कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
| ३४४ | कंब रामायण |
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समृद्ध तथा शत्रुविनाशक सेना-रूपी विशाल समुद्र जब खर-रूपी गगनस्पर्शी मेरु को घेरकर चला और जब उस सेना के मध्य मे रथारूढ होकर वह ( खर ) निकला, तब उस दृश्य को देखकर सब काँप उठे।
निर्झरों के सदृश मद-स्रावी हाथी, अश्व, स्वर्ण-कलशो से भूषित रथ, राक्षस—इन (चतुर्विध) सेनाओ के अभियान से जो धूलि आकाश मे व्याप्त हुई, उससे सूर्य का स्वर्ण-रथ और हरित अश्व भी श्वेत वर्ण हो गये ।
क्रोध-भरी, विशाल समुद्र के समान फैली हुई सेना के चलने से जो धूलि-समुदाय उठा, उससे सब कानन धूलिमय हो गये । पर्वतो पर एव गगन मे स्थित बादल भी धूसर हो गये । समुद्र पट गये । अब और क्या कहा जाय ।
हत्या करने में, विष के समान उग्र मनवाले राक्षस, भूमि पर एव आकाश में रिक्त स्थान न रहने से पर्वतो के शिखरो को ऐसे लाँघते चले आये, जैसे उन पर्वतो पर दूसरे पर्वत चल रहे हो।
माया-बन्धन के कारण उत्पन्न कर्म-परिणाम को मिटा देनेवाले, आसक्तिहीन महा-पुरुषों के लिए भी अवार्य, शरीर के साथ उत्पन्न होकर उनके प्राणो को यम के हाथ सौंपने-वाली व्याधि के समान वह राक्षसी (शूर्पणखा) आगे-आगे आ रही थी। वह राक्षस-वाहिनी उदार महाप्रभु ( राम ) के निकट आ पहुँची।
उनके चापो की ध्वनि से आकाश के बादल भी काँप उठत थे। दीर्घ धनुषो के टंकार से वज्र भी भय-विकम्पित हो उठते थे। कोलाहल से समुद्र भी डर से उपशान्त हो जाता था। यो वह राक्षस-सेना उस वन में स्थित दोनो वीरो के आवास पर आ पहुँची।
( उस वन के ) पक्षी तथा मृग ( उस सेना को देखकर ) भय से व्याकुल हुए। उनके मुँह सूख गये। उनके शरीर शिथिल पड़ गये। वे उसास भरने लगे। उनकी आँखो पर अँधेरा छा गया। यो वे कही भी रुके बिना भागते चले आये और वे क्रूर राक्षसो की सेना के आगमन की सूचना देनेवाले गुप्तचरो के समान लगते थे।
उस वन के शरभ, सिंह आदि ऐसे डरकर भाग रहे थे कि धूलि-पुंज उड़कर सर्वत्र छा गये। उनके पैरो-तले दबकर वृक्ष और झाड़ चडचड़ाहट के साथ टूट गये। उन मृगो को देखकर पुष्ट भुजाओवाले राम-लक्ष्मण ने सोचा कि राक्षस-सेना उनपर चढ़ाई करने आ रही है।
विद्युत् के जैसे प्रकाशमान धनुषवाले, अतिदृढ कवचवाले, कटि में बँधे करवाल-वाले, स्वर्णमय किनारे से युक्त तूणीरधारी और क्रोधाग्नि से जलते मनवाले लक्ष्मण, स्वय पहले युद्ध के लिए सन्नद्ध होकर राम के निकट आये और यह कहकर खडे हो गये कि आप यही रहे और मेरे युद्ध-कौशल को देखें। तब अपने अनुज को देखकर प्रभु कहने लगे—
हे वीर ! सन्मार्गगामी महातपस्वियो को मैने पहले वचन दिया है कि मैं राक्षसो के प्राण हरूँगा, उसको अयथार्थ न करने के लिए इस राक्षस-दल को मैं ही मारूँगा। सहज सुवासित तथा पुष्पालंकृत कुतलोवाली देवी सीता की रक्षा करते हुए तुम यही रहो। मै यही चाहता हूँ—यो (राम ने) कहा।
आरण्यकाण्ड ३४५
जिस सेना के आगमन से वृक्षों से भरे कानन में बड़ा मार्ग हो गया था, उस (सेना) को खर की सेना समझकर, कालवर्ण कमल-सदृश नेत्रवाले प्रभु ने अशैथिल बल-युक्त अपने कंधे पर बाणों से पूर्ण तूणीर बाँध लिया। कर में चाप धारण किया। सुदृढ कवच को भी पहन लिया और खड्ग भी (कटि में) बाँध लिया।
फिर, लक्ष्मण ने राम से प्रार्थना की—हे सिंह-सदृश बलशाली ! यदि युद्ध में अजेय स्वर्गलोकवासी और इस लोक के सब प्राणी भी अधिकाधिक संख्या में युद्ध करने आयें, तो भी उन सबकी आयु (मेरे हाथों) समाप्त हो जायगी। यह बात अब मुझे आप से कहने की आवश्यकता नहीं है न ? यह युद्ध मेरे लिए छोड़ दें और मेरी भुजाओं को सतानेवाले आलस्य को दूर कर दें।
लक्ष्मण ने यह कहा। किंतु, राम इससे सहमत नहीं हुए। तब लक्ष्मण, जो राम की उन्नत पर्वत-सदृश भुजाओं के बल को पहचानता था और अपने भाई की आज्ञा को टाल नहीं सकता था, अपने सुन्दर करों को जोड़कर सीता देवी के निकट उनकी रक्षा के लिए खड़ा हो गया, जो अपनी आँखों से अश्रुधारा को धरती पर गिराती हुई खड़ी थी।
वह सीता, जो उस लता के सदृश थी, जिसमें ताटंकों से शोभित एक चन्द्रमा पुष्पित हुआ था, व्याकुल हो खड़ी रही और अनुपम धनुर्धारी मेरु-जैसे रामचन्द्र, मेघों के समान गर्जन करनेवाले, खड्ग-दंतोंवाले राक्षसों के सामने पर्णकुटीर से यों निकल आये, जैसे कोई सिंह पर्वत की कंदरा से निकल पड़ा हो।
गगन तक बढ़े हुए बाँसों की झुरमुट में उत्पन्न होकर उसको जला देनेवाली अग्नि के समान अपने कुल का सर्वनाश करनेवाली वह राक्षसी (शूर्पणखा), पर्णशाला से निकले हुए राम की ओर संकेत करके बोली कि हमारा शत्रु यही राम है।
स्वर्णमय रथ पर, गगन को छूते हुए खड़े रहनेवाले, पर्वत-सम कंधोंवाले उस विजयी खर नामक राक्षस ने, जिसको देखकर सहस्रकिरण भी भय से हट जाता था, (राम को) देखा और अपने सैनिकों से कहा—मैं अकेला ही इनसे युद्ध करके, इस मनुष्य के बल को मिटाकर विजय-माला धारण करूँगा।
यह मनुष्य तो अकेला ही है और यहाँ पर आई हुई बलवान् राक्षस-सेना इतनी विशाल है कि इसके लिए वन में स्थान ही नहीं है। जब संसार के लोग इस दशा पर 'अहो !' कहेंगे (अर्थात्, आश्चर्य प्रकट करेंगे) तब मेरी विजय क्या रह जायगी ? अतः, तुम सब लोग यहीं देखते हुए खड़े रहो। मैं अकेले ही (हमारे लिए) भोज्य मांस से विशिष्ट इस मनुष्य के प्राणों को पी जाऊँगा।
तब अकंपन नामक विवेकवान् राक्षस, यह वचन सुनकर उसके निकट आया और कहने लगा—हे स्वामी ! हे वीरों में महावीर ! मेरा एक निवेदन है। युद्ध से अत्यन्त उग्र होना उचित ही है। तो भी इस समय अनेक दुःशकुन हो रहे हैं।
हे वीर ! मेघ, गरजकर रक्त की वर्षा कर रहे हैं। सूर्य के चारों ओर परिवेष-मंडल पड़ा है। कौए लड़ते और रोते हुए आपकी ध्वजा से टकरा रहे हैं और धरती पर गिर रहे हैं। इन बातों पर ध्यान दीजिए।
३४६ | कंब रामायण
खड्गों की धार पर मक्खियाँ भनभना रही हैं। सेना के वीरो की वाम भुजाएँ और वाम नेत्र फड़क रहे हैं। बलिष्ठ भुजाओवाले सेनापतियों के अश्व ऊँघते हुए गिर पड़ते हैं। श्वानों के साथ शृगाल-दल भी मिलकर आये हैं और रो रहे हैं।
हथिनियाँ मद-जल बहा रही हैं। विशाल गंडवाले हाथियों के दाँत टूटकर गिर रहे हैं। धरती काँप रही है। उन्नत आकाश से बिजलियाँ गिर रही हैं। दिशाएँ अकस्मात् जल उठती हैं। सबके शिरो की पुष्प-मालाओ से मास की दुर्गंधि निकल रही है।
ऐसे लक्षणों के उत्पन्न होने के कारण, इसे अकेला मनुष्य कहकर इसकी उपेक्षा न कीजिए। मेरा कथन सत्य है। यदि हमसब एक साथ युद्ध करने लगें, तो भी इसे परास्त नहीं कर सकते। हे विजयमालाधारी ! मेरे वचनों को क्षमा कर दो। यो अकंपन ने कहा।
यह वचन सुनते ही खर हँस पड़ा, जिससे सारा संसार काँप गया। फिर, वह बोला—मेरा दृढ पराक्रम पत्थर का वह सिल है, जिसपर देवता पिस चुके हैं। युद्ध की कामना से फूली हुई मेरी भुजाएँ क्या एक क्षुद्र मनुष्य के आगे नीची होकर रहेगी ?
