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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

३५८ | कंब रामायण्

एक मुहूर्त्त में मरे हुए राक्षसों का रक्त-प्रवाह सब दिशाओं में भर गया। इधर श्रीरामचन्द्र विश्राम करने लगे और देवता समुद्र में, पक्तियों में उठनेवाली लहरों के समान, घोष करते हुए उनकी स्तुति करने लगे।

इधर जो वृत्तांत कहना शेष रह गया है, अब उसे कहेंगे। रावण की बहन, अपनी छाती पीटती हुई, अंधकार समान खर का आलिंगन करके, दूर तक फैले हुए उसके उष्ण रक्त-प्रवाह में लोटने लगी।

मैंने अपने मन में (राम को पाने की) जो इच्छा की थी, हाय! उस इच्छा को अपनी नासिका के साथ ही मैंने नहीं खोया। मैंने अपने वचनों के कारण तुम लोगों (खर-दूषण) के जीवन को भी मिटा दिया। मैं अत्यन्त क्रूर हूँ—यों रोती कलपती हुई वहाँ से चली गई।

विजयमालाधारी (लंका में रहनेवाले) राक्षस-समूह का भी नाश करने के विचार से, संसार के प्राणियों को भयभीत करनेवाली आँधी के समान, वह शीघ्र लंका में जा पहुँची। (१-१६२)


अध्याय ७

मारीच-वध पटल

शूर्पणखा, कोलाहल से पूर्ण समुद्र की जैसी राक्षस-सेना के विनष्ट होने की बात को भूल-सी गई। रामचन्द्र के पर्वत-सदृश कंधों के प्रति आकर्षण उसके मन को व्यथित करने लगा। उससे अत्यंत व्याकुल हो वह यह सोचकर चल पड़ी कि, तरंगों से भरे समुद्र-रूपी परिखा से आवृत विशाल लंका में शीघ्र जा पहुँचूँगी और (रावण से) सीता के सौंदर्य के बारे में कहूँगी। अब उस लंका में स्थित रावण का वर्णन करेंगे।

वह (रावण) एक ऐसे अति मनोहर अनुपम रत्न-मंडप में आसीन था, जो (मंडप) इस नश्वर संसार में स्थावर-जंगम पदार्थों की सृष्टि करनेवाले' कमल-भव, चतुर्मुख (ब्रह्मा) के लिए भी विरचित करने को असंभव था और जो सूक्ष्म ज्ञान से उत्पन्न अनुपम दक्षता से युक्त तथा निष्कलंक धर्म के जैसे ही, संकल्प-मात्र से सब वस्तुओं का सर्जन करनेवाले (विश्वकर्मा नामक) देव-शिल्पी के द्वारा निर्मित होकर, उसके समस्त शिल्पशास्त्र-ज्ञान को प्रकट करता था।

भ्रमरों से गुंजित शिरवाले दिग्गजों के दाँतों को भी अपने कठोर आघात से तोड़ देनेवाले (उस रावण के) मनोहर कंधे, आकाश तक उन्नत होकर ऊँचे उदयाचल के समान शोभित हो रहे थे। उन कंधों पर (रावण के बीस) कुण्डल इस प्रकार प्रकाशमान थे, जैसे उज्ज्वल किरण-पुंज से युक्त द्वादश सूर्य-मंडल, मेरु पर्वत की परिक्रमा करते हुए, बीस मंडलवाले होकर चमक रहे हों।

आरण्यकाण्ड ३५६

देवताओ मे व्याघ्र-चर्म धारण करनेवाले (शिव), स्वर्णमय वस्त्र धारण करनेवाले (विष्णु) और कमल से उत्पन्न (ब्रह्मा) भी उस रावण को कुछ पीड़ा नही दे सकते थे, तो अब इस ससार मे दूसरो के सबध मे क्या कहा जाय। (अर्थात्, दूसरे कौन उससे युद्ध करने की शक्ति रखते हैं) ? सूक्ष्म कटि, पीन स्तनो, कोमल बॉम-समान कंधो, रेखाओ से युक्त नेत्रो तथा सबको आकृष्ट करने को शक्ति से युक्त सुदरियो के साथ दुस्सह प्रणय-कलह मे भी न झुकनेवाले उसके किरीटो की पंक्ति अत्यन्त उज्ज्वल थी।

(उसके आभरणो के) उज्ज्वल तथा बड़े-बडे रत्न प्रकाश-पुज बिखेर रहे थे। (उसके) वज्रमय पर्वताकार कधे, धरती का भार वहन करनेवाले विषमय सर्पराज के फनो के समान शोभित थे। (उसके वक्ष पर) के उज्ज्वल रत्नहार भयकर समुद्र से घिरी लका के मध्य स्थित उस कारागार का दृश्य उपस्थित करते थे, जिसमे (रावण) के द्वारा बंदी बनाकर लाये गये नवग्रह तथा उनके पार्श्वों मे नक्षत्र रखे गये हो।

अरुण कातिवाले, उत्तम रत्नो से खचित उसका वीर-वलय, उसके चरण में शब्दायमान हो रहा था और अवर्णनीय महावल से युक्त राक्षस-नायको के गौरवमय रत्न-किरीटो की रगड़ खा-खाकर नव काति बिखेर रहा था।

सुरो तथा असुरो ने सब दिशाओ से ला-लाकर जो सुरभित पुष्प (रावण के चरणो पर) वरसाये, वे पुष्प त्रिभुवन के राजाओ के द्वारा निरन्तर ला-लाकर समर्पित धन-राशियों के समान भरे पड़े थे।

बिजली के जैसे चमकते हुए किरीटोवाले विद्याधर-नरेश, यह न जानने से कि वह (रावण) किम समय, किस ओर अपनी दृष्टि डालेगा, सदा अपने शिर पर हाथो को जोड़े हुए सभा-मंडप में उसके समीप पंक्ति बाँधे खड़े रहते थे।

सिंह-सदृश वलशाली सिद्ध लोग, उस (रावण) के समीप शिर झुकाये, हाथ जोड़े और संकोच-से भरे मन के साथ विनम्र होकर खडे रहते थे। यदि वह रावण किसी दासी को भी कोई आज्ञा देता, तो भी (ये सिद्ध लोग) यह समझकर कि वह उनको ही आज्ञा दे रहा है, झट उसे करने के लिए दौड़ पड़ते थे।

यदि वह रावण उस सभा-मडप मे मन्त्रियो को देखकर कोई वचन कहता, तो भी किन्नर (यह सोचकर कि वह उन किन्नरो को कुछ दड देने की ही बात कर रहा है), व्याकुल तथा भयभीत होकर शिर झुकाकर खडे रहते थे।

नागलोग, रावण को देखकर, विशाल (दक्षिण) दिशा के प्रभु तथा भयकर दड-धारी यम को देखनेवाले नरक-वासियो के समान ही, गद्गदकंठ एवं भय-व्याकुल मन होकर घेरे खडे रहते थे।

तुबुरु नामक ऋषि अपनी संगीतमय वीणा के साथ रावण की उन भुजाओ का यशोगान कर रहे थे, जिन भुजाओ ने दिग्गजो के वल को कुंठित कर दिया था, कैलाश गिरि को उखाड़कर महादेव के लिए अपवाद उत्पन्न किया था और इन्द्र के साथ युद्ध करके सभी स्वर्ग-वासियो को भयभीत किया था।

नारद मुनि, स्वर्ग में प्रचलित संगीत-पद्धति मे किंचित् भी स्खलित हुए बिना,

३६०ऋव रामायण

अपने करो से वीणा का नाद करते हुए, सरस्वती के समान ही, दोषहीन राग से मधुर वेद का गान करते थे और उसके कानो को तृप्त करते थे ।

मकर-मीन से पूर्ण समुद्र का अधिपति वरुण, देव-तरुओं तथा विद्याधर-लोक के वृक्षों के पुष्पों से झरे हुए मधु को, स्वच्छ जल के साथ मिलाकर, मेव नामक पिचकारी में भरकर, डरते-डरते उस रावण पर बूँदों से बरसा रहे थे कि कही (पिचकारी का जल) मयूर और हरिणी-सदृश रमणियो के वस्त्रों पर न पड़ जाये ।

वासुदेव, सुगन्धित पुष्पो से झरनेवाले पराग और मधु को, एव (उस सभा मे स्थित) राजाओ के ऊँचे-ऊँचे किरीटो के (एक दूसरे से) रगड़ने से झरनेवाले रत्नों और मुक्ताओं के टुकड़ो को, धरती पर उनके गिरने के पूर्व ही, इधर से उधर और उधर से इधर दौड़-दौड़कर इस प्रकार बटोर लेता था, मानो वह उस स्थान पर झाडू-सा लगा रहा हो ।

बृहस्पति और शुक्राचार्य—दोनों अपने हाथो में बिजली के जैसे चमकनेवाले दण्ड लिये हुए; सारे शरीर को ढकनेवाले दीर्घ कञ्चुक धारण किये हुए, अथक रूप से घूम-घूमकर (रावण के सभा-मडप में) इन्द्र आदि देवताओ को यथोचित आसन दिखाने का कार्य कर रहे थे (अर्थात्, रावण की सेवकाई कर रहे थे) ।

काल त्रिशूल आदि अपने शस्त्रो का त्याग कर, अपने शरीर के वस्त्र से अपना मुँह ढककर, जब-जब चर्म से आवृत्त भेरी-वाद्य बजने का समय होता था, तब-तब आकर, ठीक समय की सूचना देता था। (भाव यह हैं कि कालदेव रावण के सभा-मंडप में समय की सूचना देने का कार्य करता था)।

उज्ज्वल अग्निदेव, दीपो में सुगन्धित घृत को भर-भरकर, उत्तम कर्पूर-वत्ती को तथा कपास की वत्ती को जलाकर, जलाशयो मे स्थित रक्त-कमल के समान दीपो को प्रकाशित कर रहा था।

नवीन पुष्पों से पुष्पित कल्पवृक्ष, अमन्द कान्ति से पूर्ण (चिन्तामणि आदि देव-लोक के) रत्न, दुधार (कामधेनु आदि) गायें तथा (शंख, पद्म आदि) निधियाँ, (रावण के) मन के कोमल भावों को पहचानकर क्रम-क्रम से अनेक वस्तुओ को लाकर उसके सामने रख देता था और उसे आश्चर्य मे डाल देता था ।

