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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 368

३५८ | कंब रामायण्

एक मुहूर्त्त में मरे हुए राक्षसों का रक्त-प्रवाह सब दिशाओं में भर गया। इधर श्रीरामचन्द्र विश्राम करने लगे और देवता समुद्र में, पक्तियों में उठनेवाली लहरों के समान, घोष करते हुए उनकी स्तुति करने लगे।

इधर जो वृत्तांत कहना शेष रह गया है, अब उसे कहेंगे। रावण की बहन, अपनी छाती पीटती हुई, अंधकार समान खर का आलिंगन करके, दूर तक फैले हुए उसके उष्ण रक्त-प्रवाह में लोटने लगी।

मैंने अपने मन में (राम को पाने की) जो इच्छा की थी, हाय! उस इच्छा को अपनी नासिका के साथ ही मैंने नहीं खोया। मैंने अपने वचनों के कारण तुम लोगों (खर-दूषण) के जीवन को भी मिटा दिया। मैं अत्यन्त क्रूर हूँ—यों रोती कलपती हुई वहाँ से चली गई।

विजयमालाधारी (लंका में रहनेवाले) राक्षस-समूह का भी नाश करने के विचार से, संसार के प्राणियों को भयभीत करनेवाली आँधी के समान, वह शीघ्र लंका में जा पहुँची। (१-१६२)


अध्याय ७

मारीच-वध पटल

शूर्पणखा, कोलाहल से पूर्ण समुद्र की जैसी राक्षस-सेना के विनष्ट होने की बात को भूल-सी गई। रामचन्द्र के पर्वत-सदृश कंधों के प्रति आकर्षण उसके मन को व्यथित करने लगा। उससे अत्यंत व्याकुल हो वह यह सोचकर चल पड़ी कि, तरंगों से भरे समुद्र-रूपी परिखा से आवृत विशाल लंका में शीघ्र जा पहुँचूँगी और (रावण से) सीता के सौंदर्य के बारे में कहूँगी। अब उस लंका में स्थित रावण का वर्णन करेंगे।

वह (रावण) एक ऐसे अति मनोहर अनुपम रत्न-मंडप में आसीन था, जो (मंडप) इस नश्वर संसार में स्थावर-जंगम पदार्थों की सृष्टि करनेवाले' कमल-भव, चतुर्मुख (ब्रह्मा) के लिए भी विरचित करने को असंभव था और जो सूक्ष्म ज्ञान से उत्पन्न अनुपम दक्षता से युक्त तथा निष्कलंक धर्म के जैसे ही, संकल्प-मात्र से सब वस्तुओं का सर्जन करनेवाले (विश्वकर्मा नामक) देव-शिल्पी के द्वारा निर्मित होकर, उसके समस्त शिल्पशास्त्र-ज्ञान को प्रकट करता था।

भ्रमरों से गुंजित शिरवाले दिग्गजों के दाँतों को भी अपने कठोर आघात से तोड़ देनेवाले (उस रावण के) मनोहर कंधे, आकाश तक उन्नत होकर ऊँचे उदयाचल के समान शोभित हो रहे थे। उन कंधों पर (रावण के बीस) कुण्डल इस प्रकार प्रकाशमान थे, जैसे उज्ज्वल किरण-पुंज से युक्त द्वादश सूर्य-मंडल, मेरु पर्वत की परिक्रमा करते हुए, बीस मंडलवाले होकर चमक रहे हों।