कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 358, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें३४८ | कंब रामायण
भागकर दुबारा युद्ध करने के लिए आनेवाले (राक्षसो) को, अपने तीक्ष्ण बाणों से इस प्रकार काटकर गिरा दिया कि यह विदित नही होता था कि किसने भाला फेंका, किसने तीर छोड़ा, किसने प्रयुक्त करने के लिए शस्त्र उठाया, किसने कौशल से कार्य किया या किसने नही किया ।
काकुत्स्थ (राम) ने बाणों से जो शिर काटें, उनमें से कुछ मेघ-मंडल में जा पहुँचे, कुछ समुद्र के किनारे के प्रदेशों में जा गिरे, कुछ चन्द्र को घेरे हुए नक्षत्रों में जा पहुँचे, कुछ उज्ज्वल कुंडल-भूषित मिथुन नामक राशि में जा पहुँचे, कुछ भीषण अरण्यों में जा गिरे, कुछ पर्वतो पर जा गिरे ओर कुछ दिशाओं की सीमाओं पर स्थित दिग्गजों के निकट जा गिरे।
वे (राम के) बाण, जो राँक्षसो के, मेरु का भी उपहास करनेवाले, अतिदृढ वक्षों को भेदकर आर-पार हो जाते थे और क्षतो से बहनेवाली रक्त-रूपी ऊँची तरंगों से पूर्ण नदियों को उमड़ा देते थे, कुछ मेघों पर जा लगते थे, कुछ चन्द्र से युक्त गगन में जा लगते थे और कुछ समुद्रों के बाहर एव भीतर जा लगते थे ।
सुन्दर मौलीधारी एव अग्नि-ज्वालाओं को उगलती आँखोंवाले सब राक्षस, सुदृढ तथा तीक्ष्ण शक्तियों को प्रयुक्त करके, (राम के) शर से आहत होकर अपने राक्षस-शरीर को समुद्र में छोड़ देते थे और अबिनश्वर (देव) शरीर को पाकर देवों के साथ मिल जाते थे और यह कहकर कि राक्षस लोग मिट गये, आनन्द-ध्वनि करने लगते थे ।
वहाँ विशाल तरंगों से भरे अनेक ऐसे रक्त-समुद्र उत्पन्न हो गये, जिनमें (राक्षसों के) यकृत्-रूपी कमल थे, रथ-रूपी पुलिन थे, बलवान् गज-रूपी मगरों के झुंड तैर रहे थे, भारी आँत-रूपी घने तथा हरे कमल-पत्र ऊपर की ओर फैले थे और जिनमें भूत स्नान करते थे ।
प्राणहारी अग्रभागों से युक्त (रामचन्द्र के बाण-रूपी) बौछार के गिरने से कुछ (राक्षस) हाय-हाय कर उठे, कुछ मूच्छित हो गिर पड़े, कुछ मिट गये, कुछ उसास भरने लगे, कुछ लौट गये, कुछ लुढ़क गये, कुछ कीचड़-भरे एव गहरी लहरो से युक्त रक्त-समुद्र म डूब गये, कुछ धरती पर पड़े रहे, कुछ टुकड़े-टुकड़े हो रहे ।
तत्र विष के समान क्रूर चौदहो सेनापति ऐसे उठ आये, जिससे विशाल क्षीर-समुद्र को मथनेवाले (देव तथा असुर) भी भयभीत हो उठे। वे (सेनापति) निहत होकर गिरे हुए राक्षसो का उपहास करने लगे। दृढ़ पहियोंवाले रथों पर आरूढ होकर बरछे ओर करवाल लिये हुए तथा धनुष धारण करके अपार समुद्र-जैसी सेना-वाहिनी को लेकर एक साथ आ पहुँचे ।
पूर्व समय में एक बार पर्वत को धनुष बनाकर आये हुए शिव को त्रिपुरासुरों ने जिस प्रकार घेर लिया था, उसी प्रकार प्रभु (राम) का आदर न करनेवाले वे राक्षस, मन की क्रोधाग्नि को आँखों से निकालते हुए आये और कालमेघ-सदृश धनुर्वीर (रामचंद्र) को घेरकर युद्ध करने लगे।
चन्द्रकला-समान खड्गाटतीवाले राक्षसों में से कुछ ने बाण का प्रयोग किया, कुछ ने वक्र दंडों का प्रयोग किया। कुछ ने अनेक शस्त्रों से प्रहार किया। कुछ ने निन्दा-