(रावण के पहने हुए) कुण्डल आदि आभरण, अपनी घनी कान्ति को इस प्रकार फैला रहे थे कि ऐसा लगता था, मानों सप्त लोकों में रात्रि नामक पदार्थ ही कहीं नहीं रह गई है, न अष्ट दिशाओ में कहीं अँधेरा रह गया है ।

गगा आदि नदी देवियाँ, अपने स्तन-भार से लचकनेवाली लता-समान कटि के साथ, उस सभा-मडप में आती और (रावण पर) अपने अरुण करो से अक्षत एव पुष्प बिखेरती तथा बारी-बारी से प्रशस्तियाँ गाती ।

(नारायण मुनि के) ऊरु से उत्पन्न उर्वशी १ नामक अप्सरा को आगे किये हुए


१ पुराणो में एक कथा प्रसिद्ध है—बदरिकाश्रम में विष्णु के अशभूत नर और नारायण क्रमशः शिष्य और गुरु के रूप में तपस्या करते थे। उनकी तपस्या को भग करने के लिए इन्द्र के द्वारा प्रेषित अप्सराओ को आग हुआ देखकर नारायण ने अपने उरु से उन अप्सराओ से भी अधिक सुन्दर स्त्री को उत्पन्न किया, जिसे देखकर वे सब अप्सराएं लज्जित होकर चली गई --उसका नाम उर्वशी पड़ा।

३६१ अथशूर्पणखाङ्कः

अनेक स्त्रियाँ, कलापी के समान चर्ममय वाद्यो (अर्थात् , मर्दल आदि) के ताल के अनुसार अत्युत्तम नृत्य करती थी, जिसे वह (रावण) देखता रहता था ।

वह रावण, जिसने अपूर्व तपस्या के प्रभाव से त्रिभुवन को भी अपने अपार बल के अधीन कर रखा था, अब (उस सभा-मडप में) भ्रू-रूपी धनुष को धारण करनेवाली काले तथा विशाल नयनोवाली रमणियो की दृष्टियो के प्रवाह में (तैर रहा) था ।

उस समय, रावण की वहन (शूर्पणखा), अपने लाल हाथो को शिर पर रखे हुए, स्तनों से लाल रक्त बहाते हुए, नाक और कानो से रहित होकर, अपना मुँह खोलकर मेघ के जैसे गरजती हुई, दौड़ी आई ।

वह (शूर्पणखा) अपने अत्यन्त दुर्गन्ध-पूर्ण मुँह से रोती गरजती हुई, युगात-कालिक समुद्र-घोष के समान शब्द करती हुई, व्याकुल-चित्त होकर, पश्चिम दिशा में दीख पड़नेवाली संध्याकालीन लालिमा के जैसे केशो के साथ, (लंका के प्रासाद के) उत्तरी द्वार से होकर प्रकट हुई ।

उसके इस प्रकार प्रकट होते ही, उस पुरातन (लंका) नगर की राक्षस-स्त्रियाँ उस (शूर्पणखा) के सम्मुख जाकर अपनी छाती पीट-पीटकर रोने लगी । हाय ! त्रिभुवन के शासक की वहन नककटी होकर, निस्सहाय इस प्रकार आवे, तो वे स्त्रियाँ कैसे उस दृश्य को सह सकती थी ?

राक्षस, (शूर्पणखा को) हठात् उस दशा मे आती हुई देखकर स्तब्ध रह गये । उनके मुख से कुछ वचन नही निकला, फिर वज्र-घोष के जैसा गर्जन करके, एक हाथ से दूसरे हाथ को पीटते हुए, आँखो से चिनगारियाँ निकालते हुए और ओठ चवाते हुए खड़े रहे ।

कुछ राक्षस यह कहकर क्षुब्ध हो रहे कि क्या यह कार्य इन्द्र का है ? नही तो सृष्टिकर्त्ता ब्रह्मा ने किया है ? या चक्रधारी विष्णु का यह कार्य है ? अथवा चंद्रशेखर का ही यह कार्य है ?

कुछ राक्षसों ने कहा—(इस ब्रह्मांड मे) कहने योग्य शत्रु कोई (रावण का) नही है । अतः, त्रिभुवन को अपने अन्तर मे रखे हुए इस ब्रह्मांड मे रहनेवाले) किसी भी व्यक्ति के द्वारा यह कार्य नहीं हुआ है, इसे करनेवाले इस ब्रह्मांड से परे रहनेवाला कोई होगा ।

कुछ राक्षसो ने कहा—‘अरे, यह रावण की वहन है !’—यह वचन सुनते ही सब लोग इसे ‘हे माता !’ कहकर इसके चरणो को नमस्कार करते हैं । कोई इसके अपमान की बात सोच भी नहीं सकता । अतः, इस (शूर्पणखा) ने स्वयं ही अपने कान-नाक काट लिये होंगे ।

कुछ राक्षस कहते थे—देवेन्द्र युद्ध मे पराजित होकर अब (रावण की) सेवकाई कर रहा है, तीक्ष्ण धारवाले चक्र को धारण करनेवाला विष्णु, शक्तिहीन होकर समुद्र मे जाकर रहने लगा है । अग्नि को हाथ में धारण करनेवाला शिव (रावण से डरकर) पर्वत पर जाकर रहने लगा है. फिर ऐसा कार्य करनेवाला व्यक्ति कौन है ?

यशस्वी कुल में उत्पन्न कोई भी व्यक्ति ऐसा कार्य करने का साहस नही कर

३६२ | कम्ब रामायण

सकता, स्वयं खर ने ही, यह सोचकर कि यह (शूर्पणखा) स्वच्छन्दकुल की स्त्रियों के लिए उचित कार्य न करके चरित्र-भ्रष्ट हो गई है, इसे सौन्दर्य से हीन कर दिया है।

कुछ राक्षस कहते थे—शिथिल एवं व्याकुल दिखलाते देवताओं में से किसी बलवान् व्यक्तियों ने, उपलम्भन के साथ, जीवित रहने के लिए अनुपयोगी विकार से (अर्थात्, विनाशाकारी विकार से), त्रिलोक का विनाश करने के लिए ही, इस प्रकार का कार्य किया है।

कुछ राक्षस कहते थे—दूसरा कल्प आने पर है; किन्तु इस कल्प में ऐसा कौन धीर-वसुन्धराधीश तथा गुणशाली वीर है, जो इस प्रकार ऐसा कार्य करने की क्षमता रखता है ? भयंकर अरण्य में, गोष्पदीन तपो-कर्म में निरत ऋषियों के क्रोध का ही यह परिणाम है।

अपार संपत्ति से पूर्ण उस लंकानगर में, काते नयनोंवाली राक्षस-स्त्रियाँ (शूर्पणखा की वह दशा) देखकर, वलय-मणियों से भूषित अपने हाथों को मलती हुईं, लज्जा उठाते हुए के समान अस्तव्यस्त दशा में पड़ी हुई, गद्गद वचन कहती हुई, एक के आगे एक होती हुई, दौड़ी चली आईं ।

उस नगर में, मर्दल, वीणा, मधुर नादवाले वंशल-वाद्य, मनमोहन वंशी, शंख, (चारे) (नामक वाद्य)—इनकी ध्वनि अब नहीं रही; किन्तु जैसी रुदन-ध्वनि इसके पहले कभी उत्पन्न नहीं हुई थी, वैसी रुदन-ध्वनि होने लगी।

समुद्र को भी लज्जित करनेवाले विशाल नयनों से शोभित राक्षस-स्त्रियाँ, महा-स्तनों को; मधु-अधरों को एवं अपने मनों को, एक ओर ढकेलकर दौड़ी चली आईं; तब उनकी कटि लचकने-सी लगी; जिससे वे एक दूसरे को सँभालती हुई आईं।

कुछ राक्षस-स्त्रियाँ, जो मानगल के धनी अपने पतियों को (प्रणय-कलह में हुए उनके अपराधों के लिए) दंड देने में निरत थीं और अपने उद्विग्न मन में क्रोध उमड़ने के कारण लालिमा से भरे अपने नेत्रों से अश्रु बहा रही थीं, रावण की उस बहन के चरणों पर जा गिरीं!

कुछ राक्षस-स्त्रियाँ, जो स्वर्णिम फलों से युक्त मरकत वर्णवाले मञ्जुल-वृक्षों में बाँधी गई सुगन्धमय ज़ंजीरों से लटकनेवाले झूलों में झूल रही थीं, वे सूचना छोड़कर, व्यथित चित्त के साथ, अपनी सूक्ष्म कटियों को दुखाती हुई, वीथियों में जा पहुँचीं।

और कुछ राक्षस-स्त्रियाँ, जो (अपने पतियों के) स्तंभ और चन्दनतुल्य कंधों के आलिंगन में बँधी थीं, अपनी वलय-विभूषित बाँहों को शिथिल करके, अपने कमलतुल्य वदन पर के दो नीलोत्पलों से मुक्ता की धारा बहाती हुई, सिसक-सिसककर रोने लगीं।

कुटिल-दृष्टिवाली कुछ राक्षस-स्त्रियाँ, यह कहती हुई कि शत्रु विध्वंसक और (शत्रुओं के) रक्त में डूबे हुए शूल को धारण करनेवाला राजा (रावण) यदि इस बात को जान ले, तो उसकी क्या दशा होगी ? अपनी अंजन-रूपी आँखों से नीर की वर्षा करती हुई, रोती-कलपती धरती पर लोटने लगीं।

निद्रा करनेवाली कुछ राक्षस-तरुणियाँ, मधुर स्वप्न के आनन्द को भूल गईं। मेघ की समता करनेवाले केशों को अस्तव्यस्त किये हुए, शिथिल वस्त्रों तथा कंपित स्तनों के साथ घर से निकल पड़ीं और दुःख में रोने लगीं।

अरण्यकाण्ड ३६३

खुले केश-पाशवाली कुछ राक्षस-स्त्रियाँ, यह कहकर कि शिव के कैलास को अपने विशाल करों में उठानेवाले हमारे पराक्रमी प्रभु की बहन की यह दशा हो गई है। हाय। शोक से उद्विग्न हुईं, स्तनों पर अपने करों से आघात करने लगी और उस स्त्री (शूर्पणखा) के पैरों पर आ गिरीं।

