कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 386, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३७८ | कंब रामायण |
|---|
'छिः । छिः !' कहते हुए अपने कान बंद कर लिये । उसके मन से भय दूर हो गया और क्रोध उत्पन्न हुआ । फिर वह (मारीच) कहने लगा—
हे राजन् ! तुम अपना जीवन समाप्त कर रहे हो । तुम्हारी बुद्धि भ्रष्ट हो गई है । यह तुम्हारा दोष नहीं है । मेरा विचार है कि यह कर्मों का ही परिणाम है । मेरा कथन तुम्हें मीठा नहीं लगेगा । तो भी मैं यह हित-वचन बताता हूँ—यों कहकर उस (मारीच) ने अनेक हितकारी उपदेश उस (रावण) को दिये ।
तुमने स्वयं अपने हाथो से अपने करो और शिरो को काट-काटकर अग्नि में होम किया था और दीर्घकाल तक भूखे रहकर, अपने प्राणो को पीडित करके तपस्या की थी । उसके पश्चात् ही सारी सम्पत्ति प्राप्त की । उस सम्पत्ति को यदि तुम अब अनुचित कार्य करके खो डालोगे, तो क्या उसे पुनः प्राप्त कर सकोगे ?
हे विचारणीय वेदों के पंडित ! तुमने अपूर्व तपस्या करके संपत्ति प्राप्त की है । यह धर्म के प्रभाव से हुआ या अधर्म के प्रभाव से ? बताओ तो । तुमने यह महत्त्व धर्म के प्रभाव से ही तो पाया है ? अब क्या उसे अधर्म करके खो देना चाहते हो ?
जो राजा अपने ऊपर विश्वास करनेवाले मित्रों के राज्य का हरण करते हैं, जो राजा न्यायेतर मार्ग से अपनी प्रजा से अधिक कर उगाहते हैं और जो व्यक्ति पर-पुरुष की गृहिणी को अपने वश में करते हैं—इन सबके धर्म का देवता स्वयं ही विनाश कर देता है । यह तुम जान लो, हे तात ! लोक-पीडा उत्पन्न करनेवालों में से कौन उद्धार पा सका है ?
स्वर्ग का अधिपति (इन्द्र) अहल्या के रूप की आसक्ति के कारण दुर्दशा-ग्रस्त हुआ । उस (इंद्र) के जैसे अनेक लोग हुए हैं, जो पर-स्त्री के मोह में पड़कर अधःपतन को प्राप्त हुए हैं । गौरवर्ण लक्ष्मी के समान अनेक सुन्दरियाँ तुम्हारे भोग की भागिनी हैं । तो भी तुमने बिना सोचे-समझे कुछ कह दिया है । तुम्हारी बुद्धि भ्रष्ट हो गई है ।
यदि तुम अपनी इच्छा के अनुसार काम भी करो, तो भी इससे पाप और अपयश ही तुम्हारे हाथ आयेंगे । तुम्हारी इच्छा पूर्ण नहीं होगी, नहीं होगी । ससार को उत्पन्न करनेवाला राम शाप-सदृश कठोर शरों से तुम्हारी शक्ति को मिटाकर तुम्हारी संतति और तुम्हारे सारे कुल को मिटा देगा, यह निश्चित है ।
मेरे ऐसा कहने पर भी, न जाने क्यों, तुम कुछ ठीक विचार नहीं कर रहे हो । अहो ! तुम्हारी सेना का सबसे बड़ा सेनापति खर अपनी सेना के साथ उस (राम) के एक ही शर से मारा गया । वह (राम) अब सारे राक्षस-कुल को मिटानेवाला है ।
क्रूर व्यक्तियों में वीर विराध से बढ़कर कौन था ? वह (राम के) एक ही शर से, परलोक में पहुँच गया, तो अब हममें से कौन बचनेवाला है ? जब मैं यह बात सोचता हूँ, तब मेरा मन व्याकुल हो जाता है । अब तुम अपने वचनों से मेरी चिन्ता को और भी बढ़ा रहे हो ।
जिनको मरना था, वं मर गये । उन मरनेवालों के जैसा काम मत करो । यदि तुम भी वैसा ही कार्य करोगे, तो क्या तुम को भाग्य बचा सकेगा ? ससार में कितने ही