भारतकोश
कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 297, कुल 549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 297

अयोध्याकाण्ड २८७

त्यागकर, पुनरावृत्ति से रहित (अर्थात्, जहाँ से लौट आना असंभव है), नरक-लोक प्राप्त करते हुए देखेंगे।

यह देखकर कि आपको राज्य छोड़कर वन मे निवास करने का दुःख प्राप्त हुआ है, जब आपकी जननी रो रही थी, तब उसे देखकर जो कैकेयी आनन्दित हुई थी, उसे अब (पुत्र के शोक में) पृथ्वी पर गिरकर रोते हुए देखेंगे।

सान पर चढ़ाकर तीक्ष्ण किये गये, अग्नि के समान भयंकर और विजयमाला से भूषित बरछा धारण करनेवाले ! मैं एक क्षण मे एक तीक्ष्ण तथा विध्वंसक बाण से इस सेना-समुद्र को त्रिपुर-दाह करनेवाले शिवजी के समान सुखा दूँगा—इस प्रकार लक्ष्मण ने कहा।

तब रामचन्द्र ने उससे कहा—हे लक्ष्मण ! यदि तुम चतुर्दश लोको को हिला देना चाहो, तो तुम्हारे इस निश्चय को कोई रोक नही सकता। उसके बारे मे कुछ कहने की क्या आवश्यकता है ? (पर मै तुम से) एक उचित वचन कहना चाहता हूँ। उसे सुनो।

उज्ज्वल प्रस्तर-स्तंभ के प्रतिरूप बने कंधोवाले ! हमारे कुल मे जो निष्कलंक गुणवाले राजा उत्पन्न हुए, उनकी गणना नहीं हो सकती। हमारे कुल में कौन ऐसा हुआ, जो अपने कुल-धर्म से हटा हो ?

ताल-वृक्ष जैसी सूँडोवाले हाथियो की सेना से युक्त भरत ने जो कार्य किया है, वह वेद-प्रतिपादित धर्म के अतर्भूत ही है। तुम जैसा कहते हो, वैसा नहीं है (अर्थात्, अधर्म-कार्य नहीं है)। इस सत्य को तुमने मेरे प्रति प्रेमाधिक्य के कारण सोचा नहीं।

भरत, मुझ अपने ज्येष्ठ भ्राता पर प्रेम के कारण ही यहाँ आयगा और राज्य मुझे सौंप देगा—यों सोचने के बदले क्या यह सोचना बुद्धिमत्ता है कि वह (भरत) सेना के साथ आकर मुझसे युद्ध करेगा ?

हे विद्युत् के समान चमकते हुए बरछे को धारण करनेवाले ! वीर-वलयधारी भरत यहाँ आकर विशाल सेना को, राज्य-सपत्ति के साथ, मुझे सौपेगा—इसके विपरीत यह कहना भी अनुचित है कि वह मेरे साथ युद्ध करेगा।

हे आभरण-योग्य कंधोवाले ! उत्तम धर्म के देवता के समान एव सच्चारित्र्य की धुरी बने हुए उस (भरत) के सबंध मे इस प्रकार सोचना क्या उचित है ? उसका यहाँ आना, मुझे देखने के लिए ही है। इसे तुम अभी समझोगे।

प्रभु ने अनुज (लक्ष्मण) से यो कहा—उस समय, भरत अपनी सेना को पीछे छोडकर, अपने से कभी पृथक् न होनेवाले प्रेमयुक्त भाई शत्रुघ्न को साथ लेकर, आगे बढकर (राम के निकट) आया।

नमस्कार की मुद्रा मे हाथो को उठाये हुए, शिथिल देहवाले, अश्रुपूर्ण नेत्रोवाले तथा साकार दुःख बने हुए चित्र-जैसे आनेवाले भरत को सर्वज्ञ प्रभु ने पूर्ण रूप से देखा—(अर्थात्, शिर से पैर तक दृष्टि फेरकर देखा)।

फिर, काले मेघ-जैसे आकारवाले प्रभु ने लक्ष्मण से कहा—शब्दायमान दृढ धनुष से युक्त हे अनुज ! हे तात ! देखो, रथ आदि की सेना को लेकर यह भरत बड़े क्रोध के साथ युद्ध करने के लिए कैसा युद्धोचित वेष धारण कर यहाँ आ रहा है !