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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 351, कुल 549 में से

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पृष्ठ 351

अरण्यकाण्ड ३४१

पूर्ण तूणीर को भी लिये, उस पर्णकुटी से बाहर निकले और 'अरे ! इधर आओ ।'—यों वीर- वाद कहते हुए भुजाओं को फुलाये युद्ध करने लगे ।

परशु, करवाल, उज्ज्वल फलवाला त्रिशूल तथा भयंकर प्रलयकालाग्नि की समता करनेवाले उन राक्षसों के स्तम्भ-सदृश हाथों को लक्ष्य-वेधक शरों से काट-काटकर उन्हें धरा- शायी कर दिया ।

बड़े-बड़े शस्त्रों-सहित अपनी भुजाओं के, बड़े-बड़े वृक्षों के समान कटकर गिर जाने पर भी अपने वलिष्ठ वृक्षों को लिये हुए वे राक्षस युद्ध करने के लिए आगे बढ़े । तब वलवान् (राम) के द्वारा प्रयुक्त शर, वेग से उनमें आ लगे, जिससे उनके शिर कटकर गिर पड़े । ( यह दृश्य देखकर ) पापिनी ( शूर्पणखा ) वहाँ से भाग चली ।

गरजनेवाले, क्रोधी तथा पराक्रमी सिंह के द्वारा मत्त हाथियों के मारे जाने पर जिस प्रकार हथिनी अपनी सूँड़ को उठाकर सिर पर रखे हुए चिल्लाती हुई भाग रही हो; उसी प्रकार वह ( शूर्पणखा ) भी भागकर खर के पास गई और उज्ज्वल शूलधारी खर को उसने सब वृत्तान्त सुनाया ।

वृषभवाहन ( शिव ) के लिए भी अजेय पराक्रम से युक्त क्रूर खर नामक वह (राक्षस), यह समाचार सुनकर कि सब राक्षस मारे गये, यों क्रुद्ध हो उठा कि उसकी आँखों में रक्त उमड़ पड़ा ।

कन्दरा में रहनेवाले क्रूर सिंह भी जिससे डर जायें, ऐसा गर्जन करते हुए खर ने यह आज्ञा दी—'हे सेवको ! मेरा रथ, मेरे चढ़ने के लिए अभी लाओ । मैं युद्ध करूँगा । क्षणमात्र में सेनाओं के निवास में जाओ और मेघ के जैसे बड़े नगाड़ों को हाथियों पर घुमा- कर बजवाओ ।'

ज्योंही नगाड़ों की ध्वनि हुई, त्योंही रथारूढ राक्षसों की सेना एकत्र हो आई, मानों वर्षाकालिक बड़े-बड़े मेघ अपार रूप में घिर आये हों—यह देखकर स्वर्ग और नाग- लोक भी काँप उठे ।

युद्ध की सूचना देनेवाले बड़े नगाड़ों की ध्वनि समुद्र गर्जन के सदृश थी । ( राक्षसों की ) दीर्घ भुजाएँ समुद्र की वीचियों की जैसी थी । महान् गर्जन और मेघ- सदृश काले वर्णवाला समुद्र, प्रलयकालिक पवन से प्रताड़ित होकर उमड़ पड़ा हो—यों वह ( राक्षसों की ) सेना बड़ा कोलाहल करती हुई उमड़ आई ।

घना वन ही उड़कर गगन-तल को ढक रहा हो, (ऐसा दृश्य उपस्थित करते हुए) सर्वत्र उठी हुई ऊँची ध्वजाएँ यों नाच रही थीं, जैसे भूत ही 'हमारी भूख मिट जायगी'. इस विचार से आनन्दित होकर—नाच रहे हों ।

आलान से अभी छूटे हुए, किसी की परवाह न करनेवाले, बड़ी और लम्बी टो- टो सूँड़ोंवाले मत्त हाथियों के झुंड-सदृश वह राक्षस-सेना चल पड़ी । उनके घने शस्त्र एक दूसरे से टकरा उठते थे, तो उनमें जो चिनगारियाँ निकल पड़ती थीं, उनसे सारे वन में आग लग जाती थी ।

दोनों पाश्र्वों में 'मृदङ्ग' ( नामक वाद्य ) बज रहे थे । उनकी ध्वनि, पहियों के

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