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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ
३२४कंब रामायण

राज ( रावण ) के समूल विनाश का कारण बननेवाली थी और किसी के जन्मकाल मे ही उसके प्राणो के साथ उत्पन्न होकर, अपना प्रभाव दिखाने के लिए उचित समय की प्रतीक्षा करती हुई किसी व्याधि के सदृश थी ;

जो ताँबे के जैसे लाल और घने केशोंवाली थी । राहु को भी मद कर देनेवाले शरीर से युक्त थी । स्वर्ग के देवों, तपस्वियो तथा समुद्र से आवृत धरती के लोगो का एक साथ विनाश करने की शक्तिवाली थी ,

किसी क्रूर कार्य के हेतु अकेले ही उस वन मे निवास करनेवाली थी । वह ऐसी दक्ष थी कि इस सारे ससार मे सर्वत्र अनायास ही घूम सकती थी । ऐसी वह ( शूर्पणखा ) राघव के निवासभूत उस आश्रम में आई ।

अपने बंधुजनो का अंत खोजनेवाली उस शूर्पणखा ने, पूर्वकाल मे पूजनीय देवताओं की इस प्रार्थना पर कि—'राक्षस लोग हमारा विरोध करते हैं, इसलिए आप उनका नाश करें', आदिशेष पर योगनिद्रा छोड़कर ससार मे अवतीर्ण हुए प्रभु को देखा ।

वह सोचने लगी—मन मे रहनेवाले ( मन्मथ ) के आकार नही होता । देवेन्द्र के सहस्र नयन होते हैं । शिवजी के कमल-तुल्य नयन तीन होते हैं। अपनी नाभि से सारी सृष्टि की रचना करनेवाले ( विष्णु ) के चार भुजाएँ होती हैं । ( अतः, यह उनमें से कोई नही हैं ।)

वह फिर विचार करने लगी—तो क्या जटा-जूट से शोभित (शिव) के (ललाट) नेत्र से देखे जाने से जलकर अनग बना हुआ वह ( मन्मथ ) ही, श्रेष्ठ तप करके अब पहले से भी अधिक सुन्दर रूप प्राप्त करके यहाँ आया है ।

वह सोचने लगी—इसकी मनोहर बाहुएँ, उत्तम लक्षणो से पूर्ण हैं । ( आजानु ) लबी होकर सुषमा का निवास-स्थान बनी हैं । वृक्ष भी इनकी समता नहीं कर सकते । पर्वत भी इनके सम्मुख क्षुद्र हैं । तो क्या ये बल से प्रभूत दिग्गजों की सूँडें ही हैं ?

धनुर्युद्ध मे निपुण इस व्यक्ति के वीरतापूर्ण कंधो की समता शिलामय पर्वत भी नही कर सकते । किसी अत्युन्नत इन्द्रनील रत्न के पर्वत को छोड़कर, प्रख्यात मेरु-पर्वत भी, स्वर्णमय होने से, इन ( कंधो ) की समता नही कर सकता ।

नाल पर उठे हुए रक्तकमल के दलों की समता करनेवाले इसके नयनो तथा पर्वत के समान उन्नत आकार से शोभायमान इस पुरुष की, एक कंधे से दूसरे कंधे तक फैले हुए ( वक्ष ) प्रदेश को दृष्टि-पथ मे लाने की चेष्टा करें, तो मेरे नेत्र इतने विशाल नही हैं कि इस विशाल वक्ष को पूर्णतया एक साथ देख सकें ।

यह सुन्दर अति-उज्ज्वल वदन क्या प्रफुल्ल कमल के जैसा है ? ( नही, उससे भी अधिक सुन्दर है )। क्या किरणो से पूर्ण चन्द्र को ( इसके वदन का ) उपमान कहें ? पर उस ( चन्द्र ) की कलाएँ तो क्षीण होती रहती हैं । वह जब पूर्ण रहता है, तब भी उस मे कलक रहता है ( अतः, वह इसके वदन का उपमान नही हो सकता ) ।

ऐसे मनोज्ञ सौंदर्य मे पूर्ण यह पुरुष किस प्रयोजन से, व्यर्थ ही अपने सुन्दर शरीर

अरण्यकाण्डं ३२५

को कष्ट देता हुआ यो व्रताचरण कर रहा है ? न जाने तपस्या ने स्वयं कैसी तपस्या की है कि ऐसे नवीन कमल-तुल्य नयनों से युक्त यह पुरुष उस (तपस्या) को अपनाये हुए है ?

समुद्र-रूपी वस्त्र से शोभित, सुन्दर रूपवाली, गज की गति से युक्त पृथ्वी का स्त्रीत्व भी कैसा (सार्थक) है ? उसपर उगी हुई हरियाली ऐसी है, मानो इस पुरुष के पदतल के स्पर्श से वह (पृथ्वी) पुलक से भर गई हो।

कटि में बँधे हुए करवाल से शोभित इस पुरुष की उज्ज्वल कांति को दिनकर ने कदाचित् देखा ही नहीं है। इसीलिए, मन में लज्जा का अनुभव न करके, वह दूर तक अपनी किरणों को प्रसारित करता हुआ संचरण करता है।

दुर्लंघ्य महान् पर्वत को भी जीतनेवाले उन्नत कंधों से युक्त इस पुरुष के अधर का संसार में उचित उपमान क्या दूँ ? हे मन ! यदि प्रवाल से इसकी उपमा दूँ, तो तू मेरा धिक्कार करेगा (क्योंकि वह उपमान-योग्य नहीं है)। अब किस उत्तम पदार्थ को इसका उपमान बताऊँ ?

सब कलाओं से पूर्ण चंद्रमा के समान शोभायमान इस सुन्दर की, सूर्य को भी (अपनी कांति से) विचलित करनेवाली कटि को प्राप्त करने के लिए, न जाने, इन वल्कलों ने कौन-सा तप किया था, दोषहीन पीतांबर ने कदाचित् वैसा तप नहीं किया।

लंबे, घुँघराले, झुकी हुई मेघ-पंक्तियों के समान दीखनेवाले, मध्य में टेढ़े एव काले केश-पाश को, यदि इसने जटा बनाकर न पहन लिया होता, तो उसे देखकर सब युवतियों के प्राण निकल गये होते।

प्रकट प्रकाशवाले उत्तम आभरण भी यदि (इसके शरीर को) प्राप्त करें, तो क्या वे इसके सौंदर्य को बढ़ा सकेंगे ? क्या अच्छे लक्षणों से युक्त अनुपम रत्न किसी दूसरे रत्न को धारण करके और अधिक प्रकाश से चमक उठेगा ?

जो इन्द्र, वर प्राप्त करके भी इसके परस्पर तुल्य, चरणों की धूलि की भी समता नहीं कर सकता, वह सब लोकों पर शासन करता है। (किन्तु) इस (राम) में ब्रह्मा ने सब उत्तम लक्षणों को प्रकट किया है, फिर भी यह अरण्य में निवास करता है। इस कारण ब्रह्मा भी निन्दा का पात्र हो गया है।

उस (शूर्पणखा) के मन में ऐसी वासना उमड़ी कि नदी का प्रवाह और समुद्र भी उसके सम्मुख छोटे पड़ गये। उसकी बुद्धि (उस वासना-प्रवाह में) निमग्न हो गई, जिससे उसका शील इस प्रकार क्रमशः घटने लगा, जिस प्रकार धर्म-कार्य के लिए कुछ दान दिये बिना अपने धन को बचाकर रखनेवाले व्यक्ति का यश घटता है।

उस समय वह शूर्पणखा गगन पर अंकित चित्र-प्रतिमा के समान थी। उसका मन मलिन हुआ। उसमें वेदना उत्पन्न हुई। प्रभु की प्रकाशमान सुन्दर भुजाओं में अपनी दृष्टि गड़ाये, उस (दृष्टि) को फिर खींच लेने में असमर्थ होकर वह स्तब्ध खड़ी रही।

वह इसी प्रकार खड़ी रही। फिर, यह विचार कर कि इसके विशाल वक्ष का आलिंगन करूँगी, अन्यथा अमृत पीने पर भी मेरे प्राण नहीं बच सकेंगे। अब और कोई उपाय नहीं है—उन (राम) के सम्मुख जाने का उपाय सोचने लगी।

३२६कंब रामायण

'खड्गदंतवाली यह राक्षसी सब प्राणियो को अपने उदरस्थ करनेवाली (राक्षसी) है'—यों सोचकर कही वे मेरा तिरस्कार न कर दें, इसलिए उस (शूर्पणखा) ने कोकिल-तुल्य मधुर वाणीवाली तथा बिंब-समान रक्ताधर से शोभित कलापी-तुल्य सुन्दर रमणी का वेष धारण किया।

उसने रक्तकमल पर आसीन लक्ष्मी का अपने मन में ध्यान किया। अपने वश में स्थित किसी मंत्र का जप किया और चंद्र से भी अधिक सुन्दर वदनवाली सुन्दरी का रूप लेकर गगन-तल में अपनी कांति को बिखेरती हुई नीचे उतर आई।

रुई को एवं रुचिर पल्लव दल को भी दुखानेवाले अरुण मनोहर कमल-दल-से लगनेवाले उसके छोटे-छोटे पैर थे। वह मायाविनी (शूर्पणखा), मधुर बोलीवाली पिक-वयनी-सी, कलापी-सी, हंसिनी-सी, उज्ज्वल वलि लता-सी एवं विष-सी बनकर वहाँ आई।

स्वर्ण-पराग से युक्त कमल में वास करनेवाली (लक्ष्मी) देवी के सौंदर्य को तथा शुक के सौंदर्य को भी परास्त कर देनेवाले उत्तम सौंदर्य से युक्त होकर, दो चमकते करवालों (अर्थात्, नयनों) से शोभायमान वदन के साथ, वह (गगन-तल से) यो उतर आई, मानो विद्युल्लता ही मेखला-भूषित विशाल तथा मनोहर रथ (अर्थात्, जघन तट) से युक्त होकर, एक मुग्धा का रूप धारण करके उतर रही हो।