कुछ राक्षस-स्त्रियाँ, यह कहकर कि 'अपने हाथ में शूल को रखनेवाले हमारे प्रभु के रहने के कारण लंका के पशुओं ने भी कभी ऐसा दुःख नहीं भोगा, अब क्या हमारे सब सुकृत मिट गये हैं?' दुःखी हुईं और अपने अति सुन्दर नयनों से अश्रु की धारा बहाने लगीं।

जब लंका-नगर इस प्रकार दारुण दुःख में निमग्न हो रहा था, तब शूर्पणखा, पर्वत-सानु पर आकर झुकनेवाले मेघ के समान सभा-मंडप में प्रविष्ट होकर राक्षसराज (रावण) के स्वर्णमय विशाल वीर-कंकण से भूषित पैरों पर आ गिरी। अकस्मात् उसको उस रूप में देखकर उस मंडप में बैठे हुए और खड़े हुए सब लोग भय से भाग निकलने का मार्ग देखने लगे।

तीनों लोकों में अंधकार छा गया। (धरती का भार वहन करनेवाला) शेषनाग भयभीत होकर अपने फनों को झुकाने लगा, कुलपर्वत हिल उठे, सूर्य कांतिहीन हो गया, दिग्गज अपना स्थान छोड़कर भागने लगे, देवता भय से यत्र-तत्र छिपने लगे।

उज्ज्वल-वलयभूषित (रावण की) भुजाएँ फूल उठीं, उसकी आँखों से चिनगारियाँ निकलने लगीं, दाँतों से अग्नि-ज्वालाएँ फूट निकलीं, कुंचित भौंहें ललाट के मध्य जा पहुँचीं। (रावण का क्रोध देखकर) सब भुवन डाँवाडोल हो उठे, देवता किंकर्तव्य-विमूढ़ होकर खड़े रहे।

दक्षिण दिशा के शासक यम के साथ सब देवता, यह सोचकर कि अब हमारे विनाश का समय आ गया है चुपचाप पड़े रहे। स्वर्गलोक के निवासी तथा इहलोक के निवासी भी भ्रांत होकर थर-थर काँपते हुए, उसाँसे भरते हुए घबराई हुई दशा में अवाक् हो खड़े रहे।

रावण के (कोप के कारण) दाँतों से दबे हुए ओंठवाले बिल-समान मुँहों से धुआँ निकलने लगा। उसने श्वास छोड़ा, तो पंक्तिशः रहनेवाली उसकी मूँछों में आग लग गई, उसके तीक्ष्ण तथा उज्ज्वल दंत बिजली के जैसे चमक उठे, यो मेघ के गर्जन के समान गरजकर उसने पूछा—'यह किसका कार्य है?'

शूर्पणखा ने उत्तर दिया—अरण्य में मीनकेतन (मन्मथ) के समान रूपवाले, स्वर्ग-वासियों एवं पृथ्वी के निवासियों में अपना उपमान कहीं भी न पानेवाले दो मनुष्य राजकुमार आये हैं। उन्होंने ही करवाल से (मेरे अंगों को) काट दिया है।

शूर्पणखा के यह कहते ही कि मनुष्यों ने यह कार्य किया है, रावण ने ऐसा ठहाका भरा कि सारी दिशाएँ गूँज उठीं। उसकी बीसों आँखों से चिनगारियाँ निकल पड़ीं। फिर शूर्पणखा से बोला—मनुष्यों का पराक्रम तो अतिक्षुद्र होता है, क्या तुम्हारा कथन सत्य है? असत्य कहना छोड़ दो; भय को दूर करो और यथार्थ घटना बताओ।

३६४ | कम्ब रामायण

तब शूर्पणखा कहने लगी—वे अपने रूप-सौंदर्य में मन्मथ की समता करनेवाले हैं, अपनी पुष्ट भुजाओं के बल से मेरु पर्वत की दृढ़ता को भी मिटाने में समर्थ हैं, एक क्षण-भर में सप्त लोकों के निवासियों के पराक्रम को मिटा सकते हैं। उनके गुणों का वर्णन मैं अब कैसे कर सकती हूँ ?

वे लोग मुनियों के प्रति आदर-भाव दिखाते हैं। गगन के चंद्र के सदृश मुखवाले हैं। तरंग-भरे जल में नाल पर शोभायमान सुरभित कमल के दल-सदृश नेत्रवाले हैं, वैसे ही (अर्थात्, कमल-तुल्य ही) कर-चरणवाले हैं, अपार तपस्या से संपन्न हैं। उनकी समता करनेवाले कौन हैं ? (अर्थात्, नहीं हैं।)

वे वल्कलधारी हैं। विशाल वीर-वलयधारी हैं। वक्ष पर सुन्दर सूत्र (यज्ञोपवीत) से शोभायमान हैं। धनुर्विद्या में निपुण हैं। वेद के आवास वाणी से युक्त हैं। कोमल पल्लव-सदृश (मृदुल) शरीरवाले हैं। तुमसे भयभीत नहीं होनेवाले हैं। तुम्हें धूलि के समान भी नहीं समझनेवाले हैं। शब्द-रूप शास्त्रों के समान ही अक्षय रहनेवाले तूणीर धारण करनेवाले हैं।

उत्तम चरित्रवाले मुनियों ने उन दोनों के निकट आकर निवेदन किया कि अपने मन को संयम से रखनेवाले हमलोग राक्षसों से आशंकित हैं। इसपर उन मनुष्यों ने शपथ की कि सब लोकों को जीतनेवाले रावण के कुल का हम समूल विनाश करेंगे।

हे प्रभु ! क्या एक ही लोक में दो मन्मथ निवास करते हैं ? क्या धनुर्विद्या में उनसे अधिक निपुण कोई हैं ? क्या उनकी समता करनेवाला कोई एक भी व्यक्ति है ? उन दोनों में से प्रत्येक, अकेले ही, त्रिमूर्त्तियों की समता करता है।

सारे भूमंडल में अपना शासन-चक्र प्रवर्तित करनेवाले दशरथ नामक प्रशस्त राजा के वे दोनों पुत्र हैं। किंचित् भी दोष से रहित हैं। अपने पिता की आज्ञा से दुर्गम अरण्य में आकर निवास कर रहे हैं। उनके नाम राम और लक्ष्मण हैं।—यों शूर्पणखा ने कहा।

अमृत-सदृश प्यारी बहन (शूर्पणखा) की नासिका को तीक्ष्ण करवाल से काटनेवाले, मनुष्य हैं। काटने के पश्चात् भी वे जीवित हैं। ऐसा होने पर भी नवीन खड्ग को धारण किये हुए रावण, किंचित् भी लज्जित हुए बिना, नयन खोलकर देखता हुआ अभी तक प्राण रखे हुए है।—इस प्रकार रावण कहने लगा।

सर्वत्र विजय पाकर, अपने पराक्रम से राज्य को प्राप्त करने पर भी अन्त में मुझे यही (अपयश) मिला है। मेरा सारा यश मिट गया। संसार के समस्त वीरों के शिर कट जाने पर भी, मेरा खोया हुआ मान किस प्रकार लौटकर आ सकता है ?

मुझे इस प्रकार अपमानित करनेवाले मनुष्य भी अभी तक जीवित हैं। उनके प्राण अभी स्थिर हैं और मेरा यह खड्ग भी अभी मेरे हाथ में वर्त्तमान है। समुद्र में उत्पन्न विष को पीनेवाले (शिव) के द्वारा प्रदत्त मेरी आयु भी बनी हुई है। मेरी भुजाएँ भी हैं तथा मैं भी (वैसा ही) हूँ।

हे मेरे मन ! क्या यह सोचकर कि ऐसा अपवाद शूल बनकर तुझ में चुभ गया है, तू लज्जित हो छटपटा रहा है, तू व्याकुल न हो। इस अपवाद को धोने के लिए मेरे दस

अरण्यकाण्ड ३६५

शिर ह । उन (शिरो) से भी अधिक सख्या मे मेरी भुजाएँ है । फिर, तुझे क्या क्लेश हो सकता है ?

यो कहकर वह (रावण) हँसने लगा और अपनी आँखो से चिनगारियाँ निकालने लगा । फिर पूछा—ऊँचे पर्वतों से भरे दडकारण्य मे रहनेवाले खर आदि राक्षसो ने क्या इन निस्सहाय मनुष्यो को अपने शस्त्रो से मिटा नही दिया ?

रावण के ये बच्चन कहते ही, शूर्पणखा निर्झर के समान अश्रु बहाती हुई, अपनी छाती पीटती हुई, धरती पर लोट-लोटकर रोने लगी और बोली—हे तात ! हमारे वे बन्धु भी शीघ्र उन (मनुष्यो) के द्वारा ध्वस्त हो गये । फिर, सिर पर हाथ धरकर सारा वृत्तात कहने लगी ।

खर आदि वृषभ-सदृश वीर, मेरे मुँह से घटित वृत्तात को सुनकर अपनी सारी सेना को लेकर बड़े कोलाहल के साथ वहाँ गये और सूर्य-किरणो का स्पर्श पाकर विकसित कमल की समता करनेवाले अरुण नयनों से शोभित राम नामक वीर के धनुष से तीन घड़ी के अन्दर ही वे स्वर्ग मे जा पहुँचे—यों शूर्पणखा ने कहा ।

'उसके भाई (खर और दूषण), एकाकी राम के साथ के युद्ध में, अपनी विजय माला-भूषित सेना के साथ मारे गये'—यह वचन उसके कानो मे पहुँचने के पूर्व ही रावण की विशाल आँखे, वज्र और जलधारा को गिरानेवाले मेघ के समान अश्रुओं के साथ अग्निकण उगलने लगी ।

उस समय रावण के मन मे जो क्रोध उत्पन्न हुआ, उससे दबकर उसका दुःख, अग्नि मे पडे घृत के जैसा काम करने लगा । उसने प्रश्न किया—वे मनुष्य तुम्हारी नाक और कान काटे—ऐसा तुमने कौन-सा अपराध किया ?

