कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 367, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअरण्यकाण्ड ३५७
के टूट जाने की किंचित् भी चिन्ता किये बिना ही प्राचीन संकेत १ के अनुसार अपनी विशाल बाँह को पीछे की ओर पसारा।
वरुणदेव ने यह दृश्य देखा और उनके मन की बात जानकर परशुराम से पूर्व में प्राप्त विष्णु-धनुष को उस देवाधिदेव (राम) के हाथ में लाकर रख दिया।
वरुण के द्वारा लाये हुए उस धनुष को नीलमेघवर्ण प्रभु ने अपने हाथ में लिया और अपने बाये हाथ से उसे पकड़कर दायें हाथ से खींचकर झुकाया, तो धर्महीन राक्षसों के वाम नेत्र और वाम भुजाएँ फड़क उठीं।
यों एक पलक-भर में राम ने उस धनुष को लिया, और उसे ऐसा झुकाया कि यम भी भयभीत हो गया। उनके बाद डोरी चढ़ाई और सौ बाण प्रयुक्त किये; जिनसे खर का दृढ़ चक्रवाला रथ चूर-चूर हो गया।
खर दृढ़ चक्रवाला अपना रथ खो बैठा। तब वह बड़ा कोलाहल करता हुआ आकाश में उछल गया और सुन्दर तथा अनुपम धनुर्धारी राम की भुजा-रूपी मंदराचल पर बाणों की घोर वर्षा करने लगा।
राम ने उन बाणों को रोक लिया और अपने तूणीर से तीक्ष्ण बाणों को निकाल-निकालकर चढ़ानेवाले खर के दक्षिण हाथ को एक बाण से काटकर धरती पर गिरा दिया।
खर ने, अपने दाहिने हाथ के कट जाने पर, अपने बायें हाथ से एक भयंकर वज्र के समान मूसल को उठाकर उसे राम पर फेंका। तब लक्ष्मण के अग्रज ने उसे एक ही बाण से दूर फेंक दिया।
जैसे कोई सर्प अपने विष-दंत के टूट जाने के पश्चात् फुफकार रहा हो. ऐसे ही वह खर एक बड़े वृक्ष को हाथ में लेकर झपटा। तब राम ने एक अनुपम बाण का उसपर प्रयोग किया।
यद्यपि उस खर ने अनेक वर प्राप्त किये थे, बड़ा मायावी था और बड़ा बलवान् था. तथापि राक्षसराज (रावण) के मत लोक के प्राणियों का विनाश करने के पाप के कारण, उसके दक्षिण हाथ के जैसे ही उसका कंठ भी कट गया।
उस समय, देवता हर्ष-ध्वनि कर उठे, नाचने और गाने लगे और पवित्र पुष्प बरसाने लगे। पवित्रमूर्ति (राम) भी सब दिशाओं में फैले कुहरे को मिटाकर निखरनेवाले सूर्य के समान ही चमकने लगे।
अनेक मुनि आये और राम का अभिनन्दन करने लगे; फिर पवित्र हृदयवाले (राम) उन सीताजी के समीप जा पहुँचे, जो अपने प्राणों (रामचंद्र) के राक्षस-सेना के साथ युद्ध करने के लिए चले जाने पर प्राणहीन शरीर बनकर पर्णशाला में रहती थीं।
लक्ष्मण और सीता ने रामचन्द्र के चरणों को अपने अश्रुजल से इस प्रकार धोया कि उन चरणों पर लगा हुआ, युद्ध में मृत राक्षसों का रक्त और धूल धुल गये।
१. प्राचीन संकेत यह है—पहले धनुर्भङ्ग के समय परशुराम ने राम से पराजित होकर अपने पास का विष्णु-धनुष उन्हें दिया था। राम ने वह धनुष वरुण को सौंपा था और कहा था कि जब उन्हें उसकी आवश्यकता पड़ेगी, तब वह धनुष उन्हें मिल जाना चाहिए।—अनु०