खर के इस प्रकार कहते ही क्रोधभरी राक्षस सेना ने दशरथ पुत्र को ऐसे घेर लिया, जैसे घुँघराले केसरों से शोभायमान सिंह को क्रुद्ध गज-समूह ने घेर लिया हो। उस समय उनके भयकर शस्त्र एक दूसरे से टकराकर वज्र-सी ध्वनि कर उठे।
यो उस सेना के घेरते ही राम के हाथ में स्थित धनुष के सिर झुक गये। उस समय जो युद्ध हुआ और उसका जो परिणाम हुआ, इसका वर्णन हम करेंगे। राम के वेगवान् बाणों की नोक से दौड़नेवाले अश्व छिद गये और धरती पर लोट गये। लाल बिंदियो से भरे मुखवाले हाथी ऐसे गिरे, जैसे वज्र से आहत पर्वत हों।
(राक्षसो के) त्रिशूल छिन्न हुए। अग्नि-ज्वाला उगलनेवाले फरसे टूट गये। करवाल टुकड़े-टुकड़े हो गये। गदाएँ चूर-चूर हुईं। भिदिपाल मिट गये। बाण विनष्ट हुए। शरीर को चीर देनेवाले भयंकर भाले तहस-नहस हुए। धनुष एव बरछे भी चूर-चूर हो उड़ गये।
वीर-कंकण टूटे। हाथो के साथ तोमर भी टूटे। गजों के पैर टूटे। धुरियो के साथ रथ और उनपर की ध्वजाएँ टूटी। अश्व टूटे, (शरभ आदि) जन्तुओ के दलो के शिर टूटे। मूसल जड़ से टूट गये।
रामचंद्र के बाण, जीनवाले अश्वो तथा काले वर्णवाले मदजल-स्रावी, दीर्घ सूँड़वाले, पर्वत-समान हाथियों को भेदकर पार कर जाते थे और सब दिशाओं में छितरा जाते थे। निरंतर बरसनेवाली वर्षा के जल के समान रक्त, धरती पर फैल गया। राक्षसों के शोभाहीन वक्ष खुल गये। उनके शिर कटकर (धड़ से) पृथक् हो गये।
राघव ने एक, दस, सौ, सहस्र, कोटि—यों गणना के लिए दुसाध्य कठोर शरों के सिलसिले को जारी रखा। उन बाणो ने राक्षसो को मारकर पर्वत-शिखरो एवं अनेक पर्वतो के समुदाय के समान शव-राशियों की पंक्तियाँ लगा दीं।
अरण्यकाण्ड ३४७
तड़पते हुए कबंधो की राशियाँ, बहती हुई रक्त-धारा के साथ, ऐसा दृश्य उपस्थित करती थी, जैसे अरण्य के घने वृक्षों की शाखाएँ दावाग्नि मे जल रही हो, गगन में उड़नेवाले राम-वाण ऐसे लगते थे, जैसे मृत (राक्षसों) के प्राणो का भी पीछा करते हुए जा रहे हो।
युवतियो के दीर्घ नयनो के समान ही राम के वाण, करवालो के साथ ही राक्षसो के करो के गिरने पर, उनके कंठों के कट जाने पर, कवच से आवृत देहो के छिद जाने पर, उनके शिरो को भी भीषण रूप मे छितराते हुए जलकर दिगंतो को भी पारकर जाते थे।
वर्षा के सदृश राम-बाण, पर्वत-समान राक्षसों के विशाल शरीर-रूपी तटो के मध्य तालाब बना रहे थे, नदियाँ बना रहे थे, रण में रक्त-प्रवाह को भर रहे थे और यों उस स्थान में वन के दृश्य को मिटा रहे थे (अर्थात्, वहाँ के वन को रक्तमय जलाशयो मे परिवर्तित कर रहे थे)।
उस समय, विशाल रक्त-समुद्र तरगायमान हो उठे। राक्षसों के शिर उस (समुद्र) में उतराने लगे। उनकी दीर्घ मांस पेशिया उतराने लगी। दीर्घ सूँड़वाले पर्वत-जैसे हाथी उतराने लगे। झपटकर चलनेवाले घोड़े उतराने लगे। ध्वजाओ के साथ रथ भी उतराने लगे।
उस समय, अनेक बलवान् राक्षस, ज्वाला उगलनेवाली दृष्टि से देखकर, गरजकर, किसी विशाल अचल पर्वत को घेरकर, बरसनेवाले मेघ-जैसे, तीक्ष्ण बाण आदि उग्र शस्त्रो को (राम पर) बरसाने लगे।
राम ने अपने बाणो से बरसनेवाले शस्त्रों के टुकड़े-टुकड़े कर दिये, अनेक शस्त्रों को विभिन्न दिशाओं में छितरा दिये और बिखरे रक्त-केशोवाले काले राक्षसो के शिरो को काट-काटकर यों गिरा दिया, जिससे भूमि (उन शिरों के भार से) अपनी पीठ को झुकाने लगी और वन (उन शिरों से) भर गया।
उस समय कबध नाच उठे, हाथी लाल शोणित की धाराओ में गोतं लगाने लगे, भयंकर भूत, बैर-भरे क्रोधवाले एवं क्रूर कार्य करनेवाले राक्षसों की चरबी को भर पेट खाकर आनन्द मनाने लगे, (मृत हो स्वर्ग मे आये हुए वीर) प्राणियों के भार से देवलोक की भी देह झुक गई।
मायावी, दर्प तथा कपट से भरे, वक्र दंतोवाले राक्षसों की उन आँखो की पुतलियो को, जिनको देखकर गरुड भी भयभीत हो जाता था, अब काक निकाल-निकाल-कर खाने लगे। अंधकार के समान वंचको के मध्य विनाश अनायास ही पहुँच जाता है; क्योकि कृपामय धर्म को छोड़कर अन्य कौन-सी वस्तु बलवान् हो सकती है?
तब (अनेक राक्षमो के) घने अंधकार को मिटाकर प्रकाशित होनेवाले सूर्य के जैसे धनुर्धारी (राम) को क्रोधी राक्षसों ने चमकते बरछे-जैसे अपने नेत्रों से देखा और काली तथा विशाल घनघटा-जैसे युगान्त में पत्थरो की वर्षा करे, वैसे ही सर्व प्रकार के शस्त्रो को उन (राम) पर बरसाकर युद्ध किया।
धनुर्धारी (राम) ने झुड बाँधकर आये राक्षसों को; पृथक्-पृथक् आकर सामना करनेवाले (राक्षसों) को; अत्यत क्रोध से झपटनेवाले (राक्षसो) को, पहले पराजित हो
३४८ | कंब रामायण
भागकर दुबारा युद्ध करने के लिए आनेवाले (राक्षसो) को, अपने तीक्ष्ण बाणों से इस प्रकार काटकर गिरा दिया कि यह विदित नही होता था कि किसने भाला फेंका, किसने तीर छोड़ा, किसने प्रयुक्त करने के लिए शस्त्र उठाया, किसने कौशल से कार्य किया या किसने नही किया ।
काकुत्स्थ (राम) ने बाणों से जो शिर काटें, उनमें से कुछ मेघ-मंडल में जा पहुँचे, कुछ समुद्र के किनारे के प्रदेशों में जा गिरे, कुछ चन्द्र को घेरे हुए नक्षत्रों में जा पहुँचे, कुछ उज्ज्वल कुंडल-भूषित मिथुन नामक राशि में जा पहुँचे, कुछ भीषण अरण्यों में जा गिरे, कुछ पर्वतो पर जा गिरे ओर कुछ दिशाओं की सीमाओं पर स्थित दिग्गजों के निकट जा गिरे।
वे (राम के) बाण, जो राँक्षसो के, मेरु का भी उपहास करनेवाले, अतिदृढ वक्षों को भेदकर आर-पार हो जाते थे और क्षतो से बहनेवाली रक्त-रूपी ऊँची तरंगों से पूर्ण नदियों को उमड़ा देते थे, कुछ मेघों पर जा लगते थे, कुछ चन्द्र से युक्त गगन में जा लगते थे और कुछ समुद्रों के बाहर एव भीतर जा लगते थे ।
सुन्दर मौलीधारी एव अग्नि-ज्वालाओं को उगलती आँखोंवाले सब राक्षस, सुदृढ तथा तीक्ष्ण शक्तियों को प्रयुक्त करके, (राम के) शर से आहत होकर अपने राक्षस-शरीर को समुद्र में छोड़ देते थे और अबिनश्वर (देव) शरीर को पाकर देवों के साथ मिल जाते थे और यह कहकर कि राक्षस लोग मिट गये, आनन्द-ध्वनि करने लगते थे ।
वहाँ विशाल तरंगों से भरे अनेक ऐसे रक्त-समुद्र उत्पन्न हो गये, जिनमें (राक्षसों के) यकृत्-रूपी कमल थे, रथ-रूपी पुलिन थे, बलवान् गज-रूपी मगरों के झुंड तैर रहे थे, भारी आँत-रूपी घने तथा हरे कमल-पत्र ऊपर की ओर फैले थे और जिनमें भूत स्नान करते थे ।
प्राणहारी अग्रभागों से युक्त (रामचन्द्र के बाण-रूपी) बौछार के गिरने से कुछ (राक्षस) हाय-हाय कर उठे, कुछ मूच्छित हो गिर पड़े, कुछ मिट गये, कुछ उसास भरने लगे, कुछ लौट गये, कुछ लुढ़क गये, कुछ कीचड़-भरे एव गहरी लहरो से युक्त रक्त-समुद्र म डूब गये, कुछ धरती पर पड़े रहे, कुछ टुकड़े-टुकड़े हो रहे ।
तत्र विष के समान क्रूर चौदहो सेनापति ऐसे उठ आये, जिससे विशाल क्षीर-समुद्र को मथनेवाले (देव तथा असुर) भी भयभीत हो उठे। वे (सेनापति) निहत होकर गिरे हुए राक्षसो का उपहास करने लगे। दृढ़ पहियोंवाले रथों पर आरूढ होकर बरछे ओर करवाल लिये हुए तथा धनुष धारण करके अपार समुद्र-जैसी सेना-वाहिनी को लेकर एक साथ आ पहुँचे ।