शूर्पणखा ने उत्तर दिया—किसी के द्वारा चित्रित करने के लिए असम्भव रूपवाले उन ( राम ) के साथ (एक स्त्री आई हुई है, वह) कमल के आवास को छोड़कर आई हुई लक्ष्मी के समान है, बिजली के तुल्य कटि से शोभित है, बाँस के जैसे कोमल कंधोवाली है एव स्वर्ण के रग की देहवाली है । उस नारी के निकट मैं गई थी, बस इतना ही मेरा अपराध था ।

यह सुनकर रावण ने पूछा—वह नारी कौन है ? तब उस राक्षसी ने कहा—हे प्रभु ! उस नारी का जघन-तट चक्रवाला रथ है, उसके स्तन रक्त-स्वर्ण के कलश हैं, जिनपर इगुर्दिक धातु के सपुट लगे हैं, यह भूमि का बड़ा सौभाग्य है कि उस नारी के पद-तल का स्पर्श उसे मिला है । अहो ! उसका नाम सीता है ।—यो कहकर शूर्पणखा सीता के रूप का वर्णन करने लगी ।

उसकी वाणी भ्रमरों की गुजार तथा मधु के समान रस-भरी है, उसके केशपाश मधुपूर्ण पुष्पो से सुवासित है । अप्सराओ के लिए भी पूजनीय, कमल में निवास करनेवाली सुन्दरी लक्ष्मी उसकी दासी बनने के लिए भी योग्य नहीं है । यह कहना भी कि हम उसके सौंदर्य का वर्णन करेंगे, अज्ञान का कार्य होगा ।

हे प्रभु ! अपनी वाणी को अमृत से भर-भरकर लानेवाली (अर्थात् . अमृत-समान

३६६कंब रामायण

मीठी बोलीवाली) उस नारी के अलक, मेघ-समान हैं। सुसज्जित केश-पाश, झुके हुए सजल घन की समता करते हैं। उसकी उँगलियाँ, रक्त-प्रवाल के तुल्य हैं। उसका वदन, यद्यपि निर्दोष कमल-पुष्प के परिमाण का है, तथापि उसके नयन समुद्र से भी अधिक विशाल हैं।

'मन्मथ शिव के नेत्र की अग्नि से जल गया'—यह कथन सत्य नहीं है। सत्य बात तो यह है कि उस मन्मथ ने, स्वाभाविक सुगंधि से भरे केश-पाशवाली उस सीता को देखा, किन्तु उसके सौंदर्य को अपनाने में असमर्थ रहा, जिससे अवर्णनीय पीडा से दुःखी होकर उसका शरीर क्षीण हो गया, इसीलिए वह अनंग बन गया !

हमारे शत्रु-देवों के लोक में जाकर ढूँढ़ो, फनवाले नागों के लोक में जाकर ढूँढ़ो, कहीं भी वैसी रूपवती नहीं मिलेगी। लुहार की गरम भट्ठी में तपाकर बनाये गये बरछे और करवाल को भी परास्त करनेवाले नयनों से शोभित वह नारी इसी धरती पर है, किन्तु किसी के लिए भी उसका चित्र अंकित करना असंभव है।

क्या मैं उसके कटी की सुन्दरता का वर्णन करूँ ? या उसके उज्ज्वल मुख पर स्पंदित होनेवाले मीनों (अर्थात्, नयनों) का वर्णन करूँ ? या अन्य अति मनोहर अंगो का वर्णन करूँ ? मैं पुनः-पुनः चकित रह जाती हूँ, किन्तु उसका वर्णन नहीं कर पाती हूँ। तुम तो कल स्वयं ही उसे देखनेवाले हो तो फिर मैं क्यो तुमसे उसका वर्णन करके बताऊँ।

यदि यह कहे कि उसकी भौंहें धनुष के समान हैं, उसके नेत्र बरछे के समान हैं, उसके दाँत मोतियों के समान हैं, उसका अधर प्रवाल के समान है, तो यह केवल कथन-मात्र होगा। वास्तव में ये सब उपमान उसके अवयवों के योग्य नहीं हैं। अतः, कहने योग्य उपमान कुछ भी नहीं है। इस प्रकार का उपमान देने की अपेक्षा तो यही कहना अधिक संगत होगा कि धान धान के समान ही है (अर्थात्, धान की उपमा धान से ही दी जा सकती है।)

हे प्रभु, इन्द्र ने शची देवी को पाया है। षण्मुख (कार्तिकेय) के पिता (शिव) ने उमा को पाया है। कमलनयन (विष्णु) ने सुन्दर लक्ष्मी को पाया है। यदि तुम सीता को पा लोगे, तो फिर वे (इन्द्र, शिव और विष्णु) तुम से छोटे रह जायेंगे। इससे तुम्हारा महत्त्व उनसे अधिक बढ़ जायगा।

गगनोन्नत कंधोंवाले हे वीर ! एक (अर्थात्, शिव) ने (अपनी देवी को) अर्धाङ्ग में रख लिया- एक (विष्णु) ने कमलभव लक्ष्मी को अपने वक्ष पर रख लिया। ब्रह्मा ने वाणी देवी को अपनी जिह्वा पर रख लिया, यदि तुम घन की विद्युत् को परास्त करनेवाली सूक्ष्म कटि से शोभित उस सीता को पाओगे तो उसे कहाँ रखोगे ? (भाव यह है—सीता तुम्हारे लिए शिर पर धारण करने योग्य है।)

हे प्रभु ! हे नरदार ! शिशु की सी मधुर बोलीवाली उस सीता को पाने पर तुम कुछ भी कमी का अनुभव नहीं करोगे। तुम अपनी इस संपत्ति को, जिसे दूसरों पर लुटा रहे हो, उसी को दे दोगे। मैं तुम्हारा हित करनेवाली हूँ, किन्तु तुम्हारे अन्तःपुर में रहनेवाली शुक की-सी बोलीवाली सब युवतियों का आहत अवश्य कर रही हूँ।

अररायकाण्ड३६७

रथ-तुल्य जघन-तट से शोभित वह सीता, देवलोक में या इस लोक में किसी कंचुक-बद्ध स्तनवाली स्त्री के गर्भ से उत्पन्न नहीं है। पूर्वकाल में, शंख के समान श्वेत जलवाले समुद्र ने, देवासुरों के द्वारा मथे जाने पर प्रफुल्ल कमल में आसीन लक्ष्मी को उत्पन्न किया था। अब भूमि, उस लक्ष्मी को भी परास्त करनेवाली सीता को देकर धन्य हुई है।

मीनकेतन के आनन्द को बढ़ाते हुए, संसार की प्रशंसा का पात्र बनते हुए, भ्रमरों से आवासित पुष्पों से विभूषित कुन्तलोंवाली तथा सूक्ष्म कटिवाली सीता को तुम अपना स्वत्व बना लो और अपने पराक्रम का प्रदर्शन करके राम को मेरे वश में दे दो।

हे मेरे प्रभु ! यद्यपि भाग्य हमें (जीवन के) फल प्रदान करता है, तो भी महान् तपस्वियों को भी वे फल, समय पर ही प्राप्त होते हैं। उसके पूर्व नहीं मिलते हैं। दस मुख, बीस नयन, बीस हाथ, सुन्दर रूप और मनोहर वक्ष से शोभायमान तुम अब आगे चल-कर ही बड़ा गौरव प्राप्त करनेवाले हो।

इस प्रकार की सीता को तुम्हारे पास पहुँचाने के विचार से मैं उसके निकट गई, तब उस राम के भाई ने बीच में पड़कर चमकते हुए कटार से मेरी नाक काट दी। मेरा जीवन तो तभी समाप्त हो गया। फिर भी, इस विचार से कि तुम्हारे सम्मुख आकर सारा वृत्तांत बताने के पश्चात् ही अपने प्राण त्याग करूँगी, यहाँ आई हूँ, यों शूर्पणखा ने कहा।

(शूर्पणखा के वचन सुनते ही रावण के मन में) क्रोध, वीरता, अभिमान के कारण उत्पन्न ताप—ये सब इसी प्रकार मिट गये, जिस प्रकार पाप के रहने के स्थान से धर्म मिट जाता है और जिस प्रकार एक दीप, दूसरे दीप के स्पर्श से प्रज्वलित होता है। उसी प्रकार रावण के मन में काम-व्याधि और उससे उत्पन्न होनेवाले ताप ने घर कर लिया।

रावण खर को भूल गया, अपनी बहन की नाक को काटनेवाले वीर के पराक्रम को भूल गया, उससे उत्पन्न अपने अपयश को भूल गया, शिव को जीतनेवाले मन्मथ के बाणों के प्रभाव के कारण वह पूर्वकाल में प्राप्त अपने वरों को भी भूल गया, किन्तु सीता, जिसके रूप के विषय में उसने अभी सुना था, उसको नहीं भूल सका।

सूक्ष्म कटिवाली सीता का नाम और रावण का मन दोनों एक होकर रह गये। अब सीता के अतिरिक्त अन्य किसी विषय के बारे में सोचने के लिए भी उसके पास दूसरा मन कहाँ था ? सीता को भूलने का कोई उपाय ही उसके पास नहीं था। पढ़े-लिखे व्यक्ति भी जबतक आत्म-ज्ञान नहीं प्राप्त करते, तबतक वे काम को कैसे जीत सकते हैं ?