मानो अति सुरभित कल्पवृक्ष की कोई प्रकाशमान लता, एक सुन्दरी का वेष धारण करके, अधिकाधिक बढ़नेवाली कामुकता तथा मधु-सदृश मधुर बोली को पाकर, नेत्रों को आनन्द देनेवाले लावण्य से युक्त होकर, अनुपम हरिणी की चितवन प्राप्त करके कलापी के समान चली आई हो।

(उस शूर्पणखा के) नूपुर, मेखला, हार, काली सिकता के समान केशों में गुँथे हुए पुष्पों पर मँडरानेवाले भ्रमर—इन सबकी ध्वनि यह सूचना दे रही थी कि कोई युवती आ रही है। चक्रवर्ती कुमार (राम) ने उस ध्वनि की दिशा मे दृष्टि डाली।

'स्वर्ग के द्वारा प्रदत्त कोई अनुपम मधुर अमृत हो'—ऐसी वह सुन्दरी, मनोज्ञ स्तनों के भार से कमर लचकाती हुई आ रही थी। अज्ञान को दूर करके उत्तरोत्तर बढ़नेवाले सत्य-ज्ञानरूपी नेत्र प्रदान करनेवाले भगवान् (के अवतार राम) ने अपने दोनों नयनों से उसे अपने सम्मुख देखा।

विशाल प्रदेशवाले नागलोक में, स्वर्गलोक में एवं भूलोक में भी अप्राप्य उस उपमा-रहित स्त्री-लावण्य को देखकर राम ने सोचा—यह कौन है? इसकी सुन्दरता की भी कोई सीमा है? आभरण-भूषित सुन्दरियों में इसका उपमान कौन हो सकता है?

उस समय, कामना से पूर्ण हृदयवाली उस (शूर्पणखा) ने (राम का) वदन देखा। अपने अरुण करों से उनके चरणों का स्पर्श किया। फिर अपने दीर्घ तथा तीक्ष्ण नेत्र-रूपी शूलों को उनपर फेंककर कटाक्ष-पात करती हुई, हरिणी के समान लज्जा-सी दिखाती हुई, एक ओर खड़ी रही।

वेदों के आदि (प्रकाशक) उन (राम) ने उससे प्रश्न किया—हे लक्ष्मी-समान देवी! गौरवर्ण सुन्दरी। तुम्हारा आगमन मंगलप्रद हो। यह हमारा पुण्य ही तो है कि

अरंण्यकाण्ड ३२७

तुम्हारा आगमन हुआ है। तुम्हारा स्थान कौन-सा है ? नाम क्या है ? बंधु-जन कौन है ?
तब उस मुग्धा ने अपना वृत्तांत यों कहा—
कमलभव (ब्रह्मा) के पुत्र (पुलस्त्य) के कुमार (विश्ववसु) की मै पुत्री हूँ।
त्रिपुर-दाह करनेवाले वृषभ-वाहन (शिव) के मित्र रक्त करोंवाले (कुबेर) की भगिनी हूँ।
दिग्गजो का बल चूर-चूर करके रजत-पर्वत को उठानेवाले, त्रिलोक का शासन करनेवाले
रावण की कनिष्ठा (बहन) हूँ। मै कामवल्ली कहलाती हूँ।

ये वचन सुनकर वीर (राम) ने संशय-भरे चित्त के साथ सोचा कि इसका
कार्य कपट-रहित नहीं है। इससे और कुछ प्रश्न पूछकर इसका हाल जानना चाहिए।
फिर, प्रश्न किया—यदि यह कथन सत्य है कि तुम रक्तनेत्रवाले, भयंकर आकारवाले (रावण)
की बहन हो, तो तुम्हे यह मनोहर रूप कैसे मिला ?

उन पवित्र पुरुष (राम) के यों पूछने के पूर्व ही, स्फूत्तिं के साथ कह उठी—
मायावी तथा क्रूर राक्षसो के साथ रहना अनुचित समझकर, विवेकशील होकर मैने धर्म को
अपनाया और उसी पर स्थिर रहने लगी। फिर ऐसा तप किया, जिससे मेरे पाप मिट गये
और देवो का अनुग्रह प्राप्त हुआ।

तब राम ने प्रश्न किया—हे सुन्दरी ! देवताओ का अधिपति भी जिसकी
सेवा करता रहता है, ऐसे त्रिभुवन के शासक (रावण) की तुम बहन हो, तो समृद्धि-वैभव
के साथ न आकर, किसी को साथ लिये बिना एकाकी यहाँ क्यो आई हो ?

वीर के यह पूछने पर सत्यरहित (शूर्पणखा) ने कहा—हे विमल ! हे प्रभु !
मै असजन (रावण आदि) लोगो के समीप नही जाती हूँ। देवताओं तथा उत्तम मुनियों
के संग में रहती हूँ। यहाँ एक काम से तुम्हारे दर्शन करने आई हूँ।

उसके यह कहने पर प्रभु ने यह सोचकर कि सुन्दर ललाटवाली स्त्रियो का हृदय
सुलभता से ज्ञात नही होता, इसका हृद्गत भाव पीछे प्रकट होगा, कहा—हे कंकन-भूषित
हाथोवाली ! मुझसे तुम्हे क्या कार्य है ? बताओ। यदि उचित होगा, तो वह कार्य
पूर्ण करके तुम्हारा उपकार करूँगा।

कुलीन स्त्रियो के लिए यह संभव नही है कि वे अपने हृदय के काम-भाव को स्वयं
ही प्रकट कर सकें। फिर भी, मै ऐसी हूँ कि मेरा कोई नही है। पर मै क्या करूँ ?
काम नामक एक (दुष्ट) के अत्याचार से तुम मेरी रक्षा करो।—यों उस स्त्री ने कहा।

दूर तक जाकर अवरुद्ध हो लौट आनेवाले, बिखरी हुई लाल-लाल रेखाओ से
युक्त, नानाविध भंगिमाएँ दिखाते हुए, चमचमानेवाले काले रंगवाले तथा करवाल-सदृश
नेत्रो एवं आभरण-भूषित स्तनो से शोभित उस (शूर्पणखा) के ये वचन कहने पर, प्रभु ने
विचार किया—यह लज्जाहीन है। नीच स्वभाववाली है। मायाविनी है। इसमें किंचित्
भी सद्गुण नही है।

मौन रहनेवाले उदार प्रभु के हृदय का भाव वह नही जान सकी। भ्रमर-समुदाय
के गुंजारो से युक्त कुंतलोवाली यह (शूर्पणखा) 'मेरे वचनों से मुझपर अनुरक्त हुआ है

३२८ कंब रामायण

अथवा मुझे 'नहीं' कहनेवाला है' यों संकल्प-विकल्प में दोलायमान चित्तवाली होकर आगे इस प्रकार कहने लगी—

चित्रित करने के लिए दुस्साध्य सौंदर्य से पूर्ण ! तुम्हारे यहाँ आगमन का समाचार नहीं जानने से मैं सर्वज्ञ मुनियों के आज्ञानुसार उनकी सेवा में ही निरत रह गई। मेरे कलंकहीन स्त्रीत्व एवं यौवन यों ही व्यर्थ व्यतीत हुए। यों ही एक-एक दिन एवं उनका प्रत्येक पल व्यर्थ ही चले गये।

यह सुनकर प्रभु ने मन में यह विचार कर कि यह नीच राक्षसी नीति-रहित है, अनैतिक कार्य करने का निश्चय करके यहाँ आई है, उससे कहा—हे सुन्दरी ! तुम्हारी इच्छा परंपरागत आचार के अनुकूल नहीं है। तुम ब्राह्मण जाति में उत्पन्न हो और मैं क्षत्रिय वंश का हूँ।

(तब शूर्पणखा ने कहा—) हे युद्ध के अलंकारभूत भाले को धारण करनेवाले ! मेरे पिता ब्राह्मण हैं; किंतु अरुंधती-सदृश पातिव्रत्यवाली मेरी माता धरती का राज्य करनेवाले 'माल्यकटंकट' के वंश में उत्पन्न हैं। यदि मुझे स्वीकार करने में यही (अर्थात्, मेरा ब्राह्मण-जन्म में उत्पन्न होना ही) कारण है, तो मेरे प्राण अब बच गये। भाव यह है कि मेरा पिता ब्राह्मण है; किंतु माता क्षत्रिय है, अतः मैं अनुलोम जाति में उत्पन्न हूँ और शास्त्र-विधान के अनुसार कोई क्षत्रिय मुझसे विवाह कर सकता है।

उस कामुकी (शूर्पणखा) के यह कहने पर, अधर के मंदहास की उज्ज्वलता बाहर प्रकट करनेवाले नीलवर्ण मेघ-सदृश उन प्रभु ने विनोद-पूर्ण चित्त से कहा—हे स्त्रीरत्न ! दुःखहीन राक्षसों के साथ हम, दुःखी मनुष्य, विवाह करें यह उचित नहीं है। यह बुद्धिमानों का कथन है।

तब उसने कहा—अवर्णनीय प्रेमाधिक्य से युक्त मेरी भक्ति-भावना को न देखकर मुझे रावण की बहन कहना ही अनुचित है। आदिशेष पर लेटे हुए अमल (विष्णु) जैसे हे सुन्दर ! मैंने पहले ही कहा था कि उस गर्हणीय राक्षस-वंश से पृथक् होकर मैं देवताओं की स्तुति में लगी रहती हूँ।

वेदों के लिए भी अतीत उन भगवान् (के अवतार राम) ने तब उससे कहा—हे सुन्दरी ! यदि विचार करके देखें, तो तुम्हारा एक भाई त्रिभुवन का नायक है, दूसरा कुबेर है, यदि उनमें से कोई तुम्हें प्रदान करे, तो हम विवाह करेंगे। अन्यथा, एकाकी आई हुई तुम किसी दूसरे स्थान में जाओ। मुझे तो (तुमसे बात करने में भी) आशंका हो रही है।

तब उस (शूर्पणखा) ने कहा—हे पर्वत-समान सुन्दर कंधोंवाले ! जो पुरुष और स्त्री, अनुराग से एकीभूत हृदयवाले हो जाते हैं, उनके लिए वेद-विहित विवाह एक गांधर्व विवाह ही है न ? यह विवाह हो जाय, तो मेरे भ्राता भी इसे स्वीकार करेंगे और एक बात कहती हूँ—

