कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 355, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंआरण्यकाण्ड ३४५
जिस सेना के आगमन से वृक्षों से भरे कानन में बड़ा मार्ग हो गया था, उस (सेना) को खर की सेना समझकर, कालवर्ण कमल-सदृश नेत्रवाले प्रभु ने अशैथिल बल-युक्त अपने कंधे पर बाणों से पूर्ण तूणीर बाँध लिया। कर में चाप धारण किया। सुदृढ कवच को भी पहन लिया और खड्ग भी (कटि में) बाँध लिया।
फिर, लक्ष्मण ने राम से प्रार्थना की—हे सिंह-सदृश बलशाली ! यदि युद्ध में अजेय स्वर्गलोकवासी और इस लोक के सब प्राणी भी अधिकाधिक संख्या में युद्ध करने आयें, तो भी उन सबकी आयु (मेरे हाथों) समाप्त हो जायगी। यह बात अब मुझे आप से कहने की आवश्यकता नहीं है न ? यह युद्ध मेरे लिए छोड़ दें और मेरी भुजाओं को सतानेवाले आलस्य को दूर कर दें।
लक्ष्मण ने यह कहा। किंतु, राम इससे सहमत नहीं हुए। तब लक्ष्मण, जो राम की उन्नत पर्वत-सदृश भुजाओं के बल को पहचानता था और अपने भाई की आज्ञा को टाल नहीं सकता था, अपने सुन्दर करों को जोड़कर सीता देवी के निकट उनकी रक्षा के लिए खड़ा हो गया, जो अपनी आँखों से अश्रुधारा को धरती पर गिराती हुई खड़ी थी।
वह सीता, जो उस लता के सदृश थी, जिसमें ताटंकों से शोभित एक चन्द्रमा पुष्पित हुआ था, व्याकुल हो खड़ी रही और अनुपम धनुर्धारी मेरु-जैसे रामचन्द्र, मेघों के समान गर्जन करनेवाले, खड्ग-दंतोंवाले राक्षसों के सामने पर्णकुटीर से यों निकल आये, जैसे कोई सिंह पर्वत की कंदरा से निकल पड़ा हो।
गगन तक बढ़े हुए बाँसों की झुरमुट में उत्पन्न होकर उसको जला देनेवाली अग्नि के समान अपने कुल का सर्वनाश करनेवाली वह राक्षसी (शूर्पणखा), पर्णशाला से निकले हुए राम की ओर संकेत करके बोली कि हमारा शत्रु यही राम है।
स्वर्णमय रथ पर, गगन को छूते हुए खड़े रहनेवाले, पर्वत-सम कंधोंवाले उस विजयी खर नामक राक्षस ने, जिसको देखकर सहस्रकिरण भी भय से हट जाता था, (राम को) देखा और अपने सैनिकों से कहा—मैं अकेला ही इनसे युद्ध करके, इस मनुष्य के बल को मिटाकर विजय-माला धारण करूँगा।
यह मनुष्य तो अकेला ही है और यहाँ पर आई हुई बलवान् राक्षस-सेना इतनी विशाल है कि इसके लिए वन में स्थान ही नहीं है। जब संसार के लोग इस दशा पर 'अहो !' कहेंगे (अर्थात्, आश्चर्य प्रकट करेंगे) तब मेरी विजय क्या रह जायगी ? अतः, तुम सब लोग यहीं देखते हुए खड़े रहो। मैं अकेले ही (हमारे लिए) भोज्य मांस से विशिष्ट इस मनुष्य के प्राणों को पी जाऊँगा।
तब अकंपन नामक विवेकवान् राक्षस, यह वचन सुनकर उसके निकट आया और कहने लगा—हे स्वामी ! हे वीरों में महावीर ! मेरा एक निवेदन है। युद्ध से अत्यन्त उग्र होना उचित ही है। तो भी इस समय अनेक दुःशकुन हो रहे हैं।
हे वीर ! मेघ, गरजकर रक्त की वर्षा कर रहे हैं। सूर्य के चारों ओर परिवेष-मंडल पड़ा है। कौए लड़ते और रोते हुए आपकी ध्वजा से टकरा रहे हैं और धरती पर गिर रहे हैं। इन बातों पर ध्यान दीजिए।