कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 352, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३४२ | कंब रामायण |
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घूमने से आगे बढ़नेवाले रथो की ध्वनि मे दब जाती थी। उस सेना ने, करुणा की मूर्ति के समान स्थित रामचन्द्र-रूपी सूर्य को, फैले हुए अन्धकार की तरह घेर लिया।
वह दृश्य ऐसा था, जैसे सप्त लोकों में ऊँचे बढ़े हुए सब पर्वत एक ही स्थान पर इकट्ठे हो गये हो, जिससे बड़े-बड़े सर्पों के द्वारा अपने शिरो पर धारण की हुई यह धरती डोल-डोलकर अपनी पीठ झुकाने लगी।
व्याघ्र-समूह है ? घनघटा है ? गरजते हाथियो का झुड है ? ऊँचे पर्वत हैं ? नही तो सिंहो की सेना है ?—यो सदेह उत्पन्न करते हुए शस्त्रधारी राक्षसों की सेना हजारों की सख्या में आ पहुँची।
(जब राक्षसो की उस सेना मे ऐसे रथ थे, जिनमे) कुछ मे शरभ जुते थे, कुछ मे सिह जुते थे, कुछ में बलवान् हाथी जुते थे, कुछ में बाघ जुते थे, कुछ मे श्वान जुते थे, कुछ में शृगाल जुते थे, कुछ में भूत जुते थे, कुछ मे घोडे जुते थे।
कुछ मे वृषभों के झुंड जुते थे, कुछ मे शूकर जुते थे, कुछ मे वायु-रूपी पिशाच जुते थे, कुछ में गर्दभ जुते थे, कुछ मे वाज जाति के पक्षी जुते थे। वे (रथ) ऐसे थे कि क्षण-भर मे ही सारे ससार मे घूम आ सकते थे।
इस प्रकार के रथों के समुदाय घिर आये। छोटी आँखो और लाल मुखवाले हाथियो के झुंड घिर आये। अपने पैरो से वायु के जैसे अतिवेग से दौड़नेवाले घोड़े घिर आये। उस समय शख बज उठे।
परशु, वरछे, करवाळ, वक्रदड, तोमर, भाले, भुशुडि, जो (शत्रु के) शरीर-भर को आवृत करनेवाले थे, गदाएँ, त्रिशूल, मूसल, काल-पाश—
कुंतक, कुलिश, दंड, भिदिपाल, असख्य धनुष, शर, चक्र, 'वलै', उज्ज्वल शखो के समुदाय, 'कप्पण' पाश—
इत्यादि शस्त्र ऐसे प्रकाशवाले थे कि सूर्य और अग्नि भी उन्हे देखकर मंद पड़ जाते थे, जिनमे (शत्रुओ का) मास और रक्त लगे थे, जो देवो को पीडा देनेवाले थे, जो विजयसूचक पुष्प-माला से अलंकृत थे, घिर आये।
अनेक सहस्र हाथियों के बल से युक्त, विशाल पृथ्वी को निगल सकनेवाले मुँह से युक्त, और अग्नि उगलनेवाली आँखोवाले चौदह राक्षस उस सेना के नायक थे।
विद्वानो का कथन है कि इस सेना-वाहिनी मे एक-एक दल की सख्या साठ लाख थी और उसमे ऐसे चौदह दल थे।
वे सेना-नायक अपार बल से युक्त थे, वज्र-समान घोष करनेवाले मुँह से युक्त थे, सब शस्त्रो के प्रयोग में कुशल हाथोंवाले थे। वे इतने ऊँचे थे कि मेघ, पर्वत-शिखर की भ्रांति से, उनके शिर पर विश्राम करते थे। वे गर्वी थे और उत्साहित मनवाले थे।
उनके आकार अंतरिक्ष को मापते थे। एनके वद्ध नेत्रों की परिधि मे नही आते थे। अपने पैरो से सारी धरती को नाप सकते थे। बड़े पराक्रमवाले थे। देवो के साथ असख्य युद्धों मे उन्होंने विजय प्राप्त की थी।