मेरा भाई (रावण) पहले से ही मुनियों से गहरा वैर रखता है। वह (शत्रुओं का विनाश करने में) नीति का भी विचार नहीं करता। अतः, तुम एकाकी रहनेवाले का

अरण्यकाण्ड ३२६

उसके साथ मित्रता हो जाय, इसके लिए यही उपाय है (कि तुम मुझसे विवाह कर लो)। मेरे भाई तुमसे स्नेह करेंगे और चाहो, तो स्वर्ग का राज्य भी तुम्हें दे देंगे और स्वयं तुम्हारा आदेश पूरा करते रहेंगे।

राक्षसों की कृपा मुझे मिल गई। तुम्हारी संगति भी मिली। अब मैं तुम्हारे संग शाश्वत वैभवपूर्ण जीवन सदा व्यतीत करनेवाला हो गया। उत्तम अयोध्या को त्यागने के पश्चात् मेरे पूर्वकृत तप अनेक रूप में फलित हुए हैं। यों कहकर दृढ धनुष के प्रयोग में अभ्यस्त भुजावाले प्रभु अपने दाँतो के उज्ज्वल प्रकाश को दिखाते हुए हँस पड़े।

इसी समय, स्त्रियों की रानी, धरती का रत्न, 'वजि' लता समान सुन्दरी देवी (सीता) सुगन्धित पर्णशाला के भीतर से, देवताओं के सुकृत के फलस्वरूप, उस मूर्त्ति के पास आ खड़ी हुई, जो ऐसे प्रकाशमय रूपवान् है, जिसे देखने पर देवलोक, मनुष्यलोक एवं पाताल-लोक के निवासी तथा ब्रह्मा प्रभृति देवों की आँखें भी चौंधिया जाती हैं।

मांस को पकाकर खाने के लिए ललचानेवाले बिल-सदृश मुँह से युक्त उस (शूर्पणखा) ने दिव्य ज्योति के समान एक रूप को (राम और उसके) मध्य में आकर खड़े होते हुए देखा, मानो उसने नक्षत्रों से प्रकाशमान आकाश और धरती में फैले हुए वीर गञ्ज-रूपी वन को जलाने के लिए उत्पन्न हुई पातिव्रत्य-रूपी वह्नि-ज्वाला को ही देखा हो।

तब वह (शूर्पणखा) यह सोचती हुई कि सुरभिपूर्ण केशोंवाली (अपनी पत्नी) को यह पुरुष वन में नहीं लाया होगा, इतनी सुन्दरता से पूर्ण कोई रमणी इस अरण्य में भी नहीं है, लक्ष्मी अरविंद का आवास छोड़कर क्या अपने चरण-युगल को धरती पर रखती हुई यहाँ आ सकती हैं?

वह (शूर्पणखा) तन्मय होकर बिलंब तक (सीता को) देखती खड़ी रही। वह यह सोचती रही—सृष्टिकर्त्ता की कुशलता की सीमा हो सकती है। किंतु मन से कभी न हटनेवाली (अर्थात्, मन में स्थिर रूप में अंकित रहनेवाली) सुन्दरता की कोई सीमा नहीं है। फिर सोचा—इसे देखने पर मुझ स्त्री-जन्म में उत्पन्न हुई की आँखें भी अन्य वस्तुओं पर नहीं जा रही हैं। जब मेरा ही मन ऐसा हो रहा है, तब अब दूसरों की (अर्थात्, इसे देखनेवाले पुरुषों की) क्या दशा होगी?

फिर, उसने युद्ध में निपुण प्रभु को देखा और शुकी-तुल्य देवी को देखा और वैसी ही (स्तब्ध) खड़ी रह गई। फिर, वह सोचने लगी—अब अन्य कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। कमलभव ने स्वयं सारी सृष्टि का अवलोकन करके, त्रिभुवन के निवासियो में दोनों प्रकार के (अर्थात्, स्त्री और पुरुष) व्यक्तियों की सुन्दरता की पराकाष्ठा बनाकर इन दोनों को उत्पन्न किया है।

उसने विचार किया—स्वर्ण के जैसे प्रकाश फेंकनेवाले तथा अतसी-पुष्प के जैसे रंगवाले इन पुरुष का शरीर, इस विद्युत्-समान सूक्ष्म कटिवाली के साथ संयुत नहीं है (अर्थात्, यह पुरुष इस स्त्री का पति नहीं है)। अपनी समता न रखनेवाली, पल्लव-समान चरणोंवाली यह सुन्दरी, मेरे जैसे ही बीच में (इस पुरुष पर आसक्त होकर) आई हुई कोई स्त्री है। इसका तिरस्कार (इस पुरुष से) कराऊँगी।

३३०कंब रामायण

तब उस (शूर्पणखा) ने (राम से) कहा—हे उत्तम ! हे वीर ! यह माया में चतुर है। यह वंचक राक्षसी है। इसका हृदय दुर्जय है। इसे सद्गुणवती समझना उचित नहीं है। इसका यह रूप सत्य नहीं है। यह मास खाकर जीवित रहनेवाली है। इसे देखकर मैं डर रही हूँ। इसे मेरे निकट आने से रोको और मेरी रक्षा करो।

यह सुनकर वीर (राम) बोले—हे विद्युत्-समान स्त्री ! तुम्हारा ज्ञान खूब है। तुम्हे धोखा देने की शक्ति किसमें है ? यह ज्ञात हुआ कि तुम्हारी मति स्वच्छ है और तुम सद्गुणवाली हो। अहो ! यह (सीता) कदाचित् क्रूर राक्षसी ही है। इसे तुम भली भाँति देख लो और अपने उज्ज्वल दाँत-रूपी मोतियों को दिखाकर हँस पड़े।

उस समय, अमृत के जैसी आई हुई, अरुन्धती के सदृश पातिव्रत्यवाली, मधुर बोली एवं वाँस के जैसे सुन्दर कंधोंवाली देवी (सीता) वीर (राम) के निकट आ पहुँची। तब भड़कती अग्नि के सदृश वचकगुण से पूर्ण चित्तवाली (शूर्पणखा) यह कहकर (सीता को) धमकाने लगी कि हे राक्षस-कुल में उत्पन्न स्त्री, तू क्यो बीच में आ पड़ी है ?

हंसिनी-तुल्य वह (सीता) भीत हुई। भीत होकर झट (राम की ओर) यो दौड़ी कि उसकी विद्युत्-समान सूक्ष्म कटि लचक गई और कोमल चरण दुखने लगे। यो दौड़कर वह कुंजर-समान वीर की पुष्ट भुजाओ से ऐसे लिपट गई, जैसे वर्षाकालिक जल से भरे बादल के मध्य कोई प्रवालमय लता कौंध गई हो।

तब वीर (राम) ने यह सोचकर कि वक्र खड्गदंतवाले राक्षसो के साथ विनोद करना भी बुरा ही होगा, उस (शूर्पणखा) से कहा—तुम कोई अहितकारी कार्य न करो। (मेरा) अनुज यदि तुम्हारा समाचार जान लेगा, तो वह अत्यन्त क्रुद्ध होगा। हे स्त्री ! तुम शीघ्र यहाँ से चली जाओ।

लावण्य से युक्त उस राक्षसी ने कहा—कमल मे, जल मे और कैलास मे निवास करनेवाले करुणा-पूर्ण हृदयवाले देव (ब्रह्मा, विष्णु और शिव), अनग तथा अन्य देवता भी मुझे प्राप्त करने के लिए तपस्या करते हैं। ऐसी हूँ मै। मेरी उपेक्षा करके तुम क्षमाहीन इस मायाविनी को चाहते हो, यह कैसे उचित है ?

तब पवित्र चित्तवाले (राम), यह सोचकर कि यह शिलातुल्य कठोर चित्तवाली (राक्षसी), मेरे यह कहने पर भी कि मै तुमसे सबध रखना नही चाहता हूँ, हटती नही है, किन्तु कपट-वचन कह रही है—मिथिलापति की पुत्री के साथ विद्युत् के साथ चलनेवाले मेघ के जैसे उस सुन्दर उद्यान के बीच स्थित कुटी मे चले गये।

उनके चले जाने के बाद, यह जानकर कि वे चले गये हैं, शूर्पणखा शरीर से निकले हुए प्राणो के साथ श्वासहीन हो गई। मन में अत्यत विह्वल हुई। उसे कुछ अवलवन नही मिला। मन में क्रुद्ध हुई और सोचने लगी—अंजन-समान काले केशोंवाली उस नारी पर यह पुरुष गहरा प्रेम रखता है।

इस प्रकार चिंतित होकर, वह वहाँ खड़ी नही रह सकी। वह उस पुरुषोत्तम की सगति प्राप्त करने का उपाय सोचती हुई वहाँ से चली गई। यह सोचकर कि यदि मैं इसके शरीर का आलिंगन नही करूँगी, तो अपने प्राण खो दूँगी, स्वर्ण-पराग से पूर्ण सुन्दर उद्यान

अरण्याकाण्ड ३३१

में स्थित अपने स्फटिकमय आवास मे जा पहुँची। सूर्य भी पश्चिम दिशा मे जा पहुँचा और लाली छा गई।

वह (शूर्पणखा) इस प्रकार प्रज्ञाहीन और शिथिल हो गई, मानो काल-सर्प के छेदवाले दंत से निकला हुआ विष उसकी देह में संचरण कर रहा हो। प्रख्यात कामाग्नि (उसके शरीर में) भड़क उठी।

युद्धकुशल मन्मथ के तीक्ष्ण बाण उसके वक्ष में ऐसे जा लगे, जैसे ताड़का नामक क्रूर राक्षसी के विशाल वक्ष में पुरुषोत्तम (राम) का तीक्ष्ण शर लगा था; इससे उसके भीत प्राण काँप उठे।

वह (काम-वेदना से पीड़ित) राक्षसी यह विचार करके उठी कि कलाओं से पूर्ण चन्द्रमा को साग बनाकर दृढ़ धनुर्धारी मन्मथ को ही चबा डालूँ, किन्तु मलय पर्वत से आनेवाला पवन, जब यम के दीर्घ शूल के समान उसके वक्ष पर लगा और पीड़ा उत्पन्न करने लगा, तब वह निष्क्रिय होकर गिर पड़ी।

