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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 373

अरण्यकाण्ड ३६३

खुले केश-पाशवाली कुछ राक्षस-स्त्रियाँ, यह कहकर कि शिव के कैलास को अपने विशाल करों में उठानेवाले हमारे पराक्रमी प्रभु की बहन की यह दशा हो गई है। हाय। शोक से उद्विग्न हुईं, स्तनों पर अपने करों से आघात करने लगी और उस स्त्री (शूर्पणखा) के पैरों पर आ गिरीं।

कुछ राक्षस-स्त्रियाँ, यह कहकर कि 'अपने हाथ में शूल को रखनेवाले हमारे प्रभु के रहने के कारण लंका के पशुओं ने भी कभी ऐसा दुःख नहीं भोगा, अब क्या हमारे सब सुकृत मिट गये हैं?' दुःखी हुईं और अपने अति सुन्दर नयनों से अश्रु की धारा बहाने लगीं।

जब लंका-नगर इस प्रकार दारुण दुःख में निमग्न हो रहा था, तब शूर्पणखा, पर्वत-सानु पर आकर झुकनेवाले मेघ के समान सभा-मंडप में प्रविष्ट होकर राक्षसराज (रावण) के स्वर्णमय विशाल वीर-कंकण से भूषित पैरों पर आ गिरी। अकस्मात् उसको उस रूप में देखकर उस मंडप में बैठे हुए और खड़े हुए सब लोग भय से भाग निकलने का मार्ग देखने लगे।

तीनों लोकों में अंधकार छा गया। (धरती का भार वहन करनेवाला) शेषनाग भयभीत होकर अपने फनों को झुकाने लगा, कुलपर्वत हिल उठे, सूर्य कांतिहीन हो गया, दिग्गज अपना स्थान छोड़कर भागने लगे, देवता भय से यत्र-तत्र छिपने लगे।

उज्ज्वल-वलयभूषित (रावण की) भुजाएँ फूल उठीं, उसकी आँखों से चिनगारियाँ निकलने लगीं, दाँतों से अग्नि-ज्वालाएँ फूट निकलीं, कुंचित भौंहें ललाट के मध्य जा पहुँचीं। (रावण का क्रोध देखकर) सब भुवन डाँवाडोल हो उठे, देवता किंकर्तव्य-विमूढ़ होकर खड़े रहे।

दक्षिण दिशा के शासक यम के साथ सब देवता, यह सोचकर कि अब हमारे विनाश का समय आ गया है चुपचाप पड़े रहे। स्वर्गलोक के निवासी तथा इहलोक के निवासी भी भ्रांत होकर थर-थर काँपते हुए, उसाँसे भरते हुए घबराई हुई दशा में अवाक् हो खड़े रहे।

रावण के (कोप के कारण) दाँतों से दबे हुए ओंठवाले बिल-समान मुँहों से धुआँ निकलने लगा। उसने श्वास छोड़ा, तो पंक्तिशः रहनेवाली उसकी मूँछों में आग लग गई, उसके तीक्ष्ण तथा उज्ज्वल दंत बिजली के जैसे चमक उठे, यो मेघ के गर्जन के समान गरजकर उसने पूछा—'यह किसका कार्य है?'

शूर्पणखा ने उत्तर दिया—अरण्य में मीनकेतन (मन्मथ) के समान रूपवाले, स्वर्ग-वासियों एवं पृथ्वी के निवासियों में अपना उपमान कहीं भी न पानेवाले दो मनुष्य राजकुमार आये हैं। उन्होंने ही करवाल से (मेरे अंगों को) काट दिया है।

शूर्पणखा के यह कहते ही कि मनुष्यों ने यह कार्य किया है, रावण ने ऐसा ठहाका भरा कि सारी दिशाएँ गूँज उठीं। उसकी बीसों आँखों से चिनगारियाँ निकल पड़ीं। फिर शूर्पणखा से बोला—मनुष्यों का पराक्रम तो अतिक्षुद्र होता है, क्या तुम्हारा कथन सत्य है? असत्य कहना छोड़ दो; भय को दूर करो और यथार्थ घटना बताओ।