कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 356, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें३४६ | कंब रामायण
खड्गों की धार पर मक्खियाँ भनभना रही हैं। सेना के वीरो की वाम भुजाएँ और वाम नेत्र फड़क रहे हैं। बलिष्ठ भुजाओवाले सेनापतियों के अश्व ऊँघते हुए गिर पड़ते हैं। श्वानों के साथ शृगाल-दल भी मिलकर आये हैं और रो रहे हैं।
हथिनियाँ मद-जल बहा रही हैं। विशाल गंडवाले हाथियों के दाँत टूटकर गिर रहे हैं। धरती काँप रही है। उन्नत आकाश से बिजलियाँ गिर रही हैं। दिशाएँ अकस्मात् जल उठती हैं। सबके शिरो की पुष्प-मालाओ से मास की दुर्गंधि निकल रही है।
ऐसे लक्षणों के उत्पन्न होने के कारण, इसे अकेला मनुष्य कहकर इसकी उपेक्षा न कीजिए। मेरा कथन सत्य है। यदि हमसब एक साथ युद्ध करने लगें, तो भी इसे परास्त नहीं कर सकते। हे विजयमालाधारी ! मेरे वचनों को क्षमा कर दो। यो अकंपन ने कहा।
यह वचन सुनते ही खर हँस पड़ा, जिससे सारा संसार काँप गया। फिर, वह बोला—मेरा दृढ पराक्रम पत्थर का वह सिल है, जिसपर देवता पिस चुके हैं। युद्ध की कामना से फूली हुई मेरी भुजाएँ क्या एक क्षुद्र मनुष्य के आगे नीची होकर रहेगी ?
खर के इस प्रकार कहते ही क्रोधभरी राक्षस सेना ने दशरथ पुत्र को ऐसे घेर लिया, जैसे घुँघराले केसरों से शोभायमान सिंह को क्रुद्ध गज-समूह ने घेर लिया हो। उस समय उनके भयकर शस्त्र एक दूसरे से टकराकर वज्र-सी ध्वनि कर उठे।
यो उस सेना के घेरते ही राम के हाथ में स्थित धनुष के सिर झुक गये। उस समय जो युद्ध हुआ और उसका जो परिणाम हुआ, इसका वर्णन हम करेंगे। राम के वेगवान् बाणों की नोक से दौड़नेवाले अश्व छिद गये और धरती पर लोट गये। लाल बिंदियो से भरे मुखवाले हाथी ऐसे गिरे, जैसे वज्र से आहत पर्वत हों।
(राक्षसो के) त्रिशूल छिन्न हुए। अग्नि-ज्वाला उगलनेवाले फरसे टूट गये। करवाल टुकड़े-टुकड़े हो गये। गदाएँ चूर-चूर हुईं। भिदिपाल मिट गये। बाण विनष्ट हुए। शरीर को चीर देनेवाले भयंकर भाले तहस-नहस हुए। धनुष एव बरछे भी चूर-चूर हो उड़ गये।
वीर-कंकण टूटे। हाथो के साथ तोमर भी टूटे। गजों के पैर टूटे। धुरियो के साथ रथ और उनपर की ध्वजाएँ टूटी। अश्व टूटे, (शरभ आदि) जन्तुओ के दलो के शिर टूटे। मूसल जड़ से टूट गये।
रामचंद्र के बाण, जीनवाले अश्वो तथा काले वर्णवाले मदजल-स्रावी, दीर्घ सूँड़वाले, पर्वत-समान हाथियों को भेदकर पार कर जाते थे और सब दिशाओं में छितरा जाते थे। निरंतर बरसनेवाली वर्षा के जल के समान रक्त, धरती पर फैल गया। राक्षसों के शोभाहीन वक्ष खुल गये। उनके शिर कटकर (धड़ से) पृथक् हो गये।
राघव ने एक, दस, सौ, सहस्र, कोटि—यों गणना के लिए दुसाध्य कठोर शरों के सिलसिले को जारी रखा। उन बाणो ने राक्षसो को मारकर पर्वत-शिखरो एवं अनेक पर्वतो के समुदाय के समान शव-राशियों की पंक्तियाँ लगा दीं।