(तरंगायमान समुद्र जब अपने शब्द से उसे सताने लगा, तब) उसने तरंगपूर्ण उस समुद्र को पर्वतों से पाट देना चाहा; किन्तु स्थिर गगन में प्रकाशित होनेवाले पूर्णचंद्र की दीर्घ किरणें उसे भयभीत कर रही थी, जिससे वह बलहीन होकर कुढ़ती हुई पड़ी रही।

(कभी) वह क्रुद्ध हो सोचती कि मैं इस धरती के सब उद्यानों को विध्वस्त कर, सब पुष्पों को चूर-चूर कर दूँगी; किन्तु अपने पति के संग रहनेवाली लाल मुकुटवाली क्रौंची की ध्वनि सुनकर वह अपने मन मे काँप उठती।

(कभी) वह क्रोध के साथ सर्प (राहु) को लाने का विचार करती, जिससे वह अपने प्रतिकूल रहनेवाले चंद्र को निगल जाय, किन्तु उसके पीन स्तनों पर शीतल-मंद पवन के लगने से उसके प्राण तप्त हो उठते और वह व्याकुल हो पड़ी रहती।

(अपने ताप को शांत करने के लिए) वह अपने करों से अति शीतल हिम-खंडों को लेकर अपने पुष्ट स्तनों पर रख लेती, किन्तु (उसके स्तनों से) उत्पन्न होनेवाली अग्नि में, तप्त पत्थर पर रखे हुए मक्खन के समान वे (हिमखंड) पिघल जाते।

कभी वह कामाग्नि से पीड़ित होकर निःश्वास भरती हुई अपने शरीर को शीतल जल में निमग्न करती, किन्तु वह जल (उसके शरीर के ताप से) उष्ण हो उठता। वह चिंता करती, किन्तु गरजनेवाले समुद्र एवं क्रूर मन्मथ से बचकर रहने का स्थान कहाँ है?

उसका शरीर इतना तप उठा कि शीतल चंद्रकांत की शिला भी उसके स्पर्श से पिघलने लगी। वह काले मेघ को देखती या उत्तम नील रत्नमय स्तंभ को देखती, तो (राम का स्मरण कर) उन्हें हाथ जोड़ देती।

वह कभी सोचती कि मैं किसी भयंकर, क्रूर दाँतोंवाले सर्प से सुरक्षित पर्वत की बड़ी गुहा में जाकर रहूँगी, जहाँ मनोहर पूर्णचंद्र, शीतल पवन और मदन मुझे पहचान नहीं सके।

उस समय, उष्णता बढ़ानेवाला मंद पवन पहले से भी तिगुने वेग से बहकर

३३२ कंब रामायण

उसको तपाने लगा । उसके स्तन उत्तप्त हो उठे । वह क्या उपचार करना है—यह न जानती हुई स्वर्ण रग के नवपल्लवो की शय्या पर करवटे लेने लगी ।

वीर (राम) का आकार उस क्रूर स्त्री की दृष्टि मे कालमेघ के समान दिखाई पड़ता । तब वह लज्जित हो उठती, शिथिल हो उठती, चौंक पड़ती, जैसे वह उनको अपने सम्मुख ही देख रही हो । जब वह आकार अदृश्य हो जाता, तब वह कठोर विरहाग्नि मे फँस जाती ।

अंजन-समान काले मेघ को प्रभु (राम) ही समझकर वह उसे पकड़कर अपने स्तनो से लगा लेती । किन्तु, उस मेघ को झुलसकर मिटते हुए देखकर रो पड़ती । क्षुद्र स्वभाववाली उस राक्षसी की काम-वेदना की कोई सीमा भी थी ?

वह यो तप रही थी, जैसे प्रलय-काल की भीषण अग्नि मे फँस गई हो । फिर भी, वह मूढ़ स्त्री चक्रधारी (राम) को प्राप्त कर जीवित रहूँगी—इस आशा-रूपी ओषधि से अपने प्राणो को रोके रही ।

कभी वह (राम से) प्रार्थना करने लगती—तुम क्रूर माया को अधिकाधिक बढ़ाने की शक्ति रखनेवाले मेरे विष-सदृश हृदय मे आ जाओ और मेरी वेदना को दूर करो । कभी कहती—हे अंजन पर्वत ! मुझपर कृपा करो । वह इस प्रकार पीडित हुई, जैसे उसने विष पी लिया हो ।

प्राण जाने पर भी कामना को न त्यागनेवाली वह (स्त्री) सोचती—(उस स्त्री के नयन) नीलोत्पल है ? या मीन है ?—ऐसा संदेह उत्पन्न करनेवाले नयन-युगल से युक्त वह स्त्री (सीता) लक्ष्मी से भी अधिक सुन्दर है । ऐसी दशा मे वह (राम) क्या मुझ पापी की ओर दृष्टि भी फेरेगा ?

वह सोचती—इस पुरुष के पास रहनेवाली सुन्दरी उत्तम पातिव्रत्यवाली है । रक्त कमल में वास करनेवाली लक्ष्मी ही है, फिर सोचती—मै उस (पुरुष) पर अनुरक्त होऊँ, तो भी वह इस वेदना से तस नही होता ।

जब उसकी काम-वेदना इस प्रकार बढ़ रही थी, तब सूर्य इस प्रकार उदित हुआ, जैसे तीनों लोकों में भरे हुए राक्षस-रूपी गाढ अन्धकार को दूर करने के लिए राम ही उदित हुए हो ।

उस क्रूर राक्षसी ने प्रभात को देखा और अपने प्राणो को भी सुरक्षित देखा । उसने विचार किया—जबतक वह अनुपम सुन्दरी उसके समीप रहेगी, तबतक वह पुरुष आँख उठाकर भी मुझे नही देखेगा, अतः मैं शीघ्र जाकर उस स्त्री को उठा ले आऊँगी और कहीं छिपा दूँगी । फिर, उस पुरुष के साथ सुखी जीवन व्यतीत करूँगी ।

उसने (पर्णशाला मे) आकर देखा—राम गोदावरी के सुन्दर घाट पर सध्यो- पासना मे मग्न हैं, पर उसने यह न देखा कि समीपस्थ घनी छाया से पूर्ण सुरभित उद्यान मे रहकर उनके अनुज, चंद्र-समान ललाटवाली देवी (सीता) की रक्षा कर रहे हैं ।

उसने सोचा कि यह (सीता) अकेली हैं, मेरा उद्देश्य सफल हुआ, अब सोचते हुए विलम्ब करना उचित नहीं है। और, कलंकित चित्तवाली वह, कलापी (तुल्य सीता को)

अरण्यकाण्ड ३३३

पकड़ने के लिए उनका पीछा करती हुई गई । फल-भरे उद्यान में स्थित लक्ष्मण ने यह देख लिया ।

उन्होंने क्रुद्ध होकर गरजते हुए कहा—अरी ! ठहर । फिर, झट उसके निकट आकर देखा—यह स्त्री है, हाथ मे धनुष लिया नही है; फिर उस (शूर्पणखा) के भड़कती आग-जैसे दीखनेवाले केशो को अपने अरुण कर से ऐंठकर पकड़ लिया । उसके पेट पर शीघ्रता से एक पदाघात किया और अपने कर मे उज्ज्वल करवाल धारण किया ।

तब वह उन (लक्ष्मण) को भी उठाकर आकाश-मार्ग से उड़ जाने का प्रयत्न करने लगी । इतने में (लक्ष्मण ने) उसे झट नीचे ढकेल दिया और 'अब-आगे कभी ऐसा कार्य न करना'—कहते हुए उसकी नाक, कान और कठोर स्तन के चूचुको को एक-एक कर के काट दिया । फिर शातकोप होकर उसके केशो को छोड़ दिया ।

उस क्षण, वह (शूर्पणखा) अपना मुँह खोलकर चिल्ला उठी । वह ध्वनि सब दिशाओ मे व्याप्त हो गई और देवताओ के कानो मे भी जा पड़ी । अब उसकी दशा का क्या वर्णन करना है ? उसकी नाक के छेद से प्रवाहित रक्त से धरती गल गई ।

उसकी हत्या न करके, लक्ष्मण ने अपने उज्ज्वल करवाल से उस क्रूर (राक्षसी) के नाक-कान काट दिये । वह कार्य ऐसा था, जैसे रावण के रत्नमय मुकुट-भूषित शिरो को काटने के लिए सुदिन का निर्णय करके, उसका प्रारंभ करते हुए पर्वत-शिखर को ही उन्होने काट दिया हो ।

वह धरती पर धड़ाम से गिर पड़ी और पैर उछालती हुई दहाड़ मारकर रोने लगी । वह ऐसी दिखाई पड़ती थी, मानो यम के समान कठोर शूल को धारण करनेवाले क्षुब्ध हो युद्ध करनेवाले खर प्रभृति राक्षसो के विनाश की सूचना देता हुआ कोई कालमेघ रक्त की वर्षा कर रहा हो ।

दुःख स्वयं जिनसे डरकर दूर भागता था, ऐसे राक्षसो के कुल मे उत्पन्न वह स्त्री, आकाश में उछलती, धरती पर गिरती, लोट जाती, शिथिल पड़ जाती, व्याकुल हो हाथ मलती, मूर्च्छित होती, मूर्च्छा से जग पड़ती, बार-बार कहती—मुझ स्त्री-जन्म पानेवाली का आज कैसा पराभव हुआ ?

हाथ से नाक दबाती, लुहार की भाँथी के जैसे निःश्वास भरती, धरती पर हाथ मारती, अपने युगल स्तनो पर हाथ रखती, उसकी देह स्वेद से भर जाती, अपने बलवान् पैरो को लिये चारो ओर दौड़ती, फिर रक्त बहाती हुई शिथिल पड़ जाती ।

स्रोत से उमड़नेवाले जल के समान बहनेवाले लहू से जो कीचड़ बन गया, उसमें लोटती हुई वह राक्षसी पीड़ा को नही सह सकी और अपने कुल के लोगो के नाम पुकार-पुकारकर रोने लगी, जिससे यम भी भयभीत हो गया और देवता भय से भागने लगे ।

अग्नि-ज्वाला को कर में धारण करनेवाले (शिव) के पर्वत (कैलास) को उखाड़कर उठानेवाले, हे पर्वत (सदृश रावण) ! तुम्हारे धरती पर जीवित रहते हुए ये मुनिवेषधारी धनुष लेकर घूम रहे हैं । क्या यह तुम्हारे लिए अपमानजनक नही है ?

