कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 383, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रोङ्गारकाण्ड ३७५
यह सुनकर रावण ने कहा—मैं यहाँ एक स्त्री का रूप देख रहा हूँ। हे मुग्धे ! तुम ऐसे एक पुरुष के रूप की बात कह रही हो, जो मेरे विचार में भी नहीं है, यह कैसे ? हम तो दूसरों की आँखों के सामने माया उत्पन्न करके उनको भ्रम में डालनेवाले हैं। क्या क्षुद्र मनुष्य हमारे सामने कोई माया कर सकते हैं ?
तब शूर्पणखा ने कहा—तुम्हारी बुद्धि सीता के ध्यान में निमग्न होकर अन्य किसी विषय में प्रवृत्त नहीं हो रही है। तुम ऐसी काम-वेदना से पीडित हो कि तुम्हारी आँखें जहाँ भी पड़ती हैं, वहाँ वही सीता दिखाई देती है। ऐसा भ्रम होना चिरकाल की बात ही है, (अर्थात्, कामुक लोग अपने प्रेम-पात्र को सर्वत्र देखते हैं) : यह कोई नई बात नहीं है ।
शूर्पणखा के यों कहने पर रावण ने उससे पूछा—ठीक है। वैसा ही होगा। किन्तु, तुम्हारी आँखों को वह राम क्यों दिखाई देता है ? इसका उत्तर शूर्पणखा ने यों दिया—जिस दिन (राम) ने मेरा प्रतिकार-रहित अपमान किया, उस दिन से अबतक मैं उसे भूल नहीं पाई हूँ ।
तब रावण ने कहा—सच है, तुम्हारा कथन संगत ही है। इस समय मेरी इस पीडा का निवारण किस प्रकार हो सकता है ? इसका उत्तर शूर्पणखा ने दिया—तुम समस्त विश्व के एकमात्र प्रभु हो। तुम क्यों इस प्रकार दीन हो रहे हो ? तुम जाओ और उस पुष्प-भूषित कुन्तलोंवाली सुन्दरी (सीता) को उठा लाओ।
यों कहकर वह (शूर्पणखा) वहाँ से हट चली। वह राक्षस (रावण) भी शक्तिहीन होकर, कुछ भी सोच नहीं पाता हुआ, व्याकुल प्राणी के न्याय पड़ा रहा। उसे उस दशा में देखकर समीप खड़े रहनेवाले लोग भी काँप उठे। फिर भी, वह (रावण) अपनी शेष रही आयु के प्रभाव से मरा नहीं।
कोई मृत व्यक्ति पुनः जीवित हो उठा हो, इस प्रकार उठकर वह रावण अपने पराक्रम का स्मरण करके वहाँ स्थित लोगों से कहने लगा कि धारा-रूप में जल को प्रवाहित करनेवाली चन्द्रकान्त-शिलाओं से एक अति सुन्दर मंडप का निर्माण करो।
देवशिल्पी, रावण के मन की बात जानकर तुरन्त आ पहुँचा और अपने संकल्पमात्र से ही नहीं, किंतु हस्त-कौशल को भी दिखाकर ऐसा एक सहस्र स्तम्भोंवाला अति सुन्दर मंडप निर्मित किया, जिसे देखकर ब्रह्मा भी लज्जित हो जाय ।
उस (देवशिल्पी) ने उस मंडप में ऐसी चंद्रकान्त-शिलाएं बिछाईं, जिनसे किरणों के स्पर्श के बिना ही, जल-धारा बह चलती थी। ऐसे वातायन भी निर्मित किये, जिनसे पुष्प की सुरभि से पूर्ण मन्द पवन संचरण कर सकता था। उसने सुन्दर लता-भवनों का एक मनोहर और शीतल उद्यान भी बनाया।
उभरे हुए कंधोंवाला रावण एक माणिक्यमय विमान पर आरूढ होकर, उस मंडप को देखने के लिए गया। उनके दोनों पार्श्वों में, रत्नों की उज्ज्वल प्रभाएं, गगन तक परिव्याप्त अंधकार को दूर करती हुईं, अपने सुन्दर रूपों में ज्योतिःपूर्ण दीप लिये आईं।