कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 371, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें३६१ अथशूर्पणखाङ्कः
अनेक स्त्रियाँ, कलापी के समान चर्ममय वाद्यो (अर्थात् , मर्दल आदि) के ताल के अनुसार अत्युत्तम नृत्य करती थी, जिसे वह (रावण) देखता रहता था ।
वह रावण, जिसने अपूर्व तपस्या के प्रभाव से त्रिभुवन को भी अपने अपार बल के अधीन कर रखा था, अब (उस सभा-मडप में) भ्रू-रूपी धनुष को धारण करनेवाली काले तथा विशाल नयनोवाली रमणियो की दृष्टियो के प्रवाह में (तैर रहा) था ।
उस समय, रावण की वहन (शूर्पणखा), अपने लाल हाथो को शिर पर रखे हुए, स्तनों से लाल रक्त बहाते हुए, नाक और कानो से रहित होकर, अपना मुँह खोलकर मेघ के जैसे गरजती हुई, दौड़ी आई ।
वह (शूर्पणखा) अपने अत्यन्त दुर्गन्ध-पूर्ण मुँह से रोती गरजती हुई, युगात-कालिक समुद्र-घोष के समान शब्द करती हुई, व्याकुल-चित्त होकर, पश्चिम दिशा में दीख पड़नेवाली संध्याकालीन लालिमा के जैसे केशो के साथ, (लंका के प्रासाद के) उत्तरी द्वार से होकर प्रकट हुई ।
उसके इस प्रकार प्रकट होते ही, उस पुरातन (लंका) नगर की राक्षस-स्त्रियाँ उस (शूर्पणखा) के सम्मुख जाकर अपनी छाती पीट-पीटकर रोने लगी । हाय ! त्रिभुवन के शासक की वहन नककटी होकर, निस्सहाय इस प्रकार आवे, तो वे स्त्रियाँ कैसे उस दृश्य को सह सकती थी ?
राक्षस, (शूर्पणखा को) हठात् उस दशा मे आती हुई देखकर स्तब्ध रह गये । उनके मुख से कुछ वचन नही निकला, फिर वज्र-घोष के जैसा गर्जन करके, एक हाथ से दूसरे हाथ को पीटते हुए, आँखो से चिनगारियाँ निकालते हुए और ओठ चवाते हुए खड़े रहे ।
कुछ राक्षस यह कहकर क्षुब्ध हो रहे कि क्या यह कार्य इन्द्र का है ? नही तो सृष्टिकर्त्ता ब्रह्मा ने किया है ? या चक्रधारी विष्णु का यह कार्य है ? अथवा चंद्रशेखर का ही यह कार्य है ?
कुछ राक्षसों ने कहा—(इस ब्रह्मांड मे) कहने योग्य शत्रु कोई (रावण का) नही है । अतः, त्रिभुवन को अपने अन्तर मे रखे हुए इस ब्रह्मांड मे रहनेवाले) किसी भी व्यक्ति के द्वारा यह कार्य नहीं हुआ है, इसे करनेवाले इस ब्रह्मांड से परे रहनेवाला कोई होगा ।
कुछ राक्षसो ने कहा—‘अरे, यह रावण की वहन है !’—यह वचन सुनते ही सब लोग इसे ‘हे माता !’ कहकर इसके चरणो को नमस्कार करते हैं । कोई इसके अपमान की बात सोच भी नहीं सकता । अतः, इस (शूर्पणखा) ने स्वयं ही अपने कान-नाक काट लिये होंगे ।
कुछ राक्षस कहते थे—देवेन्द्र युद्ध मे पराजित होकर अब (रावण की) सेवकाई कर रहा है, तीक्ष्ण धारवाले चक्र को धारण करनेवाला विष्णु, शक्तिहीन होकर समुद्र मे जाकर रहने लगा है । अग्नि को हाथ में धारण करनेवाला शिव (रावण से डरकर) पर्वत पर जाकर रहने लगा है. फिर ऐसा कार्य करनेवाला व्यक्ति कौन है ?
यशस्वी कुल में उत्पन्न कोई भी व्यक्ति ऐसा कार्य करने का साहस नही कर