३३४कंब रामायण

'देवता लोग आँख उठाकर भी तुम्हारी ओर नही देख सकते—क्या यह कहने मात्र से तुम्हारा काम हो गया ? आओ, यहाँ की दशा भी तो देखो।'

हे प्रलय-काल में भी न डिगनेवाले त्रिमूर्त्ति एवं देवो से भी अधिक बल से युक्त (रावण) ! 'बाघिन के पीछे-पीछे जाते हुए उसके बच्चे कभी पीड़ित नहीं होते'—समुद्र से आवृत धरती के लोगों का यह कथन भी क्या असत्य है ? आओ, मेरी इस वेदना को भी तो देखो।

हे रावण ! जब देवेन्द्र ऐरावत पर आरूढ हो देवताओ की सेना के साथ गर्जन करता हुआ युद्ध करने के लिए सम्मुख आया था, तब तुमने उसे परास्त करके भगा दिया था। हे इन्द्र की पीठ को देखनेवाले ! आओ, मेरे अपमान को भी तो देखो।

हे शिव के द्वारा प्रदत्त बड़े करवाल को धारण करनेवाले ! तुम पवन, जल, अग्नि, कालांतक यम, स्वर्ग एवं ग्रहों से अपनी सेवा कराने में समर्थ हो। क्या अब इन दो नरो के बल से परास्त हो निर्बल होकर बैठे हो ?

चलते समय जिनके भारी पैरों के पद-तल से चिनगारियाँ निकलती हैं, ऐसे मद-भरे दिग्गजों के दाँतो को तोड़नेवाले तथा पर्वतों को फोड़नेवाले कंधो से युक्त, हे बलवान् ! रूप में मन्मथ के समान होने पर भी ये मनुष्य तुम्हारे जूते के नीचे की धूल के बराबर भी नहीं हैं, क्या इनपर तुम क्रोध न करोगे ?

हाय ! क्या मधुपूर्ण सुगन्धिक पुष्प-मालाधारी देवो को मिटाने की, रावण एवं उसके भाइयो की शक्ति अब नष्ट हो गई है ? क्या अब वह शक्ति मांसमय शरीरवाले, हमारे कुलवालों का आहार बननेवाले मनुष्यो के पास चली गई है ?

युद्ध में सम्मुख पड़नेवाले, जिसे देखकर यों सदेह कर उठते हैं कि यह हर है, विष्णु है अथवा ब्रह्मा है—हे ऐसे शक्ति से संपन्न खर ! घने वृक्षों से भरे विशाल वन में एकांतवास करनेवाले मुनिवेषधारी मनुष्यो की शक्ति से, अथवा पराक्रमी राक्षसों के निर्वीर्य हो जाने से मुझपर जो विपदा आ पड़ी है, उसे तू देख।

इंद्र, हर, ब्रह्मा तथा अन्य देव जब तुम्हारी सेवा में निरत रहते हैं, सप्तलोकों के निवासी तुम्हारी स्तुति करते रहते हैं, तब तुम्हारे पूर्णचन्द्र-सदृश श्वेतच्छत्र की छाया में आसीन रहते समय, तुम्हारी सभा के मध्य मैं निर्लज्ज-सी आकर किस प्रकार अपना मुख दिखा सकूँगी ?

शिव के आसन कैलास को उखाड़नेवाले हे मेरे भाई ! मेरे बल को चूर करते हुए, पदाघात से मुझे नीचे गिराकर जिस (मनुष्य) ने मेरी नाक काट दी, वह जीवित रहकर अपनी भुजा को (गर्व से) देखे और मैं नीचे गिरकर रोती रहूँ—क्या यह उचित है ? यह वन खर का है न ? तो भी क्या मुझे ये कष्ट भोगने पड़ेंगे ?

दिग्गजो के क्रोध को कम करते हुए, उनके साथ युद्ध करके उनके दाँतो को तोड़नेवाले और उससे प्राप्त यश से फूले हुए कंधोवाले हे रावण ! कामना के वशीभूत होकर मैंने नाक खोई और निर्लज्जता से जिस अपमान का भागी हो गई हूँ, इससे क्या तुम्हारा यश कलंकित नही होगा ?

अरण्यकाण्ड ३३५

दानवों के कुल को मिटाकर, इन्द्र को बन्दी बनाकर, देवों को दास बनाकर उनसे सेवा करानेवाले हे मेरे भतीजे ! अरण्य में दो मनुष्यों ने मेरे कान और नाक काट दिये हैं। क्या, मैं पापिन इस अपमान से यहाँ यों ही मिट जाऊँ ?

पूर्वकाल में, हाथ में एक ही धनुष लेकर सप्तलोकों को जलानेवाले, अशमनीय क्रोध के साथ सब दिशाओं को परास्त करनेवाले तथा इन्द्र के दोनों चरणों में श्रृंखला डालनेवाले हे मेरे भतीजे ! क्या इन मनुष्यों का पराक्रम देखने के लिए नहीं आयोगे ?

शिलाओं को भेदनेवाले शस्त्रों को धारण करनेवाले विशाल करों से युक्त, हे पराक्रमी खर-दूषण आदि ! हे अंधकार को मिटानेवाले प्रकाश से युक्त रत्नाभरणों को धारण करनेवाले राक्षसों के कुल में उत्पन्न लोगो ! लुहार के द्वारा पैनाये गये शस्त्रोंवाले कुम्भकर्ण-जैसे ही क्या तुम लोग भी धरती में कहीं सोये पड़े हो ? मेरी पुकार तुमलोग सुन क्यों नहीं रहे हो ?

यों अनेक वचन कह-कहकर वह बलवान् राक्षसी शोक-मग्न हो रोती हुई वहाँ की मनोहर आश्रम-भूमि पर लोटती रही । उस समय, अपने कर में दृढ धनुष लिये, विशाल भुजावाले, मरकत पर्वत ( सदृश राम ), ( गोदावरी ) नदी पर सन्ध्या आदि नित्यकर्म समाप्त करके वहाँ आये ।

तब वह ( शूर्पणखा ), वहाँ आनेवाले ( राम ) को मार्ग के मध्य देखकर, अपनी छाती पीटती हुई, आँखों से अश्रु की वर्षा करती हुई, अपने शोणित के प्रवाह से वहाँ की सुन्दर भूमि को कीचड़ से भरती हुई, यह कहकर कि—'हे प्रभु ! हाय ! मैं तुम्हारे सुन्दर रूप पर आसक्त होने के अपराध में इस दुर्दशा को प्राप्त हुई हूँ। यह देखो ।'—उन ( राम ) के सामने गिर पड़ी ।

प्रभु ने अपने उपमाहीन मन से समझ लिया कि बिखरे केशोंवाली इस (राक्षसी) ने कोई क्रूर कार्य किया होगा । यह भी समझ लिया कि अनुज ने ही इसके दीर्घ कान-नाक काटे हैं। फिर उस ( राक्षसी ) से पूछा—तू कौन है ?

उस प्रश्न को सुनकर क्रूर राक्षसी ने उत्तर दिया—क्या तुम मुझे नहीं पहचानते ? बैर के नाम तक को धरती पर से मिटा देनेवाले क्रोध से युक्त, भयंकर पन्नाकार भाले को धारण करनेवाले, त्रिभुवन के शासक रावण की मैं बहन हूँ ।

तब ( राम के ) यह प्रश्न करने पर कि, पराक्रमी राक्षसों के स्थान को छोड़कर हमारे तप करने के इस स्थान में तू क्यों आई ? उसने उत्तर दिया कि, हे अग्निकण के समान तपानेवाली काम-वेदना के लिए उत्तम औषधि-समान ! मैं कल भी आई थी न ?

( तब राम ने प्रश्न किया—) क्या रक्त मीन के समान चंचल, काले वर्ण से युक्त दीर्घ नयनोंवाली, मधुपूर्ण कमल में निवास करनेवाली लक्ष्मी का भ्रम उत्पन्न करनेवाली, जो स्त्री कल आई थी, वह तुम्हीं हो ?—( राम के ) यों प्रश्न करने पर उस राक्षसी ने उत्तर दिया—सुन्दर नेत्रोंवाले हे राजन् ! स्तन, ताटंक-भूषित कान और लतातुल्य नासिका को काट देने पर सुन्दरता कहाँ रह जाती है ?

यह सुनकर प्रभु, दाँतों को किंचित् खोलकर, मुस्कराये और अनुज का मुख

३३६कम्ब रामायण

देखकर पूछा—हे वीर ! इसने क्या अपराध किया था कि तुमने झट इसके कान-नाक काट दिये ? तब शूर तथा उदार गुणवाले (लक्ष्मण) ने उनके चरणों पर नत होकर कहा—

अपने तीक्ष्ण दाँतों से (मांस) खाने के उद्देश्य से या क्रूरकर्मा राक्षसों के उभारने से, न जाने किस कारण से, यह दुर्गुणवाली राक्षसी अपनी आँखों से चिनगारियाँ उगलती हुई अज्ञात रूप से आई और उत्तम गुणवाली देवी (सीता) की ओर क्रोध करके झपटी।

धनुर्धारी लक्ष्मण के अपना कथन समाप्त करने के पूर्व ही, वह क्रूर राक्षसी बोल उठी—हे ऐसे देश के अधिपति, जहाँ के जलाशयों में कीचड़ में स्थित शंखकीट को अपने पति के संग रहते देखकर गर्भिणी मंडूक-स्त्री (ईर्ष्या से) क्रुद्ध हो जल को हिलाने लगती है ! अपनी सौत को देखने पर किस स्त्री का मन क्षुब्ध नहीं होगा ?