पूर्व समय में एक बार पर्वत को धनुष बनाकर आये हुए शिव को त्रिपुरासुरों ने जिस प्रकार घेर लिया था, उसी प्रकार प्रभु (राम) का आदर न करनेवाले वे राक्षस, मन की क्रोधाग्नि को आँखों से निकालते हुए आये और कालमेघ-सदृश धनुर्वीर (रामचंद्र) को घेरकर युद्ध करने लगे।
चन्द्रकला-समान खड्गाटतीवाले राक्षसों में से कुछ ने बाण का प्रयोग किया, कुछ ने वक्र दंडों का प्रयोग किया। कुछ ने अनेक शस्त्रों से प्रहार किया। कुछ ने निन्दा-
अरण्यकाण्ड ३४६
वचन कहे। कुछ ने धमकियाँ दीं। यो सबने पर्वतो के जैसे आकर ( गम कां ) घेर लिया।
( रामचन्द्र के ) धनुप पर चढ़कर निकले हुए बाणो से ( उन राक्षमो के ) रथो में जुते घोड़े सब धराशायी हो गये। सब मत्तगज वलि चढ़ गये। मजीर-भूषित घोड़ो के गिर उनकी धड़ों से अलग हो गये। जिस प्रकार उष्णकिरण ( सूर्य ) को घेरनेवाला परिवेष-मडल शीघ्र ही मिट जाता है, उसी प्रकार वचे-खुचे राक्षसो के पैर उखड़ गये और वे काँपते हुए भाग खडे हुए।
मूर्च्छित हुए क्रूर राक्षमो के शरीरो में जहाँ-जहाँ शरों की बौछार लगने से छेद हो गये थे, वहाँ-वहाँ से रक्त के प्रवाह उमड़कर बह चले और उज्ज्वल धरती को आवृत करने लगे। विस्तृत गगन में स्थित देवताओ ने अपनी आँखो को ( करो से ) ढक लिया। यम के दूत, अतिवेग से आनेवाली हवा के समान आकर ( उन राक्षसो के ) प्राण हरने लगे।
भूतो के अधिक संख्या में आने का कारण वननेवाले उस घोर युद्ध के उन्माद से भरे उन ( राक्षसों ) के कदराओ-जैसे मुँहो में श्वान आ घुसे। उनके शिरो पर शृगाल आ चढ़े। अग्नि के जैसे, वलिष्ठ सिंहों के जैसे और मेघ मे उत्पन्न होनेवाले वज्र के जैसे जो राक्षस घेरकर आये थे, वे ( गम के) अग्नि उगलनेवाले तीक्ष्ण मुखो से युक्त बाणो की सहायता से स्वर्ग मे चढ़ गये।
उन ( राक्षसों ) के शिर विखर गये। अग्निकण विखेरनेवाली आँखे विखर गईं। धरती पर पहाड़ो के समान हाथी विखर गये। ( राम के ) मेघ-सदृश धनुप से विच्छिन्न वाण सब दिशाओ मे विखर गये और चिनगारियाँ विखेरनेवाले पृथ्वी-जैसे राक्षमो के शरीरो से प्राण बिखर गये।
वे चौदह बड़े सेनापति, उनके रथ एव उनके बड़े शस्त्र—इनके अतिरिक्त, बड़े कोप के साथ ( राम के ) सम्मुख आये हुए सब राक्षस उन वीर के बाणो से निहत होकर दुर्गंध-भरे भीषण रक्त- प्रवाह में डूब गये।
उन चौदहो सेनापतियों ने चारो ओर देखा। किंतु, अपने साथ आई सेना मे एक भी ऐसे सैनिक को नही देखा, जिसका सिर उसकी धड़ से अलग न हुआ हो। इससे अत्यन्त क्रुद्ध होकर उन्होंने दाँतो को पीसते हुए अपने रथो को बड़े वेग के साथ चलाते हुए रामचन्द्र को घेर लिया।
तब राम ने एक क्षण में अपने बाणो से उनके चौदहो रथो को विध्वस्त कर दिया। तब वे विध्वस्त रथ, चक्र, घोडे, सारथि, सब प्रलय-काल में प्रभंजन से फेंके गये पर्वतो के जैसे फैल गये।
उनके रथ जब नष्ट हो गये, तब वे चौदहो सेनापति पृथ्वी पर ऐसे कूद पड़े कि धरती धँसने लगी। वे अपने हाथो मे दृढ़ धनुषो को लेकर, अपनी आँखो से सबको भस्म कर देनेवाली अग्नि-ज्वालाएँ उगलते हुए वज्र-जैसे शरों को लगातार बरसाने लगे।
राम ने अपने तीक्ष्ण बाणो से उनके विध्वसकारी शरी को चूर-चूर कर दिया। उनके चौदहों धनुषों को तोड़कर उनकी युद्ध की उग्रता को शान्त कर दिया।
| ३५० | कंब रामायण |
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तब वे सब सेनापति धनुषो के खो जाने से अत्यन्त क्रुद्ध होकर, बड़ी शिलाओ को लेकर, आकाश में उड़ गये और सूर्य की कांति के समान ज्वाला उगलनेवाली शिलाओं को (राम पर) बरसाने लगे।
शास्त्र-रूपी समुद्र को पार करनेवाले ज्ञानवान् प्रभु ने, प्राणहारी धनुष के साथ अपनी भौहों को भी झुकाकर उनपर पत्राकार चौदह भयंकर बाण छोड़े, जिससे वे पर्वत-खंड एवं उन सेनापतियों के शिर पृथ्वी पर आ गिरे।
इस प्रकार वे चौदहो सेनापति मरकर गिर पड़े। तब अन्य एक राक्षस-सेना, अनेक शस्त्रों को उछालती हुई तथा अपनी आँखों से अग्नि उगलती हुई रामचन्द्र के सम्मुख आ गईं और पृथ्वी पर, गगन मे एवं सब दिशाओं में फैल गई। यह देखकर देवता काँप उठे।
तब बड़े नगाड़े गर्जन कर उठे। बड़े हाथी गर्जन कर उठे। दृढ़ धनुषों की डोरियाँ गर्जन कर उठीं। शंखो के साथ अश्व भी गर्जन कर उठे। मेघ-गर्जन के समान राक्षसो की गर्जन-ध्वनि भी होने लगी।
राक्षसो के द्वारा फेंके गये, गगन-मार्ग से आनेवाले शस्त्र, वीर (राम) के बाणों से कटकर कही अपने ऊपर न आ गिरें, यह सोचकर देवता लोग भाग जाते थे। समस्त लोक काँप रहे थे। निष्कंप रहनेवाले दिग्गज भी आँखें बंद कर लेते थे।
उस उत्तम सेना का सेनापति तीन शिरोंवाला (त्रिशिर नामक) राक्षस था। जो अपार बल-सपन्न था स्वर्ण-मुकुटधारी था, अपने धनुष से तीक्ष्ण नोंकवाले बाणों की वर्षा करनेवाला था और त्रिनेत्र के हाथ में रहनेवाले त्रिशूल के जैसा आकारवाला था।
उस राक्षस-वीर के साथ, प्रलयकालिक महासमुद्र के समान सब दिशाओं से उमड़कर आई हुई उस राक्षस-सेना के बीच में धनुष को लिये, अपनी समता स्वयं करनेवाले वीर (रामचन्द्र) ऐसे लगते थे, जैसे घने अंधकार के मध्य दीप हो।
उज्ज्वल करवालधारी, वज्र-सदृश घोषवाले, भारी कवच से आवृत, तथा क्रूर नेत्र-वाले उस राक्षस (त्रिशिरा) की सेना पर राम अपनी शरवाहिनी चलाते हुए खड़े रहे।
तब उन राक्षसों के पैर, भुजाएँ, करवाल, परसे, उनकी कटि और उनके छत्र—सब-के-सब कटकर गिर गये।
जब ध्वजाएँ और कठोर क्रोधवाले अश्वों की पंक्तियाँ विध्वस्त हो गई, तब बड़े-बड़े रथ धरती पर गिर गये और भारी तथा बलिष्ठ मत्तगज वज्रपात से टूटकर गिरनेवाले पर्वत-शिखरों के समान लुढ़क गये।
शिर कट जाने पर कुछ राक्षस यह न समझते हुए कि उनके शिर कट गये हैं, अपने विजयी धनुष से शर छोड़ते ही रहे। जिनके शिर अभी कटे नही थे, वे गगन में छाये मेघों के समान अपने शस्त्र चला रहे थे।
ढाल लिये हुए विशाल हाथो, पर्वत-समान भीम आकारवाले तथा स्वर्णमय कवच धारण करनेवाले महावीरों के शिरोहीन धड़ तड़पते, उछलते हुए ऐसे नाच उठे कि नूपुरो से भूषित अप्सराएँ भी वह नाच देखकर मुग्ध हो गईं।
अरण्यकाण्ड ३५१
चामर एवं श्वेतच्छत्र-रूपी फेनवाले, गज-रूपी ऊँची पीठवाले, डूबते-उतराते मीनो से युक्त भँवरवाले तथा शीतल घाटो मे विविध रत्न-समुदाय को लाकर छितरानेवाली जीन, हौदा आदि नौकाओवाले रक्त के प्रवाह मे जा मिलते थे और उसे नया रूप (अर्थात्, रक्तवर्ण) दे देते थे।
दृढ वक्र दतोवाले कुछ राक्षस (राम के) अति तीक्ष्ण बाणो से मृत होकर देवता बन गये और भ्रमरो को आकृष्ट करनेवाली पुष्पमालाओ से शोभित केशोंवाली अप्सराओ के साथ रहकर अपने ही कबंधी का नाच देखने लगे।
कुछ राक्षस देवो के संघ मे मिल गये और उत्तम कंकणों से भूषित अप्सराओं के साथ रहकर यह देख रहे थे कि उनकी ही मृत देह की छिन्न भुजाओ को किस प्रकार एक ओर से भूत पकडकर खाने लगते हैं और दूसरी ओर श्वान उन्ही टुकड़ों को पकड़कर खींच रहे हैं। यह देख-देखकर वे हँस पड़ते थे।
कुछ राक्षस, जिनके वक्ष, चुनकर प्रयुक्त किये गये रामचंद्र के बाणो के लगने से छिद गये थे और जो (राक्षस) कर्म-बन्धन से मुक्त होकर देवता बन गये थे, यह सोचकर मन में भय करने लगे कि अहो ! राक्षसो की सेना विशाल है और राम तो एकाकी हैं, अब क्या होगा ?
