कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 370, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३६० | ऋव रामायण |
|---|
अपने करो से वीणा का नाद करते हुए, सरस्वती के समान ही, दोषहीन राग से मधुर वेद का गान करते थे और उसके कानो को तृप्त करते थे ।
मकर-मीन से पूर्ण समुद्र का अधिपति वरुण, देव-तरुओं तथा विद्याधर-लोक के वृक्षों के पुष्पों से झरे हुए मधु को, स्वच्छ जल के साथ मिलाकर, मेव नामक पिचकारी में भरकर, डरते-डरते उस रावण पर बूँदों से बरसा रहे थे कि कही (पिचकारी का जल) मयूर और हरिणी-सदृश रमणियो के वस्त्रों पर न पड़ जाये ।
वासुदेव, सुगन्धित पुष्पो से झरनेवाले पराग और मधु को, एव (उस सभा मे स्थित) राजाओ के ऊँचे-ऊँचे किरीटो के (एक दूसरे से) रगड़ने से झरनेवाले रत्नों और मुक्ताओं के टुकड़ो को, धरती पर उनके गिरने के पूर्व ही, इधर से उधर और उधर से इधर दौड़-दौड़कर इस प्रकार बटोर लेता था, मानो वह उस स्थान पर झाडू-सा लगा रहा हो ।
बृहस्पति और शुक्राचार्य—दोनों अपने हाथो में बिजली के जैसे चमकनेवाले दण्ड लिये हुए; सारे शरीर को ढकनेवाले दीर्घ कञ्चुक धारण किये हुए, अथक रूप से घूम-घूमकर (रावण के सभा-मडप में) इन्द्र आदि देवताओ को यथोचित आसन दिखाने का कार्य कर रहे थे (अर्थात्, रावण की सेवकाई कर रहे थे) ।
काल त्रिशूल आदि अपने शस्त्रो का त्याग कर, अपने शरीर के वस्त्र से अपना मुँह ढककर, जब-जब चर्म से आवृत्त भेरी-वाद्य बजने का समय होता था, तब-तब आकर, ठीक समय की सूचना देता था। (भाव यह हैं कि कालदेव रावण के सभा-मंडप में समय की सूचना देने का कार्य करता था)।
उज्ज्वल अग्निदेव, दीपो में सुगन्धित घृत को भर-भरकर, उत्तम कर्पूर-वत्ती को तथा कपास की वत्ती को जलाकर, जलाशयो मे स्थित रक्त-कमल के समान दीपो को प्रकाशित कर रहा था।
नवीन पुष्पों से पुष्पित कल्पवृक्ष, अमन्द कान्ति से पूर्ण (चिन्तामणि आदि देव-लोक के) रत्न, दुधार (कामधेनु आदि) गायें तथा (शंख, पद्म आदि) निधियाँ, (रावण के) मन के कोमल भावों को पहचानकर क्रम-क्रम से अनेक वस्तुओ को लाकर उसके सामने रख देता था और उसे आश्चर्य मे डाल देता था ।
(रावण के पहने हुए) कुण्डल आदि आभरण, अपनी घनी कान्ति को इस प्रकार फैला रहे थे कि ऐसा लगता था, मानों सप्त लोकों में रात्रि नामक पदार्थ ही कहीं नहीं रह गई है, न अष्ट दिशाओ में कहीं अँधेरा रह गया है ।
गगा आदि नदी देवियाँ, अपने स्तन-भार से लचकनेवाली लता-समान कटि के साथ, उस सभा-मडप में आती और (रावण पर) अपने अरुण करो से अक्षत एव पुष्प बिखेरती तथा बारी-बारी से प्रशस्तियाँ गाती ।
(नारायण मुनि के) ऊरु से उत्पन्न उर्वशी १ नामक अप्सरा को आगे किये हुए
१ पुराणो में एक कथा प्रसिद्ध है—बदरिकाश्रम में विष्णु के अशभूत नर और नारायण क्रमशः शिष्य और गुरु के रूप में तपस्या करते थे। उनकी तपस्या को भग करने के लिए इन्द्र के द्वारा प्रेषित अप्सराओ को आग हुआ देखकर नारायण ने अपने उरु से उन अप्सराओ से भी अधिक सुन्दर स्त्री को उत्पन्न किया, जिसे देखकर वे सब अप्सराएं लज्जित होकर चली गई --उसका नाम उर्वशी पड़ा।