(तब राम ने कहा—) भीरुता से (माया) युद्ध करनेवाले क्रूर राक्षसों के विशाल कुल को एक साथ मिटाने के लिए हम यहाँ उनके स्थान को खोजते हुए आ पहुँचे हैं। अब तू कुछ निंदा-वचन कहकर हमारे हाथ से अपने प्राण न गँवा। सत्य के आवासभूत इस वन को छोड़कर तू दूर भाग जा। राम के ये वचन सुनकर भी वह राक्षसी बोल उठी—

जिस बुढ़ापे में बाल पक जाते हैं और (शरीर में) झुर्रियाँ पड़ जाती हैं—ऐसे बुढ़ापे से रहित ब्रह्मा आदि सब देवता, रावण को कर देते हैं। अतः, तुमने जल्दी में जो यह काम कर दिया है, वह उचित नहीं किया। यदि तुम अपनी भलाई चाहते हो, तो सुनो, मैं एक बात कहती हूँ।

वह दशमुख इतना क्रोधी है कि जो कोई जाकर उससे यह कहे कि तुम्हारी बहन की नाक कट गई है, तो वह उस कहनेवाले की जीभ काट ले। अतः, मेरी नाक काटकर तुमलोगों ने अपने कुल की जड़ ही काट दी है। अब तुम्हारे प्राण नहीं बच सकते। हाय ! अपने इस सारे सौंदर्य को तुमने धूल में मिला दिया।

अब स्वर्ग के रक्षकों (देवताओं), पृथ्वी के रक्षकों (राजाओं) और नाग-लोक के रक्षकों में ऐसा कौन है, जो अपने शिरों की रक्षा करते हुए तुमलोगों की देह की भी रक्षा कर सके ? यदि तुम मेरे प्राणों की रक्षा करो (अर्थात्, विरह-पीडा से मेरी रक्षा करो) तो मैं तुम्हारी रक्षा करूँगी। अन्यथा वे रावण हैं (जो तुम्हारा विनाश करेंगे)—यों उस (शूर्पणखा) ने कहा।

उसने आगे कहा—चारित्र्य की रक्षा करनेवाले अचंचल पातिव्रत्य-धर्म से युक्त स्त्रियाँ, अपने महत्त्व को स्वयं नहीं कहती हैं। तो भी मैं, तुम पर अधिक प्रेम होने के कारण, यह कह रही हूँ। क्या तुम अपने इस अनुज को नहीं बतलाओगे कि मैं देवताओं से भी अधिक बलवान् (रावण) की बहन हूँ और संसार के सब प्राणियों से अधिक बलवान् हूँ।

बड़े युद्धों में भी मैं तुमलोगों की रक्षा कर सकती हूँ। तुम्हें उठाकर गगन-मार्ग से जा सकती हूँ। मांस-सदृश स्वादवाले अनेक फल लाकर तुम्हें दे सकती हूँ। तुम्हारे

अरण्यकाण्ड ३३७

मन में जो भी इच्छा उत्पन्न हो, उसे मैं पूरा करूंगी। जो रक्षा कर सकते हैं, उनसे द्वेष करने से क्या लाभ ? और, सुमन के जैसे कोमल स्वभाववाली इस नारी से ही क्या प्रयोजन है ? कहो तो सही।

उत्तम कुल, उत्तम स्वभाव, उद्दिष्ट वस्तुओ को लाने की शक्ति, बुद्धि, आकार, यौवन—सब विषयो में मेरी समता करनेवाली कोई स्त्री पृथ्वी के निवासियो में या स्वर्ग के निवासियो में भी कौन है ?—यदि तुम समर्थ हो तो कहो।

तुमने मेरी नाक काट दी। उससे क्या हानि है ? यदि तुम मुझे स्वीकार करो, तो मैं एक क्षण में उसे उत्पन्न कर लूँगी। मेरा सौंदर्य पूर्ण हो जायगा। यदि तुम्हारी कृपा प्राप्त करने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हो गया, तो नासिका के लोप से क्या हानि होगी ? अत्युन्नत दीर्घ नासिका भी तो स्त्रियों के लिए ( सौंदर्य का ) लोप करनेवाली ही होती है न ?

मन न मिलने पर ही तो द्वेष उत्पन्न होता है ? यदि मन मे प्रेम हो और मै तुम्हें स्वीकृत हो जाऊँ, तो मेरे प्राण भी तुम्हारे अधीन हो जायेंगे। देखनेवाले सब लोग मुग्ध होकर प्रेम करने लगें, ऐसा सौंदर्य भी विष-समान ही तो होता है, विवाह करनेवाला पति जितना सौंदर्य चाहे, केवल उतना ही सौंदर्य हो, तो क्या ( तुम ) उसे स्वीकार नही करोगे ?

शिव, कमलभव चतुर्मुख, विष्णु, विनाशकारी वज्र को धारण करनेवाला इन्द्र सब मिलकर एक रूप धारण करके खड़े हों—ऐसे रूपवाले, हे सुन्दर। सब लोको के प्राणियो को अपने अनुपम बाणो से सतानेवाला मन्मथ भी क्या तुम्हारा भाई ही है ? वह ( मन्मथ ) भी तुम्हारे इस अनुज-जैसा ही करुणाहीन है।

हे स्वर्णमय वीर-कंकण से भूषित वीरो ! तुमने यही सोचकर कि यह (शूर्पणखा) सदा के लिए इस सुन्दर रूप में हमारे पास ही रहे, अन्य कही नही जा सके और कोई इसे देखकर मोहित न हो जाय—तुमने मेरे कान-नाक काट दिये। तुमने कुछ बुरा नहीं किया। अन्यथा, मेरी नाक काटकर बड़ा छेद कर देने मे तुम्हारा अन्य क्या प्रयोजन हो सकता है ? तुम्हारा वह उद्देश्य जानकर ही अब मैं पहले से दुगुना प्रेम करने लगी हूँ। मैं क्या ऐसी निर्बुद्धि हूँ ( जो इतना भी नही समझ सकूँ ) ?

उग्र कोपवाले, शस्त्रधारी राक्षस, यह समाचार जानकर यदि लाल आँखें करेंगे, तो सारा संसार ही तुम्हारे कारण विनष्ट हो जायगा। उत्तम कुल मे उत्पन्न व्यक्ति धर्म का विचार करके ऐसा विनाश नही होने देंगे। तुम यह विचारकर यह अपवाद दूर करो और मेरा उपकार कर मेरे संग रहो—यह कहकर वह विनय करती खड़ी रही।

तब रामचन्द्र ने कहा—हे क्रूर राक्षसी ! संसार के सब प्राणियो को दुःख देनेवाली क्रूर राक्षसी तुम्हारी माता की जननी ताडका के प्राण जिस शर ने हर लिये थे, वह अभी तक मेरें पास ही है। इतना ही नही, भुजबल से युक्त तथा पुष्प-मालाओं से भूषित क्रूर राक्षसों के कुल का विनाश करने के लिए ही मैं उत्पन्न हुआ हूँ। तू अपना क्षुद्र व्यवहार त्याग दे। यह कहकर रामचन्द्र ने आगे कहा—

३३८ कंब रामायण

हम, सारी पृथ्वी का शासन करनेवाले चक्रवर्ती दशरथ के पुत्र हैं और माता की आज्ञा से सुगन्धित वन में आये हुए हैं। वेदोक्त तथा तपस्वियों के कहने से हम, अपार सेना-समुद्र से युक्त राक्षसों के वंश का विनाश करेंगे और उसके पश्चात् ही पर्वत-सदृश सौधोंवाली अयोध्या नगरी में प्रवेश करेंगे—इसे ठीक समझ ले।

राक्षसों के सम्मुख सन्मार्ग पर चलनेवाले देवता लोग खड़े नहीं रह सके और पराजित हो भाग गये, तो यहाँ ये दो मनुष्य क्या कर सकेंगे ?—ऐसा विचार मत कर। यदि तू शक्तिमान् है, तो जा, क्रोधी, तीक्ष्ण शस्त्रधारी राक्षसों में तथा बलवान् यक्षों में, जो अत्यन्त शक्तिमान् हैं, उन्हें ले आ। हम उन सबका विनाश कर देंगे।

तब उस राक्षसी ने कहा—हे धान आदि अनाजों को अधिकाधिक उत्पन्न करने-वाली जल-समृद्धि से पूर्ण देशवाले ! सुनो, यदि तुम मुझे मुँह के ऊपर ओंठ से बाहर उभरे हुए दाँतोंवाली, विकृत रूपवाली कहकर मेरा तिरस्कार न करो और मुझसे प्रेम करो, तो उन राक्षसों को अवश्य मिटा सकोगे। (उनकी) माया को यथातथ्य रूप में जान सकोगे। उनको संपूर्ण रूप से परास्त कर सकोगे। उनके क्रूर कृत्यों से तुम बच सकोगे। फिर उसने कहा—

तुम इस बाँस-सदृश कंधोंवाली को न त्यागो, तो भी मै क्या तुम्हारे लिए भार हो जाऊँगी ? यदि तुम मायावी तथा सद्ज्ञान-हीन राक्षसों से युद्ध करने का विचार करते हो, तो पंचेंद्रियों के समान विविध माया करनेवाले, उनके यंत्रों को समझकर मैं उनसे तुम लोगों की रक्षा करूँगी। 'साँप के पैर साँप ही जानता है' वाली कहावत को जानते हो न ?

