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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 369

आरण्यकाण्ड ३५६

देवताओ मे व्याघ्र-चर्म धारण करनेवाले (शिव), स्वर्णमय वस्त्र धारण करनेवाले (विष्णु) और कमल से उत्पन्न (ब्रह्मा) भी उस रावण को कुछ पीड़ा नही दे सकते थे, तो अब इस ससार मे दूसरो के सबध मे क्या कहा जाय। (अर्थात्, दूसरे कौन उससे युद्ध करने की शक्ति रखते हैं) ? सूक्ष्म कटि, पीन स्तनो, कोमल बॉम-समान कंधो, रेखाओ से युक्त नेत्रो तथा सबको आकृष्ट करने को शक्ति से युक्त सुदरियो के साथ दुस्सह प्रणय-कलह मे भी न झुकनेवाले उसके किरीटो की पंक्ति अत्यन्त उज्ज्वल थी।

(उसके आभरणो के) उज्ज्वल तथा बड़े-बडे रत्न प्रकाश-पुज बिखेर रहे थे। (उसके) वज्रमय पर्वताकार कधे, धरती का भार वहन करनेवाले विषमय सर्पराज के फनो के समान शोभित थे। (उसके वक्ष पर) के उज्ज्वल रत्नहार भयकर समुद्र से घिरी लका के मध्य स्थित उस कारागार का दृश्य उपस्थित करते थे, जिसमे (रावण) के द्वारा बंदी बनाकर लाये गये नवग्रह तथा उनके पार्श्वों मे नक्षत्र रखे गये हो।

अरुण कातिवाले, उत्तम रत्नो से खचित उसका वीर-वलय, उसके चरण में शब्दायमान हो रहा था और अवर्णनीय महावल से युक्त राक्षस-नायको के गौरवमय रत्न-किरीटो की रगड़ खा-खाकर नव काति बिखेर रहा था।

सुरो तथा असुरो ने सब दिशाओ से ला-लाकर जो सुरभित पुष्प (रावण के चरणो पर) वरसाये, वे पुष्प त्रिभुवन के राजाओ के द्वारा निरन्तर ला-लाकर समर्पित धन-राशियों के समान भरे पड़े थे।

बिजली के जैसे चमकते हुए किरीटोवाले विद्याधर-नरेश, यह न जानने से कि वह (रावण) किम समय, किस ओर अपनी दृष्टि डालेगा, सदा अपने शिर पर हाथो को जोड़े हुए सभा-मंडप में उसके समीप पंक्ति बाँधे खड़े रहते थे।

सिंह-सदृश वलशाली सिद्ध लोग, उस (रावण) के समीप शिर झुकाये, हाथ जोड़े और संकोच-से भरे मन के साथ विनम्र होकर खडे रहते थे। यदि वह रावण किसी दासी को भी कोई आज्ञा देता, तो भी (ये सिद्ध लोग) यह समझकर कि वह उनको ही आज्ञा दे रहा है, झट उसे करने के लिए दौड़ पड़ते थे।

यदि वह रावण उस सभा-मडप मे मन्त्रियो को देखकर कोई वचन कहता, तो भी किन्नर (यह सोचकर कि वह उन किन्नरो को कुछ दड देने की ही बात कर रहा है), व्याकुल तथा भयभीत होकर शिर झुकाकर खडे रहते थे।

नागलोग, रावण को देखकर, विशाल (दक्षिण) दिशा के प्रभु तथा भयकर दड-धारी यम को देखनेवाले नरक-वासियो के समान ही, गद्गदकंठ एवं भय-व्याकुल मन होकर घेरे खडे रहते थे।

तुबुरु नामक ऋषि अपनी संगीतमय वीणा के साथ रावण की उन भुजाओ का यशोगान कर रहे थे, जिन भुजाओ ने दिग्गजो के वल को कुंठित कर दिया था, कैलाश गिरि को उखाड़कर महादेव के लिए अपवाद उत्पन्न किया था और इन्द्र के साथ युद्ध करके सभी स्वर्ग-वासियो को भयभीत किया था।

नारद मुनि, स्वर्ग में प्रचलित संगीत-पद्धति मे किंचित् भी स्खलित हुए बिना,