उन्नत प्राचीरवाली लंका का अधिपति, कलापी-तुल्य रूपवाली सीता का हरण करके बंदी बनाने के पूर्व ही उसको अपने मन-रूपी कारागार में बंदी बना लिया। धूप के स्पर्श से मक्खन जैसे पिघलता है, उसी प्रकार शूलधारी रावण का हृदय धीरे-धीरे पिघलने लगा।

विधि की विडंबना के कारण, भावी की प्रबलता के कारण एवं उस लंका का विनाश निकट आने के कारण रावण की काम-व्याधि उसकी सब इन्द्रियों में उसी प्रकार व्याप्त हो गई, जिस प्रकार विद्याविहीन मूढ़ व्यक्ति का छिपकर किया हुआ कोई पाप-कर्म सर्वत्र प्रकट हो जाता है।

३७० कंब रामायण

अत्यन्त शिथिल हो गया। तब उसने अपने परिजनों को आज्ञा दी कि तुमलोग जाकर शीघ्र चंद्रमा को ले आओ, क्योंकि लोग कहते हैं कि वह शीतल होता है।

परिजनों ने जाकर उस पूर्णचंद्र से, जो दारुण क्रोधवाले राक्षस (रावण) के द्वारा शासित उस विशाल लंकापुरी के ऊपर जाने से भी डरता था, कहा कि—डरो नहीं, शीघ्र आओ। राजा तुझे बुला रहा है। इसपर चंद्र अपने मन की अधीरता को छोड़कर आकर प्रकट हुआ।

युद्ध में परास्त होकर बैर को छिपाकर दबे रहनेवाले लोग, अपने शत्रु के कमजोर पड़ने पर जिस प्रकार उस (शत्रु) को सताने के लिए आगे बढ़ जाते हैं, उसी प्रकार मंडलाकार चंद्र रावण के प्राणों के लिए यम-जैसा बनकर, सूक्ष्म सिकता से युक्त जल-भरे समुद्र से उदित हुआ।

चंद्रमा, अपनी अवर्णनीय किरणों को सब दिशाओं में फैलाकर ऊपर उठा और स्वर्ग तथा धरती के निवासियों में से किसी के लिए भी प्रिय न होनेवाले उस रावण को सताता हुआ (वह चंद्र) इस प्रकार दिखाई पड़ा, जैसे आदिशेष पर शयन करनेवाले विष्णु के द्वारा रावण के वध के लिए भेजा गया चक्रायुध ही हो।

क्षीर-सागर के अमृत को छक-छककर पान करनेवाला चंद्रमा, अपनी शीतल किरणों के समुदाय को चारों ओर व्याप्त करने लगा। वह चंद्रिका टेढ़ी भौंहों और लाल आँखोंवाले रावण को ऐसी लगी, जैसे आग में पिघली हुई चाँदी भर-भरकर चारों ओर छिड़की जा रही हो।

चंद्र-किरणें, जो धरती पर संचरण करनेवाली बिजली-सी लगती थीं, लाल धान के मनोहर खेतों से आवृत मिथिला नगर के राजा की पुत्री के सौंदर्य का वर्णन सुनकर विरह-पीड़ा से तप्त होनेवाले रावण को उसी प्रकार जलाने लगीं, जिस प्रकार कभी पराजित न होनेवाले शत्रु की कीर्ति किसी वीर को जलाती है।

वीर-कंकणधारी यम भी जिसको देखकर भयभीत होता है, उस रावण ने पूछा— मैंने कहा था कि शीतल किरणोंवाले चंद्र को ले आओ, तो जलानेवाली आग और दारुण विष में बुझी हुई तपती किरणों से युक्त सूर्य को कौन ले आया ?

उस समय, कुछ दासों ने भय के साथ निवेदन किया—हे प्रभु ! यह कथन सत्य नहीं है कि जिसे लाने की आज्ञा नहीं हुई थी, उसे हम लाये हैं। अरुण किरणोंवाला सूर्य सदा रथ पर ही आता है। यह चंद्रमा यद्यपि आपको उष्ण किरण-सा लगता है, तो भी विमान पर ही आरूढ़ है।

सर्प के फन के जैसे जघन-तट तथा शीतल वचनों से युक्त रमणियों के प्रति होने-वाले प्रेम की वेदना को उस (रावण) ने इससे पहले कभी नहीं जाना था। वह अब चंद्रमा से अत्यन्त पीड़ित हुआ। अब उसे ज्ञात हुआ कि शीतल और मनोहर कमल-पुष्पों का शत्रु चंद्रमा, यही है। फिर, उस चंद्र से प्रार्थना करने लगा कि हे चंद्र ! तू मेरे प्राणों को ला दे।

रावण कहने लगा—हे नक्षत्रों के पति ! तू क्षीण होता है। तेरा शरीर श्वेत

अरण्यकाण्ड ३७१

पड़ गया है। तेरा अन्तर काला हो गया है। अपना सहज गुण—शीतलता—छोड़कर तू तप रहा है, क्या तू भी अकेला रहता है और किसी सुन्दरी को देखे हुए व्यक्ति से उस (सुन्दरी) के सौंदर्य की चर्चा सुनी है? (जिससे वो विरह से पीड़ित हो रहा है)। मेरे हृदय में पुष्पवाण बिना रोक टोक के लग रहे हैं। उनसे मेरी रक्षा करनेवाला कोई नहीं है। अब मेरे प्राणों को कौन बचायेगा ?

मेरे प्राणों के लिए यम बनी हुई उत्तम कुलजात उस सीता के दो कुवलयों-जैसे शोभायमान कमल (जैसे वदन) से तू पराजित हो गया है, इसीलिए तू काला पड़ गया है, क्षीण हो गया है और तप्त हो उठा है। यदि शत्रु की सम्पत्ति को देखकर ही इस प्रकार मिट गये, तो तू विजय कैसे पा सकता है? बुद्धिमान् व्यक्ति (शत्रु को हराने के) पराक्रम से रहित होते हैं, तो विवेक से अपने ऊपर संयम रखते हैं।

इस प्रकार, अनेक वचन कहकर वह पीड़ित होता रहा। फिर, उसने परिजनों को आज्ञा दी कि इस चन्द्र को रात्रि-सहित यहाँ से हटा दो और सूर्य को दिन सहित ले आओ। उसके यह कहने के पूर्व ही उपेक्षित चन्द्रमा और रात्रिकाल हट गये। एक क्षण काल में ही अवर्णनीय सूर्य तथा दिन का समय आ पहुँचा।

वेद की ऋचाओं को जाननेवाले (ब्राह्मण) अग्नि में घृत डालकर जब होम करते हैं तब जिस प्रकार वह अग्नि प्रज्वलित होती है, उसी प्रकार पिघले हुए ताँबे के जैसी किरणों- वाला सूर्य प्रकाशमान हुआ। उससे रक्त-कमल विकमित हुए। सूर्य के आगमन से रक्त कुमुद दबकर निर्जीव-से हो गये। वे उन क्षुद्र व्यक्तियों के जैसे थे, जिन्होंने अपने लिए अयोग्य उत्तम पदार्थों को प्राप्त कर उससे गर्वित होकर फिर उन्हें खो दिया हो।

विश्व के आभरण-जैसे रहनेवाला सूर्य एक दिशा में आकर प्रकट हुआ, तो चन्द्रमा लज्जित हो, कांतिहीन हो, काँपता हुआ और अपनी पत्नी—रात्रि द्वारा अनुसृत होता हुआ, दूसरी दिशा में गगन-मध्य से टल चला। वह उस क्षुद्र राजा के समान था, जो किसी यशस्वी तथा पराक्रमी शासक की आज्ञा से अपने स्थान को छोड़कर चला जाता है।

विविध कर्णाभरणों से भूपित जो राक्षस-सुन्दरियाँ पुष्प-पर्यंकों पर अपने पतियों के समागम का सुख उठाती हुई प्रणय-कलह में क्रुद्ध हो गई थीं, अब हठात् रात्रि के हट जाने पर भी उस बात को न जानकर, स्वप्न में भी मान करती हुई (निद्रित) पड़ी रहीं।

कुछ राक्षस-स्त्रियाँ, अर्धरात्रि में ही हठात रात्रि के समाप्त हो जाने के कारण, मुमूर्षु-प्राण सी हो गई, थरथराती हुई काँप उठी और उनकी आँखों से आँसू इस प्रकार बह चले, जिस प्रकार प्रफुल्ल नीलोत्पल से मधु-बिंदु बह चलते हैं।

कुछ राक्षस-स्त्रियाँ, जो रूई के कोमल पर्यंक पर काम-सुख का आनन्द प्राप्त कर चुकी थी, वृक्ष की पुष्ट शाखा से लिपटी हुई लताओं के समान, अपने प्राण-पतियों के पुष्प-सदृश दोनों बाहों द्वारा दृढ़ता से बँधी हुई, निद्रित पड़ी थीं।

उत्तम मत्तगज, जो उनके कुंभों पर गुंजार करते हुए मँडरानेवाले भ्रमरों के झुंड को और उज्ज्वल सूर्य-प्रकाश को न जानते हुए नीचे पड़े थे, उन मद्यपों के समान ये कोमल शय्या पर प्रज्ञहीन होकर निद्रामग्न रहते हैं।

३७२कंब रामायण

जिस प्रकार कुल-नारियाँ, विद्या-वृद्धि से युक्त अपने प्रियतमो से वियुक्त होकर कांतिहीन हो जाती हैं, उसी प्रकार, वहाँ के प्रासादों में रखे हुए दीप, तेल के न घटने पर भी, निष्प्रभ हो गये।

प्रभात-काल में विकसित होनेवाले पुष्प, उनके सुन्दर दलों को खोलनेवाले सूर्योदय के होने पर भी, प्रफुल्ल न होकर, विशाल पर्यंक पर सोई हुई सुन्दरी के बन्द नयनों के जैसे बंद पड़े रहे।

सब लोग गहरी निद्रा में सो रहे थे। अतः, उनकी आँखें सचमुच प्रभात होने पर भी नहीं खुलीं। वे आँखें किसी को भिक्षा देने का विचार न करनेवाले लोभियों के बड़े घरों के दरवाजों के समान बंद थीं।

चक्रवाक दिन के निकल आने से विष-सदृश वियोग-पीडा से मुक्त हुए और कठोर कारावास से मुक्ति पानेवाले अपराधी के हृदय के समान आनंद से भर गये।

चन्द्र के कर-स्पर्श के अतिरिक्त अन्य किसी भी उपाय से विकसित न होनेवाले पुष्पों की ओर संगीत गानेवाले भ्रमर झपटे थे। लेकिन (इतने में चन्द्र के अस्त होकर सूर्य के उदित हो जाने से, उन बंद हुए पुष्पों से निकट) कला की महत्ता को नहीं जाननेवाले लोगों के दरवाजे पर दुःखी होकर खड़े रहनेवाले भाट लोगो के समान वे भ्रमर दुःखी होकर रह गये।