शुण्डधारी गज-सदृश वीर (राम) के वे बाण, जो कंटको (राक्षमो) के शरीरों को छिन्न-भिन्न कर रहे थे, नीच तथा काले मनवाले, झूठी गवाही देनेवाले व्यक्ति के वचनों के जैसे थे।
जिस प्रकार मनोहर पंखवाला भ्रमर अपनी शरण में पडे हुए कीड़ों को अपने रूप मे परिवर्तित कर देता है, उसी प्रकार उदार प्रभु ने मायावी राक्षसो को घेरकर अपने उत्तम शरों के पवित्र प्रभाव से देवो में परिवर्तित कर दिया।
वहाँ की रक्त की नदियाँ, मानो यह विचार कर कि एक बलवान् मनुष्य ने अनेक राक्षसो को मार दिया है, यह समाचार विजय-माला से भूषित रावण को देना चाहिए— क्रोधी राक्षसो के शवों को बहाती हुई (समुद्र मे गिरकर) लका में जा पहुँची।
चारो ओर छुटी हुई राक्षस-सेना को (राम के) बाणो ने सर्वत्र छिन्न-भिन्न करके उनके प्राणों को पी लिया, जिससे वह (सेना) धरती पर लोट गई, यह देखकर त्रिशिर ने क्रुद्ध होकर भी विलव किये विना, रक्त-प्रवाह में निमग्न अपने रथ को गगन-मार्ग से चलाता हुआ गर्जन किया।
स्थिर रथवाले उस राक्षस ने, सबके लिए दृढ सत्य का साक्षी बनकर रहनेवाले, उस धर्म-स्वरूप चक्रवर्त्ती के कुमार (राम) के शरीर को, गगन की वर्षा की तरह अपने तीक्ष्ण बाणो की वर्षा से ढक दिया।
राम ने, (राक्षस के द्वारा) बरसाये गये उन सब बाणो को अपने बाणों से छिन्न-भिन्न कर दिया। फिर, चौदह बाणो से (उस राक्षस के) उज्ज्वल स्वर्णमय रथ को ध्वस्त कर दिया और उसके सारथी को भी निहत कर दिया।
इतना ही नही, उसी क्षण, देवो के कोलाहल-ध्वनि करते समय, (राम ने)
३५२ | कम्ब रामायण
स्वर्ण के जैसे चमकते हुए तीक्ष्ण फलवाले अनुपम बाणों से क्रूर कार्य करनेवाले उस राक्षस के मुकुटधारी (तीन) शिरों में से, एक को छोड़कर, दो को काट गिराया।
तब वह राक्षस रथ-हीन हो गया और उसका त्रिशिर नाम भी निरर्थक हो गया। तो भी उसकी क्रूरता नही मिटी। जैसे गगन से काला मेघ उतरा हो, त्योंही उसने अपने वक्र धनुष से बाण-पुंज (राम पर) उतारे।
त्रिशिर, ललाट पर भौंहों को चढ़ाकर, प्रलय-काल की वर्षा की तरह शरों की घनी वर्षा करनेवाले धनुष को लेकर युद्ध करने लगा। तब जिस प्रकार प्रभंजन मेघ को बिखेर देता है, उसी प्रकार राम ने अपने अवार्य बाणों से उस (राक्षस) का धनुष काट दिया।
यद्यपि उस (राक्षस) ने अपना धनुष खो दिया, तथापि घूरनेवाले उसके चमकते मुख का प्रकाश कम नहीं हुआ। उसकी मेघ-गर्जन की-सी ध्वनि भी मंद नहीं पड़ी। उसका भुजबल मंद नहीं पड़ा। उसके द्वारा राम पर बरसाये जानेवाले पत्थर भी कम नहीं हुए और चाक के जैसे उसका परिभ्रमण भी मंद नहीं पड़ा।
गगन में स्वयं एकाकी रहकर भी उसने ऐसा माया-युद्ध किया, जैसे दो सौ व्यक्ति मिलकर युद्ध कर रहे हों। तब उसके दोनों पैरों को राम ने दो तीक्ष्ण बाणों से काट दिया और दो बाणों से उसकी भुजाओं को भी काट दिया।
भुजाओं और पैरों से हीन होकर वह (राक्षस) तीक्ष्ण दाँतों को बाहर किये, पर्वत-कंदरा समान एवं मांस-दुर्गंध से युक्त अपने मुख को खोले हुए, रामचन्द्र पर गिरकर उन्हें निगलने को आया। उसे देखकर राम ने किंचित् भी दया किये बिना, अपने दीर्घ विजयशील धनुष से एक बाण प्रयुक्त कर उसके एक शिर को भी काट दिया।
त्रिशिर पर्वत-शिखर की भाँति ज्यों ही भूमि पर गिरा, त्योंही, सूर्य के जैसे चमकते हुए करवाल धारण किये, अपने विशाल हाथों में ढालों को लिये हुए, बाकी बचे हुए राक्षस, दूषण नामक सेनापति के मना करने पर भी वहाँ रुके नहीं, किंतु भाग खड़े हुए। उनके दीर्घ पैर, विशाल रक्त प्रवाही में आँतों के मध्य उलझ जाते थे।
यह दृश्य देखकर, आकाश में झुंड बाँधकर स्थित देवता ताली बजाकर कोलाहल कर उठे। कुछ राक्षस, आदिशेष के फन पर स्थित धरती को दबाते हुए भाग चले और वहाँ फैली हुई चर्बी में फिसलकर उसमें डूब गये। कुछ राक्षस अपने सुरक्षित प्राणों के साथ भागे और शव के ढेरों से टकराकर लुढ़क गये।
कुछ राक्षस भागते हुए, धरती पर पड़े बरछे और करवाल की धारों से उनके पैर कट जाने से ढीले हो पड़े। कुछ, मृत राक्षसों के रक्त-प्रवाह में पैर फिसल जाने से डूब गये। कुछ, भय के मारे रक्त-सागरों में कूदकर तैरने लगे, किंतु वे कहीं स्थिर खड़े नहीं रह सके।
कुछ ऐसे भाग रहे थे कि उनके कटि के वस्त्र और खड्ग विगलकर गिर जाते थे और उनके पैरों में उलझकर उन्हें काटने लगते थे, तो भी वे उनपर ध्यान न देते थे। वे भय की मूर्त्ति-से बने, मुख श्वासाकुल होकर जहाँ-तहाँ शरों के छत्र पर लगे हुए उत्तम वीर (राम) के बाणों की प्रेरणा से, बाणों वाले से वेगवाला दौड़कर भाग निकलते थे।
अरण्यकाण्ड ३५३
अतिवेग से भागनेवाले कुछ राक्षस, बड़े हाथियो के पेट में पड़े छतो के द्वार-रूपी कदराओं में अपने खड्ग-सहित घुस जाते थे और पास खड़े कवध को देखकर यह कहकर सिर पर अपने हाथ जोड़ लेने थे कि—हे मेरे साथी, तुम यही कहना कि तुमने हमको नही देखा है।
इस प्रकार भागनेवाले राक्षसो को देखकर, अति वेगवान् अश्वो से जुते रथ पर आरूढ दूषण ने कहा—हमारे पराक्रम के योग्य युद्ध-कौशल से हीन इस मनुष्य को देखकर मत डरो। मै जानता हूँ कि डर का कोई कारण नही है। मै कुछ कहना चाहता हूँ, उसे सुनो।
जो लोग अपयश देनेवाले भय को मन मे रखकर जीते हैं, उनसे सुन्दर कंगन पहननेवाली स्त्रियाँ भी नही डरती हैं। धैर्य-रूपी कवच ही वास्तव में रक्षा कर सकता है। भय प्राणी की रक्षा कभी नही कर सकता।
पूर्वकाल मे, तीक्ष्ण भाले को धारण करनेवाले इन्द्र तथा अविनाशी त्रिदेवो के साथ हुए युद्ध मे कौन राक्षस डरकर भागा था ? कदाचित् तुम लोगो ने, तुमसे डरकर भागनेवाले देवो से अब यह (डरकर भागना) सीख लिया है, इसीलिए अब यो भ्रात हो रहे हो।
तुम इतने बड़े वीर हो। फिर भी एक मनुष्य से हारकर, अपने हाथ मे शस्त्र रखे, नगर मे जाकर छिपने के लिए भाग रहे हो। तुम अपनी मदमाते नयनोवाली पत्नियो के वक्ष से वक्ष मिलाकर आलिंगन का सुख भोगने जा रहे हो ?
हे वीरो। (क्रोध से) ताम्रवर्ण रहनेवाली तुम्हारी आँखें अब दूध के समान श्वेत पड़ गई हैं। अहो! क्या तुम लोग अपनी स्त्रियो को, घने वन मे भागते समय वृक्ष की शाखाओ के टकराने से अपनी पीठ पर लगे छतों को दिखाओगे, या अपने वक्ष पर लगे शरो के छत को दिखानेवाले हो।
'इस हमारे शत्रु, मनुष्य का युद्ध-पराक्रम उन देवो के लिए भी दुष्प्राप्य हैं'—(शत्रु की) ऐसी प्रशंसा का कारण बनकर, इस प्रकार पीठ दिखाकर तुम्हारा भागना—अजेय भुजबल से युक्त, तुम्हारे कुल के नायक (रावण) की बहन (शूर्पणखा) की नाक कटने की बात छोड़ भी दो, तो भी यह हमारे अपयश का कारण बन रहा है। अब इससे बढ़कर दयनीय दशा और क्या हो सकती है ?
