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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 384

३७६ | कंब रामायण

वह अंधकार यद्यपि ऐसा था, जैसे अनेक सहस्र रात्रियों को एक करके रखा गया हो, तथापि उन सुन्दर रमणियों के वदन-रूपी शीतल चन्द्रिका को बिखेरनेवाले अत्युज्ज्वल तथा अनेक सहस्र कोटि चंद्रमंडल के एक हो जाने से, वह अंधकार छिन्न-भिन्न हो मिट गया।

अति मनोहर नव रत्नों से खचित पुष्पों से युक्त कल्पतरुओं से, सूर्य को भी लज्जित करनेवाला कांतिपुंज प्रकट हो रहा था, जिससे अंधकार मिट गया और दिन का-सा प्रकाश व्याप्त हो गया। सूर्य के उदित होते ही, उसकी दीर्घ किरणों के प्रभाव से, अंधकार मिटकर प्रभात हो जाता है न ? (उसी प्रकार कल्पतरुओं के प्रकाश से प्रभात हो आया।)

स्पर्श, शब्द आदि विषयों का ग्रहण करनेवाली जिसकी इंद्रियाँ एक समान मंद पड़ गई थीं, जिसका मन स्तब्ध हो गया था और जो कर्त्तव्य-ज्ञान से रहित हो गया था ऐसा वह रावण, इच्छा के आवेग से खींचा जाकर उस मंडप में इस प्रकार आकर प्रविष्ट हुआ, जिस प्रकार जन्मान्तर के समय प्राण नवीन शरीर के भीतर प्रविष्ट होते हैं।

निष्पाप तपस्या से संपन्न व्यक्तियों के सब अभीष्टों को पूरा करनेवाला तथा वर्तुलाकार मीनों से पूर्ण क्षीर-समुद्र ही मानो, अमृत के साथ, आ गया हो—ऐसा भ्रम उत्पन्न करनेवाले, गानेवाले भ्रमरों से आवासित, हरित वृक्षों के कोमल पल्लवों तथा पुष्प-दलों से निर्मित, शीतल पर्यंक पर आकर वह (रावण) लेट गया।

ऐसा मंद पवन, जो किसी मरनेवाले व्यक्ति के प्राणों को भी रोक सकता था, - सुन्दर आभरणों से भूषित सुन्दरियों के कुंतलों की सुगंधि को लेकर, वहाँ पर यों आ पहुँचा, जैसे उस सुगंधित उद्यान में मन्मथ को भोज देने के लिए क्षीर सागर ने अमृत भेजा हो।

रक्त-बिंदुओं और अग्निकणों को बरसानेवाली आँखों से युक्त वह रावण, वातायन से मंद पवन का संचार होने पर उसका सहन नहीं कर सका और इस प्रकार घबड़ा उठा, मानो कोई, अपने घर में अजगर को घुसते हुए देखकर भयभीत हो उठा हो। फिर, अपने समीपस्थ लोगों से उसने कहा—

मानो कुएँ का थोड़ा-सा जल सारे संसार को डुबो रहा हो, इसी प्रकार, देवों में एक, यह वायु मुझे पीड़ित कर रहा है। मेरी आज्ञा के बिना यह पवन यहाँ किस प्रकार घुस पाया? फिर, उसने आज्ञा दी कि द्वारपालकों को शीघ्र ले आओ।

उस समय, सेवक दौड़ चले और द्वारपालकों को शीघ्र ले आये। क्रूर रावण ने कठोर नेत्रों से उन्हें देखकर पूछा—क्या तुमने मंद मारुत के वेश में आये हुए वायुदेव को भीतर आने का मार्ग दिया? तब उन द्वारपालकों ने निवेदन किया—जब आप इस स्थान में रहते हैं, तब उसे यहाँ आने से कोई रोक नहीं सकता है न ?

इसपर रावण ने सोचा कि वायु पर कोप करने से कुछ प्रयोजन नहीं है। अगर मैं वरछे-जैसे नयनोंवाली सीता की कृपा को नहीं प्राप्त करूँगा, तो अभी यम आकर मेरे प्राण हर लेगा। फिर, उसने सेवकों को आज्ञा दी कि बुद्धि के कौशल से सब कार्यों को पूर्ण करनेवाले मंत्रियों को बुला लाओ।