सूर्य की उष्ण किरणें, अपूर्व रत्नों से जटिल वातायनों के मार्ग से (प्रासादों के) भीतर पहुँचकर निद्रा-मग्न सुन्दरियों को जगाने लगीं। किन्तु, वे (स्त्रियाँ) सत्य को स्पष्ट न जाननेवाले लोगों के समान, तंद्रा और जागरण की मिश्रित दशा में पड़ी रहीं।

रावण की कठोर आज्ञा से परिचय न रखनेवाले विद्वान्, जो ज्योतिष-शास्त्र लिख रखा था, उसे भली भाँति जानकर कुछ गणित-शास्त्र में कुशल व्यक्ति अभी तक सोये पड़े थे। (प्रभात-काल मे) टेर लगानेवाले कुक्कुट भी सो रहे थे।

संसार में इस प्रकार के व्यापार हो उठे थे। ऐसे समय में शब्दायमान वीर-कंकणधारी रावण ने आँख उठाकर सूर्य को देखा और बोला—यह (सूर्य) उसका ध्यान करनेवाले के मन को भी तपाता है। अतः, पहले यहाँ आकर जिस चन्द्र ने हमको तपाया था, यह भी वही है।

तब कुछ दासों ने निवेदन किया—हे ईश! यह चन्द्र नहीं है। यह अरुण-किरणवाला सूर्य ही है। देखिए, इसके रथ मे दीर्घ केसरोंवाले मनोहर हरित अश्व जुते हैं। उष्ण किरणोंवाला सूर्य शरीर को तपाता है। किंतु, शीतल रहनेवाला चन्द्र नहीं तपाता।

शिखरों से शोभित नील पर्वत के जैसे रावण ने उन (दासों) से कहा कि यह सूर्य विष से अधिक दारुण है। अतः, इसे यहाँ से हटा दो। समुद्र के गर्जन को भी बन्द कर दो और संध्या-वेला में, पश्चिम दिशा में, प्रकट होनेवाली चन्द्र-कला को शीघ्र ले आओ।

राक्षस-राज ने यह वचन कहा। यह कहते ही, षोडश कलाओं से शोभायमान

अरण्यकाण्ड ३७३

चन्द्र तुरन्त तृतीया का चन्द्र बनकर एक ओर प्रकट हुआ। अब कहो तो सदा प्रभावशाली रहनेवाली तपस्या से बढकर योग्य कार्य दूसरा कौन-सा है?¹

पश्चिम दिशा में उदित उस चन्द्रकला को देखकर, क्रूर गुणवाला रावण कहने लगा—यह (चन्द्रकला) वडवाग्नि है, वह नहीं, तो यह धरती का वहन करनेवाले शेषनाग का विष-दन्त है, अगर वह भी नहीं है तो, मध्या-काल मुझे मारने के लिए ही इस (चन्द्रकला-रूपी) कटार को लेकर आया है।

पूर्वकाल में जब शीतल तरंगों से पूर्ण समुद्र से दारुण विष उत्पन्न हुआ, तब उसे अपने कंठ के भीतर रखनेवाले शिव ने इस चन्द्रकला को भी पुण्य-रज से पूर्ण अपने जटाजूट में रख लिया था. शायद वह इसी कारण से होगा कि यह (चन्द्र-कला) भी विषमयी है।

वज्र के समान भयकर रूप में सञ्चरण करते हुए जिस चंद्र ने मेरे प्राण पी लिये थे, उससे, उसका यह परिवर्तित लघु रूप, कठोरता में कुछ कम नहीं है। दारुण कोप से भरे विषमयी सर्प के बड़े आकार की अपेक्षा उस (सर्प) का छोटा रूप क्या अपने विष के प्रभाव में कुछ कम होता है?

(फिर, रावण कहने लगा) अति घोर अंधकार का गुण कैसा होता है—यह भी देखें। इस चन्द्रकला से तो पूर्व आगत सूर्य ही अच्छा था। इस (चन्द्रकला) को शीघ्र हटा दो। पराक्रम से प्रसिद्ध रहनेवाले मुझ को ही यह (चन्द्रकला) तपाती है, तो अब यह कैसे कहा जा सकता है कि मत्त लोकों में कोई इसकी पीडा से बचकर जीवित रह सकता है?

उस समय, उस चन्द्रकला के हट जाते ही अंधकार इतना घना होकर आ पहुँचा कि उसे छुआ जा सकता था। उसपर किसी भी वस्तु को रगड़ा जा सकता था। चाहे तो कोई उसे (अर्थात्, अंधकार को) खड्ग से काट सकता था या उसे (अंधकार को) खराद पर चढ़ाकर उसके खंभे बनाकर रखा जा सकता था।

अब क्या यह कहा जाय कि उस अंधकार को काठ की तरह काट-काटकर टुकड़े बनाकर फेंका जा सकता था? वह अंधकार इतना काला था, जितना निर्दोष तत्त्वज्ञान-रूपी प्रकाश के प्रविष्ट न होने से अंधा बनकर किंचित् भी दयाभाव से हीन (किसी भ्रष्ट व्यक्ति का) हृदय काला होता है।

कहीं भी भिन्न न रहनेवाला (अर्थात्, अत्यन्त घना रहनेवाला) वह अंधकार अंतराल को सर्वत्र भरकर व्याप्त हुआ और सारी धरती को निगल लिया। तब रावण ने कहा—(शायद) विष को निगलनेवाले शिव ने यह न सोचकर कि यह (विष) सारे विश्व को मिटा देगा, उसे उगल दिया है।

मैंने ठीक-ठीक जान लिया है कि यह (अंधकार) समुद्र से उत्पन्न होकर शिवजी के द्वारा निगला गया विष नहीं है। यह, धरती, आकाश आदि सब प्रदेशों को अपनी जिह्वाओं से चाटनेवाली प्रलयाग्नि ही है, जो काले हलाहल विष को पीकर स्वयं कालीपड़ गई है।


१. भाव यह है—रावण ने पूर्वकाल में बड़ी तपस्या की थी, जिसके परिणामस्वरूप चन्द्र-सूर्य आदि भी उसकी आज्ञा के पालक बने हुए थे। अतः, तपस्या ही सबसे उत्तम कार्य है। —अनु०

३७४ कंब रामायण

बाण और अग्नि भी जिसमें प्रवेश करके उसे भिन्न नहीं कर सकते, ऐसे इस अंधकार में, मुक्त विरह से पीडित होनेवाले एकाकी व्यक्ति के सम्मुख अपना उपमान न रखनेवाली एक प्रवाल-लता (के सदृश सुंदरी), अपने ऊपर काले मेघ को धारण किये, नारिकेल के कोमल फल-युगल से शोभित होकर, एक चंद्र को भी धारण किये हुए, दीपक के समान प्रकाशमान हो रही है।

यह क्या मेरे मोह से उत्पन्न भ्रम है ? या मेरा ज्ञान ही किसी कारण से अन्यथा हो गया है ? स्पष्ट ज्ञात नहीं होनेवाला यह आकार क्या है ? अंजन का प्रवाह भी जिसकी ममता नहीं कर सकता, ऐसे इस घने अंधकार में एक उज्ज्वल पूर्ण-चंद्र, दो कुंडलों से शोभित होता हुआ, अति काले केशों के साथ मेरे सम्मुख आकर प्रकट हुआ है।

अपने दोनों पाश्र्वों में बढ़नेवाले स्तन-युगल तथा जघन-तट से संयुक्त होकर रहनेवाली कटि को हम नहीं देख पा रहे हैं। उसके अतिरिक्त अन्य सब अवयवों को हम देख रहे हैं। विषपूर्ण नयनोंवाला यह आकार धीरे-धीरे एक नारी बनकर मेरे मन में प्रविष्ट हो रहा है।

चिरकाल से मैं सप्त लोकों की सुंदरियों को देखता आ रहा हूँ, किन्तु उनमें इसके जैसे रूपवाली किसी स्त्री को कहीं नहीं देखा है। अवश्य यह अद्भुत रूपवती रमणी मेरी बहन शूर्पणखा के द्वारा बताई गई, भ्रमरों से आवृत केशोंवाली, वह तरुणी (सीता) ही है।

मेरी इस विरह-पीडा को जानकर कदाचित् वह (सीता) स्वयं मुझे ढूँढती हुई यहाँ आ गई है। उसके इस उपकार का मैं क्या प्रत्युपकार कर सकता हूँ? दर्शन-मधुर इस (सीता) को अपनी आँखों से शूर्पणखा ने देखा है। उसी से पूछकर मैं अपने संदेह को दूर कर लूँगा (यही सीता है या नहीं—यह संदेह दूर करूँगा)। इस प्रकार, विचार कर रावण ने अपने दासों को आज्ञा दी कि वे उसे (अर्थात्, शूर्पणखा को) शीघ्र वहाँ बुला लावें।

रावण की यह आज्ञा सुनते ही परिजन शीघ्र दौड़े और शूर्पणखा को समाचार दिया। तुरन्त वह (शूर्पणखा), जिसने पराक्रमी राक्षसों के कुल का समूल नाश करने के कार्य में लगी हुई, अपनी नासिका तथा कर्णाभरणों से भूषित कानों को खो दिया था, (राम के विरह में) कामाग्नि से तप्त होनेवाले मन के साथ (रावण के स्थान में) आ पहुँची।

शत्रुओं के रक्त में बुझे हुए तीक्ष्ण बरछे को धारण करनेवाले रावण ने, अगल के आवासभूत मनवाली क्रूर शूर्पणखा को वहाँ आये हुए देखकर पूछा- हे स्त्रीरत्न! मेरे सम्मुख खड़ी हुई अंजन-अञ्चित करवाल-तुल्य नयनोंवाली, कलापी-समान यह स्त्री ही क्या तुम्हारी बताई हुई वह सीता है ?

