भारतकोश
कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 365, कुल 549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 365

अरण्यकाण्ड ३५५

अतिदीर्घ तथा वर्तुलाकार आठ दिशायें तथा पृथक्-पृथक् उनका भार वहन करनेवाले अष्ट दिग्गजों को ढोने रहनेवाले दो में से एक (पादुका)$^१$ को, जिन (राम) ने (अयोध्या को) लौटा दिया था, उनके ललाट पर गज के मुख पर बँधे मुखपट्ट के समान पट्ट पर वे तीनो शर जा लगे, जिस दृश्य को देखकर सभी देवता भयभीत हो गये।

राम ने सोचा कि (दूषण के द्वारा) शर-प्रयोग की गति एवं उनका बल भी प्रशंसनीय है। फिर, मनोहर कान्तिमय मंदहास से युक्त होकर तीक्ष्ण बाण चुन-चुनकर त्वरित गति से प्रयुक्त किये और उस (दूषण) के शीघ्रगामी अश्वों से युक्त रथ को विध्वस्त कर दिया। उसके धनुष को छिन्न कर दिया और उज्ज्वल कवच को भी नष्ट कर दिया।

तब देवता हर्ष-ध्वनि कर उठे। सभी दिशाओं में ऋषियों की आशीर्वाद-ध्वनि समुद्र-गर्जन के समान शब्दायमान हो उठी। फिर, राम ने यह कहकर कि—'यदि तुम वीर हो तो इनसे अपने को बचा लो', एक बाण प्रयुक्त किया। उससे उस (दूषण) का खड्ग-दन्तयुक्त बड़ा शिर कटकर गिर गया।

मुख पर दंतों से शोभायमान दिग्गजों की समता करनेवाला, अति-तीक्ष्ण तथा विविध प्रकार के शस्त्रों को धारण करनेवाला खर, यह जानकर कि दशरथ-पुत्र के बाणों ने राक्षस-सेना का विनाश कर दिया, अत्यन्त क्रुद्ध हुआ।

वह खर, राक्षसों के साथ हाथियों, अश्वों और रथों को सब दिशाओं में फैलाता हुआ यों चल पड़ा कि उसे देखकर यम भी भयभीत हो गया। उसकी सेना ने चन्द्र को आवृत करनेवाले मेघों के समान आकर दृढ़ धनुष को हाथ में धारण किये हुए मत्तगज (सदृश राम) को घेर लिया।

अदम्य क्रूर कृत्यवाले राक्षस, मदजल बहानेवाले बड़े-बड़े हाथियों को, रथों को और अश्वों को अत्यधिक संख्या में धरती पर ले आये, जिससे धरती को वहन करनेवाले आदिशेष का फण भी फटने लगा। फिर, वे भयंकर युद्ध करने लगे। महिमान्य राम ने भी अति तीक्ष्ण बाणों को प्रयुक्त किया।

(रामचन्द्र के शरों से) मत्तगज तड़पकर गिरे। रथों में जुते अश्व तड़पकर गिरे। अंगद-भूषित भुजाएँ तड़पकर गिरीं। आँतें तड़पकर गिरीं। मांस से लगे चर्म के टुकड़े तड़पकर गिरे। पैर तड़पकर गिरे। और (उन राक्षसों की) वाम भुजाएँ भी तड़क उठीं (अर्थात्, फड़ककर विपदा की सूचना देने लगीं)।

करवालों के समूह, भालों के समूह, धनुषों के समूह, बलिष्ठ भुजाओं के समूह—इन सबसे संकुल होकर राक्षस-वीरों का समूह सम्मुख आया। जिसे (रामचन्द्र के) शर-समूह-रूपी विध्वंसक सेना ने छिन्न-भिन्न कर दिया।

धर्म-स्वरूपी (राम) से चुनकर प्रयुक्त किये जानेवाले बाण नक्षत्रों को भी भेदकर जा सकते थे। मेरु पर्वत को भी भेदकर निकल जा सकते थे। ऊँचाई पर स्थित ऊपर


१. धरती का भार वहन करनेवाली दो वस्तुएँ हैं—अष्टदिग्गज और महाकूर्म्म। रामचन्द्र की पादुका, जिसे उन्होंने भरत को दिया था, आदिशेष का ही अवतार मानी गई है। —अनु०