कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 354, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३४४ | कंब रामायण |
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समृद्ध तथा शत्रुविनाशक सेना-रूपी विशाल समुद्र जब खर-रूपी गगनस्पर्शी मेरु को घेरकर चला और जब उस सेना के मध्य मे रथारूढ होकर वह ( खर ) निकला, तब उस दृश्य को देखकर सब काँप उठे।
निर्झरों के सदृश मद-स्रावी हाथी, अश्व, स्वर्ण-कलशो से भूषित रथ, राक्षस—इन (चतुर्विध) सेनाओ के अभियान से जो धूलि आकाश मे व्याप्त हुई, उससे सूर्य का स्वर्ण-रथ और हरित अश्व भी श्वेत वर्ण हो गये ।
क्रोध-भरी, विशाल समुद्र के समान फैली हुई सेना के चलने से जो धूलि-समुदाय उठा, उससे सब कानन धूलिमय हो गये । पर्वतो पर एव गगन मे स्थित बादल भी धूसर हो गये । समुद्र पट गये । अब और क्या कहा जाय ।
हत्या करने में, विष के समान उग्र मनवाले राक्षस, भूमि पर एव आकाश में रिक्त स्थान न रहने से पर्वतो के शिखरो को ऐसे लाँघते चले आये, जैसे उन पर्वतो पर दूसरे पर्वत चल रहे हो।
माया-बन्धन के कारण उत्पन्न कर्म-परिणाम को मिटा देनेवाले, आसक्तिहीन महा-पुरुषों के लिए भी अवार्य, शरीर के साथ उत्पन्न होकर उनके प्राणो को यम के हाथ सौंपने-वाली व्याधि के समान वह राक्षसी (शूर्पणखा) आगे-आगे आ रही थी। वह राक्षस-वाहिनी उदार महाप्रभु ( राम ) के निकट आ पहुँची।
उनके चापो की ध्वनि से आकाश के बादल भी काँप उठत थे। दीर्घ धनुषो के टंकार से वज्र भी भय-विकम्पित हो उठते थे। कोलाहल से समुद्र भी डर से उपशान्त हो जाता था। यो वह राक्षस-सेना उस वन में स्थित दोनो वीरो के आवास पर आ पहुँची।
( उस वन के ) पक्षी तथा मृग ( उस सेना को देखकर ) भय से व्याकुल हुए। उनके मुँह सूख गये। उनके शरीर शिथिल पड़ गये। वे उसास भरने लगे। उनकी आँखो पर अँधेरा छा गया। यो वे कही भी रुके बिना भागते चले आये और वे क्रूर राक्षसो की सेना के आगमन की सूचना देनेवाले गुप्तचरो के समान लगते थे।
उस वन के शरभ, सिंह आदि ऐसे डरकर भाग रहे थे कि धूलि-पुंज उड़कर सर्वत्र छा गये। उनके पैरो-तले दबकर वृक्ष और झाड़ चडचड़ाहट के साथ टूट गये। उन मृगो को देखकर पुष्ट भुजाओवाले राम-लक्ष्मण ने सोचा कि राक्षस-सेना उनपर चढ़ाई करने आ रही है।
विद्युत् के जैसे प्रकाशमान धनुषवाले, अतिदृढ कवचवाले, कटि में बँधे करवाल-वाले, स्वर्णमय किनारे से युक्त तूणीरधारी और क्रोधाग्नि से जलते मनवाले लक्ष्मण, स्वय पहले युद्ध के लिए सन्नद्ध होकर राम के निकट आये और यह कहकर खडे हो गये कि आप यही रहे और मेरे युद्ध-कौशल को देखें। तब अपने अनुज को देखकर प्रभु कहने लगे—
हे वीर ! सन्मार्गगामी महातपस्वियो को मैने पहले वचन दिया है कि मैं राक्षसो के प्राण हरूँगा, उसको अयथार्थ न करने के लिए इस राक्षस-दल को मैं ही मारूँगा। सहज सुवासित तथा पुष्पालंकृत कुतलोवाली देवी सीता की रक्षा करते हुए तुम यही रहो। मै यही चाहता हूँ—यो (राम ने) कहा।