कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 380, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३७२ | कंब रामायण |
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जिस प्रकार कुल-नारियाँ, विद्या-वृद्धि से युक्त अपने प्रियतमो से वियुक्त होकर कांतिहीन हो जाती हैं, उसी प्रकार, वहाँ के प्रासादों में रखे हुए दीप, तेल के न घटने पर भी, निष्प्रभ हो गये।
प्रभात-काल में विकसित होनेवाले पुष्प, उनके सुन्दर दलों को खोलनेवाले सूर्योदय के होने पर भी, प्रफुल्ल न होकर, विशाल पर्यंक पर सोई हुई सुन्दरी के बन्द नयनों के जैसे बंद पड़े रहे।
सब लोग गहरी निद्रा में सो रहे थे। अतः, उनकी आँखें सचमुच प्रभात होने पर भी नहीं खुलीं। वे आँखें किसी को भिक्षा देने का विचार न करनेवाले लोभियों के बड़े घरों के दरवाजों के समान बंद थीं।
चक्रवाक दिन के निकल आने से विष-सदृश वियोग-पीडा से मुक्त हुए और कठोर कारावास से मुक्ति पानेवाले अपराधी के हृदय के समान आनंद से भर गये।
चन्द्र के कर-स्पर्श के अतिरिक्त अन्य किसी भी उपाय से विकसित न होनेवाले पुष्पों की ओर संगीत गानेवाले भ्रमर झपटे थे। लेकिन (इतने में चन्द्र के अस्त होकर सूर्य के उदित हो जाने से, उन बंद हुए पुष्पों से निकट) कला की महत्ता को नहीं जाननेवाले लोगों के दरवाजे पर दुःखी होकर खड़े रहनेवाले भाट लोगो के समान वे भ्रमर दुःखी होकर रह गये।
सूर्य की उष्ण किरणें, अपूर्व रत्नों से जटिल वातायनों के मार्ग से (प्रासादों के) भीतर पहुँचकर निद्रा-मग्न सुन्दरियों को जगाने लगीं। किन्तु, वे (स्त्रियाँ) सत्य को स्पष्ट न जाननेवाले लोगों के समान, तंद्रा और जागरण की मिश्रित दशा में पड़ी रहीं।
रावण की कठोर आज्ञा से परिचय न रखनेवाले विद्वान्, जो ज्योतिष-शास्त्र लिख रखा था, उसे भली भाँति जानकर कुछ गणित-शास्त्र में कुशल व्यक्ति अभी तक सोये पड़े थे। (प्रभात-काल मे) टेर लगानेवाले कुक्कुट भी सो रहे थे।
संसार में इस प्रकार के व्यापार हो उठे थे। ऐसे समय में शब्दायमान वीर-कंकणधारी रावण ने आँख उठाकर सूर्य को देखा और बोला—यह (सूर्य) उसका ध्यान करनेवाले के मन को भी तपाता है। अतः, पहले यहाँ आकर जिस चन्द्र ने हमको तपाया था, यह भी वही है।
तब कुछ दासों ने निवेदन किया—हे ईश! यह चन्द्र नहीं है। यह अरुण-किरणवाला सूर्य ही है। देखिए, इसके रथ मे दीर्घ केसरोंवाले मनोहर हरित अश्व जुते हैं। उष्ण किरणोंवाला सूर्य शरीर को तपाता है। किंतु, शीतल रहनेवाला चन्द्र नहीं तपाता।
शिखरों से शोभित नील पर्वत के जैसे रावण ने उन (दासों) से कहा कि यह सूर्य विष से अधिक दारुण है। अतः, इसे यहाँ से हटा दो। समुद्र के गर्जन को भी बन्द कर दो और संध्या-वेला में, पश्चिम दिशा में, प्रकट होनेवाली चन्द्र-कला को शीघ्र ले आओ।
राक्षस-राज ने यह वचन कहा। यह कहते ही, षोडश कलाओं से शोभायमान