कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 382, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें३७४ कंब रामायण
बाण और अग्नि भी जिसमें प्रवेश करके उसे भिन्न नहीं कर सकते, ऐसे इस अंधकार में, मुक्त विरह से पीडित होनेवाले एकाकी व्यक्ति के सम्मुख अपना उपमान न रखनेवाली एक प्रवाल-लता (के सदृश सुंदरी), अपने ऊपर काले मेघ को धारण किये, नारिकेल के कोमल फल-युगल से शोभित होकर, एक चंद्र को भी धारण किये हुए, दीपक के समान प्रकाशमान हो रही है।
यह क्या मेरे मोह से उत्पन्न भ्रम है ? या मेरा ज्ञान ही किसी कारण से अन्यथा हो गया है ? स्पष्ट ज्ञात नहीं होनेवाला यह आकार क्या है ? अंजन का प्रवाह भी जिसकी ममता नहीं कर सकता, ऐसे इस घने अंधकार में एक उज्ज्वल पूर्ण-चंद्र, दो कुंडलों से शोभित होता हुआ, अति काले केशों के साथ मेरे सम्मुख आकर प्रकट हुआ है।
अपने दोनों पाश्र्वों में बढ़नेवाले स्तन-युगल तथा जघन-तट से संयुक्त होकर रहनेवाली कटि को हम नहीं देख पा रहे हैं। उसके अतिरिक्त अन्य सब अवयवों को हम देख रहे हैं। विषपूर्ण नयनोंवाला यह आकार धीरे-धीरे एक नारी बनकर मेरे मन में प्रविष्ट हो रहा है।
चिरकाल से मैं सप्त लोकों की सुंदरियों को देखता आ रहा हूँ, किन्तु उनमें इसके जैसे रूपवाली किसी स्त्री को कहीं नहीं देखा है। अवश्य यह अद्भुत रूपवती रमणी मेरी बहन शूर्पणखा के द्वारा बताई गई, भ्रमरों से आवृत केशोंवाली, वह तरुणी (सीता) ही है।
मेरी इस विरह-पीडा को जानकर कदाचित् वह (सीता) स्वयं मुझे ढूँढती हुई यहाँ आ गई है। उसके इस उपकार का मैं क्या प्रत्युपकार कर सकता हूँ? दर्शन-मधुर इस (सीता) को अपनी आँखों से शूर्पणखा ने देखा है। उसी से पूछकर मैं अपने संदेह को दूर कर लूँगा (यही सीता है या नहीं—यह संदेह दूर करूँगा)। इस प्रकार, विचार कर रावण ने अपने दासों को आज्ञा दी कि वे उसे (अर्थात्, शूर्पणखा को) शीघ्र वहाँ बुला लावें।
रावण की यह आज्ञा सुनते ही परिजन शीघ्र दौड़े और शूर्पणखा को समाचार दिया। तुरन्त वह (शूर्पणखा), जिसने पराक्रमी राक्षसों के कुल का समूल नाश करने के कार्य में लगी हुई, अपनी नासिका तथा कर्णाभरणों से भूषित कानों को खो दिया था, (राम के विरह में) कामाग्नि से तप्त होनेवाले मन के साथ (रावण के स्थान में) आ पहुँची।
शत्रुओं के रक्त में बुझे हुए तीक्ष्ण बरछे को धारण करनेवाले रावण ने, अगल के आवासभूत मनवाली क्रूर शूर्पणखा को वहाँ आये हुए देखकर पूछा- हे स्त्रीरत्न! मेरे सम्मुख खड़ी हुई अंजन-अञ्चित करवाल-तुल्य नयनोंवाली, कलापी-समान यह स्त्री ही क्या तुम्हारी बताई हुई वह सीता है ?
तब शूर्पणखा ने उत्तर दिया—अरुण कमल-जैसे नयनों, रक्त बिंबफल-समान अधर, मनोहर और उन्नत कंधों, लंबी दीर्घ बाहुओं तथा सुन्दर पुष्पमाला से भूषित वक्ष के साथ आया हुआ, अंजन-पर्वत सदृश दीखनेवाला यह दृढ धनुर्धारी रामचन्द्र है।