अद्भुत शस्त्र-प्रयोग मे निपुण, धीरता-पूर्ण युद्ध-कार्य से जीविका-निर्वाह करने-वाले, शत्रुओ से छीनकर लिये गये करवालों को धारण करनेवाले, हे राक्षसो। अब क्या तुम लोग मोती आदि को बेचकर वणिक्-वृत्ति करनेवाले हो ? या तीक्ष्ण बरछे, करवाल आदि से पृथ्वी को जीतकर कृषक-वृत्ति करनेवाले हो ? बताओ तो सही।
यो कहकर उसने आगे कहा—तुम लोग कुछ समय तक खड़े रहकर मेरे दीर्घ धनुष का प्रभाव देखो। फिर, वह (दूषण) स्वय अपनी तरंगायमान समुद्र-सदृश सेना को लेकर (राम के) सम्मुख जाकर आक्रमण करने लगा। वह दृश्य देखकर देवता लोग भी मूर्च्छित हो गये। तब राम ने भी उससे यह कहकर कि—'अपने को भली भाँति बचाओ'—आगे पग बढ़ा दिया।
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तब (राम के बाणों से सैनिकों के) हाथ खड्गों-सहित कटकर गिर गये। हाथियों के ऊँचे बढे हुए दंत कटकर गिर गये। पवन-गति से जानेवाले रथ, ध्वजाओं-सहित, कटकर गिर गये। घोड़ों के शिर ऐसे कटकर गिरे, जैसे लाल धान की बालियाँ कटकर गिर रही हों।
(राम के द्वारा) प्रयुक्त शरों में से कुछ (राक्षसों के) मर्म-स्थानों को खोजते हुए चले। कुछ उनके कवच और वस्त्रों को उड़ाकर चले और कुछ शर उनके ढालों और शरीर को भी ऐसे भेद कर चले कि उनके शरीर से रक्त की नदियाँ, पर्वत-निर्झरों के जैसे बह चलीं।
चुनकर प्रयोग किये गये कुछ कंकपत्र (बाण), शरीरों में प्रविष्ट होकर राक्षसों के मर्म-स्थानों में घुस गये। अर्धचन्द्राकार बाण, उनके मर्म-स्थानों में न घुसकर उनके शिरों को काटकर उड़ गये। कुछ अति तीक्ष्ण शर उनके कवचावृत वक्षों को भेदकर गये, और 'भल्ल' (नामक कुछ शर) मायावी राक्षसों के हृदय को भी छेदकर चले गये।
युद्ध की लीला रचनेवाले (श्रीराम) ने, दूषण के द्वारा प्रयुक्त सब बाणों को काटकर, उसके निकट स्थित राक्षसों के द्वारा प्रयुक्त अन्य शस्त्रों को भी ध्वस्त कर, अपरिमेय बल से युक्त उस राक्षस-सेना रूपी शब्दायमान समुद्र को कुछ क्षणों में ही सुखा दिया।
तब देवता लोग आनन्द-ध्वनि कर उठे। रक्त की बड़ी-बड़ी नदियाँ बड़े पर्वतों एवं वृक्षों को बहा ले चलीं। रामचन्द्र के द्वारा प्रयुक्त उग्र बाण दिग्दिगंतों में भी जाकर, उन दिशाओं को आवृत कर रहनेवाले क्रूर राक्षसों को आहत कर धरती पर लिटा दिया।
युद्ध करने की इच्छा से जो राक्षस रण-क्षेत्र में खड़े रहे, वे सब मर मिटे। यम, उन (राक्षसों) के शरीरों से निकलनेवाले प्राणों को ढोते-ढोते बहुत थक गया। अब उन भूतों के बारे में क्या कहा जाय, जो उन (राक्षसों) की चरबी को पेट-भर खाकर ऊँचे पर्वतों के जैसे लगते थे?
उस समय, दूषण अत्यन्त क्रुद्ध होकर, हाथियों, रथों, अश्वों, क्रोधी राक्षसों के मुकुट-भूषित शिरों, कवचों, उज्ज्वल शस्त्रों से सुसज्जित शरीरों, उनकी श्वेतरंग की चरबी—इन सबके ढेरों के ऊपर से होकर कोलाहल-पूर्ण रथ को शीघ्र चलाता हुआ आया।
धर्महीन (राक्षसों) के शरीरों के ढेर की कोई संख्या नहीं थी। अतः, वह दूषण, यद्यपि चरखी के जैसा वेगवान् था, तथापि उसका रथ उन शव-राशियों पर चढ़ता-उतरता हुआ बड़ी कठिनाई से आगे बढ़ा। उस कठिनाई के बारे में हम क्या कहें?
सुसज्जित केसरोंवाले पचीस अश्व जुते तथा लुढ़कते चक्रोंवाले एक विलक्षण रथ पर वह (दूषण) आरूढ था। भूमि के अंधकार को मिटानेवाले चन्द्र के सदृश स्थित रामचन्द्र के उज्ज्वल शर-रूपी यम के सम्मुख मानो स्वयं उसके प्राण आ पड़े हों, ऐसी शीघ्रता से वह आया।
उस रथ को तथा उसपर धनुष को हाथ में लिये हुए पर्वत के जैसे खड़े दूषण को, देखकर अकलंका रामचन्द्र ने अपनी कृपा के कारण किंचित् उसकी प्रशंसा करते हुए कहा—'तुम्हारा साहस भी धन्य है।' उस समय उस क्रूर राक्षस ने तीन बाण प्रयुक्त किये।
अरण्यकाण्ड ३५५
अतिदीर्घ तथा वर्तुलाकार आठ दिशायें तथा पृथक्-पृथक् उनका भार वहन करनेवाले अष्ट दिग्गजों को ढोने रहनेवाले दो में से एक (पादुका)$^१$ को, जिन (राम) ने (अयोध्या को) लौटा दिया था, उनके ललाट पर गज के मुख पर बँधे मुखपट्ट के समान पट्ट पर वे तीनो शर जा लगे, जिस दृश्य को देखकर सभी देवता भयभीत हो गये।
राम ने सोचा कि (दूषण के द्वारा) शर-प्रयोग की गति एवं उनका बल भी प्रशंसनीय है। फिर, मनोहर कान्तिमय मंदहास से युक्त होकर तीक्ष्ण बाण चुन-चुनकर त्वरित गति से प्रयुक्त किये और उस (दूषण) के शीघ्रगामी अश्वों से युक्त रथ को विध्वस्त कर दिया। उसके धनुष को छिन्न कर दिया और उज्ज्वल कवच को भी नष्ट कर दिया।
तब देवता हर्ष-ध्वनि कर उठे। सभी दिशाओं में ऋषियों की आशीर्वाद-ध्वनि समुद्र-गर्जन के समान शब्दायमान हो उठी। फिर, राम ने यह कहकर कि—'यदि तुम वीर हो तो इनसे अपने को बचा लो', एक बाण प्रयुक्त किया। उससे उस (दूषण) का खड्ग-दन्तयुक्त बड़ा शिर कटकर गिर गया।
मुख पर दंतों से शोभायमान दिग्गजों की समता करनेवाला, अति-तीक्ष्ण तथा विविध प्रकार के शस्त्रों को धारण करनेवाला खर, यह जानकर कि दशरथ-पुत्र के बाणों ने राक्षस-सेना का विनाश कर दिया, अत्यन्त क्रुद्ध हुआ।
वह खर, राक्षसों के साथ हाथियों, अश्वों और रथों को सब दिशाओं में फैलाता हुआ यों चल पड़ा कि उसे देखकर यम भी भयभीत हो गया। उसकी सेना ने चन्द्र को आवृत करनेवाले मेघों के समान आकर दृढ़ धनुष को हाथ में धारण किये हुए मत्तगज (सदृश राम) को घेर लिया।
अदम्य क्रूर कृत्यवाले राक्षस, मदजल बहानेवाले बड़े-बड़े हाथियों को, रथों को और अश्वों को अत्यधिक संख्या में धरती पर ले आये, जिससे धरती को वहन करनेवाले आदिशेष का फण भी फटने लगा। फिर, वे भयंकर युद्ध करने लगे। महिमान्य राम ने भी अति तीक्ष्ण बाणों को प्रयुक्त किया।
(रामचन्द्र के शरों से) मत्तगज तड़पकर गिरे। रथों में जुते अश्व तड़पकर गिरे। अंगद-भूषित भुजाएँ तड़पकर गिरीं। आँतें तड़पकर गिरीं। मांस से लगे चर्म के टुकड़े तड़पकर गिरे। पैर तड़पकर गिरे। और (उन राक्षसों की) वाम भुजाएँ भी तड़क उठीं (अर्थात्, फड़ककर विपदा की सूचना देने लगीं)।
करवालों के समूह, भालों के समूह, धनुषों के समूह, बलिष्ठ भुजाओं के समूह—इन सबसे संकुल होकर राक्षस-वीरों का समूह सम्मुख आया। जिसे (रामचन्द्र के) शर-समूह-रूपी विध्वंसक सेना ने छिन्न-भिन्न कर दिया।
धर्म-स्वरूपी (राम) से चुनकर प्रयुक्त किये जानेवाले बाण नक्षत्रों को भी भेदकर जा सकते थे। मेरु पर्वत को भी भेदकर निकल जा सकते थे। ऊँचाई पर स्थित ऊपर
१. धरती का भार वहन करनेवाली दो वस्तुएँ हैं—अष्टदिग्गज और महाकूर्म्म। रामचन्द्र की पादुका, जिसे उन्होंने भरत को दिया था, आदिशेष का ही अवतार मानी गई है। —अनु०
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के लोको को भी पार कर जा सकते थे। धरती को भी भेदकर जा सकते थे। तो अब क्या यह भी कहने की आवश्यकता है कि वे ( वाण ) करवालो को उठाये, उपस्थित राक्षसो के शरीर को भी भेदकर जा सकते थे ?