यदि तुम यह सोचते हो कि हृदय से प्रेम करके ही इस (सीता) ने तुमसे विवाह किया है, तो अपने इस अनुज के साथ—जिसने इतना भी विचार न किया कि राक्षसों के साथ युद्ध करना पड़े, तो हम तीनों एक साथ मिलकर रक्त की नदियाँ बहा देंगे और राक्षसों पर विजय प्राप्त करेंगे (और मेरा अंग-भंग कर दिया)—मेरा विवाह करा दो। दो ग्रहों (सूर्य और चन्द्र) को बन्दी बनानेवाले रावण से मैं बल में कुछ कम नहीं हूँ।

जब तुम उत्सव के दृश्यों से युक्त अपने बड़े नगर में प्रवेश करोगे, तब मैं (अपनी मायाशक्ति से) मनचाहा रूप धारण करूँगी। तुम्हारा यह अनुज, शांतमन होकर भी यदि यह कहे कि इस नाककटी स्त्री के साथ कैसे रह सकता हूँ ? तो हे प्रभु ! तुम इसे समझाकर कहना कि चिरकाल से मैं कटिहीन १ स्त्री के साथ रहता हूँ।

उस (शूर्पणखा) ने जब ये वचन कहे, तब अत्यन्त क्रुद्ध हुए अनुज लक्ष्मण ने पत्राकार बरछे की ओर दृष्टि करके (राम से) कहा—हे प्रभु ! यदि इसे अभी न मार दें, तो यह बहुत पीडा उत्पन्न करेगी। कहिए, आपकी क्या आज्ञा है ? प्रभु ने कहा—यदि अब भी यह हमें छोड़कर न जाये तो वैसा ही करेंगे। तब उस राक्षसी ने यह सोचकर कि ये मुझ-पर कुछ दया नहीं करेंगे और यहाँ रहूँगी, तो मेरे प्राणों की हानि होगी।


१. शूर्पणखा सीता को 'कटिहीन' कह रही है। —अनु०

अरण्यकाण्ड ३३१

फिर, यह कहकर कि—अपनी नाक, कानो और स्तनो को खोकर भी (तुम लोगो के साथ) मैं कैसे रह सकती हूँ? तुम्हारे मन को समझने के लिए ही तो मैने यह माया की थी ? अब मै पवन से भी तेज अग्नि से भी क्रूर खर को बुला लाऊँगी, जो तुम लोगों के लिए यम बनेगा—अशमनीय बेर के साथ वहाँ से चली गई । ( १-१४३ )

अध्याय ६

खर-वध पटल

रक्त की धारा बहाती हुई, बिखरे केशोवाली, नाली-जैसे छेद से युक्त नाकवाली और विशाल मुँहवाली वह (शूर्पणखा), जाकर (जनस्थान में) स्थित भयंकर खर के चरणो पर ऐसे गिरी, जैसे कोई लालिमा से युक्त बादल हो।

'(राक्षसो के) विनाश का यह दिन है'—इस बात की सूचना देते हुए, यम की आज्ञा से बजनेवाले नगाड़े के समान, अकेली चिल्लाती हुई वह (शूर्पणखा), इस प्रकार धरती पर लुढ़कती रही, जिस प्रकार गरजते मेघ से गिरे हुए वज्र की अग्नि से जलता हुआ कोई नाग हो।

उस खर ने उसे देखा, जिसके मुँह से कठोर वचनों के अनुकूल धुआँ निकल पड़ता था और पूछा—'निर्भय होकर इस प्रकार तुम्हारा रूप विकृत करनेवाले कौन हैं?' तब नासिका-द्वार से बहनेवाले रक्त से रुँधी हुई आँखोंवाली उस (शूर्पणखा) ने कहा—

दो मनुष्य हैं, जो मुनिवेषधारी हैं, हाथो में दृढ धनुष एव करवाळ धारण करने-वाले हैं, मन्मथ के समान सुन्दर रूपवाले हैं, धर्मस्वभाववाले हैं, दशरथ के पुत्र हैं, राक्षसो के साथ युद्ध करने के विचार से उनको ढूँढते रहते हैं।

वे तुम्हारे बल की कुछ परवाह नही करनेवाले हैं। धर्म-मार्ग पर स्थिर रहकर उसकी रक्षा का विचार करनेवाले हैं, विजयशील भाले रखनेवाले राक्षसों का विनाश करने का दृढ़ निश्चय रखनेवाले हैं।

उनके साथ एक मुग्ध (स्त्री) है, जो इतनी महिलोचित सुन्दरता से पूर्ण है कि पृथ्वी में, दुर्लङ्घ्य स्वर्ग-लोक मे तथा अन्य (पाताल) लोक में, कही अन्वेषण करने पर भी उसकी समता करनेवाली स्त्री नही मिलेगी। मैने अपनी आँखों से उसे देखा है। लेकिन, उसका वर्णन मै नही कर सकती।

उसे देखकर मैंने सोचा—अन्यत्र दुर्लभ सुन्दरता से युक्त इस रमणी को मै लङ्काधीश के लिए ले जाऊँगी और उस पर झपटी। तब उन मनुष्यों ने क्रुद्ध होकर मेरी नाक काट डाली।—उसने यों कहा।

उस खर ने, जो अपने आकार से संसार को भय-विकम्पित करनेवाला था और

३४० | कंब रामायण

जिसको सामने से देखनेवालों की आँखें झुलस जाती थीं, जिसने उस (शूर्पणखा) को पहले ठीक-ठीक नहीं देखा था, अब उसके वचन सुनते ही, यह कहकर उठा कि उन विनाश को प्राप्त होनेवाले मनुष्यों के द्वारा, ताल-फल के कोए के जैसे उखाड़ी गई अपनी नाक को मुझे दिखाओ।

वह उठकर खड़ा हुआ। उसका मन ऐसे क्रोध से बोखला उठा, जो सप्त लोकों को जलाकर भस्म कर सके, और बोला—'मनुष्य-मात्र मर गये, केवल इतना कह देने से ही हमारा यह अपमान नहीं मिटेगा।'१

तब ज्योंही उसने 'रथ लाओ' कहा, त्योंही उसके निकटस्थ रहनेवाले, एक ही हाथ से सारी धरती को उठाने की शक्ति रखनेवाले, दो हाथवाले ऊँचे पर्वतों के जैसे लगनेवाले, चौदह वीरों ने (खर से) निवेदन किया कि यह (युद्ध का) कार्य हमें सौंपो।

त्रिशूल, करवाळ, तोमर, चक्र, कालपाश, गदा आदि शस्त्र हाथों में लेकर वे चले, तो उनके कोलाहल से समुद्र से आवृत्त धरती के सब प्राणी भयभीत हो उठे। उनके आकार ऐसे थे, मानो विष ही साकार बन गया हो।

जलती क्रोधाग्नि से युक्त, उन राक्षसों ने (खर से) कहा—हे वीर ! हमारी सेवा आज धन्य हुई। क्या तुम देवों से युद्ध करने जा रहे हो ? हमारे जीवित रहते यदि तुम मनुष्यों से युद्ध करने जाओगे, तो हमारा जीवन व्यर्थ होगा। यों कहकर उन्होंने उसे रोका।

तब खर ने कहा—ठीक है। अच्छा कहा, यदि मैं इन क्षुद्र मनुष्यों से युद्ध करने जाऊँ, तो देवता लोग हँसेंगे। तुम लोग जाओ। उनको मारकर उनका रक्त पियो और उस सुकुमारी को साथ लेकर आओ।

(खर के) यह आज्ञा देते ही, आनंदित होकर उन वीरों ने उसे प्रणाम किया और समाचार देनेवाली निर्लज्ज (शूर्पणखा)-रूपी यम के दूत को आगे करके, उसके पीछे-पीछे चलकर दशरथ के पुत्रों के निवास पर गये।

उस (शूर्पणखा) ने कोलाहल के साथ युद्ध के लिए आये हुए उन राक्षसों को, कमल-समान नेत्रवाले उन राम को अपनी उँगली उठाकर दिखाया, जो अकलंकमहमनाम वाले चक्रपाणी (विष्णु) के ध्यान में मग्न थे।

कुछ राक्षस कह रहे थे कि (उन मनुष्यों को) पकड़कर ऊपर उछालेंगे। फिर, हाथों में रोक लेंगे। और, कुछ कहते थे कि इन्हें दीर्घ पाश से हम बाँधेंगे। यों सब राक्षसों ने, अपने नायक (खर) की आज्ञा के अनुसार कार्य को पूर्ण करने के विचार से, पहाड़ों के जैसे आकर उन (राम-लक्ष्मण) को घेर लिया।

अपरिमित शक्तिवाले राम ने अपने अनुज को यह आदेश देकर कि देवी की रक्षा करो, उज्ज्वल कल्पवृक्ष के पुष्प-समान अपने अनुपम करों से डोरी से युक्त पर्वत-सदृश विशाल भारी धनुष को उठा लिया।

कमल-सदृश नयनोंवाले प्रभु, यों (धनुष को) उठाये, करवाल के साथ बाणों से


१ भाव यह है कि संसार के सारे मनुष्यों को मार देने से भी हमारा यह अपमान न मिटेगा।—ने०

अरण्यकाण्ड ३४१

पूर्ण तूणीर को भी लिये, उस पर्णकुटी से बाहर निकले और 'अरे ! इधर आओ ।'—यों वीर- वाद कहते हुए भुजाओं को फुलाये युद्ध करने लगे ।

परशु, करवाल, उज्ज्वल फलवाला त्रिशूल तथा भयंकर प्रलयकालाग्नि की समता करनेवाले उन राक्षसों के स्तम्भ-सदृश हाथों को लक्ष्य-वेधक शरों से काट-काटकर उन्हें धरा- शायी कर दिया ।

बड़े-बड़े शस्त्रों-सहित अपनी भुजाओं के, बड़े-बड़े वृक्षों के समान कटकर गिर जाने पर भी अपने वलिष्ठ वृक्षों को लिये हुए वे राक्षस युद्ध करने के लिए आगे बढ़े । तब वलवान् (राम) के द्वारा प्रयुक्त शर, वेग से उनमें आ लगे, जिससे उनके शिर कटकर गिर पड़े । ( यह दृश्य देखकर ) पापिनी ( शूर्पणखा ) वहाँ से भाग चली ।

गरजनेवाले, क्रोधी तथा पराक्रमी सिंह के द्वारा मत्त हाथियों के मारे जाने पर जिस प्रकार हथिनी अपनी सूँड़ को उठाकर सिर पर रखे हुए चिल्लाती हुई भाग रही हो; उसी प्रकार वह ( शूर्पणखा ) भी भागकर खर के पास गई और उज्ज्वल शूलधारी खर को उसने सब वृत्तान्त सुनाया ।

वृषभवाहन ( शिव ) के लिए भी अजेय पराक्रम से युक्त क्रूर खर नामक वह (राक्षस), यह समाचार सुनकर कि सब राक्षस मारे गये, यों क्रुद्ध हो उठा कि उसकी आँखों में रक्त उमड़ पड़ा ।

