कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 366, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३५६ | कंब रामायण |
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के लोको को भी पार कर जा सकते थे। धरती को भी भेदकर जा सकते थे। तो अब क्या यह भी कहने की आवश्यकता है कि वे ( वाण ) करवालो को उठाये, उपस्थित राक्षसो के शरीर को भी भेदकर जा सकते थे ?
उस समय, उनको घेरकर आनेवाले सब राक्षसो का एक साथ विनाश करने के लिए राम ने जो बाण चुन-चुनकर चलाये, उन्होंने उन राक्षसो को उसी प्रकार अति शीघ्र मिटा दिये, जिस प्रकार किसी बलवान् व्यक्ति के द्वारा किसी बलहीन को अत्याचार से मारकर चुराया गया धन ( उस अत्याचारी बलवान् को ) शीघ्र ही मिटा देता है।
सब राक्षस-वीरो के मिट जाने पर वीर-कंकणधारी, अतिक्रुद्ध क्रूर खर, उत्तरोत्तर बढ़ आनेवाली मज्जा और रक्त की धारा मे ऐसे ही अकेले खड़ा रहा, जैसे विशाल समुद्र के मध्य मंदराचल खड़ा हो।
मन मे क्रोधाग्नि से जलता हुआ वह ( खर ), अपनी लाल आँखो से चिनगारियाँ उगलता हुआ और अपने दृढ धनुष से बाणो को उगलता हुआ, बढ़ती हुई रक्त-धारा के मध्य से समुद्र-मध्य जानेवाली नौका के सदृश रथ पर आया। काक और गिद्ध भी उसको घेर-कर आये।
युगात मे सारे संसार को जलानेवाली अग्नि के समान वैर एव क्रूरता से युक्त, एकाकी रहनेवाले उस राक्षस के अपने निकट आने के पूर्व ही, नीलकंठ ( शिव ) के धनुष को तोड़नेवाले प्रभु, उत्तम बाणों को लिये हुए उसके सम्मुख बढ आये।
अग्नि के जैसे तीक्ष्ण रूपवाले, पवन के जैसे वेगवाले तथा अन्य सब लक्षणों से युक्त तीक्ष्णाग्र बाणो को उस राक्षस-पति ने छोड़ा। किंतु राम ने उन सबको वैसे ही सहस्रों उत्तम बाणो से छिन्न-भिन्न कर दिया।
सप्त लोको के प्रभु राम ने प्रलयाग्नि से भी अधिक तीक्ष्ण, नौ बाणो को प्रयुक्त किया। किंतु, चक्र के रूप मे झुके हुए धनुषवाले खर ने अग्नि उगलनेवाले बाणों को चलाकर राम के बाणों को रोक दिया।
फिर, खर ने माया-युद्ध करते हुए, शरों की वर्षा उत्पन्न की और रामचन्द्र के शरीर को उन बाणों से ढक दिया। इससे देवता भयभीत होकर भागे, तब महावीर राम अत्यन्त क्रुद्ध हुए और उनके उज्ज्वल दाँत और उन (दाँतो) को ढकनेवाले ओठ दोनों व्यस्त हो गये (अर्थात्, उनके दाँत ओठो को चबाते हुए उन ओठो को ढकने लगे।)
राम ने यह सोचकर कि अब एक तीक्ष्ण बाण से इस राक्षस को मिटा दूँगा, एक शर को धनुष पर चढ़ाकर उसे आकर्ण खींचा, तब उनके हाथ का धनुष, विशाल आकाश में उत्पन्न मेघ-गर्जन के सदृश घोष के साथ टूट गया।
( राम की ) जय-जयकार करनेवाले देवताओ ने देखा कि राम का धनुष टूट गया है और उनके पास अन्य कोई दृढ़ धनुष नही है और यह सोचकर कि हमारी शक्ति अब नष्ट हो गई है, भय से काँप उठे और व्याकुल हो उठे।
इसी क्षण राजाधिराज के पुत्र ( राम ) ने अपने अकेलेपन की एवं अपने धनुष