उस समय, उनको घेरकर आनेवाले सब राक्षसो का एक साथ विनाश करने के लिए राम ने जो बाण चुन-चुनकर चलाये, उन्होंने उन राक्षसो को उसी प्रकार अति शीघ्र मिटा दिये, जिस प्रकार किसी बलवान् व्यक्ति के द्वारा किसी बलहीन को अत्याचार से मारकर चुराया गया धन ( उस अत्याचारी बलवान् को ) शीघ्र ही मिटा देता है।
सब राक्षस-वीरो के मिट जाने पर वीर-कंकणधारी, अतिक्रुद्ध क्रूर खर, उत्तरोत्तर बढ़ आनेवाली मज्जा और रक्त की धारा मे ऐसे ही अकेले खड़ा रहा, जैसे विशाल समुद्र के मध्य मंदराचल खड़ा हो।
मन मे क्रोधाग्नि से जलता हुआ वह ( खर ), अपनी लाल आँखो से चिनगारियाँ उगलता हुआ और अपने दृढ धनुष से बाणो को उगलता हुआ, बढ़ती हुई रक्त-धारा के मध्य से समुद्र-मध्य जानेवाली नौका के सदृश रथ पर आया। काक और गिद्ध भी उसको घेर-कर आये।
युगात मे सारे संसार को जलानेवाली अग्नि के समान वैर एव क्रूरता से युक्त, एकाकी रहनेवाले उस राक्षस के अपने निकट आने के पूर्व ही, नीलकंठ ( शिव ) के धनुष को तोड़नेवाले प्रभु, उत्तम बाणों को लिये हुए उसके सम्मुख बढ आये।
अग्नि के जैसे तीक्ष्ण रूपवाले, पवन के जैसे वेगवाले तथा अन्य सब लक्षणों से युक्त तीक्ष्णाग्र बाणो को उस राक्षस-पति ने छोड़ा। किंतु राम ने उन सबको वैसे ही सहस्रों उत्तम बाणो से छिन्न-भिन्न कर दिया।
सप्त लोको के प्रभु राम ने प्रलयाग्नि से भी अधिक तीक्ष्ण, नौ बाणो को प्रयुक्त किया। किंतु, चक्र के रूप मे झुके हुए धनुषवाले खर ने अग्नि उगलनेवाले बाणों को चलाकर राम के बाणों को रोक दिया।
फिर, खर ने माया-युद्ध करते हुए, शरों की वर्षा उत्पन्न की और रामचन्द्र के शरीर को उन बाणों से ढक दिया। इससे देवता भयभीत होकर भागे, तब महावीर राम अत्यन्त क्रुद्ध हुए और उनके उज्ज्वल दाँत और उन (दाँतो) को ढकनेवाले ओठ दोनों व्यस्त हो गये (अर्थात्, उनके दाँत ओठो को चबाते हुए उन ओठो को ढकने लगे।)
राम ने यह सोचकर कि अब एक तीक्ष्ण बाण से इस राक्षस को मिटा दूँगा, एक शर को धनुष पर चढ़ाकर उसे आकर्ण खींचा, तब उनके हाथ का धनुष, विशाल आकाश में उत्पन्न मेघ-गर्जन के सदृश घोष के साथ टूट गया।
( राम की ) जय-जयकार करनेवाले देवताओ ने देखा कि राम का धनुष टूट गया है और उनके पास अन्य कोई दृढ़ धनुष नही है और यह सोचकर कि हमारी शक्ति अब नष्ट हो गई है, भय से काँप उठे और व्याकुल हो उठे।
इसी क्षण राजाधिराज के पुत्र ( राम ) ने अपने अकेलेपन की एवं अपने धनुष
अरण्यकाण्ड ३५७
के टूट जाने की किंचित् भी चिन्ता किये बिना ही प्राचीन संकेत १ के अनुसार अपनी विशाल बाँह को पीछे की ओर पसारा।
वरुणदेव ने यह दृश्य देखा और उनके मन की बात जानकर परशुराम से पूर्व में प्राप्त विष्णु-धनुष को उस देवाधिदेव (राम) के हाथ में लाकर रख दिया।
वरुण के द्वारा लाये हुए उस धनुष को नीलमेघवर्ण प्रभु ने अपने हाथ में लिया और अपने बाये हाथ से उसे पकड़कर दायें हाथ से खींचकर झुकाया, तो धर्महीन राक्षसों के वाम नेत्र और वाम भुजाएँ फड़क उठीं।
यों एक पलक-भर में राम ने उस धनुष को लिया, और उसे ऐसा झुकाया कि यम भी भयभीत हो गया। उनके बाद डोरी चढ़ाई और सौ बाण प्रयुक्त किये; जिनसे खर का दृढ़ चक्रवाला रथ चूर-चूर हो गया।
खर दृढ़ चक्रवाला अपना रथ खो बैठा। तब वह बड़ा कोलाहल करता हुआ आकाश में उछल गया और सुन्दर तथा अनुपम धनुर्धारी राम की भुजा-रूपी मंदराचल पर बाणों की घोर वर्षा करने लगा।
राम ने उन बाणों को रोक लिया और अपने तूणीर से तीक्ष्ण बाणों को निकाल-निकालकर चढ़ानेवाले खर के दक्षिण हाथ को एक बाण से काटकर धरती पर गिरा दिया।
खर ने, अपने दाहिने हाथ के कट जाने पर, अपने बायें हाथ से एक भयंकर वज्र के समान मूसल को उठाकर उसे राम पर फेंका। तब लक्ष्मण के अग्रज ने उसे एक ही बाण से दूर फेंक दिया।
जैसे कोई सर्प अपने विष-दंत के टूट जाने के पश्चात् फुफकार रहा हो. ऐसे ही वह खर एक बड़े वृक्ष को हाथ में लेकर झपटा। तब राम ने एक अनुपम बाण का उसपर प्रयोग किया।
यद्यपि उस खर ने अनेक वर प्राप्त किये थे, बड़ा मायावी था और बड़ा बलवान् था. तथापि राक्षसराज (रावण) के मत लोक के प्राणियों का विनाश करने के पाप के कारण, उसके दक्षिण हाथ के जैसे ही उसका कंठ भी कट गया।
उस समय, देवता हर्ष-ध्वनि कर उठे, नाचने और गाने लगे और पवित्र पुष्प बरसाने लगे। पवित्रमूर्ति (राम) भी सब दिशाओं में फैले कुहरे को मिटाकर निखरनेवाले सूर्य के समान ही चमकने लगे।
अनेक मुनि आये और राम का अभिनन्दन करने लगे; फिर पवित्र हृदयवाले (राम) उन सीताजी के समीप जा पहुँचे, जो अपने प्राणों (रामचंद्र) के राक्षस-सेना के साथ युद्ध करने के लिए चले जाने पर प्राणहीन शरीर बनकर पर्णशाला में रहती थीं।
लक्ष्मण और सीता ने रामचन्द्र के चरणों को अपने अश्रुजल से इस प्रकार धोया कि उन चरणों पर लगा हुआ, युद्ध में मृत राक्षसों का रक्त और धूल धुल गये।
१. प्राचीन संकेत यह है—पहले धनुर्भङ्ग के समय परशुराम ने राम से पराजित होकर अपने पास का विष्णु-धनुष उन्हें दिया था। राम ने वह धनुष वरुण को सौंपा था और कहा था कि जब उन्हें उसकी आवश्यकता पड़ेगी, तब वह धनुष उन्हें मिल जाना चाहिए।—अनु०
३५८ | कंब रामायण्
एक मुहूर्त्त में मरे हुए राक्षसों का रक्त-प्रवाह सब दिशाओं में भर गया। इधर श्रीरामचन्द्र विश्राम करने लगे और देवता समुद्र में, पक्तियों में उठनेवाली लहरों के समान, घोष करते हुए उनकी स्तुति करने लगे।
इधर जो वृत्तांत कहना शेष रह गया है, अब उसे कहेंगे। रावण की बहन, अपनी छाती पीटती हुई, अंधकार समान खर का आलिंगन करके, दूर तक फैले हुए उसके उष्ण रक्त-प्रवाह में लोटने लगी।
मैंने अपने मन में (राम को पाने की) जो इच्छा की थी, हाय! उस इच्छा को अपनी नासिका के साथ ही मैंने नहीं खोया। मैंने अपने वचनों के कारण तुम लोगों (खर-दूषण) के जीवन को भी मिटा दिया। मैं अत्यन्त क्रूर हूँ—यों रोती कलपती हुई वहाँ से चली गई।
विजयमालाधारी (लंका में रहनेवाले) राक्षस-समूह का भी नाश करने के विचार से, संसार के प्राणियों को भयभीत करनेवाली आँधी के समान, वह शीघ्र लंका में जा पहुँची। (१-१६२)
अध्याय ७
मारीच-वध पटल
शूर्पणखा, कोलाहल से पूर्ण समुद्र की जैसी राक्षस-सेना के विनष्ट होने की बात को भूल-सी गई। रामचन्द्र के पर्वत-सदृश कंधों के प्रति आकर्षण उसके मन को व्यथित करने लगा। उससे अत्यंत व्याकुल हो वह यह सोचकर चल पड़ी कि, तरंगों से भरे समुद्र-रूपी परिखा से आवृत विशाल लंका में शीघ्र जा पहुँचूँगी और (रावण से) सीता के सौंदर्य के बारे में कहूँगी। अब उस लंका में स्थित रावण का वर्णन करेंगे।
वह (रावण) एक ऐसे अति मनोहर अनुपम रत्न-मंडप में आसीन था, जो (मंडप) इस नश्वर संसार में स्थावर-जंगम पदार्थों की सृष्टि करनेवाले' कमल-भव, चतुर्मुख (ब्रह्मा) के लिए भी विरचित करने को असंभव था और जो सूक्ष्म ज्ञान से उत्पन्न अनुपम दक्षता से युक्त तथा निष्कलंक धर्म के जैसे ही, संकल्प-मात्र से सब वस्तुओं का सर्जन करनेवाले (विश्वकर्मा नामक) देव-शिल्पी के द्वारा निर्मित होकर, उसके समस्त शिल्पशास्त्र-ज्ञान को प्रकट करता था।
भ्रमरों से गुंजित शिरवाले दिग्गजों के दाँतों को भी अपने कठोर आघात से तोड़ देनेवाले (उस रावण के) मनोहर कंधे, आकाश तक उन्नत होकर ऊँचे उदयाचल के समान शोभित हो रहे थे। उन कंधों पर (रावण के बीस) कुण्डल इस प्रकार प्रकाशमान थे, जैसे उज्ज्वल किरण-पुंज से युक्त द्वादश सूर्य-मंडल, मेरु पर्वत की परिक्रमा करते हुए, बीस मंडलवाले होकर चमक रहे हों।
आरण्यकाण्ड ३५६
