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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 372

३६२ | कम्ब रामायण

सकता, स्वयं खर ने ही, यह सोचकर कि यह (शूर्पणखा) स्वच्छन्दकुल की स्त्रियों के लिए उचित कार्य न करके चरित्र-भ्रष्ट हो गई है, इसे सौन्दर्य से हीन कर दिया है।

कुछ राक्षस कहते थे—शिथिल एवं व्याकुल दिखलाते देवताओं में से किसी बलवान् व्यक्तियों ने, उपलम्भन के साथ, जीवित रहने के लिए अनुपयोगी विकार से (अर्थात्, विनाशाकारी विकार से), त्रिलोक का विनाश करने के लिए ही, इस प्रकार का कार्य किया है।

कुछ राक्षस कहते थे—दूसरा कल्प आने पर है; किन्तु इस कल्प में ऐसा कौन धीर-वसुन्धराधीश तथा गुणशाली वीर है, जो इस प्रकार ऐसा कार्य करने की क्षमता रखता है ? भयंकर अरण्य में, गोष्पदीन तपो-कर्म में निरत ऋषियों के क्रोध का ही यह परिणाम है।

अपार संपत्ति से पूर्ण उस लंकानगर में, काते नयनोंवाली राक्षस-स्त्रियाँ (शूर्पणखा की वह दशा) देखकर, वलय-मणियों से भूषित अपने हाथों को मलती हुईं, लज्जा उठाते हुए के समान अस्तव्यस्त दशा में पड़ी हुई, गद्गद वचन कहती हुई, एक के आगे एक होती हुई, दौड़ी चली आईं ।

उस नगर में, मर्दल, वीणा, मधुर नादवाले वंशल-वाद्य, मनमोहन वंशी, शंख, (चारे) (नामक वाद्य)—इनकी ध्वनि अब नहीं रही; किन्तु जैसी रुदन-ध्वनि इसके पहले कभी उत्पन्न नहीं हुई थी, वैसी रुदन-ध्वनि होने लगी।

समुद्र को भी लज्जित करनेवाले विशाल नयनों से शोभित राक्षस-स्त्रियाँ, महा-स्तनों को; मधु-अधरों को एवं अपने मनों को, एक ओर ढकेलकर दौड़ी चली आईं; तब उनकी कटि लचकने-सी लगी; जिससे वे एक दूसरे को सँभालती हुई आईं।

कुछ राक्षस-स्त्रियाँ, जो मानगल के धनी अपने पतियों को (प्रणय-कलह में हुए उनके अपराधों के लिए) दंड देने में निरत थीं और अपने उद्विग्न मन में क्रोध उमड़ने के कारण लालिमा से भरे अपने नेत्रों से अश्रु बहा रही थीं, रावण की उस बहन के चरणों पर जा गिरीं!

कुछ राक्षस-स्त्रियाँ, जो स्वर्णिम फलों से युक्त मरकत वर्णवाले मञ्जुल-वृक्षों में बाँधी गई सुगन्धमय ज़ंजीरों से लटकनेवाले झूलों में झूल रही थीं, वे सूचना छोड़कर, व्यथित चित्त के साथ, अपनी सूक्ष्म कटियों को दुखाती हुई, वीथियों में जा पहुँचीं।

और कुछ राक्षस-स्त्रियाँ, जो (अपने पतियों के) स्तंभ और चन्दनतुल्य कंधों के आलिंगन में बँधी थीं, अपनी वलय-विभूषित बाँहों को शिथिल करके, अपने कमलतुल्य वदन पर के दो नीलोत्पलों से मुक्ता की धारा बहाती हुई, सिसक-सिसककर रोने लगीं।

कुटिल-दृष्टिवाली कुछ राक्षस-स्त्रियाँ, यह कहती हुई कि शत्रु विध्वंसक और (शत्रुओं के) रक्त में डूबे हुए शूल को धारण करनेवाला राजा (रावण) यदि इस बात को जान ले, तो उसकी क्या दशा होगी ? अपनी अंजन-रूपी आँखों से नीर की वर्षा करती हुई, रोती-कलपती धरती पर लोटने लगीं।

निद्रा करनेवाली कुछ राक्षस-तरुणियाँ, मधुर स्वप्न के आनन्द को भूल गईं। मेघ की समता करनेवाले केशों को अस्तव्यस्त किये हुए, शिथिल वस्त्रों तथा कंपित स्तनों के साथ घर से निकल पड़ीं और दुःख में रोने लगीं।