तब शूर्पणखा ने उत्तर दिया—अरुण कमल-जैसे नयनों, रक्त बिंबफल-समान अधर, मनोहर और उन्नत कंधों, लंबी दीर्घ बाहुओं तथा सुन्दर पुष्पमाला से भूषित वक्ष के साथ आया हुआ, अंजन-पर्वत सदृश दीखनेवाला यह दृढ धनुर्धारी रामचन्द्र है।

श्रोङ्गारकाण्ड ३७५

यह सुनकर रावण ने कहा—मैं यहाँ एक स्त्री का रूप देख रहा हूँ। हे मुग्धे ! तुम ऐसे एक पुरुष के रूप की बात कह रही हो, जो मेरे विचार में भी नहीं है, यह कैसे ? हम तो दूसरों की आँखों के सामने माया उत्पन्न करके उनको भ्रम में डालनेवाले हैं। क्या क्षुद्र मनुष्य हमारे सामने कोई माया कर सकते हैं ?

तब शूर्पणखा ने कहा—तुम्हारी बुद्धि सीता के ध्यान में निमग्न होकर अन्य किसी विषय में प्रवृत्त नहीं हो रही है। तुम ऐसी काम-वेदना से पीडित हो कि तुम्हारी आँखें जहाँ भी पड़ती हैं, वहाँ वही सीता दिखाई देती है। ऐसा भ्रम होना चिरकाल की बात ही है, (अर्थात्, कामुक लोग अपने प्रेम-पात्र को सर्वत्र देखते हैं) : यह कोई नई बात नहीं है ।

शूर्पणखा के यों कहने पर रावण ने उससे पूछा—ठीक है। वैसा ही होगा। किन्तु, तुम्हारी आँखों को वह राम क्यों दिखाई देता है ? इसका उत्तर शूर्पणखा ने यों दिया—जिस दिन (राम) ने मेरा प्रतिकार-रहित अपमान किया, उस दिन से अबतक मैं उसे भूल नहीं पाई हूँ ।

तब रावण ने कहा—सच है, तुम्हारा कथन संगत ही है। इस समय मेरी इस पीडा का निवारण किस प्रकार हो सकता है ? इसका उत्तर शूर्पणखा ने दिया—तुम समस्त विश्व के एकमात्र प्रभु हो। तुम क्यों इस प्रकार दीन हो रहे हो ? तुम जाओ और उस पुष्प-भूषित कुन्तलोंवाली सुन्दरी (सीता) को उठा लाओ।

यों कहकर वह (शूर्पणखा) वहाँ से हट चली। वह राक्षस (रावण) भी शक्तिहीन होकर, कुछ भी सोच नहीं पाता हुआ, व्याकुल प्राणी के न्याय पड़ा रहा। उसे उस दशा में देखकर समीप खड़े रहनेवाले लोग भी काँप उठे। फिर भी, वह (रावण) अपनी शेष रही आयु के प्रभाव से मरा नहीं।

कोई मृत व्यक्ति पुनः जीवित हो उठा हो, इस प्रकार उठकर वह रावण अपने पराक्रम का स्मरण करके वहाँ स्थित लोगों से कहने लगा कि धारा-रूप में जल को प्रवाहित करनेवाली चन्द्रकान्त-शिलाओं से एक अति सुन्दर मंडप का निर्माण करो।

देवशिल्पी, रावण के मन की बात जानकर तुरन्त आ पहुँचा और अपने संकल्पमात्र से ही नहीं, किंतु हस्त-कौशल को भी दिखाकर ऐसा एक सहस्र स्तम्भोंवाला अति सुन्दर मंडप निर्मित किया, जिसे देखकर ब्रह्मा भी लज्जित हो जाय ।

उस (देवशिल्पी) ने उस मंडप में ऐसी चंद्रकान्त-शिलाएं बिछाईं, जिनसे किरणों के स्पर्श के बिना ही, जल-धारा बह चलती थी। ऐसे वातायन भी निर्मित किये, जिनसे पुष्प की सुरभि से पूर्ण मन्द पवन संचरण कर सकता था। उसने सुन्दर लता-भवनों का एक मनोहर और शीतल उद्यान भी बनाया।

उभरे हुए कंधोंवाला रावण एक माणिक्यमय विमान पर आरूढ होकर, उस मंडप को देखने के लिए गया। उनके दोनों पार्श्वों में, रत्नों की उज्ज्वल प्रभाएं, गगन तक परिव्याप्त अंधकार को दूर करती हुईं, अपने सुन्दर रूपों में ज्योतिःपूर्ण दीप लिये आईं।

३७६ | कंब रामायण

वह अंधकार यद्यपि ऐसा था, जैसे अनेक सहस्र रात्रियों को एक करके रखा गया हो, तथापि उन सुन्दर रमणियों के वदन-रूपी शीतल चन्द्रिका को बिखेरनेवाले अत्युज्ज्वल तथा अनेक सहस्र कोटि चंद्रमंडल के एक हो जाने से, वह अंधकार छिन्न-भिन्न हो मिट गया।

अति मनोहर नव रत्नों से खचित पुष्पों से युक्त कल्पतरुओं से, सूर्य को भी लज्जित करनेवाला कांतिपुंज प्रकट हो रहा था, जिससे अंधकार मिट गया और दिन का-सा प्रकाश व्याप्त हो गया। सूर्य के उदित होते ही, उसकी दीर्घ किरणों के प्रभाव से, अंधकार मिटकर प्रभात हो जाता है न ? (उसी प्रकार कल्पतरुओं के प्रकाश से प्रभात हो आया।)

स्पर्श, शब्द आदि विषयों का ग्रहण करनेवाली जिसकी इंद्रियाँ एक समान मंद पड़ गई थीं, जिसका मन स्तब्ध हो गया था और जो कर्त्तव्य-ज्ञान से रहित हो गया था ऐसा वह रावण, इच्छा के आवेग से खींचा जाकर उस मंडप में इस प्रकार आकर प्रविष्ट हुआ, जिस प्रकार जन्मान्तर के समय प्राण नवीन शरीर के भीतर प्रविष्ट होते हैं।

निष्पाप तपस्या से संपन्न व्यक्तियों के सब अभीष्टों को पूरा करनेवाला तथा वर्तुलाकार मीनों से पूर्ण क्षीर-समुद्र ही मानो, अमृत के साथ, आ गया हो—ऐसा भ्रम उत्पन्न करनेवाले, गानेवाले भ्रमरों से आवासित, हरित वृक्षों के कोमल पल्लवों तथा पुष्प-दलों से निर्मित, शीतल पर्यंक पर आकर वह (रावण) लेट गया।

ऐसा मंद पवन, जो किसी मरनेवाले व्यक्ति के प्राणों को भी रोक सकता था, - सुन्दर आभरणों से भूषित सुन्दरियों के कुंतलों की सुगंधि को लेकर, वहाँ पर यों आ पहुँचा, जैसे उस सुगंधित उद्यान में मन्मथ को भोज देने के लिए क्षीर सागर ने अमृत भेजा हो।

रक्त-बिंदुओं और अग्निकणों को बरसानेवाली आँखों से युक्त वह रावण, वातायन से मंद पवन का संचार होने पर उसका सहन नहीं कर सका और इस प्रकार घबड़ा उठा, मानो कोई, अपने घर में अजगर को घुसते हुए देखकर भयभीत हो उठा हो। फिर, अपने समीपस्थ लोगों से उसने कहा—

मानो कुएँ का थोड़ा-सा जल सारे संसार को डुबो रहा हो, इसी प्रकार, देवों में एक, यह वायु मुझे पीड़ित कर रहा है। मेरी आज्ञा के बिना यह पवन यहाँ किस प्रकार घुस पाया? फिर, उसने आज्ञा दी कि द्वारपालकों को शीघ्र ले आओ।

उस समय, सेवक दौड़ चले और द्वारपालकों को शीघ्र ले आये। क्रूर रावण ने कठोर नेत्रों से उन्हें देखकर पूछा—क्या तुमने मंद मारुत के वेश में आये हुए वायुदेव को भीतर आने का मार्ग दिया? तब उन द्वारपालकों ने निवेदन किया—जब आप इस स्थान में रहते हैं, तब उसे यहाँ आने से कोई रोक नहीं सकता है न ?

इसपर रावण ने सोचा कि वायु पर कोप करने से कुछ प्रयोजन नहीं है। अगर मैं वरछे-जैसे नयनोंवाली सीता की कृपा को नहीं प्राप्त करूँगा, तो अभी यम आकर मेरे प्राण हर लेगा। फिर, उसने सेवकों को आज्ञा दी कि बुद्धि के कौशल से सब कार्यों को पूर्ण करनेवाले मंत्रियों को बुला लाओ।

अरण्यकाण्ड ३७७

रावण की आज्ञा पाकर वे सेवक, 'हुं' ध्वनि करने के समय के भीतर ही (अर्थात्, अतिशीघ्र ही) अनेक स्थानो मे दौडे और मन्त्रियो को समाचार दिया। समाचार पाते ही वे मंत्री लोग, पताकाओ से युक्त रथों पर, घोड़ों पर, शिविकाओ में तथा त्रिविध मद से युक्त गजो पर आरूढ होकर इस प्रकार आ पहुँचे कि उन्हे देखकर भूसुरो और देवताओ के मन भी व्याकुल हो उठे।

मन मे उठे विचार को शीघ्र कार्यान्वित करनेवाले, किन्तु अब अपने कर्त्तव्य को निश्चित नही कर पानेवाले रावण ने अपने मंत्रियों के साथ ठीक मंत्रणा की, फिर गगन-गामी विमान पर चढकर अकेले ही उस मारीच के आश्रम मे आ पहुँचा, जो पन्चेन्द्रियो का दमन करके तपस्या मे निरत था।

रावण के आते ही मारीच ने, सभय तथा व्याकुल होकर काले तथा बड़े आकारवाले रावण का आगे जाकर सब प्रकार से स्वागत-सत्कार किया और उसके मुख की ओर देखकर कहने लगा---

मन में यह सोचकर चिंतित होता हुआ कि न जाने यह (रावण) किस प्रयोजन से यहाँ आया है, मारीच कहने लगा—सुन्दर तथा शीतल कल्पवृक्षो की छाया मे रहकर शासन करनेवाले देवेंद्र और यमराज को भी भयभीत करते हुए राज्य करनेवाले, हे शासक ! अब इस अरण्य मे, मेरे इस कष्टदायक कुटीर में, दीन जन के जैसे किस प्रयोजन से आये हो ? कहो।

रावण कहने लगा—अपनी शक्ति-भर प्रयत्न करके मै अपने प्राणों को रोके हुआ हूँ। अब शिथिल हो रहा हूँ। मेरे महत्त्व, कीर्त्ति, प्रभाव—सब मिट गये हैं। इसका क्या कारण है, मै उसके बारे मे तुमसे किस प्रकार शांति के साथ कह सकता हूँ ? इस घटना से हमे ऐसा अपयश प्राप्त हुआ है कि देवताओ से हमे लजित होना पड़ा है।

हे शूलधारी ! मनुष्य पराक्रम दिखाने लगे हैं? उनके खड्ग से तुम्हारी भतीजी की नाक और कान कट गये है। विचार करने पर मेरे और तुम्हारे वशो के लिए इससे बढकर और क्या अपमान हो सकता है? तुम्ही कहो।

एक मनुष्य ने दृढ धनुष को लेकर, बड़े क्रोध के साथ अधिक सख्या मे आकर युद्ध करनेवाले मेरे भाइयो की आयु को समाप्त कर दिया। यह तो अबतक की हमारी सब विजयों के लिए कलक है न। दृढ शूलधारी तुम्हारे भतीजे इस प्रकार मर मिटे। वह मनुष्य तो अपनी दोनो भुजाओ को ही लेकर अबतक सुखी रहता है न ?