देवताओ मे व्याघ्र-चर्म धारण करनेवाले (शिव), स्वर्णमय वस्त्र धारण करनेवाले (विष्णु) और कमल से उत्पन्न (ब्रह्मा) भी उस रावण को कुछ पीड़ा नही दे सकते थे, तो अब इस ससार मे दूसरो के सबध मे क्या कहा जाय। (अर्थात्, दूसरे कौन उससे युद्ध करने की शक्ति रखते हैं) ? सूक्ष्म कटि, पीन स्तनो, कोमल बॉम-समान कंधो, रेखाओ से युक्त नेत्रो तथा सबको आकृष्ट करने को शक्ति से युक्त सुदरियो के साथ दुस्सह प्रणय-कलह मे भी न झुकनेवाले उसके किरीटो की पंक्ति अत्यन्त उज्ज्वल थी।
(उसके आभरणो के) उज्ज्वल तथा बड़े-बडे रत्न प्रकाश-पुज बिखेर रहे थे। (उसके) वज्रमय पर्वताकार कधे, धरती का भार वहन करनेवाले विषमय सर्पराज के फनो के समान शोभित थे। (उसके वक्ष पर) के उज्ज्वल रत्नहार भयकर समुद्र से घिरी लका के मध्य स्थित उस कारागार का दृश्य उपस्थित करते थे, जिसमे (रावण) के द्वारा बंदी बनाकर लाये गये नवग्रह तथा उनके पार्श्वों मे नक्षत्र रखे गये हो।
अरुण कातिवाले, उत्तम रत्नो से खचित उसका वीर-वलय, उसके चरण में शब्दायमान हो रहा था और अवर्णनीय महावल से युक्त राक्षस-नायको के गौरवमय रत्न-किरीटो की रगड़ खा-खाकर नव काति बिखेर रहा था।
सुरो तथा असुरो ने सब दिशाओ से ला-लाकर जो सुरभित पुष्प (रावण के चरणो पर) वरसाये, वे पुष्प त्रिभुवन के राजाओ के द्वारा निरन्तर ला-लाकर समर्पित धन-राशियों के समान भरे पड़े थे।
बिजली के जैसे चमकते हुए किरीटोवाले विद्याधर-नरेश, यह न जानने से कि वह (रावण) किम समय, किस ओर अपनी दृष्टि डालेगा, सदा अपने शिर पर हाथो को जोड़े हुए सभा-मंडप में उसके समीप पंक्ति बाँधे खड़े रहते थे।
सिंह-सदृश वलशाली सिद्ध लोग, उस (रावण) के समीप शिर झुकाये, हाथ जोड़े और संकोच-से भरे मन के साथ विनम्र होकर खडे रहते थे। यदि वह रावण किसी दासी को भी कोई आज्ञा देता, तो भी (ये सिद्ध लोग) यह समझकर कि वह उनको ही आज्ञा दे रहा है, झट उसे करने के लिए दौड़ पड़ते थे।
यदि वह रावण उस सभा-मडप मे मन्त्रियो को देखकर कोई वचन कहता, तो भी किन्नर (यह सोचकर कि वह उन किन्नरो को कुछ दड देने की ही बात कर रहा है), व्याकुल तथा भयभीत होकर शिर झुकाकर खडे रहते थे।
नागलोग, रावण को देखकर, विशाल (दक्षिण) दिशा के प्रभु तथा भयकर दड-धारी यम को देखनेवाले नरक-वासियो के समान ही, गद्गदकंठ एवं भय-व्याकुल मन होकर घेरे खडे रहते थे।
तुबुरु नामक ऋषि अपनी संगीतमय वीणा के साथ रावण की उन भुजाओ का यशोगान कर रहे थे, जिन भुजाओ ने दिग्गजो के वल को कुंठित कर दिया था, कैलाश गिरि को उखाड़कर महादेव के लिए अपवाद उत्पन्न किया था और इन्द्र के साथ युद्ध करके सभी स्वर्ग-वासियो को भयभीत किया था।
नारद मुनि, स्वर्ग में प्रचलित संगीत-पद्धति मे किंचित् भी स्खलित हुए बिना,
| ३६० | ऋव रामायण |
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अपने करो से वीणा का नाद करते हुए, सरस्वती के समान ही, दोषहीन राग से मधुर वेद का गान करते थे और उसके कानो को तृप्त करते थे ।
मकर-मीन से पूर्ण समुद्र का अधिपति वरुण, देव-तरुओं तथा विद्याधर-लोक के वृक्षों के पुष्पों से झरे हुए मधु को, स्वच्छ जल के साथ मिलाकर, मेव नामक पिचकारी में भरकर, डरते-डरते उस रावण पर बूँदों से बरसा रहे थे कि कही (पिचकारी का जल) मयूर और हरिणी-सदृश रमणियो के वस्त्रों पर न पड़ जाये ।
वासुदेव, सुगन्धित पुष्पो से झरनेवाले पराग और मधु को, एव (उस सभा मे स्थित) राजाओ के ऊँचे-ऊँचे किरीटो के (एक दूसरे से) रगड़ने से झरनेवाले रत्नों और मुक्ताओं के टुकड़ो को, धरती पर उनके गिरने के पूर्व ही, इधर से उधर और उधर से इधर दौड़-दौड़कर इस प्रकार बटोर लेता था, मानो वह उस स्थान पर झाडू-सा लगा रहा हो ।
बृहस्पति और शुक्राचार्य—दोनों अपने हाथो में बिजली के जैसे चमकनेवाले दण्ड लिये हुए; सारे शरीर को ढकनेवाले दीर्घ कञ्चुक धारण किये हुए, अथक रूप से घूम-घूमकर (रावण के सभा-मडप में) इन्द्र आदि देवताओ को यथोचित आसन दिखाने का कार्य कर रहे थे (अर्थात्, रावण की सेवकाई कर रहे थे) ।
काल त्रिशूल आदि अपने शस्त्रो का त्याग कर, अपने शरीर के वस्त्र से अपना मुँह ढककर, जब-जब चर्म से आवृत्त भेरी-वाद्य बजने का समय होता था, तब-तब आकर, ठीक समय की सूचना देता था। (भाव यह हैं कि कालदेव रावण के सभा-मंडप में समय की सूचना देने का कार्य करता था)।
उज्ज्वल अग्निदेव, दीपो में सुगन्धित घृत को भर-भरकर, उत्तम कर्पूर-वत्ती को तथा कपास की वत्ती को जलाकर, जलाशयो मे स्थित रक्त-कमल के समान दीपो को प्रकाशित कर रहा था।
नवीन पुष्पों से पुष्पित कल्पवृक्ष, अमन्द कान्ति से पूर्ण (चिन्तामणि आदि देव-लोक के) रत्न, दुधार (कामधेनु आदि) गायें तथा (शंख, पद्म आदि) निधियाँ, (रावण के) मन के कोमल भावों को पहचानकर क्रम-क्रम से अनेक वस्तुओ को लाकर उसके सामने रख देता था और उसे आश्चर्य मे डाल देता था ।
(रावण के पहने हुए) कुण्डल आदि आभरण, अपनी घनी कान्ति को इस प्रकार फैला रहे थे कि ऐसा लगता था, मानों सप्त लोकों में रात्रि नामक पदार्थ ही कहीं नहीं रह गई है, न अष्ट दिशाओ में कहीं अँधेरा रह गया है ।
गगा आदि नदी देवियाँ, अपने स्तन-भार से लचकनेवाली लता-समान कटि के साथ, उस सभा-मडप में आती और (रावण पर) अपने अरुण करो से अक्षत एव पुष्प बिखेरती तथा बारी-बारी से प्रशस्तियाँ गाती ।
(नारायण मुनि के) ऊरु से उत्पन्न उर्वशी १ नामक अप्सरा को आगे किये हुए
१ पुराणो में एक कथा प्रसिद्ध है—बदरिकाश्रम में विष्णु के अशभूत नर और नारायण क्रमशः शिष्य और गुरु के रूप में तपस्या करते थे। उनकी तपस्या को भग करने के लिए इन्द्र के द्वारा प्रेषित अप्सराओ को आग हुआ देखकर नारायण ने अपने उरु से उन अप्सराओ से भी अधिक सुन्दर स्त्री को उत्पन्न किया, जिसे देखकर वे सब अप्सराएं लज्जित होकर चली गई --उसका नाम उर्वशी पड़ा।
३६१ अथशूर्पणखाङ्कः
अनेक स्त्रियाँ, कलापी के समान चर्ममय वाद्यो (अर्थात् , मर्दल आदि) के ताल के अनुसार अत्युत्तम नृत्य करती थी, जिसे वह (रावण) देखता रहता था ।
वह रावण, जिसने अपूर्व तपस्या के प्रभाव से त्रिभुवन को भी अपने अपार बल के अधीन कर रखा था, अब (उस सभा-मडप में) भ्रू-रूपी धनुष को धारण करनेवाली काले तथा विशाल नयनोवाली रमणियो की दृष्टियो के प्रवाह में (तैर रहा) था ।
उस समय, रावण की वहन (शूर्पणखा), अपने लाल हाथो को शिर पर रखे हुए, स्तनों से लाल रक्त बहाते हुए, नाक और कानो से रहित होकर, अपना मुँह खोलकर मेघ के जैसे गरजती हुई, दौड़ी आई ।
वह (शूर्पणखा) अपने अत्यन्त दुर्गन्ध-पूर्ण मुँह से रोती गरजती हुई, युगात-कालिक समुद्र-घोष के समान शब्द करती हुई, व्याकुल-चित्त होकर, पश्चिम दिशा में दीख पड़नेवाली संध्याकालीन लालिमा के जैसे केशो के साथ, (लंका के प्रासाद के) उत्तरी द्वार से होकर प्रकट हुई ।
उसके इस प्रकार प्रकट होते ही, उस पुरातन (लंका) नगर की राक्षस-स्त्रियाँ उस (शूर्पणखा) के सम्मुख जाकर अपनी छाती पीट-पीटकर रोने लगी । हाय ! त्रिभुवन के शासक की वहन नककटी होकर, निस्सहाय इस प्रकार आवे, तो वे स्त्रियाँ कैसे उस दृश्य को सह सकती थी ?
राक्षस, (शूर्पणखा को) हठात् उस दशा मे आती हुई देखकर स्तब्ध रह गये । उनके मुख से कुछ वचन नही निकला, फिर वज्र-घोष के जैसा गर्जन करके, एक हाथ से दूसरे हाथ को पीटते हुए, आँखो से चिनगारियाँ निकालते हुए और ओठ चवाते हुए खड़े रहे ।
कुछ राक्षस यह कहकर क्षुब्ध हो रहे कि क्या यह कार्य इन्द्र का है ? नही तो सृष्टिकर्त्ता ब्रह्मा ने किया है ? या चक्रधारी विष्णु का यह कार्य है ? अथवा चंद्रशेखर का ही यह कार्य है ?
