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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 379

अरण्यकाण्ड ३७१

पड़ गया है। तेरा अन्तर काला हो गया है। अपना सहज गुण—शीतलता—छोड़कर तू तप रहा है, क्या तू भी अकेला रहता है और किसी सुन्दरी को देखे हुए व्यक्ति से उस (सुन्दरी) के सौंदर्य की चर्चा सुनी है? (जिससे वो विरह से पीड़ित हो रहा है)। मेरे हृदय में पुष्पवाण बिना रोक टोक के लग रहे हैं। उनसे मेरी रक्षा करनेवाला कोई नहीं है। अब मेरे प्राणों को कौन बचायेगा ?

मेरे प्राणों के लिए यम बनी हुई उत्तम कुलजात उस सीता के दो कुवलयों-जैसे शोभायमान कमल (जैसे वदन) से तू पराजित हो गया है, इसीलिए तू काला पड़ गया है, क्षीण हो गया है और तप्त हो उठा है। यदि शत्रु की सम्पत्ति को देखकर ही इस प्रकार मिट गये, तो तू विजय कैसे पा सकता है? बुद्धिमान् व्यक्ति (शत्रु को हराने के) पराक्रम से रहित होते हैं, तो विवेक से अपने ऊपर संयम रखते हैं।

इस प्रकार, अनेक वचन कहकर वह पीड़ित होता रहा। फिर, उसने परिजनों को आज्ञा दी कि इस चन्द्र को रात्रि-सहित यहाँ से हटा दो और सूर्य को दिन सहित ले आओ। उसके यह कहने के पूर्व ही उपेक्षित चन्द्रमा और रात्रिकाल हट गये। एक क्षण काल में ही अवर्णनीय सूर्य तथा दिन का समय आ पहुँचा।

वेद की ऋचाओं को जाननेवाले (ब्राह्मण) अग्नि में घृत डालकर जब होम करते हैं तब जिस प्रकार वह अग्नि प्रज्वलित होती है, उसी प्रकार पिघले हुए ताँबे के जैसी किरणों- वाला सूर्य प्रकाशमान हुआ। उससे रक्त-कमल विकमित हुए। सूर्य के आगमन से रक्त कुमुद दबकर निर्जीव-से हो गये। वे उन क्षुद्र व्यक्तियों के जैसे थे, जिन्होंने अपने लिए अयोग्य उत्तम पदार्थों को प्राप्त कर उससे गर्वित होकर फिर उन्हें खो दिया हो।

विश्व के आभरण-जैसे रहनेवाला सूर्य एक दिशा में आकर प्रकट हुआ, तो चन्द्रमा लज्जित हो, कांतिहीन हो, काँपता हुआ और अपनी पत्नी—रात्रि द्वारा अनुसृत होता हुआ, दूसरी दिशा में गगन-मध्य से टल चला। वह उस क्षुद्र राजा के समान था, जो किसी यशस्वी तथा पराक्रमी शासक की आज्ञा से अपने स्थान को छोड़कर चला जाता है।

विविध कर्णाभरणों से भूपित जो राक्षस-सुन्दरियाँ पुष्प-पर्यंकों पर अपने पतियों के समागम का सुख उठाती हुई प्रणय-कलह में क्रुद्ध हो गई थीं, अब हठात् रात्रि के हट जाने पर भी उस बात को न जानकर, स्वप्न में भी मान करती हुई (निद्रित) पड़ी रहीं।

कुछ राक्षस-स्त्रियाँ, अर्धरात्रि में ही हठात रात्रि के समाप्त हो जाने के कारण, मुमूर्षु-प्राण सी हो गई, थरथराती हुई काँप उठी और उनकी आँखों से आँसू इस प्रकार बह चले, जिस प्रकार प्रफुल्ल नीलोत्पल से मधु-बिंदु बह चलते हैं।

कुछ राक्षस-स्त्रियाँ, जो रूई के कोमल पर्यंक पर काम-सुख का आनन्द प्राप्त कर चुकी थी, वृक्ष की पुष्ट शाखा से लिपटी हुई लताओं के समान, अपने प्राण-पतियों के पुष्प-सदृश दोनों बाहों द्वारा दृढ़ता से बँधी हुई, निद्रित पड़ी थीं।

उत्तम मत्तगज, जो उनके कुंभों पर गुंजार करते हुए मँडरानेवाले भ्रमरों के झुंड को और उज्ज्वल सूर्य-प्रकाश को न जानते हुए नीचे पड़े थे, उन मद्यपों के समान ये कोमल शय्या पर प्रज्ञहीन होकर निद्रामग्न रहते हैं।