कन्दरा में रहनेवाले क्रूर सिंह भी जिससे डर जायें, ऐसा गर्जन करते हुए खर ने यह आज्ञा दी—'हे सेवको ! मेरा रथ, मेरे चढ़ने के लिए अभी लाओ । मैं युद्ध करूँगा । क्षणमात्र में सेनाओं के निवास में जाओ और मेघ के जैसे बड़े नगाड़ों को हाथियों पर घुमा- कर बजवाओ ।'

ज्योंही नगाड़ों की ध्वनि हुई, त्योंही रथारूढ राक्षसों की सेना एकत्र हो आई, मानों वर्षाकालिक बड़े-बड़े मेघ अपार रूप में घिर आये हों—यह देखकर स्वर्ग और नाग- लोक भी काँप उठे ।

युद्ध की सूचना देनेवाले बड़े नगाड़ों की ध्वनि समुद्र गर्जन के सदृश थी । ( राक्षसों की ) दीर्घ भुजाएँ समुद्र की वीचियों की जैसी थी । महान् गर्जन और मेघ- सदृश काले वर्णवाला समुद्र, प्रलयकालिक पवन से प्रताड़ित होकर उमड़ पड़ा हो—यों वह ( राक्षसों की ) सेना बड़ा कोलाहल करती हुई उमड़ आई ।

घना वन ही उड़कर गगन-तल को ढक रहा हो, (ऐसा दृश्य उपस्थित करते हुए) सर्वत्र उठी हुई ऊँची ध्वजाएँ यों नाच रही थीं, जैसे भूत ही 'हमारी भूख मिट जायगी'. इस विचार से आनन्दित होकर—नाच रहे हों ।

आलान से अभी छूटे हुए, किसी की परवाह न करनेवाले, बड़ी और लम्बी टो- टो सूँड़ोंवाले मत्त हाथियों के झुंड-सदृश वह राक्षस-सेना चल पड़ी । उनके घने शस्त्र एक दूसरे से टकरा उठते थे, तो उनमें जो चिनगारियाँ निकल पड़ती थीं, उनसे सारे वन में आग लग जाती थी ।

दोनों पाश्र्वों में 'मृदङ्ग' ( नामक वाद्य ) बज रहे थे । उनकी ध्वनि, पहियों के

३४२कंब रामायण

घूमने से आगे बढ़नेवाले रथो की ध्वनि मे दब जाती थी। उस सेना ने, करुणा की मूर्ति के समान स्थित रामचन्द्र-रूपी सूर्य को, फैले हुए अन्धकार की तरह घेर लिया।

वह दृश्य ऐसा था, जैसे सप्त लोकों में ऊँचे बढ़े हुए सब पर्वत एक ही स्थान पर इकट्ठे हो गये हो, जिससे बड़े-बड़े सर्पों के द्वारा अपने शिरो पर धारण की हुई यह धरती डोल-डोलकर अपनी पीठ झुकाने लगी।

व्याघ्र-समूह है ? घनघटा है ? गरजते हाथियो का झुड है ? ऊँचे पर्वत हैं ? नही तो सिंहो की सेना है ?—यो सदेह उत्पन्न करते हुए शस्त्रधारी राक्षसों की सेना हजारों की सख्या में आ पहुँची।

(जब राक्षसो की उस सेना मे ऐसे रथ थे, जिनमे) कुछ मे शरभ जुते थे, कुछ मे सिह जुते थे, कुछ में बलवान् हाथी जुते थे, कुछ में बाघ जुते थे, कुछ मे श्वान जुते थे, कुछ में शृगाल जुते थे, कुछ में भूत जुते थे, कुछ मे घोडे जुते थे।

कुछ मे वृषभों के झुंड जुते थे, कुछ मे शूकर जुते थे, कुछ मे वायु-रूपी पिशाच जुते थे, कुछ में गर्दभ जुते थे, कुछ मे वाज जाति के पक्षी जुते थे। वे (रथ) ऐसे थे कि क्षण-भर मे ही सारे ससार मे घूम आ सकते थे।

इस प्रकार के रथों के समुदाय घिर आये। छोटी आँखो और लाल मुखवाले हाथियो के झुंड घिर आये। अपने पैरो से वायु के जैसे अतिवेग से दौड़नेवाले घोड़े घिर आये। उस समय शख बज उठे।

परशु, वरछे, करवाळ, वक्रदड, तोमर, भाले, भुशुडि, जो (शत्रु के) शरीर-भर को आवृत करनेवाले थे, गदाएँ, त्रिशूल, मूसल, काल-पाश—

कुंतक, कुलिश, दंड, भिदिपाल, असख्य धनुष, शर, चक्र, 'वलै', उज्ज्वल शखो के समुदाय, 'कप्पण' पाश—

इत्यादि शस्त्र ऐसे प्रकाशवाले थे कि सूर्य और अग्नि भी उन्हे देखकर मंद पड़ जाते थे, जिनमे (शत्रुओ का) मास और रक्त लगे थे, जो देवो को पीडा देनेवाले थे, जो विजयसूचक पुष्प-माला से अलंकृत थे, घिर आये।

अनेक सहस्र हाथियों के बल से युक्त, विशाल पृथ्वी को निगल सकनेवाले मुँह से युक्त, और अग्नि उगलनेवाली आँखोवाले चौदह राक्षस उस सेना के नायक थे।

विद्वानो का कथन है कि इस सेना-वाहिनी मे एक-एक दल की सख्या साठ लाख थी और उसमे ऐसे चौदह दल थे।

वे सेना-नायक अपार बल से युक्त थे, वज्र-समान घोष करनेवाले मुँह से युक्त थे, सब शस्त्रो के प्रयोग में कुशल हाथोंवाले थे। वे इतने ऊँचे थे कि मेघ, पर्वत-शिखर की भ्रांति से, उनके शिर पर विश्राम करते थे। वे गर्वी थे और उत्साहित मनवाले थे।

उनके आकार अंतरिक्ष को मापते थे। एनके वद्ध नेत्रों की परिधि मे नही आते थे। अपने पैरो से सारी धरती को नाप सकते थे। बड़े पराक्रमवाले थे। देवो के साथ असख्य युद्धों मे उन्होंने विजय प्राप्त की थी।

अरण्यकाण्ड ३४३

उनके कंधे इतने दृढ तथा बलवान् थे कि इन्द्र आदि के द्वारा फेंके गये बड़े शस्त्र उनपर लगकर चूर-चूर होकर छितरा जाते थे। उनकी कठोर आज्ञा ऐसी थी कि यम भी उनके चरणों पर गिरकर उनकी अधीनता स्वीकार करता था। वे ऐसे थे, मानों भयंकर अग्नि ही साकार हो गई हो।

वे शूल, पाश, घने लाल केश, क्रूर नेत्र और खड्ग दंतों से युक्त थे। वे इतने काले थे कि उनके सन्मुख विष भी सफेद जान पड़ता था। अपनी शक्ति से काल भी उन्हे अपना काल समझकर डरता रहता था। वे ऐसे रूपवाले थे।

वे वीर-कंकणधारी थे। पुष्पमालाधारी थे। कवच से आवृत वक्षवाले थे। उज्ज्वल आभरण-भूषित थे। कुंचित भुकुटिवाले थे। अग्नि-सदृश (लाल) केशवाले थे। उनके मन युद्ध की कामना से उनके लिए उमंग से भर जाते थे। अपने में वे लोग बड़ी एकता रखते थे।

अतिदृढ दंत और मद-स्रावी हाथीवाला इन्द्र भी उनके सम्मुख आ जाय, तो वह भी भयभीत होकर, पीठ दिखाकर, भाग खड़ा होगा। तीनो नश्वर भुवनो में युद्ध करने का मौका न पाकर उनके पर्वत-जैसे कंधे खुजलाते रहते थे।

हाथी, घोड़े, भूत, वानर, बलवान् सिंह, क्रोधी भालू, श्वान, व्याघ्र, शरभ—ये अग्नि-सदृश चमकते तथा भयजनक मुखवाले तथा क्षीर-समुद्र में उत्पन्न हलाहल के समान नयनवाले थे।

कोई आठ हाथोवाले थे। कई सात हाथोवाले थे। कई नेत्रो से अग्नि उगलने-वाले सात-आठ मुखोवाले थे। बलिष्ठ टाँगोंवाले थे। प्राणियो को अपने दीर्घ करो से उठाकर मुँह में ठूँसकर चबा जानेवाले थे। विनाशहीन थे।

यक्षो से छीनकर लाये गये, असुरो से दिये गये, देवो को डराकर उनसे बलात् लिये गये, अश्रान्त गन्धवों को भगाकर उनसे छीनकर लाये गये, करुणाळु सिद्धो को सताकर उनसे लिये गये—

मयूर-पक्ष, ध्वजा, छत्र, चामर, हाथियो पर रखने योग्य बड़ी पताकाएँ, वितान तथा अन्य अनेक राजचिह्न, विना व्यवधान के, सर्वत्र शोभायमान थे और गगनतल मे व्याप्त होकर ससार-भर में सूर्य का-सा प्रकाश फैला रहे थे।

वे चौदह सेनापति चौदहो भुवनो को जीतनेवाले थे। वे सैनिक परशुधारी थे, करवाळधारी थे, उज्ज्वल त्रिशूलधारी थे और सिंह और व्याघ्र के समान हिंस्र क्रोधवाले थे।

वे धनुर्धारी थे। वडे खडगो से युक्त थे। ओठो पर रखे (ओठो को चबाते हुए) दाँतोवाले थे। मेरु पर्वत को भी उखाड़ने की शक्ति रखते थे। अश्व-जुते रथोवाले थे। अपने कहे अनुसार करने की धृति और इच्छा-शक्ति रखते थे। ऐसे सैनिक सब दिशाओ से आकर एकत्र हुए।

शत्रुओ के प्राणो को उनके शरीरो से पृथक् करनेवाले और विजयमाला से भूषित त्रिशूलो को धारण किये हुए, दृढता से युक्त दूषण, त्रिशिरा इत्यादि अनेक राक्षस-नायक कोलाहल से भरी, नगाड़े बजानेवाली सेनाओं को लेकर आ पहुँचे।