कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 333, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअरण्यकाण्ड ३२३
करनेवाली थी )। बहुत स्वच्छ थी। शीतल गुणवाली थी। यों वह नदी उत्तम कवि की कविता के समान थी। १
वह दिव्य नदी भ्रमरों से गुंजित, कमलपुष्प-रूपी अपने वदन को विकसित किये, सुरभित नीलोत्पल-रूपी नयनों से एकटक देखती हुई, क्रमशः एक के पश्चात् एक करके आनेवाली लहरों के करों से उत्तम पुष्पों को बिखेर रही थी, मानों उन प्यारे कुमारों के चरणों की पूजा करके उनको प्रणाम कर रही हो।
चंचल जल से पूर्ण वह नदी, निरपराध तथा सत्य-युक्त उन कुमारों को वन-जीवन के कष्ट उठाते देखकर, उमड़ते हुए प्रेम से, सद्योविकसित नीलोत्पल-समुदाय-रूपी अपने मनोहर नेत्रों से अश्रु-बिंदु बहाती हुई, अत्यन्त द्रवित होकर मानो दहाड़ मारकर रो रही थी।
दीर्घ धनुर्धारी (राम), नाल-संयुक्त कमलपुष्प-रूपी शय्या पर युगल नयनों के जैसे विश्राम करनेवाले चक्रवाक-मिथुन को देखते और अपनी प्रियतमा (सीता) के वक्ष की ओर दृष्टि फेरते तथा उत्तम आभरणों से भूषित सीता महिमावान् प्रभु (राम) के कंधों में रमे हुए अपने मन के साथ उन्हीं (कंधों) के जैसे शोभित होनेवाले रत्नमय पुलिनों की ओर देखती।
उत्तम प्रभु (राम), हंसों को (उनके आने की आहट पाकर) वहाँ से हट जाते हुए देखकर अपने समीप में आनेवाली सीता की पदगति को निहारते हुए मंदहास करते। तब वहाँ पर आकर, जल पीकर लौट जानेवाले मत्तगजों को देखती हुई वह देवी भी एक नवीन मंद-मुस्कान से खिल उठती।
धनुष को अपने विशाल कर में धारण करनेवाले वीर (राम), जब जल से समृद्ध उस नदी में लताओं को हिलते हुए देखते और अपनी प्रियतमा की कटि को देखते, तब सीता अंधकार-सदृश कांतिवाले मनोहर कुवलय-पुष्पों के मध्य अरुण कमल को विकसित देखती और (उस दृश्य में) अपने प्रभु के सौंदर्य को देखती।
राम, इस प्रकार चलकर उस नदी के निकट, शीतल 'पंचवटी' नामक पुष्पभरे उद्यान में जा पहुँचे और वहाँ अनुज के द्वारा निर्मित एक सुन्दर पर्णकुटी में निवास करने लगे। फिर एक दिन—
(शूर्पणखा उस आश्रम में आ पहुँची) जो नीलरत्न-समान कांतिवाले राक्षस—
१. तमिल काव्य-लक्षणों के अनुसार कविता में 'तुरै' और 'तियै' नामक दो लक्षण होने चाहिए। तुरै का अर्थ है 'अहम्' और 'पुरम्'। ये क्रमशः मनुष्य के आंतरिक भाव और बाह्य-व्यापार को व्यक्त करते हैं। पुरम् की अपेक्षा अहम् को व्यक्त करनेवाली कविता अधिक सुन्दर होती है। नवरसों में शृंगार को अहम् में और अन्य रसों को पुरम् में अंतर्भूत किया जा सकता है। 'तुरै' शब्द में श्लेष से घाट का अर्थ भी है। तियै का अर्थ है पाँच प्रकार के प्रदेश। इन्हीं पाँच प्रदेशों की भूमिका पर मनुष्य-जीवन की सुख-दुःखात्मक विभिन्न दशाओं का चित्रण करना प्राचीन तमिल कवियों की परिपाटी रही है। नदी और कविता—दोनों का संबंध इन पाँच प्रदेशों से दिखाया गया है। यह पद कंबन की कविता-कौशल का एक सुन्दर नमूना है। —ले०