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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 360, कुल 549 में से

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पृष्ठ 360
३५०कंब रामायण

तब वे सब सेनापति धनुषो के खो जाने से अत्यन्त क्रुद्ध होकर, बड़ी शिलाओ को लेकर, आकाश में उड़ गये और सूर्य की कांति के समान ज्वाला उगलनेवाली शिलाओं को (राम पर) बरसाने लगे।

शास्त्र-रूपी समुद्र को पार करनेवाले ज्ञानवान् प्रभु ने, प्राणहारी धनुष के साथ अपनी भौहों को भी झुकाकर उनपर पत्राकार चौदह भयंकर बाण छोड़े, जिससे वे पर्वत-खंड एवं उन सेनापतियों के शिर पृथ्वी पर आ गिरे।

इस प्रकार वे चौदहो सेनापति मरकर गिर पड़े। तब अन्य एक राक्षस-सेना, अनेक शस्त्रों को उछालती हुई तथा अपनी आँखों से अग्नि उगलती हुई रामचन्द्र के सम्मुख आ गईं और पृथ्वी पर, गगन मे एवं सब दिशाओं में फैल गई। यह देखकर देवता काँप उठे।

तब बड़े नगाड़े गर्जन कर उठे। बड़े हाथी गर्जन कर उठे। दृढ़ धनुषों की डोरियाँ गर्जन कर उठीं। शंखो के साथ अश्व भी गर्जन कर उठे। मेघ-गर्जन के समान राक्षसो की गर्जन-ध्वनि भी होने लगी।

राक्षसो के द्वारा फेंके गये, गगन-मार्ग से आनेवाले शस्त्र, वीर (राम) के बाणों से कटकर कही अपने ऊपर न आ गिरें, यह सोचकर देवता लोग भाग जाते थे। समस्त लोक काँप रहे थे। निष्कंप रहनेवाले दिग्गज भी आँखें बंद कर लेते थे।

उस उत्तम सेना का सेनापति तीन शिरोंवाला (त्रिशिर नामक) राक्षस था। जो अपार बल-सपन्न था स्वर्ण-मुकुटधारी था, अपने धनुष से तीक्ष्ण नोंकवाले बाणों की वर्षा करनेवाला था और त्रिनेत्र के हाथ में रहनेवाले त्रिशूल के जैसा आकारवाला था।

उस राक्षस-वीर के साथ, प्रलयकालिक महासमुद्र के समान सब दिशाओं से उमड़कर आई हुई उस राक्षस-सेना के बीच में धनुष को लिये, अपनी समता स्वयं करनेवाले वीर (रामचन्द्र) ऐसे लगते थे, जैसे घने अंधकार के मध्य दीप हो।

उज्ज्वल करवालधारी, वज्र-सदृश घोषवाले, भारी कवच से आवृत, तथा क्रूर नेत्र-वाले उस राक्षस (त्रिशिरा) की सेना पर राम अपनी शरवाहिनी चलाते हुए खड़े रहे।

तब उन राक्षसों के पैर, भुजाएँ, करवाल, परसे, उनकी कटि और उनके छत्र—सब-के-सब कटकर गिर गये।

जब ध्वजाएँ और कठोर क्रोधवाले अश्वों की पंक्तियाँ विध्वस्त हो गई, तब बड़े-बड़े रथ धरती पर गिर गये और भारी तथा बलिष्ठ मत्तगज वज्रपात से टूटकर गिरनेवाले पर्वत-शिखरों के समान लुढ़क गये।

शिर कट जाने पर कुछ राक्षस यह न समझते हुए कि उनके शिर कट गये हैं, अपने विजयी धनुष से शर छोड़ते ही रहे। जिनके शिर अभी कटे नही थे, वे गगन में छाये मेघों के समान अपने शस्त्र चला रहे थे।

ढाल लिये हुए विशाल हाथो, पर्वत-समान भीम आकारवाले तथा स्वर्णमय कवच धारण करनेवाले महावीरों के शिरोहीन धड़ तड़पते, उछलते हुए ऐसे नाच उठे कि नूपुरो से भूषित अप्सराएँ भी वह नाच देखकर मुग्ध हो गईं।