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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 357, कुल 549 में से

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पृष्ठ 357

अरण्यकाण्ड ३४७

तड़पते हुए कबंधो की राशियाँ, बहती हुई रक्त-धारा के साथ, ऐसा दृश्य उपस्थित करती थी, जैसे अरण्य के घने वृक्षों की शाखाएँ दावाग्नि मे जल रही हो, गगन में उड़नेवाले राम-वाण ऐसे लगते थे, जैसे मृत (राक्षसों) के प्राणो का भी पीछा करते हुए जा रहे हो।

युवतियो के दीर्घ नयनो के समान ही राम के वाण, करवालो के साथ ही राक्षसो के करो के गिरने पर, उनके कंठों के कट जाने पर, कवच से आवृत देहो के छिद जाने पर, उनके शिरो को भी भीषण रूप मे छितराते हुए जलकर दिगंतो को भी पारकर जाते थे।

वर्षा के सदृश राम-बाण, पर्वत-समान राक्षसों के विशाल शरीर-रूपी तटो के मध्य तालाब बना रहे थे, नदियाँ बना रहे थे, रण में रक्त-प्रवाह को भर रहे थे और यों उस स्थान में वन के दृश्य को मिटा रहे थे (अर्थात्, वहाँ के वन को रक्तमय जलाशयो मे परिवर्तित कर रहे थे)।

उस समय, विशाल रक्त-समुद्र तरगायमान हो उठे। राक्षसों के शिर उस (समुद्र) में उतराने लगे। उनकी दीर्घ मांस पेशिया उतराने लगी। दीर्घ सूँड़वाले पर्वत-जैसे हाथी उतराने लगे। झपटकर चलनेवाले घोड़े उतराने लगे। ध्वजाओ के साथ रथ भी उतराने लगे।

उस समय, अनेक बलवान् राक्षस, ज्वाला उगलनेवाली दृष्टि से देखकर, गरजकर, किसी विशाल अचल पर्वत को घेरकर, बरसनेवाले मेघ-जैसे, तीक्ष्ण बाण आदि उग्र शस्त्रो को (राम पर) बरसाने लगे।

राम ने अपने बाणो से बरसनेवाले शस्त्रों के टुकड़े-टुकड़े कर दिये, अनेक शस्त्रों को विभिन्न दिशाओं में छितरा दिये और बिखरे रक्त-केशोवाले काले राक्षसो के शिरो को काट-काटकर यों गिरा दिया, जिससे भूमि (उन शिरों के भार से) अपनी पीठ को झुकाने लगी और वन (उन शिरों से) भर गया।

उस समय कबध नाच उठे, हाथी लाल शोणित की धाराओ में गोतं लगाने लगे, भयंकर भूत, बैर-भरे क्रोधवाले एवं क्रूर कार्य करनेवाले राक्षसों की चरबी को भर पेट खाकर आनन्द मनाने लगे, (मृत हो स्वर्ग मे आये हुए वीर) प्राणियों के भार से देवलोक की भी देह झुक गई।

मायावी, दर्प तथा कपट से भरे, वक्र दंतोवाले राक्षसों की उन आँखो की पुतलियो को, जिनको देखकर गरुड भी भयभीत हो जाता था, अब काक निकाल-निकाल-कर खाने लगे। अंधकार के समान वंचको के मध्य विनाश अनायास ही पहुँच जाता है; क्योकि कृपामय धर्म को छोड़कर अन्य कौन-सी वस्तु बलवान् हो सकती है?

तब (अनेक राक्षमो के) घने अंधकार को मिटाकर प्रकाशित होनेवाले सूर्य के जैसे धनुर्धारी (राम) को क्रोधी राक्षसों ने चमकते बरछे-जैसे अपने नेत्रों से देखा और काली तथा विशाल घनघटा-जैसे युगान्त में पत्थरो की वर्षा करे, वैसे ही सर्व प्रकार के शस्त्रो को उन (राम) पर बरसाकर युद्ध किया।

धनुर्धारी (राम) ने झुड बाँधकर आये राक्षसों को; पृथक्-पृथक् आकर सामना करनेवाले (राक्षसों) को; अत्यत क्रोध से झपटनेवाले (राक्षसो) को, पहले पराजित हो