कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 348, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें३३८ कंब रामायण
हम, सारी पृथ्वी का शासन करनेवाले चक्रवर्ती दशरथ के पुत्र हैं और माता की आज्ञा से सुगन्धित वन में आये हुए हैं। वेदोक्त तथा तपस्वियों के कहने से हम, अपार सेना-समुद्र से युक्त राक्षसों के वंश का विनाश करेंगे और उसके पश्चात् ही पर्वत-सदृश सौधोंवाली अयोध्या नगरी में प्रवेश करेंगे—इसे ठीक समझ ले।
राक्षसों के सम्मुख सन्मार्ग पर चलनेवाले देवता लोग खड़े नहीं रह सके और पराजित हो भाग गये, तो यहाँ ये दो मनुष्य क्या कर सकेंगे ?—ऐसा विचार मत कर। यदि तू शक्तिमान् है, तो जा, क्रोधी, तीक्ष्ण शस्त्रधारी राक्षसों में तथा बलवान् यक्षों में, जो अत्यन्त शक्तिमान् हैं, उन्हें ले आ। हम उन सबका विनाश कर देंगे।
तब उस राक्षसी ने कहा—हे धान आदि अनाजों को अधिकाधिक उत्पन्न करने-वाली जल-समृद्धि से पूर्ण देशवाले ! सुनो, यदि तुम मुझे मुँह के ऊपर ओंठ से बाहर उभरे हुए दाँतोंवाली, विकृत रूपवाली कहकर मेरा तिरस्कार न करो और मुझसे प्रेम करो, तो उन राक्षसों को अवश्य मिटा सकोगे। (उनकी) माया को यथातथ्य रूप में जान सकोगे। उनको संपूर्ण रूप से परास्त कर सकोगे। उनके क्रूर कृत्यों से तुम बच सकोगे। फिर उसने कहा—
तुम इस बाँस-सदृश कंधोंवाली को न त्यागो, तो भी मै क्या तुम्हारे लिए भार हो जाऊँगी ? यदि तुम मायावी तथा सद्ज्ञान-हीन राक्षसों से युद्ध करने का विचार करते हो, तो पंचेंद्रियों के समान विविध माया करनेवाले, उनके यंत्रों को समझकर मैं उनसे तुम लोगों की रक्षा करूँगी। 'साँप के पैर साँप ही जानता है' वाली कहावत को जानते हो न ?
यदि तुम यह सोचते हो कि हृदय से प्रेम करके ही इस (सीता) ने तुमसे विवाह किया है, तो अपने इस अनुज के साथ—जिसने इतना भी विचार न किया कि राक्षसों के साथ युद्ध करना पड़े, तो हम तीनों एक साथ मिलकर रक्त की नदियाँ बहा देंगे और राक्षसों पर विजय प्राप्त करेंगे (और मेरा अंग-भंग कर दिया)—मेरा विवाह करा दो। दो ग्रहों (सूर्य और चन्द्र) को बन्दी बनानेवाले रावण से मैं बल में कुछ कम नहीं हूँ।
जब तुम उत्सव के दृश्यों से युक्त अपने बड़े नगर में प्रवेश करोगे, तब मैं (अपनी मायाशक्ति से) मनचाहा रूप धारण करूँगी। तुम्हारा यह अनुज, शांतमन होकर भी यदि यह कहे कि इस नाककटी स्त्री के साथ कैसे रह सकता हूँ ? तो हे प्रभु ! तुम इसे समझाकर कहना कि चिरकाल से मैं कटिहीन १ स्त्री के साथ रहता हूँ।
उस (शूर्पणखा) ने जब ये वचन कहे, तब अत्यन्त क्रुद्ध हुए अनुज लक्ष्मण ने पत्राकार बरछे की ओर दृष्टि करके (राम से) कहा—हे प्रभु ! यदि इसे अभी न मार दें, तो यह बहुत पीडा उत्पन्न करेगी। कहिए, आपकी क्या आज्ञा है ? प्रभु ने कहा—यदि अब भी यह हमें छोड़कर न जाये तो वैसा ही करेंगे। तब उस राक्षसी ने यह सोचकर कि ये मुझ-पर कुछ दया नहीं करेंगे और यहाँ रहूँगी, तो मेरे प्राणों की हानि होगी।
१. शूर्पणखा सीता को 'कटिहीन' कह रही है। —अनु०