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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 374, कुल 549 में से

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पृष्ठ 374

३६४ | कम्ब रामायण

तब शूर्पणखा कहने लगी—वे अपने रूप-सौंदर्य में मन्मथ की समता करनेवाले हैं, अपनी पुष्ट भुजाओं के बल से मेरु पर्वत की दृढ़ता को भी मिटाने में समर्थ हैं, एक क्षण-भर में सप्त लोकों के निवासियों के पराक्रम को मिटा सकते हैं। उनके गुणों का वर्णन मैं अब कैसे कर सकती हूँ ?

वे लोग मुनियों के प्रति आदर-भाव दिखाते हैं। गगन के चंद्र के सदृश मुखवाले हैं। तरंग-भरे जल में नाल पर शोभायमान सुरभित कमल के दल-सदृश नेत्रवाले हैं, वैसे ही (अर्थात्, कमल-तुल्य ही) कर-चरणवाले हैं, अपार तपस्या से संपन्न हैं। उनकी समता करनेवाले कौन हैं ? (अर्थात्, नहीं हैं।)

वे वल्कलधारी हैं। विशाल वीर-वलयधारी हैं। वक्ष पर सुन्दर सूत्र (यज्ञोपवीत) से शोभायमान हैं। धनुर्विद्या में निपुण हैं। वेद के आवास वाणी से युक्त हैं। कोमल पल्लव-सदृश (मृदुल) शरीरवाले हैं। तुमसे भयभीत नहीं होनेवाले हैं। तुम्हें धूलि के समान भी नहीं समझनेवाले हैं। शब्द-रूप शास्त्रों के समान ही अक्षय रहनेवाले तूणीर धारण करनेवाले हैं।

उत्तम चरित्रवाले मुनियों ने उन दोनों के निकट आकर निवेदन किया कि अपने मन को संयम से रखनेवाले हमलोग राक्षसों से आशंकित हैं। इसपर उन मनुष्यों ने शपथ की कि सब लोकों को जीतनेवाले रावण के कुल का हम समूल विनाश करेंगे।

हे प्रभु ! क्या एक ही लोक में दो मन्मथ निवास करते हैं ? क्या धनुर्विद्या में उनसे अधिक निपुण कोई हैं ? क्या उनकी समता करनेवाला कोई एक भी व्यक्ति है ? उन दोनों में से प्रत्येक, अकेले ही, त्रिमूर्त्तियों की समता करता है।

सारे भूमंडल में अपना शासन-चक्र प्रवर्तित करनेवाले दशरथ नामक प्रशस्त राजा के वे दोनों पुत्र हैं। किंचित् भी दोष से रहित हैं। अपने पिता की आज्ञा से दुर्गम अरण्य में आकर निवास कर रहे हैं। उनके नाम राम और लक्ष्मण हैं।—यों शूर्पणखा ने कहा।

अमृत-सदृश प्यारी बहन (शूर्पणखा) की नासिका को तीक्ष्ण करवाल से काटनेवाले, मनुष्य हैं। काटने के पश्चात् भी वे जीवित हैं। ऐसा होने पर भी नवीन खड्ग को धारण किये हुए रावण, किंचित् भी लज्जित हुए बिना, नयन खोलकर देखता हुआ अभी तक प्राण रखे हुए है।—इस प्रकार रावण कहने लगा।

सर्वत्र विजय पाकर, अपने पराक्रम से राज्य को प्राप्त करने पर भी अन्त में मुझे यही (अपयश) मिला है। मेरा सारा यश मिट गया। संसार के समस्त वीरों के शिर कट जाने पर भी, मेरा खोया हुआ मान किस प्रकार लौटकर आ सकता है ?

मुझे इस प्रकार अपमानित करनेवाले मनुष्य भी अभी तक जीवित हैं। उनके प्राण अभी स्थिर हैं और मेरा यह खड्ग भी अभी मेरे हाथ में वर्त्तमान है। समुद्र में उत्पन्न विष को पीनेवाले (शिव) के द्वारा प्रदत्त मेरी आयु भी बनी हुई है। मेरी भुजाएँ भी हैं तथा मैं भी (वैसा ही) हूँ।

हे मेरे मन ! क्या यह सोचकर कि ऐसा अपवाद शूल बनकर तुझ में चुभ गया है, तू लज्जित हो छटपटा रहा है, तू व्याकुल न हो। इस अपवाद को धोने के लिए मेरे दस

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