। भीत होकर झट (राम की ओर) यो दौड़ी कि उसकी विद्युत्-समान सूक्ष्म कटि लचक गई और कोमल चरण दुखने लगे। यो दौड़कर वह कुंजर-समान वीर की पुष्ट भुजाओ से ऐसे लिपट गई, जैसे वर्षाकालिक जल से भरे बादल के मध्य कोई प्रवालमय लता कौंध गई हो।
तब वीर (राम) ने यह सोचकर कि वक्र खड्गदंतवाले राक्षसो के साथ विनोद करना भी बुरा ही होगा, उस (शूर्पणखा) से कहा—तुम कोई अहितकारी कार्य न करो। (मेरा) अनुज यदि तुम्हारा समाचार जान लेगा, तो वह अत्यन्त क्रुद्ध होगा। हे स्त्री ! तुम शीघ्र यहाँ से चली जाओ।
लावण्य से युक्त उस राक्षसी ने कहा—कमल मे, जल मे और कैलास मे निवास करनेवाले करुणा-पूर्ण हृदयवाले देव (ब्रह्मा, विष्णु और शिव), अनग तथा अन्य देवता भी मुझे प्राप्त करने के लिए तपस्या करते हैं। ऐसी हूँ मै। मेरी उपेक्षा करके तुम क्षमाहीन इस मायाविनी को चाहते हो, यह कैसे उचित है ?
तब पवित्र चित्तवाले (राम), यह सोचकर कि यह शिलातुल्य कठोर चित्तवाली (राक्षसी), मेरे यह कहने पर भी कि मै तुमसे सबध रखना नही चाहता हूँ, हटती नही है, किन्तु कपट-वचन कह रही है—मिथिलापति की पुत्री के साथ विद्युत् के साथ चलनेवाले मेघ के जैसे उस सुन्दर उद्यान के बीच स्थित कुटी मे चले गये।
उनके चले जाने के बाद, यह जानकर कि वे चले गये हैं, शूर्पणखा शरीर से निकले हुए प्राणो के साथ श्वासहीन हो गई। मन में अत्यत विह्वल हुई। उसे कुछ अवलवन नही मिला। मन में क्रुद्ध हुई और सोचने लगी—अंजन-समान काले केशोंवाली उस नारी पर यह पुरुष गहरा प्रेम रखता है।
इस प्रकार चिंतित होकर, वह वहाँ खड़ी नही रह सकी। वह उस पुरुषोत्तम की सगति प्राप्त करने का उपाय सोचती हुई वहाँ से चली गई। यह सोचकर कि यदि मैं इसके शरीर का आलिंगन नही करूँगी, तो अपने प्राण खो दूँगी, स्वर्ण-पराग से पूर्ण सुन्दर उद्यान