मेरे मन की अग्नि शान्त नहीं हुई है। मरण की वेदना भोग रहा हूँ। वे मेरे समान नहीं हैं। अत. मै उनसे युद्ध करना नही चाहता हूँ। मै यहाँ इसलिए आया हूँ कि तुम्हारी सहायता लेकर उन (मनुष्यो) के साथ रहनेवाली; प्रवाल को भी परास्त करनेवाले लाल अधर से युक्त, लता-समान सुन्दरी को उठा ले आऊँ और अपने अपमान का बदला लूँ—यो रावण ने कहा।

भड़कती हुई ज्वाला में जैसे लोह को पिघलाकर डाला गया हो, उसी प्रकार रावण के वचन मारीच को तप्त करने लगे। उसका कथन पूरा होने के पूर्व मारीच ने

३७८कंब रामायण

'छिः । छिः !' कहते हुए अपने कान बंद कर लिये । उसके मन से भय दूर हो गया और क्रोध उत्पन्न हुआ । फिर वह (मारीच) कहने लगा—

हे राजन् ! तुम अपना जीवन समाप्त कर रहे हो । तुम्हारी बुद्धि भ्रष्ट हो गई है । यह तुम्हारा दोष नहीं है । मेरा विचार है कि यह कर्मों का ही परिणाम है । मेरा कथन तुम्हें मीठा नहीं लगेगा । तो भी मैं यह हित-वचन बताता हूँ—यों कहकर उस (मारीच) ने अनेक हितकारी उपदेश उस (रावण) को दिये ।

तुमने स्वयं अपने हाथो से अपने करो और शिरो को काट-काटकर अग्नि में होम किया था और दीर्घकाल तक भूखे रहकर, अपने प्राणो को पीडित करके तपस्या की थी । उसके पश्चात् ही सारी सम्पत्ति प्राप्त की । उस सम्पत्ति को यदि तुम अब अनुचित कार्य करके खो डालोगे, तो क्या उसे पुनः प्राप्त कर सकोगे ?

हे विचारणीय वेदों के पंडित ! तुमने अपूर्व तपस्या करके संपत्ति प्राप्त की है । यह धर्म के प्रभाव से हुआ या अधर्म के प्रभाव से ? बताओ तो । तुमने यह महत्त्व धर्म के प्रभाव से ही तो पाया है ? अब क्या उसे अधर्म करके खो देना चाहते हो ?

जो राजा अपने ऊपर विश्वास करनेवाले मित्रों के राज्य का हरण करते हैं, जो राजा न्यायेतर मार्ग से अपनी प्रजा से अधिक कर उगाहते हैं और जो व्यक्ति पर-पुरुष की गृहिणी को अपने वश में करते हैं—इन सबके धर्म का देवता स्वयं ही विनाश कर देता है । यह तुम जान लो, हे तात ! लोक-पीडा उत्पन्न करनेवालों में से कौन उद्धार पा सका है ?

स्वर्ग का अधिपति (इन्द्र) अहल्या के रूप की आसक्ति के कारण दुर्दशा-ग्रस्त हुआ । उस (इंद्र) के जैसे अनेक लोग हुए हैं, जो पर-स्त्री के मोह में पड़कर अधःपतन को प्राप्त हुए हैं । गौरवर्ण लक्ष्मी के समान अनेक सुन्दरियाँ तुम्हारे भोग की भागिनी हैं । तो भी तुमने बिना सोचे-समझे कुछ कह दिया है । तुम्हारी बुद्धि भ्रष्ट हो गई है ।

यदि तुम अपनी इच्छा के अनुसार काम भी करो, तो भी इससे पाप और अपयश ही तुम्हारे हाथ आयेंगे । तुम्हारी इच्छा पूर्ण नहीं होगी, नहीं होगी । ससार को उत्पन्न करनेवाला राम शाप-सदृश कठोर शरों से तुम्हारी शक्ति को मिटाकर तुम्हारी संतति और तुम्हारे सारे कुल को मिटा देगा, यह निश्चित है ।

मेरे ऐसा कहने पर भी, न जाने क्यों, तुम कुछ ठीक विचार नहीं कर रहे हो । अहो ! तुम्हारी सेना का सबसे बड़ा सेनापति खर अपनी सेना के साथ उस (राम) के एक ही शर से मारा गया । वह (राम) अब सारे राक्षस-कुल को मिटानेवाला है ।

क्रूर व्यक्तियों में वीर विराध से बढ़कर कौन था ? वह (राम के) एक ही शर से, परलोक में पहुँच गया, तो अब हममें से कौन बचनेवाला है ? जब मैं यह बात सोचता हूँ, तब मेरा मन व्याकुल हो जाता है । अब तुम अपने वचनों से मेरी चिन्ता को और भी बढ़ा रहे हो ।

जिनको मरना था, वं मर गये । उन मरनेवालों के जैसा काम मत करो । यदि तुम भी वैसा ही कार्य करोगे, तो क्या तुम को भाग्य बचा सकेगा ? ससार में कितने ही

श्रीरणयकांड३७९

शासक हुए, उनमें अधर्मी राजाओ ने कभी सुख नही पाया। इस ससार मे कौन चिरकाल तक जीवित रहनेवाला है। सब मिट जानेवाले ही तो हैं?

उस वीर (राम) से जिसने अपने वाण से मेरे भाई (सुबाहु) को और मेरी माता (ताड़का) को मार डाला और जिसके निकट खड़े रहनेवाले उनके भाई से मेरा सारा पराक्रम मिट गया, उनके स्मरण से ही मेरा व्याकुल मन काँप उठता है। राम के ऐसे पराक्रम से मै बहुत चिन्तित हूँ।

हम इस सत्य को प्रत्यक्ष देखते हैं कि सब स्थावर तथा जगम पदार्थ अस्थिर हैं, नष्ट होनेवाले हैं, अतः हे तात! कोई नीच कार्य करने का विचार न करो। मेरी बात सुनो, अपनी महान् समृद्धि के साथ तुम चिरकाल तक जियो। इस प्रकार, मारीच ने (रावण से) कहा।

यह सुनकर रावण अपनी भयंकर आँखो मे आग उगलने लगा। उसकी भौंहि तन गई; बहुत क्रुद्ध होकर उसने कहा—तुम कहते हो कि मेरी ये पराक्रमी सुन्दर भुजाएँ, जिन्होने गंगा को अपनी जटा में धारण करनेवाले (शिव) को उनके कैलास के सहित, एक हथेली पर उठाया था, अब एक मनुष्य से पराजित होनेवाली हैं।

अभी जो घटना हुई, उसके वारे में तुमने नही सोचा, पर निःसंकोच होकर मेरी निंदा की। जिन्होने मेरी वहन के मुँह में एक गढ़ा-सा खोद डाला हो, उन (मनुष्यो) की तुमने प्रशसा की, यह तुम्हारा एक अपराध है। फिर भी, मैने इसके लिए क्षमा कर दिया।

तब मारीच, यह सोचकर भी कि उसके ऊपर क्रोध करनेवाला वह निर्भीक (रावण) उनके वचनों को सुनकर पुनः क्रुद्ध होगा - चुप नही रहा। किन्तु, फिर कहा—तुम्हारा यह क्रोध मुझ पर नही है, किंतु यह स्वय तुम पर ही है और तुम्हारे कुल पर है।

यदि तुम यह सोचते हो कि तुमने कैलास पर्वत को उठाया था, तो यह भी तो सोचो कि जब जनक ने (राम से कहा कि यह धनुष शिवजी के द्वारा झुकाया हुआ पर्वत ही है, तुम इसे चढ़ाओ, तो राम ने एक क्षण में अनायास ही उस (धनुष) को हाथ मे उठा लिया और उस पर डोरी चढ़ाने के निमित्त उसे झुकाकर तोड़ दिया। वह पर्वताकार शिव-धनुष गगन को छूनेवाला मेरु-पर्वत ही तो था।

तुम (राम के प्रभाव के बारे मे) कुछ नही जानते हो। मेरे वचन को भी स्वीकार नही करते हो। वह (राम), युद्ध के लिए सन्नद्ध होकर पुष्पमाला धारण करे, इसके पूर्व ही, उसके शत्रुओ के प्राण लुट जाते हैं। तुमने मूढ़ता से यह समझ रखा है कि वह (सीता) एक मानव-स्त्री मात्र है। क्या वह, सीता का अपना रूप है? वह तो राक्षसो के पाप के परिणाम की ही प्रतिमूर्ति है।

मेरे मन मे, यह सोचकर कि (यदि तुम सीता का हरण करोगे, तो) तुम अपने बंधुओ-सहित मिट जाओगे, नही बच सकोगे, ऐसी धड़कन उत्पन्न हो रही है, जैसे नगाडा बज रहा हो। इसका तुम विचार नही करते। अज्ञान में पड़कर जो विष पीने जा रहा हो, उससे उसके समीप रहनेवाले ज्ञानी व्यक्ति, क्या यह कहेंगे कि यह कार्य ठीक है?