कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 364, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३५४ | कम्ब रामायण |
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तब (राम के बाणों से सैनिकों के) हाथ खड्गों-सहित कटकर गिर गये। हाथियों के ऊँचे बढे हुए दंत कटकर गिर गये। पवन-गति से जानेवाले रथ, ध्वजाओं-सहित, कटकर गिर गये। घोड़ों के शिर ऐसे कटकर गिरे, जैसे लाल धान की बालियाँ कटकर गिर रही हों।
(राम के द्वारा) प्रयुक्त शरों में से कुछ (राक्षसों के) मर्म-स्थानों को खोजते हुए चले। कुछ उनके कवच और वस्त्रों को उड़ाकर चले और कुछ शर उनके ढालों और शरीर को भी ऐसे भेद कर चले कि उनके शरीर से रक्त की नदियाँ, पर्वत-निर्झरों के जैसे बह चलीं।
चुनकर प्रयोग किये गये कुछ कंकपत्र (बाण), शरीरों में प्रविष्ट होकर राक्षसों के मर्म-स्थानों में घुस गये। अर्धचन्द्राकार बाण, उनके मर्म-स्थानों में न घुसकर उनके शिरों को काटकर उड़ गये। कुछ अति तीक्ष्ण शर उनके कवचावृत वक्षों को भेदकर गये, और 'भल्ल' (नामक कुछ शर) मायावी राक्षसों के हृदय को भी छेदकर चले गये।
युद्ध की लीला रचनेवाले (श्रीराम) ने, दूषण के द्वारा प्रयुक्त सब बाणों को काटकर, उसके निकट स्थित राक्षसों के द्वारा प्रयुक्त अन्य शस्त्रों को भी ध्वस्त कर, अपरिमेय बल से युक्त उस राक्षस-सेना रूपी शब्दायमान समुद्र को कुछ क्षणों में ही सुखा दिया।
तब देवता लोग आनन्द-ध्वनि कर उठे। रक्त की बड़ी-बड़ी नदियाँ बड़े पर्वतों एवं वृक्षों को बहा ले चलीं। रामचन्द्र के द्वारा प्रयुक्त उग्र बाण दिग्दिगंतों में भी जाकर, उन दिशाओं को आवृत कर रहनेवाले क्रूर राक्षसों को आहत कर धरती पर लिटा दिया।
युद्ध करने की इच्छा से जो राक्षस रण-क्षेत्र में खड़े रहे, वे सब मर मिटे। यम, उन (राक्षसों) के शरीरों से निकलनेवाले प्राणों को ढोते-ढोते बहुत थक गया। अब उन भूतों के बारे में क्या कहा जाय, जो उन (राक्षसों) की चरबी को पेट-भर खाकर ऊँचे पर्वतों के जैसे लगते थे?
उस समय, दूषण अत्यन्त क्रुद्ध होकर, हाथियों, रथों, अश्वों, क्रोधी राक्षसों के मुकुट-भूषित शिरों, कवचों, उज्ज्वल शस्त्रों से सुसज्जित शरीरों, उनकी श्वेतरंग की चरबी—इन सबके ढेरों के ऊपर से होकर कोलाहल-पूर्ण रथ को शीघ्र चलाता हुआ आया।
धर्महीन (राक्षसों) के शरीरों के ढेर की कोई संख्या नहीं थी। अतः, वह दूषण, यद्यपि चरखी के जैसा वेगवान् था, तथापि उसका रथ उन शव-राशियों पर चढ़ता-उतरता हुआ बड़ी कठिनाई से आगे बढ़ा। उस कठिनाई के बारे में हम क्या कहें?
सुसज्जित केसरोंवाले पचीस अश्व जुते तथा लुढ़कते चक्रोंवाले एक विलक्षण रथ पर वह (दूषण) आरूढ था। भूमि के अंधकार को मिटानेवाले चन्द्र के सदृश स्थित रामचन्द्र के उज्ज्वल शर-रूपी यम के सम्मुख मानो स्वयं उसके प्राण आ पड़े हों, ऐसी शीघ्रता से वह आया।
उस रथ को तथा उसपर धनुष को हाथ में लिये हुए पर्वत के जैसे खड़े दूषण को, देखकर अकलंका रामचन्द्र ने अपनी कृपा के कारण किंचित् उसकी प्रशंसा करते हुए कहा—'तुम्हारा साहस भी धन्य है।' उस समय उस क्रूर राक्षस ने तीन बाण प्रयुक्त किये।