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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 350, कुल 549 में से

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पृष्ठ 350

३४० | कंब रामायण

जिसको सामने से देखनेवालों की आँखें झुलस जाती थीं, जिसने उस (शूर्पणखा) को पहले ठीक-ठीक नहीं देखा था, अब उसके वचन सुनते ही, यह कहकर उठा कि उन विनाश को प्राप्त होनेवाले मनुष्यों के द्वारा, ताल-फल के कोए के जैसे उखाड़ी गई अपनी नाक को मुझे दिखाओ।

वह उठकर खड़ा हुआ। उसका मन ऐसे क्रोध से बोखला उठा, जो सप्त लोकों को जलाकर भस्म कर सके, और बोला—'मनुष्य-मात्र मर गये, केवल इतना कह देने से ही हमारा यह अपमान नहीं मिटेगा।'१

तब ज्योंही उसने 'रथ लाओ' कहा, त्योंही उसके निकटस्थ रहनेवाले, एक ही हाथ से सारी धरती को उठाने की शक्ति रखनेवाले, दो हाथवाले ऊँचे पर्वतों के जैसे लगनेवाले, चौदह वीरों ने (खर से) निवेदन किया कि यह (युद्ध का) कार्य हमें सौंपो।

त्रिशूल, करवाळ, तोमर, चक्र, कालपाश, गदा आदि शस्त्र हाथों में लेकर वे चले, तो उनके कोलाहल से समुद्र से आवृत्त धरती के सब प्राणी भयभीत हो उठे। उनके आकार ऐसे थे, मानो विष ही साकार बन गया हो।

जलती क्रोधाग्नि से युक्त, उन राक्षसों ने (खर से) कहा—हे वीर ! हमारी सेवा आज धन्य हुई। क्या तुम देवों से युद्ध करने जा रहे हो ? हमारे जीवित रहते यदि तुम मनुष्यों से युद्ध करने जाओगे, तो हमारा जीवन व्यर्थ होगा। यों कहकर उन्होंने उसे रोका।

तब खर ने कहा—ठीक है। अच्छा कहा, यदि मैं इन क्षुद्र मनुष्यों से युद्ध करने जाऊँ, तो देवता लोग हँसेंगे। तुम लोग जाओ। उनको मारकर उनका रक्त पियो और उस सुकुमारी को साथ लेकर आओ।

(खर के) यह आज्ञा देते ही, आनंदित होकर उन वीरों ने उसे प्रणाम किया और समाचार देनेवाली निर्लज्ज (शूर्पणखा)-रूपी यम के दूत को आगे करके, उसके पीछे-पीछे चलकर दशरथ के पुत्रों के निवास पर गये।

उस (शूर्पणखा) ने कोलाहल के साथ युद्ध के लिए आये हुए उन राक्षसों को, कमल-समान नेत्रवाले उन राम को अपनी उँगली उठाकर दिखाया, जो अकलंकमहमनाम वाले चक्रपाणी (विष्णु) के ध्यान में मग्न थे।

कुछ राक्षस कह रहे थे कि (उन मनुष्यों को) पकड़कर ऊपर उछालेंगे। फिर, हाथों में रोक लेंगे। और, कुछ कहते थे कि इन्हें दीर्घ पाश से हम बाँधेंगे। यों सब राक्षसों ने, अपने नायक (खर) की आज्ञा के अनुसार कार्य को पूर्ण करने के विचार से, पहाड़ों के जैसे आकर उन (राम-लक्ष्मण) को घेर लिया।

अपरिमित शक्तिवाले राम ने अपने अनुज को यह आदेश देकर कि देवी की रक्षा करो, उज्ज्वल कल्पवृक्ष के पुष्प-समान अपने अनुपम करों से डोरी से युक्त पर्वत-सदृश विशाल भारी धनुष को उठा लिया।

कमल-सदृश नयनोंवाले प्रभु, यों (धनुष को) उठाये, करवाल के साथ बाणों से


१ भाव यह है कि संसार के सारे मनुष्यों को मार देने से भी हमारा यह अपमान न मिटेगा।—ने०