कुछ राक्षसों ने कहा—(इस ब्रह्मांड मे) कहने योग्य शत्रु कोई (रावण का) नही है । अतः, त्रिभुवन को अपने अन्तर मे रखे हुए इस ब्रह्मांड मे रहनेवाले) किसी भी व्यक्ति के द्वारा यह कार्य नहीं हुआ है, इसे करनेवाले इस ब्रह्मांड से परे रहनेवाला कोई होगा ।
कुछ राक्षसो ने कहा—‘अरे, यह रावण की वहन है !’—यह वचन सुनते ही सब लोग इसे ‘हे माता !’ कहकर इसके चरणो को नमस्कार करते हैं । कोई इसके अपमान की बात सोच भी नहीं सकता । अतः, इस (शूर्पणखा) ने स्वयं ही अपने कान-नाक काट लिये होंगे ।
कुछ राक्षस कहते थे—देवेन्द्र युद्ध मे पराजित होकर अब (रावण की) सेवकाई कर रहा है, तीक्ष्ण धारवाले चक्र को धारण करनेवाला विष्णु, शक्तिहीन होकर समुद्र मे जाकर रहने लगा है । अग्नि को हाथ में धारण करनेवाला शिव (रावण से डरकर) पर्वत पर जाकर रहने लगा है. फिर ऐसा कार्य करनेवाला व्यक्ति कौन है ?
यशस्वी कुल में उत्पन्न कोई भी व्यक्ति ऐसा कार्य करने का साहस नही कर
३६२ | कम्ब रामायण
सकता, स्वयं खर ने ही, यह सोचकर कि यह (शूर्पणखा) स्वच्छन्दकुल की स्त्रियों के लिए उचित कार्य न करके चरित्र-भ्रष्ट हो गई है, इसे सौन्दर्य से हीन कर दिया है।
कुछ राक्षस कहते थे—शिथिल एवं व्याकुल दिखलाते देवताओं में से किसी बलवान् व्यक्तियों ने, उपलम्भन के साथ, जीवित रहने के लिए अनुपयोगी विकार से (अर्थात्, विनाशाकारी विकार से), त्रिलोक का विनाश करने के लिए ही, इस प्रकार का कार्य किया है।
कुछ राक्षस कहते थे—दूसरा कल्प आने पर है; किन्तु इस कल्प में ऐसा कौन धीर-वसुन्धराधीश तथा गुणशाली वीर है, जो इस प्रकार ऐसा कार्य करने की क्षमता रखता है ? भयंकर अरण्य में, गोष्पदीन तपो-कर्म में निरत ऋषियों के क्रोध का ही यह परिणाम है।
अपार संपत्ति से पूर्ण उस लंकानगर में, काते नयनोंवाली राक्षस-स्त्रियाँ (शूर्पणखा की वह दशा) देखकर, वलय-मणियों से भूषित अपने हाथों को मलती हुईं, लज्जा उठाते हुए के समान अस्तव्यस्त दशा में पड़ी हुई, गद्गद वचन कहती हुई, एक के आगे एक होती हुई, दौड़ी चली आईं ।
उस नगर में, मर्दल, वीणा, मधुर नादवाले वंशल-वाद्य, मनमोहन वंशी, शंख, (चारे) (नामक वाद्य)—इनकी ध्वनि अब नहीं रही; किन्तु जैसी रुदन-ध्वनि इसके पहले कभी उत्पन्न नहीं हुई थी, वैसी रुदन-ध्वनि होने लगी।
समुद्र को भी लज्जित करनेवाले विशाल नयनों से शोभित राक्षस-स्त्रियाँ, महा-स्तनों को; मधु-अधरों को एवं अपने मनों को, एक ओर ढकेलकर दौड़ी चली आईं; तब उनकी कटि लचकने-सी लगी; जिससे वे एक दूसरे को सँभालती हुई आईं।
कुछ राक्षस-स्त्रियाँ, जो मानगल के धनी अपने पतियों को (प्रणय-कलह में हुए उनके अपराधों के लिए) दंड देने में निरत थीं और अपने उद्विग्न मन में क्रोध उमड़ने के कारण लालिमा से भरे अपने नेत्रों से अश्रु बहा रही थीं, रावण की उस बहन के चरणों पर जा गिरीं!
कुछ राक्षस-स्त्रियाँ, जो स्वर्णिम फलों से युक्त मरकत वर्णवाले मञ्जुल-वृक्षों में बाँधी गई सुगन्धमय ज़ंजीरों से लटकनेवाले झूलों में झूल रही थीं, वे सूचना छोड़कर, व्यथित चित्त के साथ, अपनी सूक्ष्म कटियों को दुखाती हुई, वीथियों में जा पहुँचीं।
और कुछ राक्षस-स्त्रियाँ, जो (अपने पतियों के) स्तंभ और चन्दनतुल्य कंधों के आलिंगन में बँधी थीं, अपनी वलय-विभूषित बाँहों को शिथिल करके, अपने कमलतुल्य वदन पर के दो नीलोत्पलों से मुक्ता की धारा बहाती हुई, सिसक-सिसककर रोने लगीं।
कुटिल-दृष्टिवाली कुछ राक्षस-स्त्रियाँ, यह कहती हुई कि शत्रु विध्वंसक और (शत्रुओं के) रक्त में डूबे हुए शूल को धारण करनेवाला राजा (रावण) यदि इस बात को जान ले, तो उसकी क्या दशा होगी ? अपनी अंजन-रूपी आँखों से नीर की वर्षा करती हुई, रोती-कलपती धरती पर लोटने लगीं।
निद्रा करनेवाली कुछ राक्षस-तरुणियाँ, मधुर स्वप्न के आनन्द को भूल गईं। मेघ की समता करनेवाले केशों को अस्तव्यस्त किये हुए, शिथिल वस्त्रों तथा कंपित स्तनों के साथ घर से निकल पड़ीं और दुःख में रोने लगीं।
अरण्यकाण्ड ३६३
खुले केश-पाशवाली कुछ राक्षस-स्त्रियाँ, यह कहकर कि शिव के कैलास को अपने विशाल करों में उठानेवाले हमारे पराक्रमी प्रभु की बहन की यह दशा हो गई है। हाय। शोक से उद्विग्न हुईं, स्तनों पर अपने करों से आघात करने लगी और उस स्त्री (शूर्पणखा) के पैरों पर आ गिरीं।
कुछ राक्षस-स्त्रियाँ, यह कहकर कि 'अपने हाथ में शूल को रखनेवाले हमारे प्रभु के रहने के कारण लंका के पशुओं ने भी कभी ऐसा दुःख नहीं भोगा, अब क्या हमारे सब सुकृत मिट गये हैं?' दुःखी हुईं और अपने अति सुन्दर नयनों से अश्रु की धारा बहाने लगीं।
जब लंका-नगर इस प्रकार दारुण दुःख में निमग्न हो रहा था, तब शूर्पणखा, पर्वत-सानु पर आकर झुकनेवाले मेघ के समान सभा-मंडप में प्रविष्ट होकर राक्षसराज (रावण) के स्वर्णमय विशाल वीर-कंकण से भूषित पैरों पर आ गिरी। अकस्मात् उसको उस रूप में देखकर उस मंडप में बैठे हुए और खड़े हुए सब लोग भय से भाग निकलने का मार्ग देखने लगे।
तीनों लोकों में अंधकार छा गया। (धरती का भार वहन करनेवाला) शेषनाग भयभीत होकर अपने फनों को झुकाने लगा, कुलपर्वत हिल उठे, सूर्य कांतिहीन हो गया, दिग्गज अपना स्थान छोड़कर भागने लगे, देवता भय से यत्र-तत्र छिपने लगे।
उज्ज्वल-वलयभूषित (रावण की) भुजाएँ फूल उठीं, उसकी आँखों से चिनगारियाँ निकलने लगीं, दाँतों से अग्नि-ज्वालाएँ फूट निकलीं, कुंचित भौंहें ललाट के मध्य जा पहुँचीं। (रावण का क्रोध देखकर) सब भुवन डाँवाडोल हो उठे, देवता किंकर्तव्य-विमूढ़ होकर खड़े रहे।
दक्षिण दिशा के शासक यम के साथ सब देवता, यह सोचकर कि अब हमारे विनाश का समय आ गया है चुपचाप पड़े रहे। स्वर्गलोक के निवासी तथा इहलोक के निवासी भी भ्रांत होकर थर-थर काँपते हुए, उसाँसे भरते हुए घबराई हुई दशा में अवाक् हो खड़े रहे।
रावण के (कोप के कारण) दाँतों से दबे हुए ओंठवाले बिल-समान मुँहों से धुआँ निकलने लगा। उसने श्वास छोड़ा, तो पंक्तिशः रहनेवाली उसकी मूँछों में आग लग गई, उसके तीक्ष्ण तथा उज्ज्वल दंत बिजली के जैसे चमक उठे, यो मेघ के गर्जन के समान गरजकर उसने पूछा—'यह किसका कार्य है?'
शूर्पणखा ने उत्तर दिया—अरण्य में मीनकेतन (मन्मथ) के समान रूपवाले, स्वर्ग-वासियों एवं पृथ्वी के निवासियों में अपना उपमान कहीं भी न पानेवाले दो मनुष्य राजकुमार आये हैं। उन्होंने ही करवाल से (मेरे अंगों को) काट दिया है।
शूर्पणखा के यह कहते ही कि मनुष्यों ने यह कार्य किया है, रावण ने ऐसा ठहाका भरा कि सारी दिशाएँ गूँज उठीं। उसकी बीसों आँखों से चिनगारियाँ निकल पड़ीं। फिर शूर्पणखा से बोला—मनुष्यों का पराक्रम तो अतिक्षुद्र होता है, क्या तुम्हारा कथन सत्य है? असत्य कहना छोड़ दो; भय को दूर करो और यथार्थ घटना बताओ।